Wednesday, 31 December 2008

नए साल की शुभकामनायें...


आप सबको नए साल की शुभकामनायें--- ये नया साल आपके जीवन में नई खुशियाँ लायें और प्रगति के नए पथ पर लाये...

Tuesday, 30 December 2008

ये पहला युद्ध नहीं है...ये चलता रहेगा!

मोहन थपलियाल कौन हैं मुझे नहीं मालूम लेकिन इन्टरनेट पर उनकी कुछ लाइने देखी और ख़ुद को कुछ लिखने से रोक नहीं पाया। मुझे लगा उनकी लाइने आपतक पहुंचानी चाहिए---
"युद्ध जो आ रहा है
पहला युद्ध नहीं है।
इससे पहले भी युद्ध हुए थे।
पिछला युद्ध जब खत्म हुआ
तब कुछ विजेता बने और कुछ विजित।
विजितों के बीच आम आदमी भूखों मरा
विजेताओं के बीच भी मरा वह भूखा ही।"

आज हम फ़िर भारत-पाकिस्तान के बीच लड़ाई की ख़बरों के माहौल में जी रहे हैं. शायद लड़ाई हो ही जाए और शायद लड़ाई न हो. लेकिन आम आदमी की समस्याएं कभी ख़त्म नहीं होंगी. अगर लड़ाई होगी तो वो लड़ाई में मारा जाएगा और जो लड़ाई से बचेगा वो भूख से मरेगा. लेकिन अगर लड़ाई नहीं होगी तो वैसे भी आम आदमी भूख से मारा जा रहा है. चाहे वो गाजा पट्टी का आदमी हो या भारत का या फ़िर आपसी संघर्ष में उलझे अफ्रीका के लोग सब मरने-मारने पर उतारू है. उसे उकसाने वाला सुरक्षित है और वो ख़ुद को इस संघर्ष का आसान शिकार होता हुआ देखने को मजबूर है. लेकिन कहते हैं न कि जिंदगी चलने का नाम है और ये कभी रूकती नहीं. अपना ये आम आदमी भी इसी विचारधारा पे चलता है और ऐसे ही चलता रहेगा...

Sunday, 28 December 2008

रेव पार्टी करने वालों को नहीं दिखा सकेगी मीडिया...

नया साल आने को है लेकिन हर जगह मायूसी सी छाई हुई है। यहाँ तक कि हर साल नए साल पर रंगीन रहने वाला गोवा भी इस बार कुछ सहमा-सहमा सा नजर आ रहा है। वहां के बीच पर हर साल होने वाले खुले रेव पार्टी और मौज-मस्ती के नशे में चूर देशी-विदेशी मस्तमौला लोग इस बार कुछ खुश नहीं दिखाई दे रहे हैं। ऐसा वहां की सरकार द्वारा खुले में होने वाली रेव पार्टियों पर पाबन्दी लगाने के कारण हुआ है. हालाँकि इसबार भी गोवा में रेव पार्टी होगी लेकिन केवल होटलों में ही. हर बार की तरह इस बार खुले में मौज-मस्ती करने वाले चाहरदीवारी के अन्दर ही अपनी खुशी का प्रदर्शन कर पाएंगे. गोवा की सरकार ऐसा राज्य की छवि सुधारने के लिए कर रही है? हम भी उम्मीद करते हैं शायद इससे गोवा की छवि सुधर ही जाए.

नए साल पर मचने वाले धमाल पर नज़र गड़ाए मीडिया के लिए भी ये नया साल कुछ मजेदार नहीं होने जा रहा है। महाराष्ट्र की सरकार ने रेव पार्टी में शामिल मस्तमौलों की मौज-मस्ती टीवी पर दिखाने पर पाबन्दी लगा दी है. सरकार का कहना है कि इस तरह से मीडिया रेव पार्टी करने वाले "निर्दोष बच्चों" को दिखाकर ठीक नहीं कर रही है इसलिए मीडिया अब ऐसे नीर-दोष बच्चों की कवरेज़ नहीं कर पायेगी. अब आप ही बताइए कि सरकार नए साल की कवरेज़ ही नहीं करने देगी तो खबरों की तलाश में घुमने वाले पत्रकार कहाँ से मसालेदार ख़बर ला पाएंगे. और टीवी के परदे सूने ही दिखाई देंगे.

इधर मुंबई में हमेशा मुगदर भांजते रहने वाले मशहूर चाचा-भतीजा इस बार कुछ खास नहीं कर पा रहे हैं. वहां आतंकी हमले के बाद से उनको धमाल मचाने का मौका नहीं मिल पा रहा है. चाचा तो कभी-कभी देशभक्ति की नाल थामकर अपनी गोली दाग भी देते हैं लेकिन अपने भतीजे साहब उसी समय से गायब हैं. उनके लिए भी नया साल फ़िर से नई शुरुआत का मुहूर्त साबित हो सकता है. वे नए साल पर फ़िर से धमाल मचाने मैदान में उतर सकते हैं और इस बार शायद संस्कृति की दुहाई देकर बाहरी(देशी-विदेशी मस्तमौला और वहां की सरकार की नज़र में निर्दोष बच्चे) लोगों की ठोक-बजाई करने लगें. उनके लिए ये गेम सेफ भी होगा. अब मौज-मस्ती करने वाले लोग आतंकवादी थोड़े हैं जिनसे भइया को डर लगेगा. भाई जो मौज-मस्ती करने आएंगे वे तो बस भइया से पिटने लायक ही होंगे. अब हमें तो इंतजार है कि कब भइया अपने दरबे से बाहर निकले और हमारे नए साल को मसालेदार बनाये...इस बार तो रेव पार्टी का फ्रंट भी खुला होगा. मीडिया कवरेज़ पर रोक की वजह से दुनिया उनकी नीर-दोषता भी नहीं देख सकेगी...

चलो अमेरिका की बेरोजगारी ख़त्म हो गई...

जबसे विश्व बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ने लगा था तब से अमेरिकी कूटनीति में भी मंदी दिखाई दे रही थी. चीन के बढ़ने और मजबूत होने से एशिया में उसकी दादागिरी बंद हो गई थी और अफ्रीका वालों ने भी उसे इधर ज्यादा मौका नहीं दिया था. लेकिन जब से मुंबई में हमले हुए हैं और भारत-पाकिस्तान अपना हथियार भांज रहे हैं. तबसे अमेरिकी कूटनीति की बेरोजगारी ख़त्म होने के संकेत दिखने लगे थे और इधर इस्रायेल ने गाजा पट्टी में हमला शुरू कर अमेरिका को और उसके यहाँ की राजनयिक कौम को फ़िर से मालामाल होने का मौका दे दिया है. लंबे समय से आर्थिक मंदी से जूझ रहा अमेरिका इस मौसम में हथियार बेचकर अपनी हालत सुधार सकता है.....

Thursday, 25 December 2008

ठेकेदारी. धनउगाही.. चंदा... राजनीति....वगैरह-वगैरह

कल उत्तर प्रदेश के औरैया में एक सरकारी इंजीनियर की हत्या कर दी गई. हत्या का आरोप प्रदेश में सत्ताधारी दल के एक विधायक और उसके समर्थकों पर लगा. आरोप लगा कि ये प्रदेश के मुख्यमंत्री के जन्मदिन समारोह के लिए चंदा उगाही को गए थे. उसी को लेकर विवाद बढ़ा और विधायक समर्थकों ने पीटपीट कर इंजीनियर की हत्या कर दी। ऐसा नहीं है कि ये घटना हमारे देश में पहली बार हुई है। अगर आप बिहार और उत्तर प्रदेश की ख़बरों पर ध्यान रखते हैं तो ऊपर शीर्षक में लिखे शब्द रोज ही आपको पढने-सुनने को मिल जायेंगे. अख़बारों में विकास की तमाम योजनाओं की ख़बर के साथ उन योजनाओं के लिए आने वाले करोड़ों के बजट को लूटने-हथियाने के लिए होने वाली लडाई इन राज्यों में बहुत आम है. ऐसा भी नहीं है कि इस तरह का काम केवल बिहार, उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों और छोटे शहरों में ही होता है. बल्कि मुंबई और अन्य बड़े शहरों में भी इस तरह की बातें देखने-सुनने को मिलती है. फर्क सिर्फ़ इतना है कि गाँव में इस तरह का लूटमार करने वाले वहीँ के दबंग लोग होते हैं और शहरों में ऐसा करने वाले लोगों के साथ डॉन, माफिया जैसे फिल्मी शब्द चस्पां कर दिए गए हैं. बड़े शहरों की यही कहानियाँ मुम्बईया फिल्मों का मसाला बनती है।

देश के इन दोनों ही हिस्सों में इस कौम के लोग रहते हैं। इनके पास न तो धन-बल की कोई कमी होती है और न ही इनके पास व्यवस्था में पैठ की कोई कमी होती है. ये लोग मीडिया को अपने पक्ष में इस्तेमाल करना जानते हैं. गाँव में रहने वाले इस कौम के लोग आजकल राजनीति में धड़ल्ले से शामिल हो रहे हैं. क्यूंकि इन्हें ये मालूम है कि देश के संसाधनों का अगर अपने पक्ष में इस्तेमाल करना है तो पहले व्यवस्था को अपने हाथ में करो. राजनीति में ऐसे लोगों की पूछ भी कम नहीं है. जनता भले ही चौक-चौराहों पर इन बाहुबली लोगों को बुरा कहें लेकिन जब मतगणना होती है तो यही लोग विजय पताका फहराते दिखते हैं. अगर आपमें बाकि लोगों को ठिकाने लगा पाने और ख़ुद को ऐसे ही अन्य लोगों से बचा पाने की कुव्वत है तभी आप राजनीति में सफल हो सकते हैं और विधान सभाओं और संसद तक पहुँच सकते हैं. हमारे गाँव में कहा जाता है कि अगर आपके पास बाहुबल है तभी राजनीति में सफल हो सकते हो वरना वो धोती-कुरता और खद्दर के कुरते वाली राजनीति का समय अब कहाँ रहा. जनता ऐसे लोगों से परहेज नहीं करती है और ऐसे लोगों के हाथों में अपना भविष्य सुरक्षित मानती है. शायद जनता को ऐसा लगता है कि यही वो लोग हैं जो अपनी रक्षा करने में सक्षम हैं और इन्हीं के हाथों में अपना जीवन सौंपा जा सकता है. शायद इसी लिए जनता ऐसे लोगों को राजनीति में आगे करती है और इतना ताकत देती है कि विकास योजनाओं के लिए आए करोडों कि राशि को लूटकर मालदार बनते जा रहे ठेकेदार और अन्य अधिकारीयों से चन्दा वसूली कर सकें. ऐसे लोग इस विचारधारा में भरोसा रखते हैं कि भाई जब देश को लूट ही रहे हो तो सबको मिलकर खाना चाहिए. आख़िर हम लोकतंत्र में रहते हैं और देश के साथ-साथ यहाँ की मलाई पर भी सबका बराबर हक़ होना चाहिए.

देश में इस विचारधारा को आगे बढ़ाने में लगे इस कौम के महापुरुषों की सबसे बड़ी दुश्मन अपनी मीडिया है. जब ऐसे लोग अपनी "मेहनत और परिश्रम" के बल पर चुनाव जीतकर विधान-सभा और संसद तक पहुँच जाते हैं तो मीडिया इनके पीछे पड़ जाती है. दावेदारी होने के बाद भी मीडिया के दबाव में ऐसे लोग मंत्री पद पर नहीं पहुँच पाते. अगर मीडिया इनके रस्ते में रोड़ा न बने तो देश की मुख्यधारा में भी ऐसे बाहुबल, चंदा वसूली और अन्य तकनीक अपनाकर आगे बढ़ने वाले लोगों की अच्छी-खासी संख्या हो जायेगी. और पूरा देश खुशहाल और बाहुबली हो जाएगा. तब शायद...
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......बहुत कुछ हो जाए...

Tuesday, 23 December 2008

वाइन, चाकलेट से दिमाग हमेशा रहता है तेज?

एक ख़बर देखकर मन में कई सवाल उठे। ख़बर थी- वाइन, चाकलेट और चाय के शौकीनों को ज्यादा मन मसोसने की जरूरत नहीं। हाल में किए गए वैज्ञानिक शोध में इन सभी चीजों को मस्तिष्क की क्षमता बढ़ाने में मददगार पाया गया है। अक्सर इस तरह के शोध के परिणाम अख़बारों में छपते रहते हैं। मन में एक सवाल उठा कि क्या वैज्ञानिकों के पास काम का इतना अकाल है कि उनको इस तरह की बकवास बातों को साबित करने में अपनी एनर्जी खपानी पड़ रही है. वैज्ञानिक किस आधार पर ये परिणाम दे रहे हैं ये तो मुझे नहीं मालूम लेकिन जहाँ तक मैंने दुनिया देखी है उसमें तो ऐसा नहीं होते देखा है। चाय-काफ्फी तक तो ठीक है, चाकलेट तक भी ठीक है लेकिन अगर कोई ये कहे कि दारु दिमाग बढ़ने में सहायक है तो मैंने तो अबतक ऐसा नहीं देखा है.

मैंने अपने आस-पास काफ़ी बड़ी संख्या में लोगों को शराब पीते हुए देखा है वाकई चढ़ने के बाद कइयो का दिमाग तेज काम करने लगता है। मेरे एक परिचित जो कि आम तौर पर हिन्दी में बात करते हैं शराब पीने के बाद अक्सर अंग्रेजी में बात करने लगते हैं. इसी तरह मेरे एक अन्य मित्र कहते हैं कि शराब पीने के बाद उनका कांफिडेंस बढ़ जाता है. लेकिन कई लोगों के साथ शराब कुछ अलग असर भी दिखाता है. पीने के बाद कई तो सड़क किनारे गड्ढे में पड़े हुए मिलते हैं. हो सकता है कि जिन वैज्ञानिकों ने शोध किया हो उनके पास प्रयोग के लिए लाइ गई शराब में कुछ ऐसा तत्व हो जो अलग परिणाम दे लेकिन सबको तो इस तरह का अद्भुत शराब मिल नहीं सकता. उन वैज्ञानिकों के लिए मैं एक जानकारी देना चाहूँगा कि हमारे देश में हर साल सैकड़ों लोग जहरीली शराब पीकर मर भी जाते हैं और इससे भी कई गुना ज्यादा लोग शराब पीकर अपनी जिंदगी, अपना परिवार सबकुछ बर्बाद कर लेते हैं. उन्हें भी इन वैज्ञानिकों के शोध से कुछ फायदा हो सकता है.

हमारे देश में शराब, सिगरेट, गुटखा आदि का सेवन एक बुरी आदत के रूप में मानी जाती है। लेकिन इसपर रोक नहीं है। देश में इन चीजों की खुलेआम बिक्री होती है. शराब की बिक्री के लिए कई दिशा निर्देश जारी किए जाते है. अपने देश में कई सारे ड्राई डे तय किए हैं. अब ये कितने कारगर होते हैं ये बता पाना तो मुश्किल है. क्यूंकि अगर मुझे शराब पीना है और मालूम है कि कल ड्राई डे है तो मैं अपना जुगाड़ आज ही कर लूँगा. ये भी व्यवस्था से निकला हुआ उपाय है. इसके आलावा पिछले दिनों सार्वजानिक स्थानों पर धुम्रपान करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया. लेकिन इसके उत्पादन पर किसी भी तरह का प्रतिबन्ध नहीं है. अगर सरकार इसे ग़लत मानती है तो इसके उत्पादन पर भी लगाम लगानी चाहिए. इसके बिना इसपर रोक का नाटक बेमानी है और केवल ख़ुद को धोका देने जैसी बात है.

जाहीर है ऐसे हालत में शोध करने वाले वैज्ञानिकों का मार्केट बढ़ जाएगा. अगर इन चीजों को प्रतिबंधित किया जा रहा है और वैज्ञानिक कहे कि इन चीजों के इस्तेमाल से दिमाग तेज होता है तो जाहीर है पीने वालों को अपने समर्थन में कुछ कहने को मिल जाएगा. फ़िर तो ये लोग कह पाएंगे कि शराब वगैरह का सेवन आज कि दुनिया में बहुत जरूरी है. ज्ञान आधारित दुनिया में सर्वाइव करने के लिए दिमाग बढ़ाना जरूरी है और ये तभी हो पायेगा जब शराब का सेवन किया जाएगा. दुनिया भर में इस खोज का समर्थ करने वाले इतने मिल जायेंगे कि मजबूरन इन वैज्ञानिकों को नोबल पुरस्कार देना पड़ जाएगा.

क्या आतंकवाद पाकिस्तान की सरकारी नीति में शामिल है...

मुंबई में आतंकी हमलों के लगभग १ महीने होने जा रहे हैं. इस बीच इस मामले की जांच और कार्रवाई के नाम पर कहीं कुछ भी होता हुआ नजर नहीं आया. ये पूरा महीना इसी में निकल गया- भारत कहता रहा कि पाकिस्तान को आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करनी ही होगी और दूसरी ओर पाकिस्तान लगातार ये कहता रहा कि उसे सबूत नहीं मिले हैं. पूरा महीना भारत की ओर से धैर्य दिखाने और पाकिस्तान की ओर से बेशर्मी दिखाने में गुजर गया. बीच-बीच में अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के नेता भी इस नाटक में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे और बयानबाजी कर ख़बरों में छाते रहे। लेकिन खुलेआम आतंकवादियों को बचाने में लगे पाकिस्तान को कोई भी ये नहीं कह पाया कि भारत पाकिस्तान से दुश्मनी की बात नहीं कर रहा है बल्कि भारत उन आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग कर रहा है जिन्होंने मुंबई में घुसकर निर्दोष लोगों को मारने की योजना बनाई. अब केवल योजना बनाने वालों को ही सजा दी जा सकती है क्यूंकि इस योजना को अंजाम देने वाले तो पहले ही मारे गए और एक आतंकी भारत की जेल में है।

पाकिस्तान की मीडिया में इस ख़बर के आने के बाद भी कि एकमात्र जिन्दा पकड़ा गया आतंकी पाकिस्तान के फरीदकोट गाँव का है वहां के सियासतदान बेशर्मी से इसे नकार रहे हैं. जब विपक्ष के नेता नवाज शरीफ ने कहा कि कसब पाकिस्तान का है तो वहां की सूचना मंत्री ने कहा कि इस मामले पर पाकिस्तान के सभी दलों को एकता दिखानी चाहिए. अब भला सूचना मंत्री से पूछा जाना चाहिए कि क्या वो आतंकवादियों की हिमायत में पाकिस्तान की एकता की बात कर रही हैं या फ़िर वहां आतंकवाद सरकारी नीति में शामिल है. ये बात अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को पाकिस्तान से साफ़ शब्दों में पूछना चाहिए. अमेरिका और तमाम पश्चिमी देशों के जो नेता ये कहते हुए रोज दौरे पर आ रहे हैं कि उनका प्रयास भारत-पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव को कम करना है. लेकिन कोई इनसे सवाल पूछे कि आख़िर इस तरह कैसे तनाव कम होगा. अगर तनाव को कम ही करना ही है तो विश्व को पाकिस्तान पर आर्थिक और अन्य तरह से लगाम लगानी चाहिए ताकि वो अपनी गलती को मानने को मजबूर हो जाए। पाकिस्तान को हथियार बेचने वाले देशों को भी अपने व्यापार से ज्यादा इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि कैसे पाकिस्तान को आतंकवादी पैदा करने वाला देश बनने से रोका जाए. पाकिस्तान को इस बात के लिए मजबूर किया जाए कि वो आतंकवाद का व्यापार बंद कर रोजी-रोटी के लिए कोई और पेशा चुने...और भारत को भी अब धैर्य का रास्ता छोड़ पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए तैयार होना पड़ेगा. वरना ऐसे ही पाकिस्तान के लोग पैसे के लिए फिदायीन बनते रहेंगे और भारत पर आतंकी हमले होते रहेंगे...

Saturday, 20 December 2008

विरोध के सबसे सस्ते हथियार का जनक कौन...शायद जैदी...

कल अख़बार में एक कार्टून पर नज़र गई। कार्टून में एक नेताजी को भाषण देते हुए दिखाया गया था. वे माइक नीचे कर डायेस की ओट में से छुपकर भाषण दे रहे थे. उनकी सुरक्षा के लिए सामने खड़ा पुलिसवाला कह रहा था कि सर खड़े होकर बोलिए कोई खतरा नहीं है. ये पूरा ऑडिटोरियम शू-फ्री( आप इसे जूता मुक्त जोन भी पढ़ सकते हैं) है...जाहीर है ये कार्टून इराकी पत्रकार मुन्तदर-जैदी के हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति बुश पर फेंके गए जूते पर आधारित था. किसी ने दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति के प्रमुख के ऊपर जूते फेंके. ये कार्टून उसी से उपजे डर को प्रदर्शित कर रहा था. जिस नेता बिरादरी पर हमारी व्यवस्था को चलाने की जिम्मेदारी होती है वही नेता बिरादरी विरोध के इस नए हथियार के निशाने पर है. मुंबई में भी जब आतंकी हमले हुए और लोगों ने आम लोगों की सुरक्षा के लिए मुखर होकर बोलना शुरू कर दिया तब भारत में भी ऐसा ही हुआ था. जब आम लोग केवल वोटर बने रहने की हद से आगे बढे और राजनेताओं के खिलाफ बोलने लगे तो यहाँ भी आवाज को दबाने का प्रयास हुआ था. कुछ लोगों ने तो विरोध करनेवालों और अपनी जान की सुरक्षा की मांग करने वाले लोगों को आतंकवादी तक करार दे दिया था. लेकिन ये भी सच है कि लोग जब बोलने की ठान लें तो उन्हें कोई रोक नहीं सकता. जैदी ने यही साबित किया. जिस बात को इराक के लोग कई सालों से दुनिया को नहीं सुना पा रहे थे उसे जैदी ने इतनी आसानी से और बिना किसी खर्च के पूरी दुनिया को सुना दिया.

जैदी वाली घटना के बाद तो अमेरिकी मीडिया में भी बुश द्वारा इराक में अपनाई गई नीति पर सवाल उठने लगा है. हालाँकि इस सस्ते हथियार की सफलता के लिए जैदी को भारी कीमत चुकानी पड़ी है. हिरासत में उसे इतना मारा गया कि उसकी हड्डी-पसलियाँ तक टूट गई. इस मामले की सुनवाई कर रहे जज ने ये बातें मीडिया को बताई. बुश पर जूता फेंकने वाला ये युवा पत्रकार आज दुनिया के उन लोगों के लिए किसी हीरो से कम नहीं हैं जो ये पसंद नहीं करते कि अमेरिका दुनिया पर अपनी दादागिरी दिखाए. दुनिया भर में इस घटना को लेकर प्रतिक्रियाएं आई. लोगों ने अपनी-अपनी तरफ़ से इस घटना की तारीफ की या फ़िर विरोध किया। ब्राजील के राष्ट्रपति हुगो शावेज ने जैदी को एक बहादुर और साहसी नौजवान बताया तो पूरे अरब जगत ने भी इस कदम को एक साहसी कदम बताया. बहरीन के एक अमीर ने अपनी मर्सिडीज कार उस पत्रकार को इनाम में देने की घोषणा की तो इराकी फुटबॉल टीम के एक पूर्व खिलाड़ी ने बुश की ओर चलने वाले जूते को नीलाम करने की घोषणा कार दी। लेकिन क्या अमेरिका इसे बर्दाश्त कर सकता था कि कोई कल को इस जूते को कहीं प्रदर्शनी में रखकर ये कहे कि देखो ये वही जूता है जो सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका के राष्ट्रपति पर फेंका गया था। जाहीर है अमेरिका इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता था और उसने किया भी नहीं। अमेरिकी सैनिकों ने उस पत्रकार को हिरासत में तो तोडा ही उसके जूते को भी सुरक्षा जांच के नाम पर नष्ट कर दिया। कहा गया कि ये देखने के लिए कि उस जूते में कहीं बम तो नहीं है सुरक्षा अधिकारीयों ने उसे नष्ट करवा दिया.

सवाल ये भी है कि जैदी ने ऐसा क्यूँ किया. जाहीर है पिछले कई वर्षों से इराक के लोग जो जीवन जी रहे हैं उसके लिए अमेरिका सबसे ज्यादा जिम्मेदार है या फ़िर जो भी हो. रोज मर-मर कर जीने लायक हो गए इस इस जीवन ने जैदी जैसे पढ़े-लिखे युवाओं को ऐसा करने पर मजबूर कर दिया है. वो पेशे से पत्रकार जरूर है लेकिन वो ख़बरों से समाज और लोगों की जिंदगी बदलने के जुमले को आजमाते-आजमाते उब गया लगता है और आख़िर में उसने वो कर दिया जो व्यवस्था से मायूस युवा हर देश में करते हैं. जैदी के साथ-साथ अन्य लोगों को भी शायद यही लगता है कि इराक की दुर्दशा के लिए अमेरिका ही सबसे ज्यादा दोषी है और कलम की ताकत को आजमाकर थक चुके जैदी ने तब जूते का सहारा लिया. दुनिया के हर हिस्से का आम आदमी आने वाले कल में अपने जिंदगी में बदलाव की उम्मीद लिए जी रहा है और जो भी उसे रोकने का प्रयास करेगा वो उसका विरोध करेगा. जैदी ने तो दुनिया को बस विरोध का एक नया हथियार भर दिया है. अमेरिका इसे बर्दाश्त कर भी कैसे सकता था उसने विरोध के इस नए प्रतिक को नष्ट करवा दिया. लेकिन क्या इस नए हथियार को रोका जा सकता है. शायद नहीं...लेकिन फ़िर भी इस घटना ने दुनिया को और खासकर आम लोगों को विरोध का एक हथियार तो दे ही दिया. कि जो तुम्हे लगातार जूते मार रहे हैं और तुम्हारी जिंदगी को नरक बनाये हुए हैं उन्हें तुम भी जूते मारो...

Saturday, 13 December 2008

काहे का प्रशासनिक(?) सुधार आयोग...

कांग्रेस नेता वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में बनी प्रशासनिक सुधार आयोग ने देश के प्रशासनिक ढांचे में सुधार के लिए कई अनुसंशायें की हैं। जिनमें एक निश्चित समय अन्तराल पर अधिकारियों की फिटनेस और तमाम मोर्चों पर समीक्षा भी शामिल है. आयोग ने सिविल सेवा परीक्षा में बैठने वाले उम्मीदवारों के लिए नई उम्र सीमा तय करने की मांग की है. आयोग की माने तो सामान्य वर्ग से अब वे ही उम्मीदवार परीक्षा दे सकेंगे जिनकी उम्र २५ साल से कम हो. यानि कि उनके लिए सिविल सेवा में आने के लिए अब ३० साल तक का मौका न होकर २५ साल तक का मौका ही मिल सकेगा, उन्हें ३ बार परीक्षा देने का मौका ही मिल सकेगा। और जो सामान्य नहीं हैं यानि कि असामान्य वर्ग के लोग वे भी आयोग के फैसले से खुश नहीं होंगे. ओबीसी वर्ग के लोग अब ३३ के बजाय २८ साल और अनुसूचित जाती और जनजाति के लोग ३५ के बजाय २९ साल तक परीक्षा दे सकेंगे. ओबीसी वर्ग के लोगों को ५ बार परीक्षा में बैठने का मौका मिल सकेगा और अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के लिए ये मौका ६ बार का होगा.

जाहिर सी बात है कि प्रशासनिक सुधार के इस प्रयास में भी जातीय राजनीति की बू आ रही है. अगर सरकार को पिछडी जातियों के लोगों को समुचित प्रतिनिधित्व दिलाना ही है तो इसके लिए उनके लिए सीटें आरक्षित हैं और इसके लिए अलग से उन्हें ज्यादा मौके और उम्र की छूट देने की कोई जरूरत मालूम नहीं होती. अगर सामान्य वर्ग का आदमी २५ साल तक ही परीक्षा दे सकता है तो फ़िर दूसरे को इससे ज्यादा का मौका क्यों. क्या आयोग ऐसा मानता है कि आरक्षित वर्ग के आदमी के दिमाग में कोई चीज सामान्य वर्ग कि अपेक्षा कुछ साल बाद आती है. या फ़िर इस वर्ग के लोगों को फ़ेल होने के कुछ ज्यादा मौके देने लायक मानती है. ये पहले साफ़ होना चाहिए. आप अगर किसी को कोई सुविधा देते हैं तो उसके कारण को भी साफ़ करना चाहिए. जैसे मानसिक या शारीरिक रूप से विकलांग लोगों को इस आधार पर आरक्षण मिलता है कि वे सामान्य लोगों से समान मुकाबला नहीं कर सकते तो इस बात को असामान्य वर्ग के लोगों के लिए माना जाना चाहिए. किसी परीक्षा में पास होने के लिए सामाजिक पिछडापन कोई मसला नहीं हो सकता उसके लिए पढ़ाई करनी होती है. इस आधार पर किसी को वैशाखी नहीं दी जानी चाहिए. और अगर वाकई देश के प्रशासनिक ढांचे में सुधार करना है तो वैशाखी वाले लोगों को आगे करने की प्रवृति से बचना होगा. इसमें वही लोग लिए जायें जिनमे प्रशासन चला पाने की कुव्वत हो. दूसरी बात ये कि जो लोग पिछले दशकों में आरक्षण की मलाई खाकर मोटे हो गए हैं उनसे भी ये वैशाखी अब छीन लेनी चाहिए. अगर वाकई आप प्रशासन में सुधार लाना चाहते हैं तो... वरना आप इसे प्रशासनिक सुधार आयोग की जगह राजनीतिक रणनीति सुधार आयोग भी कह सकते हैं.

और अंत में...अगर सामान्य वर्ग से अलग वर्ग के लोगों को असामान्य का संबोधन सुनना बुरा लगा हो तो इसके लिए माफी...

Monday, 8 December 2008

चुनाव ही नहीं हो जनता का आखिरी हथियार...

५ राज्यों में विधानसभा चुनाव के परिणाम आ गए. कांग्रेस और भाजपा ने मिलकर इन राज्यों की सत्ता आपस में बाँट ली. अन्य सभी दल महज तमाशबीन बनकर रह गए. वैसे भी इन राज्यों में अन्य दलों के लिए कोई स्कोप नहीं था. हा राजस्थान में जरूर अन्य दलों और निर्दलीय विधायकों के पास मौका है कि वो लोकतंत्र की मलाई खा सकें. जीत के बाद जीतने वाले दलों के नेताओं ने कहा कि आतंकवाद समेत सभी मुद्दें बेमानी साबित हुए और हमें जीत से नहीं रोक सके. इन्हें इस बात कि खुशी है कि आतंकवाद कोई चुनावी मुद्दा नहीं बन सका. अगर ऐसा सच में हुआ है तो ये खेदजनक है. अगर लोग अपनी सुरक्षा को चुनाव में मुद्दा नहीं बना सकते तो फ़िर तो भगवान ही इसका मालिक है. इसके साथ ही एक और काम होना चाहिए कि किसी भी दल को ये अधिकार नहीं मिलना चाहिए कि वो आतंकवाद जैसे मसले को चुनाव में भुनाए. लोगों को भी ये समझना होगा कि चुनाव ही आखिरी हथियार नहीं है. अगर जीतने के बाद भी कोई सरकार उनकी सुरक्षा के साथ ढिलाई बरतती है तो लोगों को सरकार से सवाल करना चाहिए। लोगों को अपनी सुरक्षा और विकास जैसे मसलों पर मुखर होना होगा तभी हम भारत को दुनिया की सबसे बड़ी लोकतंत्र के रूप में वास्तव में स्थान दिला पायेंगे.

बटला हाउस में मुठभेड़, मालेगांव धमाकों और मुंबई में हमले जैसे मसले पर जिस तरह से देश ने राजनीति होते हुए देखी वो हमारे लोकतंत्र के लिए कहीं से भी सहीं नहीं माना जा सकता। लेकिन इस बार आतंकवाद के मसले पर यहाँ के मुस्लिम भाई लोगों ने जिस तरह से मुखर होकर विरोध किया यही रवैया उन्हें आगे भी जारी रखना होगा ताकि यहाँ का बहुसंख्यक हिंदू समुदाय उनपर भरोसा कर सके. यहाँ के हिंदू समुदाय को भी धर्म के मामले को केवल राजनीति के लिए उठाने वाले लोगों से सावधान होना होगा. लोगों को राजनितिक बिरादरी में उस तबके को आगे करना होगा जो समाज के लिए काम करने के मकसद से राजनीति में आ रहा है और ऐसे लोगों को राजनीति से बाहर करना होगा जो केवल सत्ता का सुख भोगने के लिए राजनीति में आ रहे हैं.

अमेरिका में ओबामा की जीत पर जश्न मनाने वाली भारतीय जनता को अगर अपने लिए काम करने वाला और परिवर्तन लाने वाला नेता चाहिए तो पहले उन्हें ख़ुद मुखर होना होगा और फ़िर जब वे ऐसा नेता चुनेंगे जो दागदार न हो और अपराधी न हो और जो जाति-धर्म जाति-धर्म बात न कर विकास जाति-धर्म की बात करे तभी यहाँ सही मायने में लोकतंत्र का विकास हो पायेगा.

Sunday, 7 December 2008

बात बनती नहीं दिखती ऐसी हालात में.....

"जब भी होती है बारिश कही ख़ून की,
भीगता हूं सदा मैं ही बरसात में।
बात बनती नहीं ऐसे हालात में,
मैं भी जज़्बात में, तुम भी जज़्बात में..."
मैं कौन हूँ। शायद उन बदनसीब देशों में से एक का नागरिक जो आतंकवाद से सर्वाधिक प्रभावित हैं। मैं भारत का भी हो सकता हूँ, पाकिस्तान का भी, अफगानिस्तान का भी और इराक का भी या शायद ऐसे ही किसी और बदनसीब देश का नागरिक. जो रोज-रोज और कहें तो हर वक्त सहमा हुआ है एक अनजान डर से. दफ्तर जाते हुए, सिनेमा हॉल जाते हुए, बाज़ार जाते हुए या बस और रेल में सफर करते हुए भी या फ़िर किसी पार्क में बैठते हुए भी. उसे डर है कि कहीं भी किसी भी वक्त कोई उसपर हमला कर सकता है. अगर मैं भारत का रहने वाला हूँ तो मेरे लिए पहले से ही ६ दिसम्बर, १५ अगस्त और २६ जनवरी जैसे कई दिवस हैं जब हम काफ़ी सतर्क हुआ करते थे. अब ऐसी कोई सम्भावना नहीं जताई जा सकती कि इसी समय आतंकवादी हमला कर सकते हैं. जैसा कि पिछली कुछ घटनाएं देखी गईं. उसके अनुसार देश में कहीं भी कभी भी आतंकी हमला कर सकते हैं. कोई उसे रोक नहीं सकता. भारत के प्रमुख शहर मुंबई में पिछले सप्ताह हमला हुआ. ये हमला रोका नहीं जा सका. जब हमला हो गया तब सिस्टम जगा और अब ये तय किया जा रहा है कि किसकी विफलता से हमला हुआ. सभी सुरक्षा एजेंसियां एक-दूसरे के ऊपर विफलता का ठीकड़ा फोड़ने में लगी है. और अब जब आम लोग अपनी सुरक्षा की मांग के साथ सड़कों पर उतरने लगें हैं तो ये राजनितिक बिरादरी को चुभने लगा है. ये तो अपेक्षित था ही. हमारे देश की राजनीतिक बिरादरी को जनता को उल्लू बनाकर सत्ता में बने रहने की आदत पड़ गई हैं. उन्हें जनता द्वारा अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना कभी पसंद नहीं आयेगा और जनता को मुखर होकर अपनी बात रखनी होगी. जनता को देश की राजनीतिक बिरादरी को ये समझाना होगा कि उसपर शासन वही करेगा जो उसके लिए काम करेगा।

शुक्रवार को आधी रात को दिल्ली के इंदिरा गाँधी हवाई अड्डे पर गोलियां चलने की आवाज हुई। वहां मौजूद सभी लोग जान बचाने के लिए जहाँ जगह मिली दुबक लिए. वहां भी वही मेरे जैसा आम आदमी था. जो अपना काम करने के लिए, घुमने के लिए या फ़िर किसी और कारण से हवाई जहाज की यात्रा करने के लिए हवाई अड्डे पर आया था. किसने गोली चलाई नहीं मालूम. लेकिन खौफ पैदा हुआ मेरे दिमाग में. मुझे उस वक्त फ़ोन करके अपने घर वालों को ये बताना पड़ा की मैं सुरक्षित हूँ॥ मैं वही आम आदमी हूँ..

ऐसा नहीं है कि इस डर में केवल भारत का आदमी जी रहा है. अगर मैं पाकिस्तान, इराक और अफगानिस्तान का नागरिक हूँ तो मेरे अन्दर भी डर है. यहाँ के लोग दोहरी मार झेल रहे हैं. कभी उन्हें आतंकवादियों की गोलियां अपना निशाना बनाती है तो कभी विदेशी सैनिकों की तोपें और मिसाइलें उनका घर तबाह कर जाती है. विशेषकर पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा पर रहने वाले लोग रात को सोते वक्त इस बात को यकीनी तौर पर नहीं कह सकते कि कल सुबह भी उनका घर जैसे का तैसा रह जाएगा. हो सकता है आतंकवादियों को खोजती हुई अमेरिकी आँखें और उसके बाद चली मिसाइलें रात के अंधेरे में घर समेत उनके अस्तित्व को नेस्तनाबूद कर दे. आतंकी उनके बच्चों को जबरन आतंकी बनाने के लिए ले जाते हैं और देशी-विदेशी सैनिक आतंकियों का परिजन होने के कारण उठा ले जाते हैं. यहीं हैं मेरी जिंदगी. मुझे उस शख्स से डर है जिसे मैं नहीं जनता. इन सभी देशों का नागरिक होने के नाते मुझे बस ये मालूम है कि मेरे भी जज्बात हैं. हम सभी के जज्बात हैं. भारत में हमले हुए, पाकिस्तान के पेशावर में हमले हुए, अफगानिस्तान की पहाडियां बम-गोलों के शोर से भरी पड़ी हैं.. किसने किए- कोई हमारे बीच का है. पाकिस्तान पर शक जताया गया. इससे पाकिस्तान के लोगों की भावनाए आहत हुई और वहां प्रदर्शन हुए. लेकिन जाहीर सी बात है कि हमला करने वाले चाहे जो भी हो वो आम तबके से ही आता है और मरने वाले भी आम लोग हैं और मौत का ये सौदा करने वाले इसमें कहीं भी शिकार नहीं हैं. मरने वाले में, उसके बाद रोने वाले में और उसके बाद हर पल को डर-डर कर जीने वाले में मैं ही हूँ...दुनिया का आम आदमी...

Tuesday, 2 December 2008

मुंबई धमाकों से उभरे हुए सूरमा...

मुंबई में हाल में हुए हमलों ने देश के लिए जितना भी नुकसानदायक रहा हो लेकिन कुछ लोगों को लगातार ख़बरों की सुर्खियों में बनाए रहा। मुंबई धमाकों के बाद देश में जैसी प्रतिक्रिया हुई है उसने राजनीतिक बिरादरी को हिला कर रख दिया है। हालांकि अब भी देश की अधिकांश जनता इस समस्या के प्रति बिमुख बनी हुई है. लेकिन किसी भी लडाई में कुछ ही लोग आगे रहते हैं. अगर कुछ लोग मुंबई में आतंकी हमलों के बाद आतंक पर कड़ी करवाई न करने के लिए नेताओं को जिम्मेदार मान कर चेत जाने की बात कर रहे हैं तो इसमें बुराई क्या है. राजनीती के लिए ही लेकिन विरोध करने वाले लोगों के विरोध को हवा दी जा रही है. इसमें बुरे कुछ नहीं है अगर देश की जनता अपनी सुरक्ष और अपने अधिकारों के खड़ी नहीं होगी तो राजनीतिक बिरादरी उसके लिए कभी भी मुखर नहीं होगी. हा ये बात हमारे कुछ राजनीतिज्ञों को जरूर चुभ रही है.

जनता द्वारा अपने अधिकारों के लिए खड़े होने पर सबसे ज्यादा भड़के भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी। मुंबई में मारे गए लोगों और शहीद हुए जवानों को श्रधांजलि देने के लिए जमा हुए लोग नकवी जी की आंखों में चुभे और नकवी जी ने कहा कि जो लोग राजनेताओं का विरोध कर रहे हैं वे लोकतंत्र के दुश्मन हैं और उनका किसी न किसी से सम्बन्ध होगा। उन्होंने कहा कि इन सब की जाँच होनी चाहिए और पता करना चाहिए कि ये किनके लोग हैं. नकवी जी ने आगे कहा कि ये सारा नाटक पश्चिमी सभ्यता से प्रेरित है और लिपिस्टिक लगाने वाली औरतें ऐसा कर रही हैं. नकवी जी ने जो भी कहा तुंरत भाजपा ने उससे किनारा कर लिया। पार्टी प्रवक्ता ने तुंरत कहा कि जो भी नकवी जी ने कहा वो उनका अपना मत है.

दूसरे दिग्विजयी बने केरल के मुख्यमंत्री। शहीद मेजर संदीप उनिकृष्णन के घर पर राजनीति करने आने वाले नेताओं के कारन संदीप के पिता ने उनसे मिलने से मना कर दिया। मुख्यमंत्री महोदय ने कह दिया कि अगर ये शहीद न होते तो यहाँ कुत्ता भी नहीं आता.

मुंबई हमलों की भेंट चढ़े पूर्व गृह मंत्री शिवराज पाटिल जी को तो अभी लोग नहीं ही भूले होंगे। अभी हाल ही तक उनपर देश के आतंरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी थी. उन्होंने इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया भी. जब भी देश में कहीं कोई हमला हुआ उन्होंने लोगों को सांत्वना देने के लिए दार्शनिक अंदाज में भाषण दिया. लोग उनकी महानता को नहीं समझ पाये और मीडिया वालों ने तो अति ही कर दी. उनके पदनाम के साथ जबतक भूतपूर्व नहीं लगवा दिया चैन से नहीं बैठे.

महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री आर आर पाटिल जो की पिछले कुछ दिनों से कुछ ज्यादा ही गदा भांज रहे थे को भी मुंबई धमाकों ने ठिकाने लगा दिया. बाहरियों के ख़िलाफ़ राज ठाकरे द्वारा चलाये जा रहे रहे अभियान को समर्थन देने वाले आर आर पाटिल ने मुंबई में हुए धमाकों और हमलों के बाद कहा कि मुंबई एक बहुत बड़ा शहर है और बड़ी-बड़ी शहरों में छोटी-छोटी घटनाएँ होती रहती है. मतलब की जिस घटना की प्रतिक्रिया पूरी दुनिया में हुई है वो घटना गृहमंत्री और उपमुख्यमंत्री जैसे गंभीर पद पर बैठे हुए शक्श को मामूली लग रहा है. जिस राज्य के वे गृहमंत्री हैं उसकी राजधानी में आतंकी आए सरेआम उन्होंने लोगों पर गोलिया बरसाई और बड़े-बड़े होटलों में बंधक बना लिया और जिन्हें काबू करने के लिए देश भर से सैकड़ों सेना के जवान और कमांडो बुलाये गए जिन्होंने ६० घंटे की लड़ाई के बाद कई लोगों की जान खोकर आतंक का खत्म किया. वही पाटिल जी को छोटी घटना लग रही थी. पाटिल जी ऐसी गलती उनपर भारी परी. उन्हें पद छोड़ना पड़ा. अब वे न तो गृह मंत्री हैं और न उप मुख्यमंत्री. अब शायद केवल विधायक के रूप में सोचने पर उन्हें मामले की गंभीरता का अहसास हो.

Monday, 1 December 2008

देश के वीर बेटों को शत-शत नमन...

मुंबई में हमला करने वाले आतंकी मारे गए, सेना और कमांडोज का ऑपरेशन सफल रहा। देश चैन की साँस ले रहा है. कभी न रुकने वाला मुंबई शहर फ़िर से चलने का प्रयास करने लगा है. हमले के वक्त से अपने घरों में कैद मुम्बईवासी अब अपने घरों से बाहर आने लगें हैं. स्कूल, कालेज, ऑफिस, पार्क सब फ़िर से गुलजार होने लगे हैं और लोगों के चेहरे पर दहशत की जगह फ़िर मुस्कान लौटने लगीं हैं. लेकिन ये सब हु है हमारे देश के बहादुर जवानों के बलिदान के कारण. देश के चेहरे पर फ़िर से मुस्कान लाने के लिए कई वीर जवानों को अपनी जान गवानी पड़ी हैं. देश के इन वीर बेटों के घरों में मातम है लेकिन इनके बलिदान ने ये साबित कर दिया है कि जब भी कोई ताकत देश की अस्मिता पर खतरा बनकर आएगी उसे मुहतोड़ जवाब मिलेगा.

पूरे देश ने इन बेटों के बलिदान को देखा. पूरे देश ने टीवी के परदे पर मुंबई में दहशत के माहौल को देखा, जब चारों ओर आतंक का राज था. स्टेशन पर दर्जनों लोग मार दिए गए थे, ताज होटल, ओबेराय होटल और नरीमन हाउस में कई लोग मार दिए गए थे और सैकडों लोग आतंकवादियों के चंगुल में फंसे हुए थे. आतंकी खुलेआम मौत का तांडव कर रहे थे. ऐसे वक्त में देश के इन बेटों ने मोर्चा संभाला और जब सारा देश अपने घरों में बैठकर टीवी देख रहा था इन वीरों ने गोलियों का सामना कर आतंक का खात्मा किया. जब देश और दुनिया के लोग मुंबई में फंसे अपने परिजनों को फ़ोन कर कह रहे थे कि अपने दरवाजे को ठीक से बंद कर ले और घर के बाहर कतई न निकलें. तब देश के वीर जवान ताज होटल, ओबेराय होटल और अन्य खतनाक जगहों पर घुस रहे थे. ऐसे वक्त में इनके परिजन भी इन घटनाओं को देख रहे होंगे और उन्हें भी मालूम था कि उनके बेटे मौत का सामना करने जा रहे हैं. देश के इन बेटों ने ये लडाई लड़ी और तभी रुके जब आतंक का खात्मा हो गया. कई ने अपनी जाने गवाईं, कई अभी भी अस्पतालों में पड़े हुए हैं. कई ने अपने आस-पास से गोलिओं को गुजरते देखा और कई ने दुश्मनों को अपना निशाना बनाया. देश अब फ़िर चैन की साँस ले रहा है...लेकिन सबकी नम आँखें इन वीर बेटों को शत-शत नमन करती है...जिन्होंने इस लिए अपनी जान गवां दी कि देश की अस्मिता पर कोई सवाल न उठे और देश का आम आदमी खुले आकाश के नीचे साँस ले सके और अपने घर की दरवाजों और खिड़कियों को खोल कर बाहर से हवा आने दें...एक बार फ़िर इन जवानों को शत-शत नमन...

Friday, 28 November 2008

सपनों के शहर मुंबई की एक सुबह...

नहीं मैं किसी सपने की बात नहीं कर रहा हूँ न ही मुंबई को शंघाई बनाने की थोथी बातों और दावों के बारे में कुछ कहने जा रहा हूँ। क्यूंकि कभी न सोने वाला, कभी न ठहरने वाला मुंबई अभी आतंक की गिरफ्त में है. पिछले ४८ घंटों से पूरा मुंबई आतंकी हमलों से घिरा हुआ है. लोग अपने घरों में दुबके पड़े है और टीवी के परदे पर नज़रें जमाये हुए हैं. सेना और एनएसजी के बहादुर जवान होटलों और अन्य जगहों पर लोगों को बंधक बनाये आतंकवादियों से लोहा ले रहे हैं और प्रधानमंत्रीजी देश की जनता के नाम संदेश देते हुए टीवी के परदे पर दिखाई दे रहे हैं। सभी नेता मुंबई में हुए इन आतंकवादी हमलों की निंदा करने में जुटे हैं और देश-विदेश से इन आतंकवादियों से निपटने में मदद की पेशकश की जा रही हैं। भारत में आतंकवाद की समस्या पर कभी भी कान न देने वाले ब्रिटेन, अमेरिका जैसे देश भारत के सामने आतंकी समस्या की गंभीरता को स्वीकार करने लगे हैं। क्यूंकि मेरे विचार में बुधवार की रात से जिस तरह के हमलें मुंबई में शुरू हुए हैं शायद ही किसी देश में इस तरीके से आतंकियों ने हमला करने की अबतक हिम्मत की हो. अमेरिका में ९/११ का हमला भी इस तरह से सीधी लड़ाई जैसी नहीं थी.

ऐसा नहीं है कि इस हमले में मुंबई शहर की कोई गलती हो। मुंबई की गलती ये है कि ये देश की औद्योगिक राजधानी के रूप में जानी जाती है और देश-विदेश के लोगों के लिए एक केन्द्र के रूप में है. जाहीर है यहाँ हमला कर आतंकी ज्यादा से ज्यादा लोगों को डरना चाहते हैं. ऐसा भी नहीं है कि मुंबई में ये पहला आतंकी हमला है. इससे पहले भी मुंबई हमेशा आतंक के निशाने पर रहा है. एक बात और भी है कि देश में औद्योगिक सक्रियता का केन्द्र होने के कारण मुंबई के हमलों में बहुत सारे राज्यों और देशों के लोग हताहत हुए हैं. शायद आतंकियों का ये मकसद भी उन्हें मुंबई जैसे जगहों को टारगेट बनाने को तैयार करता है.

ऐसा नहीं है कि देश के अन्य शहर इन दहशतगर्दों के निशाने पर नहीं हैं। दिल्ली, अहमदाबाद, बेंगलूर, जयपुर, बनारस, हैदराबाद और कई अन्य शहर भी इन आतंकवादियों का शिकार बन चुके हैं। पूरा देश आज बैठकर संकट में घिरी मुंबई से आने वाली ख़बरों को देख रहा है. मुंबई से आने वाली खबरें कुछ इस तरह से है--- ताज होटल में मुठभेड़ अभी भी जारी, नरीमन हाउस में आतंकवादियों से मुठभेड़ अभी भी जारी, ओबेराय होटल में सेना-एनएसजी की करवाई जारी, शहर के सभी स्कूल, कॉलेज, कार्यालय, शेयर बाज़ार, फिल्मों और सीरियल्स की शूटिंग सब बंद. मतलब कभी न रुकने वाली मुंबई शहर आतंक के साए में जी रहीहै और पूरी तरह से ठहरी हुई है. रात को नींद तो अधिकंच को नहीं ही आई होगी. टीवी के परदे पर सब मुंबई को देख रहे हैं. शंघाई बनने का सपना सबके दिमाग से निकल चुका है और सब केवल जान की सलामती चाहते है. जान बचेगी तो मुंबई को शंघाई, न्यूयार्क कुछ भी बना लेंगे लेकिन पहले ख़ुद को सुरक्षित तो रखा जाए.

Friday, 14 November 2008

द ग्रेट इंडियन पॉलिटिकल तमाशा...

५ राज्यों में चुनाव का बिगुल बज चुका है। नेता मैदान में हैं और जनता के बीच जाने को मजबूर हैं। सो इन दिनों उन्हें पसीना भी हो रहा है. जनता खुश है कि जिन चेहरों को अख़बार और टीवी पर देखती थी इन दिनों वे चेहरे उनके शहर और कभी-कभी उनके घरों तक पहुच जाते हैं. बड़े-बड़े फिल्मी सितारे चुनाव प्रचार के लिए बुलाये जा रहे हैं नेताओं द्वारा बड़े-बड़े दावे और आश्वासन दिए जा रहे हैं. जनता को इन आश्वासनों पर कोई भरोसा नहीं है कारण है कि आज की जो पीढी है हर ५ साल पर इन्हीं आश्वासनों को सुनकर बड़ी हुई है. उन्हें मालूम है की नेता जी लोग कितने ही इमोशनल होकर क्यूँ न कुछ कहें लेकिन करेंगे कुछ नहीं. लोगों ने अब बचपन में सिविक्स की किताबों में पढ़ी इस बात को भी भुला दिया है कि लोकतंत्र जनता द्वारा, जनता के लिए और जनता की व्यवस्था होती है. लोगों को अब इन थोथी बातों पर भरोसा नहीं रहा।

जैसे अपने देश के नेता जी लोग मानने लगे हैं कि चुनाव सत्ता में आने और ५ साल तक राज करने के लिए होते हैं। वैसे भी चुनाव हमारे मोहल्ले के कुछ लोगों के लिए हर 5 साल बाद नेता जी लोगों की जेब से कुछ निकलवाने का मौका भर होता है. उनके लिए तो चुनाव का मौका ठीक वैसा ही होता है जैसे मेरे मोहल्ले के पंडित जी के लिए शादी-व्याह का मौका होता है जिसमें वो जजमान से जो चाहे ले सकते हैं...

राजधानी दिल्ली में चुनाव का बिगुल बज चुका है। व्यक्तिगत संबंधों के कारण कल मुझे एक उम्मीदवार के साथ उनके इलाके में घुमने का मौका मिला. नजदीकी संबंधों के कारण मुझे वो सब देखने का मौका मिला जो अक्सर नेता लोग अपनी भोली-भली जनता से कभी नहीं कहते. मसलन मुझे उस बैठक में भी हिस्सा लेने का मौका मिला जिसमे ये रणनीति बन रही थी कि कैसे ज्यादा से ज्यादा लोगों को लुभाया जा सके. किस वर्ग को अपना टारगेट बनाया जाए उन्हें प्रसन करने के लिए कौन-कौन से मसले उठाये जाए और जनता के बीच किस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया जाए. किन-किन इलाकों में लोगों को अपने साथ जोड़ने के लिए किन मुद्दों को आगे किया जाए और उन इलाकों से किन लोगों को अपने साथ लिया जाए. किससे किस तरह की बात की जाए. कौन किस बात पर हमारे साथ आ सकता है वगैरह-वगैरह...ऐसे न जाने कितने मसले उन बैठकों में उठे. इससे आगे भी कई बातें हुईं जिन्हें खुलेआम बोलना हो सकता है किसी को लोकतान्त्रिक भावनावों का अपमान लगे इसलिए उनका जिक्र मैं नहीं कर सकता.

ये तो रही विधानसभा में चुनाव लड़ रहे छोटे खिलाड़ियों की बात. अभी कुछ महीने बाद देश में लोक सभा के चुनाव भी होने हैं. उनमें देश के बड़े चुनावी खिलाड़ी मैदान में होंगे. तब बड़े सितारे और बड़े प्रचारक भी लोगों के बीच उतरेंगे. जनता को मनोरंजन का पूरा मसाला मिलेगा. जनता को देश के विकास के लिए होने वाले काम से मतलब तो रह नहीं गया है उन्हें भी इस बड़े तमाशे का बेसब्री से इंतज़ार है. अमेरिका में एक अश्वेत के राष्ट्रपति बनने पर खुशी जताने वाले हमारे देश के टीवी दर्शक अपने मत का इस्तेमाल करने नहीं जाते और घर बैठे चाहते हैं को देश में व्यवस्था परिवर्तन हो. उन्हें ये समझना पड़ेगा की ओबामा जैसा नेता अमेरिका में इसलिए है कि वहां डीजर्व जनता ऐसे नेता को डीजर्व करती है. हम इतने काबिल तरीके से अपना मतदान नहीं कर पाते कि ओबामा जैसा नेता जीतने की हिम्मत कर सके. हम दागदार छवि वाले नेताओं, अच्छा बात बनाने वाले नेताओं और वोटरों को पैसा बाटने वाले नेताओं, और बड़े फिल्मी सितारों को प्रचार के लिए ले आने वाले नेताओं को चुनते हैं तो हम विकास की उम्मीद कैसी कर सकते हैं. हमारे यहाँ दशकों से चुनावी नाटक जारी है ये ऐसे ही जारी रहेंगे जबतक की हम अपने प्रगति के लिए इस व्यवस्था का इस्तेमाल करना नहीं सिख जाते...

Wednesday, 12 November 2008

कब ग्लोबल से लोकल हो गए पता ही नहीं चला

रात में सोये-सोये अचानक कब सपनो में खो गए पता ही नहीं चला. तब मुझे कहाँ पता था कि जो देख रहा हूँ वो असलियत नहीं एक सपना है. रोज-रोज ख़बरों में ये देखते-देखते कि भारत बस अब महाशक्ति-विश्वशक्ति बनने ही वाला है. रोज-रोज अपना राजनितिक नेतृत्व देश के लोगों को यही सपना तो दिखाते आ रहा है. १९९० के दशक के शुरू से ही जब से टीवी वालों ने भारत के लोगों को वैश्वीकरण, ग्लोबलाइजेशन और ग्लोबल जैसी अव्धारनाये दिखाई है हमें लगता है कि आज नहीं तो कल हम बस महाशक्ति बनने ही वाले हैं. इसी ख्वाब के बहाव में रात कब बीत गई पता नहीं चला और जब नींद खुली तो घर में सब वैसा ही दिखा जैसा इसके पहले देखा था. कही भी कोई बदलाव नहीं दिखाई दिया. मैंने सोचा कि शायद पूरा भारत वैश्विक हो गया है और मैं सोया ही रह गया. अब पूरा भारत घूम के देखा तो जा नहीं सकता इसलिए सोचा कि टीवी में देखते है कि सुबह का ये बदला हुआ भारत कैसा है...

पहले समाचार चैनल को खोलते ही ख़बर मिली--राज ठाकरे ने कहा--मुंबई उनके बाप-दादों का है...अगली ख़बर थी मुंबई में बिहारी छात्रों की पिटाई के विरोध में बिहार बंद. अगला आइटम था असम में बिहारी लोगों पर हमले करने वालों को आईएसआई की मदद. इसी तरह की कई खबरें टीवी चैनलों पर चल रही ख़बरों में छाई हुई थी. दिल्ली में चुनाव हो रहा है इसके बारे में ख़बर थी कि बाहर से आने वाले लोगों पर लगाम लगाने के लिए एक दल सत्ता में आने पर कदम उठाएगा. इसी समय एक टीवी चैनल पर ओबामा की जीत के बाद विश्लेषण आ रहा था. जिसमें कहाँ जा रहा था कि ओबामा के आने के बाद वीसा नियमों में सुधार किया जाएगा.

ऐसे न जाने कितने सारे ख़बर ग्लोबल होने के हमारे सपने को कुंद कर रहे थे. कलाम साहब के राष्ट्रपति बनने के बाद देश के बच्चों ने २०२० तक देश को महाशक्ति बनाने को लेकर न जाने कितने सपने देख लिए है. उनके लिए भी एक टीवी पर कार्यक्रम चल रहा था. उसमें आए एक एक्सपर्ट ने बहुत अच्छा सुझाव दिया. उन्होंने कहाँ कि ग्लोबल होने में बहुत खतरा है क्यों न हम फ़िर लोकल हो जाए. तब कोई बाहरी कहकर हमला तो नहीं करेगा. इसके लिए सबसे बढ़िया है कि सब अपने-अपने घरों में ही रहे. घर से निकलने पर दूसरे घर वाले बाहरी कहकर मारेंगे. मोहल्ले से निकलने पर दूसरे मोहल्ले वाले, शहर से निकलने पर दूसरे शहर वाले और राज्य से निकलने पर दूसरे राज्य वाले. दूसरे देश में तो पीटना स्वाभाविक ही है. इसलिए सबसे अच्छी बात यही है कि अपन इघर में रहिये और पीटने और अपमानित होने से बचिए। न किसी क यहाँ जायेंगे और न ही कोई हमें अपमानित करेगा। इसके लिए सभी जगह के लोगन को पहले उनके मूल मोहल्ले में भेज देना चाहिए और फ़िर हर दुसरे मोहल्ले में जाने के लिए वीसा नियम बना देना चाहिए। इससे सत्ता का और विकेंद्रीकरण भी होगा और शासन के काम में भी आसानी होगी। अगर लोग बचेंगे तभी कुछ बदलाव होगा न। जान रहेगी तभी तो महाशक्ति बनेंगे न. एक्ट लोकली और थिंक ग्लोबली का नारा भूलकर अब नारा यही होना चाहिए कि लाइव लोकली और इग्नोर ग्लोबली...

Thursday, 6 November 2008

अमेरिका सुधरे तो सुधरे, हम नहीं सुधरेंगे...

आज दुनिया के इतिहास में एक नया अध्याय जुडा। यूँ कहें तो दुनिया के सबसे मजबूत पद पर एक अश्वेत काबिज़ हो गया. ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति बन गए इसका जश्न मनाते दुनिया भर के लोग देखे गए. टीवी के कैमरों पर लोग ओबामा जिंदाबाद के नारे लगाते दिखें. पता नहीं पूरी दुनिया के लोगो को उनसे क्या उम्मीदें है. शायद ये वाजिब भी है अगर अमेरिका की सोच और उसकी काम करने का तरीका बदलता है तो उसका असर पूरी दुनिया पर होगा. अमेरिका की बदली हुई सीरत पूरी दुनिया की सूरत बदल सकती है और अब इस नैया की पतवाड़ ओबामा नामक उस मध्यवर्गीय परिवार से आए हुए नौजवान के हाथों में आ गई है जिसने इस पद को पाने के लिए एक लंबा रास्ता तय किया है. वो अमेरिका की आज़ादी के २१९ सालों में बाद और पहला अश्वेत राष्ट्र प्रमुख है. और शायद उसके संघर्षों को देखकर ही दुनिया को उससे ज्यादा उम्मीदें हैं.

लेकिन अमेरिकी चुनाव में इसी समय में हमारे यहाँ भी कई राज्यों में चुनाव हो रहे हैं और आने वाले महीनों में देश केन्द्रीय नेतृत्त्व को भी चुनेगा. लेकिन जिस तरह से अमेरिका में लोग अपना प्रतिनिधि चुनते हैं उसके मुकाबले तो परिपक्वता में हम कहीं से भी उनके आसपास नहीं ठहरते. वहां राष्ट्रपति बनने में लिए पहले उम्मीदवार को अपने दल में एनी उम्मीदवारों से अपने आप को श्रेष्ठ साबित करना होता है फ़िर उसके बाद विपक्षी उम्मीदवार से उसे पुरे देश में सामने विभिन्न मसलों पर अपनी नीति पर बहस करनी होती है. वहां का मतदाता ये देखता है की जिन समस्याओं से वो जूझ रहे हैं उनसे निपटने में ये उम्मीदवार किस हद तक सफल हो सकता है. फ़िर अमेरिकी लोग अपना मतदान करते हैं. दूसरी ओर अपने नेतृत्व का चुनाव करते समय हम किन बातों का ध्यान रखते हैं शायद ही हम इसके बारे में जानते होंगे. कोई जाति में आधार पर वोट करता है तो कोई धर्म के आधार पर, तो कोई किसी एनी आधार पर. आज की तारीख में हम ये भी नहीं कह सकते कि बूथ कप्तचरिंग और बहुबल के कारण हम अपने पसंद कि उम्मीदवार नहीं चुन पाते. क्योंकि आज कि तारीख में चुनाव तैयारियां इतनी शक्त होने लगी हैं कि जो जिसे चाहे वोट कर सकता है. फ़िर भी हमारे प्रतिनिधि दागी छवि वाले लोग कैसे चुन लिए जाते हैं. शायद इसका जवाब है कि इसके लिए हम ही दोषी है. हम अपना प्रतिनिधि इसलिए नहीं चुनते कि वो हमारे लिए काम करेगा बल्कि हम इस लिए चुनते हैं कि वो राजनीति करेगा. जहिर सी बात है कि जब हम अपने लिए कुछ नहीं कर पाते तो हमारे द्वारा चुने गए लोग क्या करेंगे. हम नहीं बदलेंगे और इसी कारण हमारी राजनीति न तो जिम्मेदार होगी और ना ही हमारे प्रति उसकी जवाबदेही तय हो पायेगी. हम अमेरिका में ओबामा के जितने पर जश्न तो मन सकते हैं लेकिन हम अपने लिए एक ओबामा तलाशने के काबिल नहीं है इसी कारण हमारी बदहाली अब भी जारी है और शायद आगे भी तबतक जारी रहेगी जब तक हम ऐसे ही रहेंगे.

Saturday, 1 November 2008

लोगों को उनकी किस्मत ही बचा सकती है इस भारत में!

असम में दर्जन भर धमाके हुए। भारत में किसी को भी कोई हैरानी नहीं हुई. सिवाए उनके जिनके अपने लोग इस हादसे में या तो मारे गए या फ़िर घायल हो गए. इस तरह का सिलसिला पिछले कुछ सालों में भारत के शहरों में बढ़ता चला गया है. पिछले ७ महीनों में हुए ६३ बम धमाके इसका प्रमाण है और इसमें अब और कुछ कहने की जरूरत नहीं रह गई है. जो इन हमलों में बच गए हैं वे आगे होने वाले हमलों में मारे जाने या फ़िर अपंग होने या फ़िर घायल हो जाने का इंतज़ार कर सकते हैं. अगर ये सिलसिला शुरू हुआ है तो कभी न कभी उनका भी नम्बर आएगा ही. हमारे देश के गृहमंत्री जी धमाकों के बाद असम के दौरे पर गए थे. उन्होंने वहां मीडिया से कहाँ---"हम यहाँ आपके दुःख में शरीक होने आए हैं, जिन्होंने भी ये काम किया है वे इंसान नहीं दरिन्दे हैं. हम असम की सरकार से कहेंगे कि उनके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई करे और जल्द से जल्द करे।"

अब आप समझ सकते है कि जिस शख्स पर देश की आतंरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी है उनका बयान ऐसा है. जाहीर सी बात है इस बयान में ऐसा कुछ भी नहीं है जो हमला करने वालों को डरा सके. न ही अबतक हुए हमलों में लोगों को हुई सजा इन्हे डरा सकती है. जो अबतक पकड़े गए उनके और मामले में हुई छीछालेदर आगे से बहादुर पुलिस अफसरों को कुर्बानी देने से रोकेगी और जनता का भरोसा भी सिस्टम से उठता जाएगा. इसलिए कहा जा सकता है कि लोगों को अब केवल अपनी किस्मत पर ही भरोसा रह गया है. उन्हें कोई नहीं बचा सकता सिवाए उनकी किस्मत के। मालेगांव विस्फोटों में पकड़ी गई साध्वी प्रज्ञा के बारे में डंका पीट रहे लोग बटला हाउस मुठभेड़ का नाम आते ही चुप्पी लगा जाते हैं। कंधमाल, कर्णाटक पर भी वे खूब बोलते हैं और गुजरात का उदहारण देना भी वे नहीं भूलते लेकिन जैसे ही मुंबई में राज ठाकरे कि गुंडागर्दी, असम और बिहार में भरे अवैध बांग्लादेशीयों को मामला आता है उनकी जबान पर जैसे ताला लग जाता है. ऐसा नहीं कि ये हाल केवल एक दल का है. विपक्ष के पास भी ऐसा कुछ नहीं है जिसके दम पर वे कह सके कि आम आदमी को सुरक्षित रखने में वे कामयाब रहेंगे. उनके काल में भी पड़ोसी देशों में सक्रिय आतंकवादियों पर लगाम नहीं लगाया जा सका और वर्तमान सरकार के काल में भी ये सम्भव नहीं हो सका. जब भी हमले होते हैं किसी नए आतंकवादी समूह का नाम लेकर सब निश्चिंत हो जाते हैं. खुफिया एजेंसियां ये कहकर निश्चिंत हो जाती हैं कि हमने तो पहले ही हमलों की चेतावनी दे दी थी. इस माहौल में कहा जा सकता है कि लोग अपने भाग्य-भरोसे ही बच सकते हैं.

Sunday, 26 October 2008

बिहार को ख़ुद के लिए खड़ा होना होगा...

शुक्रवार को दिनभर बिहार ख़बरों में छाया रहा। मुंबई में परीक्षा देने गए छात्रों के साथ मार-पीट के विरोध में कुछ छात्र संगठनों ने बिहार बंद का अहवाह्न किया था और दिनभर वहां तोड़-फोड़ और मार-पीट चलती रही. दलीय राजनीति चाहे जो भी हो लेकिन एक बात अच्छी लगी कि वहां छात्र आंदोलित हुए और अपनी आवाज बुलंद की. जाहिर है सड़क पर उतरे युवा भारतीय लोकतंत्र में अपनी अहमियत और अपने नागरिक अधिकारों की वापसी के लिए सड़क पर उतरे थे. अपनी आवाज बुलंद करना भूल चुके बिहार का ये मुखर होता हुआ चेहरा एक नई उम्मीद की किरण पैदा करता है. बिहार को फ़िर बोलना होगा...अपने लिए बोलना होगा...ये आज उसके लिए एक जरुरत बन गई है...शायद खाने, पीने और जीने के जैसा...

बिहार में एक और मुखरता आनी चाहिए अपने विकास को लेकर... कई ऐसे राज्य हैं जो केन्द्र से बड़ी मात्रा में पैसा ले रहे हैं. विकास के नाम पर. बिहार को भी देश के विकास में अपनी हिस्सेदारी के लिए मुखर होना होगा. इसके लिए बिहार के लोगों खासकर युवा वर्ग को आगे आना होगा और अपने देश को बताना होगा कि उसे आगे बढ़ने के लिए उसका हिस्सा चाहिए. देश के आगे ये मांग होनी चाहिए कि बिहार आगे बढ़ना चाहता है और अब बिहार ख़ुद को सबके बराबर लाना चाहता है. उसे इस नज़र से नहीं देखा जाना चाहिए कि वो सबकुछ के लिए दूसरो पर निर्भर है और उसके बच्चों को नौकरी पाने के लिए किसी राज ठाकरे और किसी रवि नाईक जैसे लोगों की धौंस सहनी पड़ेगी.. कि देश के संसाधनों पर उसका भी हक़ है और वो इसे लेकर रहेगा. उसे अपने ऊपर से लगा कमजोरी का धब्बा हटाना पड़ेगा और ये तभी होगा जब बिहार के युवा खड़े होकर दूसरे लोगों से नज़र मिलाकर बात करेंगे और उनके सवालों का जवाब मुखर होकर देंगे. इसके लिए पहले काम करना होगा और अपने राज्य के नेत्रित्व को भी मजबूर करना होगा कि वो इनके लिए काम भी करे और इनके हक़ के लिए अपनी आवाज देश के सामने ज्यादा मुखर अंदाज में कहें...आज छात्र सडकों पर उतरे हैं तो इसका स्वागत होना चाहिए और ये पार्टी और विचारधारा के लाइन से उठकर होना चाहिए. वहां कि सरकार को भी चाहिए कि वो लोगों को अपनी बात कहने से रोकने नहीं और इनकी आवाज को सही दिशा दे. नेत्रित्व का काम यही होता है और अगर ये न हो सका तो कल को युवा इस तरह के नेत्रित्व को स्वीकार करने से इनकार कर देगा...

Tuesday, 21 October 2008

राज ठाकरे को हीरो मत बनाओ...

राज ठाकरे कौन है...शायद महाराष्ट्र के एक छोटे से राजनीतिक दल का एक छोटा सा नेता. जिसका वजूद बस इतना भर है कि वो शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे का भतीजा है और अब शिवसेना का बागी है.और अपनी एक पार्टी बनाकर अपना वजूद तलाशने का प्रयास कर रहा है. उसकी और भी कई खासियतें हैं..इतने कम वजूद के बाद भी आज उसका नाम सुनकर शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे और उद्धव ठाकरे के माथे पर पसीना आ जाता है...उसका नाम सुनकर महाराष्ट्र कांग्रेस के नेताओं के चेहरे एकबारगी खिल उठते हैं..शायद शिवसेना को मात देने में वो उनके लिए हितकारी साबित हो जाए...... उसका नाम सुनकर मुंबई में रह रहे बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग एकबार अपनी सुरक्षा और आत्मसम्मान के बारे में सोचने को मजबूर हो जाते हैं... लालू यादव के शब्दों में कहें तो वो एक मानसिक बीमार आदमी है और देशद्रोह से भी बड़ा अपराध करने वाला आपराधी भी...

आज सुबह या फ़िर कहें कि कल रात से ही राज ठाकरे सभी न्यूज़ चैनलों की सबसे बड़ी हेडलाइंस बना हुआ है। वो गिरफ्तार कर लिया गया है॥उसपर मुंबई में रेलवे की परीक्षा देने आए बाहरी परीक्षार्थियों पर हमले करवाने का आरोप है..उसके पार्टी के कार्यकर्ताओं और दूसरे दलों के शब्दों में कहें तो उसके गुंडों ने बहरी परीक्षार्थियों की जमकर धुनाई की. सभी टीवी चैनलों ने एमेनेस के कार्यकर्ताओं द्वारा बहरी लोगों को मारते हुए दिखाया...इससे पहले भी राज ठाकरे और इसके गुंडे इस तरह के उल्प्प्ल-जुलूल काम करते आए हैं. इसे वो मराठी मानूस के हक़ की लड़ाई बताता है. कल वो गिरफ्तार कर लिया गया...आज उसे कोर्ट में पेश किया जाएगा..शायद कुछ दिनों तक उसे जेल में रखा भी जाएगा..और उसके बाद क्या...फ़िर उसे छोड़ दिया जाएगा...लेकिन इस दौरान वो टीवी में, पेपर में और अन्य मीडिया चैनलों में छाया रहेगा...एक ऐसा नेता जिसका अपने प्रदेश में कोई वजूद नहीं है वो अपने कुछ गुंडों की बदौलत पूरे देश में चर्चित होता जा रहा है...यही है राज ठाकरे और उसकी सफल होती राजनीति....

सवाल है कि उसका नाम सुनकर क्यूँ शिवसेना नेताओं के माथे पर बल पड़ जाते हैं. इसका कारण है कि जिस रास्ते पर चलकर बाल ठाकरे ने ४ दशक पहले अपनी राजनीति चमकाई थी उसी रास्ते पर चलकर राज ठाकरे अपनी राजनीति चमका रहा है. जो वोट बैंक शिव सेना का है या था उसी पर राज ठाकरे की नज़र है...और यही कारण है कि उसका नाम सुनते ही शिवसैनिकों का चेहरा गंभीर हो जाता है और कांग्रेस नेताओं के चेहरे खिल उठते हैं.

सवाल उठता है कि क्यूँ बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग जो मुंबई में रह रहे हैं या फ़िर मुंबई से सरोकार रखते हैं वो राज ठाकरे से डर रहे हैं। इसका कारण है कि जो लोग मुंबई को अपने देश का हिस्सा मानकर वहाँ रोजगार कर रहे हैं, वहां अपने परिवार को रखे हुए हैं या फ़िर कई ऐसे भी हैं जिन्होंने अब मुंबई को ही अपना घर-बार बना लिया है उनके लिए राज ठाकरे खतरा बन गया है. राजनीतिक बिरादरी इस मामले को अपने फायदे और नुक्सान के हिसाब से देख रही है. महारष्ट्र कि सत्ताधारी दल कांग्रेस पर शिवसेना को कमजोर करने के लिए राज ठाकरे को ढील देने का आरोप लग रहा है वही भाजपा राज्य के भीतर और उसके बाहर के अपने नफे-नुकसान को देखते हुए चुप्पी लगाए हुए है. शिवसेना न चाहते हुए भी मराठी मानूस के साथ है...और ऐसे में जनता अपने को असहाय महसूस कर रही है॥वरना अगर सरकार मुस्तैद होती तो क्या मजाल कुछ गुंडों की कि वो इस तरह की बदतमीजी करने की हिम्मत जुटा पाते.

इस कहानी की सबसे कमजोर कड़ी साबित हो रही है मीडिया...राज ठाकरे को इस तरह से पेश किया जा रहा है जैसे वो कोई महान उद्देश्य के लिए लड़ता हुआ कोई सिपाही हो...उस टुच्चे से छुटभैये नेता को मीडिया इतनी हाईप दे रही है जितनी शायद ही किसी अच्छे काम करने वाले को मिलता होगा...और बिहार और उत्तर प्रदेश की सरकार भी कम दोषी नहीं हैं. अगर उनके लोग मुंबई में पिटे जा रहे हैं तो उन्हें केन्द्र से साफ़ कहना चाहिए की उनके लोगों की रक्षा होनी चाहिए और उनपर हमला करने वाले छुटभैये लोगों को तगडी मार लगाई जानी चाहिए...उनसे आतंवादियों से भी कदा सुलूक किया जाना चाहिए. जब उन राज्यों की सरकार केन्द्र पर दबाव नहीं बनाएगी तबतक कैसे वहां के लोगों को न्याय मिलेगा....

Thursday, 16 October 2008

इंडिया शाइनिंग और चमक-दमक की निकली हवा!

पिछले २ दशको से देश को चमक-दमक का जो सपना दिखाया जा रहा था उसे आर्थिक मंदी ने धो डाला है। पहले तो इस मंदी ने अमेरिका और अन्य दमकते चेहरे वाले आर्थव्यवस्थाओं की चमक पोंछी उसके बाद अब तीसरी दुनिया के देश निशाने पर हैं। आखिरी समय तक हमारे देश के नीति-निर्माता बार-बार यही दुहराते रहे की भारत में कोई आर्थिक मंदी नहीं है और हम इसके प्रभाव से अछूते रहेंगे. लेकिन अब सच्चाई सबके सामने है. सीआरआर कम होकर ९ फीसदी से ६.५० फीसदी तक आ गया है, बैंकिंग सेक्टर के लिए सरकार ने 25,००० करोड़ की बेलआउट पैकेज की घोषणा की है. कल तक सफलता की कुलान्छे भरने वाली कंपनियों ने छंटनी शुरू कर दी है. जेट एयरवेज ने २,००० कर्मचारियों को निकालने का फरमान जारी कर दिया, टीसीएस, क्वार्क, रिलायंस रिटेल जैसी चमकती-दमकती कंपनियां भी पीछे नहीं हैं. यहाँ तक कि एयर इंडिया ने भी छंटनी की जगह १५,000 कर्मचारियों के लिए बिना वेतन की छुट्टी जैसी योजना लॉन्च कर दी है...वगैरह...वगैरह...

हमारी राजनितिक बिरादरी के लिए ये चिंता की बात नहीं है उनके लिए सबसे ज्यादा चिंता की बात है इस मंदी की मार चुनावी मौसम आने से पहले आ गई. कुछ इससे खुश हो रहे हैं की चलो बैठे-बिठाए एक मुद्दा हाथ लग गया. मंदी की मार से भारत भी प्रभावित होगा इस बात को सरकार ने आखिरी समय तक दबाये रखा। लेकिन ये कब तक सम्भव था. घाटा बढ़ता देख कंपनियों ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया. जेट ने मुनाफे के लिए किंगफिशर से हाथ मिला लिया और अपने २,००० कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया। यानी कल तक जो लोग जेट जैसी कंपनी में काम कर रहे थे आज वो बिना किसी गलती के सड़क पर खड़े कर दिए गए. उनसे किसी को सहानुभूति भी नहीं है. सरकार ने कह दिया कि ये कंपनी का अंदरूनी फैसला है और सरकार इसमें हस्तछेप नहीं कर सकती. हज, कैलाश मानसरोवर जैसी धार्मिक यात्राओं के लिए सरकार करोड़ों-अरबो रुपया बाँट सकती है, लेकिन बात-बात पर मुआवजा बांटने वाली यही सरकार तब कोई बेलआउट पैकेज मंजूर नहीं कर सकती जब देश के पढ़े-लिखे लोग अपनी नौकरियां खो रहे हों।

ये देश की बड़ी कंपनियों के फैसले की बात है जहाँ हजारों युवा काम करते हैं. ये बड़े-बड़े शिक्षण संस्थानों की उपज हैं और काफ़ी पैसा और मेहनत के बाद अपना कैरीअर बनाया है. इन सबके बावजूद ये आज सड़क पर हैं. ये हैं हमारी चमक-दमक वाली आर्थव्यवस्था की सच्चाई. और इसपर सरकार का जवाब है कि ये कंपनियों का अंदरूनी मसला है. जनता में इस फैसले पर कोई उबाल नहीं दिख रहा है. इतने बड़े फैसले पर कोई बड़ा विरोध न हो पाना इस बात का संकेत है कि देश का युवा वर्ग संगठित नहीं है और उसमें आन्दोलन करने की मानसिकता मजबूत नही है। यही कारण है की पूंजीवादी तबका बिना किसी झिझक के इतना बड़ा फ़ैसला ले लेता है और उसका कोई प्रबल विरोध तक खड़ा नहीं होता. राजनीती में युवा वर्ग और उसके मसले, उसकी समस्यायें उतनी प्रभावशाली नहीं रही, इसलिए कोई राजनीतिक दल उसके लिए खड़ा नहीं हो रहा है. और अपनी पढ़ाई-लिखी पूरी कर नौकरी कर रहा युवा अपनी लड़ाई में अकेले है. पिछले २ दशको में राजनीति के अन्दर आई हास का ये प्रत्यक्ष प्रमाण है।

शायद यहीं से वर्ग संघर्ष की लडाई शुरू होती है. जो फैसले ले रहा है वो है पूंजीवादी तबका और जो सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया जा रहा है वो है कामगार तबका. अबतक येही कामगार तबका देश में पूँजीवाद का सबसे प्रबल समर्थक रहा है. और ख़ुद को देश के अन्य तबको से अलग मानता रहा है. इस तबके को हमेशा से ये भरोसा रहा है की पूंजीवादी तबके का दामन थामकर वो आगे बढ़ता रहेगा और बाकी के देश से उसको कोई मतलब नहीं है. यही कारण है की आज जब इस तबके पर संकट आया है तो समाज में इसे लेकर कोई हलचल नहीं है. जबकि ये भी एक सच्चाई है की ये तबका भी इसी समाज से निकला है और अब ख़ुद को इससे अलग मानने लगा था. जबतक इस समाज में एकता नहीं आएगी तब-तक न तो राजनीतिक बिरादरी इसकी समस्याओं को लेकर संजीदा हो पायेगी और न ही कार्पोरेट जगत इसे लेकर दबाव में आ सकेगा. रूस, चीन और अन्य देशों में २०वि शताब्दी में हुई साम्यवादी क्रांति इसी अति की प्रतिक्रिया थी. और आज जब पूँजी वाद फ़िर शिखर पर आकर अपने रंग दिखा रहे तब इसी तरह के बुलबुले की जरुरत दिख रही है.

Saturday, 4 October 2008

मैडम कभी लाइन में नहीं लगती...

सुबह बैंक खुलने से पहले ही पहुंचना था सो जल्दी-जल्दी तैयार होकर निकले। सोचा था ११ बजे के पहले कहाँ काम होता है लेकिन जब पहुंचा तो देर हो चुकी थी. लम्बी लाइन लगी हुई थी और काफ़ी सारे लोग आगे लाइन में पहले से लग चुके थे... काम जरुरी था इसलिए मैं भी पीछे लग गया...लाइन बहुत धीरे-धीरे चल रही थी और कई सारे लोग ऑफिस से आए थे इसलिए उनको जल्दी थी. बीच-बीच में लोगों के फ़ोन बजते और लोग कह उठते सर/मैडम बस ५ मिनट में पहुँच रहा हूँ, बस बहन की फीस भरने की आखिरी तारीख थी इसलिए बैंक आ गया...पहुँच रहा हूँ॥ जब भी कोई लाइन में साइड से लगने का प्रयास करता अचानक पीछे लाइन में लगे लोग चिल्ला पड़ते. तभी एक महिला का आगमन हुआ. उन्होंने एक्सक्यूज मी के लजीज शब्द से हॉल में एंट्री मारी.. भीड़ और लम्बी लाइन की परवाह किए बिना उनके कदम हौले-हौले लाइन में आगे की तरफ़ बढ़ते चले गए. अपना कागज़ निकाला और ये देखे बिना कि लोग उसी लाइन में अपना काम कराने के लिए काफ़ी देर से खड़े हैं उन्होंने अपना कागज़ काउंटर मैन को बढ़ा दिया. पीछे लाइन में खड़े आदमी ने आगे वाले को कुहनी मारी... लेकिन आगे वाले को कुछ नहीं बोलते देख वो खौल उठा और बोल पड़ा मैडम लाइन से आइये न. मैडम ने अपनी गर्दन उसकी ओर घुमाई और उसे ऐसे देखा जैसे उसने कोई असंसदीय भाषा का इस्तेमाल कर दिया है. और पूरे विश्वास के साथ कहा कि-- मैडम कभी लाइन में नहीं लगती...

अबला नारियों के देश कहे जाने वाले भारत की राजधानी दिल्ली जैसे शहर में अबला नारियों के सशक्त बनते जाने के ऐसे ही कई प्रमाण रोज देखने को मिलते हैं। सिनेमा हॉल हो, बैंक हो, फ़ोन बिल- पानी बिल- या किसी भी प्रकार का बिल जमा करना हो सभी जगह ये नज़ारा देखने को मिल जाता है/ दिल्ली के ब्लू लाइन बसों की तो बात ही कुछ अलग होती है. एक तरफ़ की पूरी सीट महिलाओं के लिए आरक्षित लिखी रहती बसों में ये कम भी होती है और कई में एक तरफ़ की पूरी..यानी कि बस वाले अपनी सहूलियत से आरक्षण की सीमा तय करते रहते हैं. खाली देखकर अगर कोई पुरूष या लड़का किसी महिला सीट पर विराजमान हो जाए और अगले बस स्टैंड पर कोई महिला या लड़की बस में चढ़ जाए तो देखिये नज़ारा. अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए या तो लड़का पहले ही सीट छोड़ दे या फ़िर अपमानित होने के लिए तैयार रहे. जैसे ही महिला सीट पर कोई पुरूष दिखा लड़किया आकर उसे इशारा करती है...ऊपर कि ओर जहाँ महिला लिखा रहता है. लड़के भी आखिरी वक्त तक अपनी लड़ाई लड़ते हैं. लड़की ने ऊपर इशारा किया..लड़का उसके सामने जबतक फ़िर से उसे पढ़कर सही होने की पुष्टि नहीं कर लेता सीट छोड़ना उसे ठीक नहीं लगता. लेकिन महिला लिखित सीटों के लिए अपनी आवाज बुलंद करने वाली लड़कियों को मैंने कभी नहीं देखा है कि उन्होंने कभी किसी बुजुर्ग के लिए सीट छोड़ी हो. इस काम की अपेक्षा भी हमेशा लड़को से ही की जाती है. मैंने आज तक कभी किसी बस में इस तरह का नजारा नहीं देखा है. चाहे सीट पर बैठी लड़की २० साल की नवयुवती ही क्यूँ न हो लेकिन वो किसी बुजुर्ग के लिए सीट नहीं छोड़ सकती है.

ब्लू लाइन बसों में रोजाना सफर करने वाली लड़किया सीट पाने के लिए कुछ विशेष तरीके भी आजमाती हैं। अगर ब्लू लाइन बस के ड्राईवर कंडक्टर से उनकी जान पहचान बन गई तो रोजाना उनकी सीट पक्की. आगे की बालकनी की सीट ऐसी लड़कियों के लिए पक्की रहती इस इलाके को -नो मैन्स लैंड- कह सकते हैं. इस इलाके में अगर गलती से कोई लड़का घुस गया तो उससे कंडक्टर ऐसे सलूक करता है जैसे वो भारत की सीमा में घुसा कोई अवैध बंगलादेशी नागरिक हो. चमक-दमक और रंगी-पुती लड़कियों से भरे उस इलाके को बस के बाकी हिस्सों में बैठे लड़के ऐसे देखते हैं जैसे बॉम्बे के पास के इलाको में बैठे लोग बॉम्बे शहर की रंगीनियत को देखते हैं...

Sunday, 28 September 2008

ऐसे तो मिट गया आतंकवाद...

दिल्ली में आज फ़िर एक ब्लास्ट हुआ। इस बार धमाका महरौली में फूलों के बाज़ार में हुआ। १३ सितम्बर को हुए सिलसिलेवार धमाके को भी लोग अभी कहाँ भूल पाए हैं। तब से अब तक लगातार चर्चा जारी है कि कैसे आतंकवाद पर काबू पाया जाए। आज जब फ़िर धमाका हुआ तब विदेश मंत्री ने कहा कि पूरी सख्ती से कुचला जाएगा आतंकवाद। विदेश यात्रा पर गए प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में सरकार के शीर्ष नेता प्रणब मुखर्जी ने गृह मंत्री शिवराज पाटिल को घर बुला कर हालात पर चर्चा की। इसके बाद उन्होंने कहा, 'सरकार किसी को नहीं छोड़ेगी और सख्त कार्रवाई करेगी।'--- अगर मैं भूला नहीं हूँ तो ऐसा १३ सितम्बर को हुए धमाको के बाद भी कहा गया था। सरकार ने संसद पर हुए हमले, लाल किले पर हुए हमले, सरोजिनी नगर में हुए हमले और लगभग हर हमले के बाद ऐसा ही कहा था। लेकिन हालत क्या है। संसद पर हमले के दोषियों की सजा राजनीतिक दांवपेंच में उलझ कर रह गई है। बाकी के हमलों में क्या हुआ किसी को पता नहीं। कुछ होने की उम्मीद भी किसी को नहीं।

दिल्ली में आज हुए धमाको में २ की जान चली गई। किसने लिए, क्यूँ गई किसी को नहीं पता। लेकिन गई और दो लोगों की गई। इसकी जिम्मेदारी किसी की नहीं। दो निर्दोष लोग मारे गए। उनके परिवार को शायद कुछ मुआवजा मिल जाए, सरकारी खाते में एक और केस शुरू हो गया। जांच शुरू हो गई। शायद कोई पकड़ा भी जाए और शायद ना भी। अगर पकड़ा भी गया तो शायद केस प्रूव नहीं हो पाए और वो छुट जाए। कुछ नहीं कहा जा सकता इस देश में। सब कुछ सम्भव है यहाँ।

१३ सितम्बर को हुए धमाकों के बाद पुलिस और गृह मंत्रालय पर कुछ करने का जब दबाव बना तो करवाई हुई। फ़ोन काल्स से मिले सुराग के आधार पर दिल्ली के जामिया इलाके में पुलिस ने छापे मारे। मुठभेड़ हुआ और २ आतंकी मारे गए। कई आतंकी पकड़ लिए गए। अब उनपर ये आरोप साबित होगा-नहीं होगा ये कानूनी मसला है। पुलिस का एक वीर जवान भी शहीद हुआ। पुलिस ने देश भर में हुए आतंकी हमलों के तार इस ग्रुप से जोड़ दिया और पूरे देश की पुलिस इस खुलासे में लग गई। कई आतंकी पकड़े गए...लेकिन हमारे यहाँ की राजनीति है कि थमने का नाम ही नहीं ले रही है। मारे गए और पकड़े गए सभी आतंकी एक समुदाय से है इसके लिए राजनीति शुरू हो गई। दुसरे समुदाय को कोई हैरानी नहीं हुई क्योंकि वो इस तरह की सुनने का आदि हो चुका है। लेकिन जिस समुदाय पर ये आरोप लग रहा है वो चुप कैसे रहता। उन लड़कों के घर वालों ने तो उन्हें आतंकी मानने से मना किया ही, धार्मिक गुरुओं ने भी अपने को शांत रखना मुनासिब नहीं समझा। हर हमले के बाद पकड़े गए लोगों के घर का दौरा करने वाले सबसे बड़े धर्मगुरु ने फ़िर वही किया। मुठभेड़ में मारे गए लोगों के अन्तिम संस्कार में गए और उन्हें क्लीन चिट दे दिया। इसके पहले गुजरात धमाकों में संदिग्ध पाए गए लोगों के घर जाकर भी वे ऐसा कर आए थे। उस विश्विद्यालय, जिससे ये kaii संदिग्ध जुड़े हुए थे ने तो इन्हे कानूनी सहायता मुहैया कराने तक की घोषणा कर दी. धार्मिक ध्रुवीकरण होता देख कई राजनेता भी अपना मुगदर भांजने में पीछे नहीं रहे। सभी ने बयां देना शुरू कर दिया। सिमी जैसे संगठनों तक को ye नेता लोग (जिसमें वर्तमान सरकार के कई मंत्री भी शामिल हैं) क्लीन चिट देने लगे. वो भी इतने विश्वास के साथ जैसे की उनकी सारी गतिविधियों की उन्हें पूरी जानकारी हो और कुछ भी करने से पहले इन संगठनों के नेता इनसे पूछ कर ही कोई कदम उठाते हों. कोई कहता कि आतंकवाद को किसी एक समुदाय से जोड़ कर कैसे देखा जा सकता है. जाहीर है ऐसा नहीं होना चाहिए. लेकिन जब हर मामले के बाद एक ही समुदाय के लोगों पर शक जाए तो कैसे यकीं नहीं हो.... ऐसा भी हुआ है कि उस समुदाय से बहुत सारे लोग देश के लिए काम करने के कारण प्रसिद्ध हुए हैं और देश ने उन्हें सर-माथे पर बैठाया भी है। इसलिए ये कहना कि देश एक समुदाय विशेष को निशाना बना रहा है बिल्कुल ग़लत है। इस समुदाय के लोगों को इसका उपाय तलाशना चाहिए कि उनके बच्चे देशविरोधी कामों में शामिल न हों इसके बदले ये समुदाय गलती मानने से ही इंकार कर रहा है. ऐसे में अगर दुसरे धर्मों से जुड़े संगठन ध्रुइकरण कराने में सफल हो गए तो कौन रोक पायेगा उन्हें.

ये मौका धर्मनिरपेक्षता के नाम पर राजनीति करने वाले सभी नेताओं के लिए एक बड़ा अवसर बनता जा रहा है. यही सारे नेता हिंदूवादी संगठनों पर लगातार प्रतिबन्ध लगाने की मांग करते आ रहे हैं. उनका आरोप है कि ये हिंदूवादी संगठन देश में साम्प्रदायिकता फैला रहे हैं. इनके अनुसार सिमी जैसे संगठनों को to वैसे ही बदनाम किया जा रहा है. सच कहें तो अगर ये अपनी बातों पर कायम रहना चाहते हैं तो इन्हे पहले विपक्ष के बदले अपनी सरकार से लड़ाई लड़नी चाहिए. जिस सरकार का गृह मंत्रालय सिमी पर प्रतिबन्ध जारी रखने के लिए अदालत में लड़ाई लड़ रहा है उसी सरकार के मंत्री उसी संगठन को क्लीन चिट कैसे दे सकते हैं. दूसरी बात ये कि अगर कोई धर्मगुरु क़ानून से आगे बढ़कर किसी आपराधी को क्लीन चिट देने का प्रयास करता है तो उसे भी क़ानून के दायरे में लाना चाहिए. अगर इतनी इक्छाशक्ति हो तो फ़िर आतंकवाद से लड़ा जा सकता है और अगर ऐसा सम्भव नहीं है तो फ़िर ये बयान आगे भी हर हमले के बाद जारी रहेगा और जनता भी इसे हर शनिवार को अखबारों में छपने वाली फिल्मी गॉसिपस की तरह पढ़ती रहेगी.....

Thursday, 25 September 2008

यहाँ तो सबकुछ पहले से ही उल्टा-पुल्टा है...

मशहूर अमेरिकी जादूगर डेविड ब्लेन न्यूयार्क के सेंट्रल पार्क में ६ मंजिल की ईमारत जितनी ऊँचाई पर एक तार के सहारे उलटा लटक गए हैं। ब्लेन ६० घंटों तक बिना खाए, बिना सोये लटके रहेंगे. लेकिन इसमें कोई नई बात थोड़े ही है ब्लेन अमेरिकी बाज़ार की नक़ल ही तो कर रहे हैं. अमेरिकी बाज़ार भी तो इन दिनों उल्टा लटका हुआ है और अपनी ताल पर दुनिया की अन्य अर्थव्यवस्थाओं को भी उलटा लटकाए हुए है. लेकिन एक बात बिल्कुल साफ़ है कि हमारा देश इस मामले में अमेरिका से बिल्कुल भी पीछे नहीं है. प्राचीन काल से ही हमारे यहाँ ऐसे बड़े-बड़े जादूगर हुए हैं जिन्होंने ख़ुद के आलावा बड़ी-बड़ी हस्तियों और कई बार तो पूरे देश को ही उलटा लटका दिया. अब विक्रम-वैताल के किस्से को ही देख लीजिये. डेविड ब्लेन तो एक बार उल्टे लटक कर दुनिया भर में ख़बरों में छा गए लेकिन अपने वैताल जी तो बात-बात पर विक्रम से रूठकर पेड़ पर उल्टे लटक जाया करते थे और फ़िर अपनी कहानी सुनने कि हामी विक्रम द्वारा भरने के बाद ही नीचे उतरते थे.

आधुनिक भारत में भी ऐसे सूरमा कम नहीं हैं जिन्होंने बड़े-बड़े तीसमार खान तक को उल्टे लटकाने में सफलता पाई है. अब बंगाल में तृणमूल प्रमुख ममता जी का जादू ही देख लीजिये. पूरी दुनिया में अपनी धाक जमाकर अपना बाजू दिखाने वाले टाटा को तो उन्होंने उलटा लटकाया ही, साथ-साथ इस साल जाड़े के मौसम तक घर के बाहर लखटकिया कार खड़ी करने का ख्वाब पाले लाखों लोगों की उम्मीदों को भी उन्होंने खूँटी पर टांग दिया. जिस हड़ताल और धरने-प्रदर्शन के बल पर अबतक वामपंथी भाई लोग सबको लटकाया करते थे उसी जादू का इस्तेमाल कर ममताजी ने उलटा उन्हीं को लटका दिया. वैसे अपने वामपंथी लोग भी कम जादूगर नहीं हैं। अमेरिका के साथ परमाणु करार मसले पर उन्होंने सरकार को ही उल्टा लटका दिया था. वो तो भला हो छोटे भैया का जिनका जादू उनपर भरी पडा और उन्होंने सरकार को रस्सी से उतारकर फ़िर से खडा किया.

अपने जल देवता के जादू को ही देख लीजिये। बाढ़ के पानी की शक्ल में आए जल देवता ने देशव्यापी जादू दिखाया. फ़िर क्या दिल्ली, क्या बिहार और क्या उडीसा सब जगहों पर लोग पेड़ों और खंभों पर लटके नज़र आए.

अपने मीडिया वालों का जादू भी देखने लायक है। दिल्ली में हुए ब्लास्ट के बाद गृह मंत्री महोदय की बार-बार कपड़े बदलने के लिए ऐसी खिचाई की कि बेचारे की कुर्सी जाते-जाते बची. अब तो किसी धमाके के बाद दौरा करते वक्त बेचारे अपने गंदे कपड़े बदलने से पहले भी १० बार सोचेंगे.

इशु को सूली पर टंगे देखकर उडीसा और कर्णाटक वाले इतने प्रेरित हो गए की उन्होंने पूरे कौम को ही टांग दिया। और इतने जलवे दिखाए की उसकी गूँज रोम और अमेरिका तक में सुनाई देने लगी.

वैसे पड़ोसी पाकिस्तान में भी जादोगारों की कोई कमी नहीं है। अब अपने जरदारी साहब को ही देख लिजिए. तोपची मुशर्रफ़ साहब पर उनका जादू ऐसा चला कि वो कहीं गुमनामी में खोते चले गए. पता चला हैं कि मुश् साहब इन दिनों अपने घर पर रहकर कागज़ काले कर रहे हैं. हो सकता हैं कि कल को उनका भी जादू चल जाए और दुनिया के बेस्ट सेलर राइटर्स में उनका भी नाम शुमार हो जाए. अपना जादू चलने कि खुशी लेकर इधर जरदारी साहब न्यूयार्क पहुंचे और उधर वजीरिस्तान में कबायली लडाकों ने अमेरिकी जासूसी विमान को पाकिस्तान में घुसते ही मार गिराया. इससे पहले कि जरदारी साहब लोकतंत्र बहाली के नाम पर बुश साहब से पीठ थपथपाने की गुजारिश करते विमान गिरने की ख़बर अमेरिका पहुँच गई. जरदारी साहब की हालत ऐसी की जनरल असेम्बली के हॉल में अंत समय तक बुश साहब से नज़रें चुराते फिरेंगे.

ये तो केवल भारत और पाकिस्तान के जादूगरों की सूची हैं. ऐसे ही न जाने दुनिया में और भी कितने जादूगर पड़े हुए हैं जो अमेरिकी जादूगरों को कड़ी टक्कर दे सकते हैं. ये तो एक सैम्पल भर हैं.

Wednesday, 24 September 2008

बातें हैं बातों का क्या...

आज अचानक मुझे नई दिल्ली स्टेशन जाना पडा। वहां बैठे हुए मैं बातें कर रहा था। अचानक मेरे सामने एक हाथ बढ़ा और साथ ही एक महिला की आवाज भी आई- कई दिनों से भूखी हूँ खाने के लिए कुछ दे दो बेटा. अपनी आदत के अनुसार मैंने आगे बढ़ने का इशारा किया और खुश होता हुआ अपनी बातों में लग गया. सामने खड़ी महिला आगे बढ़ गई. अचानक मेरी नज़र उसपर गई. एकदम कमजोर सी दिख रही उस महिला के उम्र का अंदाजा लगा पाना सम्भव नहीं था, फ़िर भी ऐसा लग रहा था कि उम्र ६० साल से ज्यादा ही होगा. कपड़े के नाम पर शरीर पर एक पुरानी सी साड़ी थी और चेहरे से उसकी दयनीयता झलक रही थी। मेरे बाद वो महिला करीब १५ लोगों के सामने हाथ फैलाती रही और सब ने उसे कुछ देने से नकार दिया. तब जाकर मुझे लगा कि शायद मुझे कुछ करना चाहिए. मैंने अपनी जेब टटोली और उसके खाने भर पैसे निकाल कर उसे देते हुए बोला जाकर कुछ खा लीजिये. उस महिला ने मुझसे पूछा कि खाना कहाँ मिलेगा. मैंने दूकान की ओर इशारा करते हुए कहा कि वहां जाओ वहीँ मिलेगा. वो महिला मुझे हाथ जोड़ते हुए दूकान की ओर बढ़ गई. मेरी नज़र उसे जाते हुए देखती रही. अचानक मुझे महसूस हुआ की मेरी आँखे भर आई है। मेरे आगे एक सवाल था कि इस उम्र में आके क्यूँ इस महिला के सामने ऐसा वक्त आया है? मेरी मदद से उस महिला का कुछ नहीं होने वाला है। इस उम्र में वो काम करने में सक्षम नहीं है और मैं सोचता हुं कि वो महिला अब स्टेशन पर ही कहीं वैसे ही सोई होगी और फ़िर कल दिन में खाने के लिए उसे किसी के आगे हाथ फैलाना होगा। और ये सिलसिला उसके जीवन के आखिरी वक्त तक चलता रहेगा। हम चाहे तो ऐसे लोगों को धिक्कार सकते हैं लेकिन मेरा मानना है कि ऐसा तबतक सम्भव नहीं है जबतक इंसान बहुत बेबस नहीं हो। किसी के आगे हाथ फैलाना इतना आसान काम नहीं है। लेकिन ऐसी स्थिति का होना हमारे समाज के लिए बड़ी असफलता है.


अक्सर सड़क चलते चौक-चौराहों पर या फ़िर कहीं सार्वजानिक स्थानों पर बैठे हुए कोई जब हमारे सामने हाथ फैला देता है हम आदतन ये सोचते हैं कि ये सब तो चलते रहता है। हम अक्सर हाथ फैलाने वालों को आगे बढ़ने का इशारा कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो लेते हैं। ऐसा करते वक्त कई बार अपने साथ खड़े लोगों पर इम्प्रेशन जमाने के लिए हम कह बैठते हैं कि इन लोगों को तो कोई काम ही नहीं। जहाँ देखों हाथ फैला देते हैं. बस स्टेशनों या रेलवे स्टेशनों पर कई बार जब छोटे बच्चे ऐसा काम करते हैं तो हम उनके माँ-बाप को उनको जन्म देकर कोसते हुए कह बैठते हैं कि जब पालना-पोषना ही नहीं था तो पैदा क्यूँ किया. लेकिन मेरे विचार में ये इतना छोटा सवाल नहीं है. ये सवाल मेरे कुछ सोचने या नहीं सोचने से ज्यादा सामाजिक है. सवाल सामजिक सुरक्षा का है. हम क्यूँ ऐसा समाज नहीं बना पाये हैं जिसमे सभी को सामाजिक सुरक्षा प्रदान किया जा सके. जो काम करने में सक्षम हैं उनकी बात नहीं है लेकिन जो बच्चे काम करने लायक नहीं है और अनाथ हैं या फ़िर ऐसे बुजुर्ग जो कुछ कर सकने में सक्षम नहीं है और उनके पास जीविका का कोई साधन भी नहीं है उनके लिए व्यवस्था को कुछ जरूर करना होगा. केवल राजधानी दिल्ली में ७५,००० ऐसे लोग है जो सड़कों पे अपनी जिंदगी बिताते हैं और दिन में चौक-चौराहों पर मांगते हैं। लोग उन्हें कुछ दे रहे हैं या फ़िर उसे देश की समस्या बताकर चुप रह जाते हैं ये उनका अपना मामला है। लेकिन हमारे समाज को इस बारे में कुछ करना चाहिए।


"जिस्म तो ख़ाक हो गया बेबसी के बोझ से,
आँखों में भी बेहिसाब पानी ही पानी था।".....

Monday, 22 September 2008

और अब पढिये लादेन के लिखे नज़्म!

अखबार पर नज़र गई। सॉफ्ट स्टोरिज में ओसामा बिन लादेन का नाम देखकर हैरानी हुई। अक्सर अखबार के इस इलाके में सनसनी फैलाती और धमाका करती सिने तारिकाओं और सिने स्टार्स के अफेयर्स के किस्से छपते हैं इस लिए पहले तो भरोसा नहीं हुआ। लगा कहीं नीचे -बुरा न मानो होली है- तो नहीं लिखा हुआ है। लेकिन जब दूर-दूर तक इसका कोई निशाँ नहीं मिला तब जाकर कुछ संतोष हुआ. ख़बर की शीर्षक थी- एक बेहतरीन कवि भी है लादेन. लादेन जी की तस्वीर के साथ ख़बर छपी गई थी.


धमाके के अंदाज में इस पेज को पढने की आदत के कारण हमने इस ख़बर को इस अंदाज में पढ़ा। लीजिये आतंकवाद की दुनिया से एक और धमाका आपके सामने आ गया. दुनिया भर को और खासकर चौधरी अमेरिका को अपने बाजुओं की ताकत दिखाने वाले आतंकवाद सनसनी ओसामा बिन लादेन के बारे में नया खुलासा कि वह एक 'बेहतरीन कवि' भी है। कैलिफॉर्निया यूनिवर्सिटी में अरबी के प्रोफ़ेसर फ्लाग मिलर जल्द ही ओसामा की साहित्यिक कृतियों को प्रकाशित करने वाले हैं। एक अमेरिकी अखबार में ख़बर छपी है कि अमेरिका में 9/11 के आतंकवादी हमले के बाद अफगानिस्तान में ओसामा के अड्डे से टेप मिले, जिनमें 1990 के दशक में शादी और अन्य महफिलों में उसके गाए नगमे थे। मिलर ने इनका अध्ययन किया है। मिलर का मानना है कि लादेन एक 'सुलझा हुआ' शायर है। उसकी मात्राएं चुस्त हैं और यही कारण है कि बहुत से लोगों ने उसकी नज्मों को टेप किया है। अपनी नज्मों और नगमों में लादेन ने खुद को 'जंगजू शायर' या योद्धा कवि के रूप में पेश किया है।


सहसा मेरे दिल में आने वाले समय की एक तस्वीर उभर आई। अब आगे आने वाले समय में विरह-वेदना के काल में प्रेमी अपनी प्रेमिकाओं को लादेन जी की शायरी एसेमेस करके भेजेगा और समझायेगा कि जैसे लादेन जी ने विरह का काल काटा वैसे ही हमें भी हिम्मत से इस समय को बिताना होगा और जब कोई सैनिक पति लड़ाई पर नहीं जाना चाहेगा तो उनकी हिम्मतवाली पत्निया उन्हें लादेन जी द्वारा लिखी हुई वीर रस वाली नज़्म सुनाकर भेजेंगी. आख़िर उनसे बड़ा प्रेरणास्रोत और कौन होगा.


चलिए सिलेब्रिटी शायरों की दुनिया में एक नया नाम तो जुडा। वैसे भी चाचा गालिब जैसे पुराने धुरंधर शायरों को पढ़ते-पढ़ते अब बोरीअत सी लगने लगी थी और वो भी ये पुराने शायर टीवी पे दिखने वाले सिलेब्रिटी शायर जैसे तो थे नहीं जिनके नगमें कैसेटों और नए-नए रूप में बिके। लेकिन लादेन जी के इतिहास को देखते हुए लग रहा है कि वे जल्द ही महानतम शायरों की सूची में शामिल हो जायेंगे. भाई कौन नहीं चाहेगा उनके लिखे हुए शब्दों को पढ़ना, और कौन प्रकाशक नहीं मना करेगा उनकी किताबों को छापने से. और रही मार्केटिंग की बात तो दुनिया भर में फैले हुए उनके एजेंट भाई लोग ये काम तो आसानी से कर लेंगे. सबसे ज्यादा प्रतियाँ तो दुनिया भर में फैले हुए उनके अनुयायी लोग और उनके विचारो को चारो तरफ़ फैलाने में लगे लोग ही खरीद लेंगे. भारत से लेकर, पाकिस्तान, अमेरिका, लन्दन, अफ्रीका और हर जगह उनकी वीर रस वाली कविताएं खरीदी जाएँगी...हो सकता है कि आगे चलकर वे दुनिया के पहले ग्लोबल शायर के रूप में विख्यात हो जाएँ.

Friday, 19 September 2008

मीडिया ने बनाया आम लोगों को असुरक्षित!

१९९३ के मुंबई धमाकों ने पहली बार आम लोगों को आतंकवाद का शिकार बनाया। इसके पहले तक भारत में आमतौर पर ये माना जाता था कि आतंकवादी अपनी मांगे मनवाने या प्रतिशोध लेने या फ़िर मीडिया में जगह बनाने के लिए केवल वीआइपी लोगों को ही निशाना बनाते हैं. इंदिरा जी और राजीव जी आतंकवाद के इस रूप का शिकार हो चुके हैं. दुनिया के कई और नेता भी इस आतंकवाद का शिकार हो चुके हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति केनेडी हों, मिस्र के अनवर सद्दात हों, बांग्लादेश के शेख मुजीबुर रहमान आदि नेता तमाम सुरक्षा बंदोवस्त के बावजूद आतंकी हमले के शिकार हो गए. १९८० के बाद का दौर पूरी दुनिया में मीडिया के विकास का दौर कहा जा सकता है. लेकिन जैसे-जैसे मीडिया की ताकत बढती गई-(ख़बरों तक जल्द से जल्द पहुचने, उसे जल्द से जल्द दिखाने और ज्यादा से ज्यादा जगह की खबरों को एक साथ दिखाने की क्षमता) वैसे-वैसे आतंकवादियों ने भी मीडिया का इस्तेमाल करना बखूबी सीख लिया. पहले उन्हें लगता था कि ख़बरों में आने के लिए बड़े लोगों को निशाना बनाना पडेगा, लेकिन मीडिया के मजबूत होने के साथ ही इनका काम आसान हो गया। वीआइपी हमलों को अंजाम देने के लिए उन्हें जहाँ काफ़ी मश्शकत करनी पड़ती थी वही ये रास्ता उन्हें काफ़ी आसान लगा. फ़िर दहशतगर्दों ने अपना तरीका बदला और मुंबई में सिलसिलेवार धमाके कर आम जनता को निशाना बनाया. ऐन इसी वक्त दुनिया के कई हिस्सों में आतंकवादियों ने आम लोगों को निशाना बनाकर कई हमले किए और अपने नए तरीके को लॉन्च किया. अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर २००१ में हुआ हमला इस कड़ी की सबसे बड़ी घटना थी.

मुंबई में जो सिलसिलेवार धमाके हुए उसे पूरे देश और पूरी दुनिया ने देखा। आतंकवादियों के मकसद को, उनके द्वारा अंजाम दिए गए मकसद को और लोगों में उसकी दहशत को मीडिया में खूब जगह मिली। इस सफलता से उत्साहित होकर इन संगठनों ने एक-एक कर कई हमलों को अंजाम दिया। पिछले कुछ सालों में दिल्ली, मुंबई, जयपुर, आँध्रप्रदेश, बनारस, बेंगलोर, अहमदाबाद समेत कई शहरों में आतंकी हमले हुए। ये सारे हमले आम लोगों को निशाना बनाकर सार्वजानिक जगहों पर किए गए थे। हर हमले के बाद सरकार ने आतंरिक सुरक्षा को मजबूत करने का आश्वासन दिया और सुरक्षा तथा खुफिया एजेंसियों को सक्रीय तथा आक्रामक बनाने का प्रण लिया. इन हमलों ने एक बात साफ़ कर दी कि अब तक वीआइपी सुरक्षा को प्राथमिकता देती आ रही सुरक्षा एजेंसियों को अपना तरीका बदलना होगा. अगर आतंकवाद से लड़ना है तो आम लोगों को सुरक्षा प्रदान करना होगा. इस दौरान आम लोगों की अपेक्षाएं बढ़ न जाए इसके लिए बार-बार कहा गया कि देश के एक अरब से ज्यादा आबादी में से हर एक को सुरक्षा प्रदान करना सम्भव नहीं है.

ऐसे वक्त में मीडिया ने काफ़ी हद तक सकारात्मक भूमिका निभाई। सरकार और खुफिया एजेंसियों कि खूब खिंचाई की गई लेकिन कई मौको पर खबरों को सनसनीखेज बनाने और जल्द से जल्द ब्रेकिंग न्यूज़ देने की होड़ में मीडिया ने कई बार आतंवादियों को नए रस्ते भी सुझाए। पिछले सप्ताह दिल्ली में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के बाद मीडिया के द्वारा किए गए २ कामों का मैं जिक्र करना चाहूँगा। दिल्ली में धमाकों के तुंरत बाद जब सभी टीवी चैनलों पर ये ख़बर लाइव चल रही थी तभी एक गुब्बारा बेचने वाला लड़का जो कि बाराखम्भा रोड पर हुए धमाकों का प्रत्यक्षदर्शी था को पुलिस ने पकडा। अचानक सभी चैनलों ने अफरा-तफरी में उसे मानव बम घोषित कर दिया. फिल्ड से लाइव कर रहे और उन्हें स्टूडियो से संचालित कर रहे खबरनवीसों ने आपाधापी में थोडा संयम बरतने का प्रयास भी नहीं किया. उस समय अचानक मानव बम की ख़बर को सबसे अहम् बना दिया गया. रिपोर्टर्स ने यहाँ तक कह दिया कि बच्चे के शरीर पर बम बंधा हुआ है और उसे गुब्बारे का लालच देकर आतंकवादियों ने उसके शरीर पर ये बाँध दिया था. बाद में जब पुलिस ने मामला स्पष्ट किया तब तो मीडिया बैकफूट पर आई और इस ख़बर को हटाया गया. अगर आतंकियों ने अबतक ऐसा करने की कभी सोची भी नहीं हो तो आगे के लिए उन्हें मीडिया ने एक नया तरीका दे दिया. मीडिया की गैरजिम्मेदारी का दूसरा किस्सा प्रिंट मीडिया से आता है। हादसे के २ दिन बाद एक राष्ट्रिय समाचारपत्र ने धमाकों के लिए इस्तेमाल किए गए अमोनियम नाइट्रेट का पूरा विवरण छाप डाला. मसलन ये क्या होता है और किन-किन चीजों के साथ इसे मिलाकर किन-किन विधियों से इससे बम बनाया जा सकता है. इसके एक दिन बाद केन्द्र सरकार ने अमोनियम नाइट्रेट को विस्फोटक की श्रेणी में लाते हुए निर्देश दिया कि इसकी बिक्री में ध्यान दिया जाए.

समाचार के आलावा मीडिया के अन्य माध्यमों ने भी इस मामले पर कम गैरजिम्मेदारी नहीं दिखाई है. सस्पेंस वाले नोवेल पढ़कर अपराध करने के कई किस्से तो हम पहले भी सुन चुके हैं लेकिन अहमदाबाद में जब हाल में हुए धमाकों में से एक अस्पताल में किया गया तब कहाँ गया कि ये हमला हाल ही में आई एक बॉलीवुड फ़िल्म से प्रेरित थी. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सृजनात्मकता की रक्षा के नाम पर इसका बचाव तो किया जा सकता है लेकिन इससे आम लोगों की जिंदगी खतरे में पड़ सकती है और मीडिया को अपनी इस जिम्मेदारी को भी ध्यान में रखना पडेगा.

Sunday, 14 September 2008

दहशतगर्दी का सिलसिला तो थामना ही पड़ेगा...

वाराणसी-दिल्ली-मुंबई-हैदराबाद-जयपुर-बेंगलूर-अहमदाबाद और अब फ़िर दिल्ली...इससे पहले भी आतंकवादी हमलों का ये सिलसिला चलता रहा है और आगे भी इसके अनवरत चलते रहने में किसी को कोई संदेह नहीं है। इसी सिलसिले के तहत १३ सितम्बर को देश की राजधानी दिल्ली में ५ सिलसिलेवार धमाके हुए. २४ लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पडा और दर्जनों लोग घायल हुए. ये सारे हमले ऐसे जगहों पर हुए जहाँ भीड़-भाड़ ज्यादा थी. करोलबाग के गफ्फार मार्केट में पहला धमाका हुआ...यहाँ दिल्ली के लोग और बाहर से यहाँ आने वाले लोग खरीददारी के लिए आते हैं. इसके बाद कनाट प्लेस में बाराखंभा और सेंट्रल पार्क में धमाके हुए और फ़िर पॉश ग्रेटर कैलाश के मार्केट में धमाके हुए। बाराखंभा जैसे जगह पर लोग ऑफिस से छूटने के बाद बस पकड़ने के लिए आते हैं, शनिवार का दिन होने के कारण ग्रेटर कैलाश के बाज़ार में चहल-पहल थी. वीकएंड मनाने के लिए बड़ी संख्या में लोग सेंट्रल पार्क में जमा थे. तभी इन जगहों पर धमाके किए गए और लोगों को शिकार बनाया गया...

दिल्ली में आतंकी हमलों की ख़बर टीवी चैनलों पर दिखने लगी। दिल्ली में अफरा-तफरी क्या मची पूरे देश से यहाँ रह रहे लोगों के पास फ़ोन आने लगें। अफरा-तफरी के माहौल में पूरा देश अपने-अपने लोगों की कुशलता जानने के लिए व्यग्र था. दिल्ली में मोबाइल नेटवर्क जाम हो गया. लोग डरे-सहमे थे. दिल्ली के लिए पिछले कुछ सालों में ये दूसरा मौका था. लोग अभी भी सरोजिनी नगर और अन्य जगहों पर हुए धमाको की दर्द से उबर नहीं पाये हैं. यही मकसद दहशतगर्दी फैलाने वालों का था और वो अपने मकसद में कामयाब दिखे. लोग गुस्से में थे. अस्पतालों में राजनीतिक नेताओं के दौरे होने लगे. सरकार की ओर से मृतकों को मुआवजे का ऐलान भी कर दिया गया. गृहमंत्री ने टीवी के सामने आकर कह दिया कि लोग शान्ति बनाए रखे और घबराए नहीं. लेकिन लोगों को सरकार के किसी भी आश्वासन पर भरोसा नहीं हुआ . पुलिस ने जांच शुरू कर दी...और हर हमले की तरह देश के इतिहास में ये भी एक किस्से के रूप में दर्ज हो गया...हर साल १३ सितम्बर को कुछ मनाने के लिए.

प्रधानमंत्री से लेकर सभी लोगों ने हमले की निंदा की. गृह मंत्री महोदय ने कहा कि दोषियों को बख्शा नहीं जायेगा. इसी समय देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी आईबी का बयान आया कि उन्होंने पहले ही इन हमलों का अंदेशा जताया था. बेंगलोर में भाजपा का सम्मलेन चल रहा था. भाजपा ने लगे हाथों सरकार की निंदा कर दी और सरकार की लापरवाही को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया. पोटा जैसे कड़े क़ानून की वकालत करते हुए भाजपा ने कह दिया कि अगर वो सत्ता में आई तो १०० दिनों में पोटा लागू किया जाएगा. टेलिविज़न चैनलों पर आने वाले बड़े-बड़े विशेषज्ञों ने तमाम तरह से हमलों का विश्लेषण किया. पिछले हमलों से उसकी समानताओं का अवलोकन किया जाने लगा और विभिन्न शहरों में हुए हमलों को जोड़कर आतंकी ऑपरेशन को कोई नाम देने का प्रयास किया जाने लगा. सुबह के अखबारों में बड़े-बड़े अक्षरों में बेंगलोर और अहमदाबाद से दिल्ली हमलों को जोड़कर ऑपरेशन-बीएडी नाम दे दिया गया.

सबके बयान आए लेकिन इससे लोगों को ये भरोसा दिला पाना मुश्किल दिख रहा है कि अगली बार जब वे किसी बाज़ार में खरीददारी के लिए जायेंगे, किसी पार्क में घुमने जायेंगे, सिनेमा हॉल में फ़िल्म देखने जायेंगे, ट्रेन और बस से सफर करने जायेंगे या फ़िर कहीं भी सार्वजानिक जगह पे जायेंगे तो सुरक्षित रह पाएंगे. दूसरी समस्या ये भी है कि क्या हमला करने वालों को रोका जा सकता है... इतना आसान नहीं लगता ये सब लेकिन क्या ये ऐसे ही होता रहेगा और लोग इसके शिकार होते रहेंगे या फ़िर इसके ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी जायेगी. क्या देश के लोगों को सुरक्षित रखने के लिए बाहर से आने वाले आतंकवादियों और हथियारों को सीमा के बाहर ही नहीं रोका जा सकता. क्या अपने देश के हर नागरिक को पहचान-पात्र देकर अवैध लोगों को पहचाना नहीं जा सकता. बाहर से हमलावर नहीं आ पायें इसके लिए क्या पड़ोसी देशों पर कडाई नहीं की जा सकती और सबसे बड़ी बात कि देशविरोधी काम में शामिल अपने देश के लोगों को क्या दण्डित नहीं किया जा सकता। वो कोई भी हो और किसी भी समुदाय से क्यूँ न हो उन्हें दण्डित करना पड़ेगा और उनका समर्थन करने वाले हर शख्स की गिरेबान पकड़नी होगी। पोटा जैसा या उससे भी कडा कानून अब नहीं लाया जाएगा तो कब. क्या देश के लोगों को इस मामले पर खुलकर खडा नहीं होना चाहिए. लोग जब तक खड़े नहीं होंगे तबतक राजनीतिक नेतृत्व पर कड़े कदम उठाने का दबाव नहीं बनेगा और लोग ऐसे ही इस दहशतगर्दी के शिकार होते रहेंगे...

Friday, 12 September 2008

चलो एक दिन कुछ पॉजिटिव सोच लें...

लगातार सुबह से ही कई टीवी चैनलों, समाचार वेबसाइट्स और अखबारों में खबरें आ रही थी। पहले तो मुझे समझ में नहीं आया कि माजरा क्या है लेकिन जब उत्सुकता बढ़ी तो हमने इस ख़बर की तह में जाने का फ़ैसला किया। पता चला कि ये सब १३ सितम्बर को लेकर हो रहा है। दरअसल सकारात्मक सोच को बढ़ावा देने के लिए पश्चिमी देशों में हर साल 13 सितंबर को पाजिटिव थिंकिंग डे (सकारात्मक सोच दिवस) मनाया जाता है। जिस दिन लोग सही सोच के साथ दिन शुरू करते हैं और सामाजिक कल्याण में भागीदारी करते हैं। इसे वहां के लोग जीवन पर लगातार हावी हो रहे नकारात्मकता पर काबू पाने के हथियार के रूप में देख रहे हैं। इसे हमारे देश की मीडिया ने भी इस बार खूब तवज्जो देनी शुरू की है। हो सकता है पिछले सालों में भी हमारी मीडिया ने १३ सितम्बर को मनाया हो लेकिन मेरे लिए इस दिवस का अनुभव पहला है। इमानदारी से कहूँ तो जितना दिवस पश्चिम के लोग मानते हैं उतना मना पाना हमारे बस की बात नहीं है। यहाँ तक कि वे लोग तो फादर्स डे, मदर्स डे और न जाने ऐसे ही कितने दिवस मनाते हैं। अब इसके लिए तो एक देरी रखनी पड़ेगी और किन लोगों को साल के किस तारीख को याद करना है इसकी पूरी सूची बनानी पड़ेगी।

वैसे जहाँ तक मेरा मानना है कि पॉजिटिव थिंकिंग के लिए हमारे देश में कई सारे दिवस पहले से ही फिक्स हैं। हमारे यहाँ जीतने भी त्योहार हैं सब इसी सोच पर आधारित हैं। इन दिनों पर लोगों को पॉजिटिव थिंकिंग रखना पड़ता है, पॉजिटिव लाइफ जीना पड़ता है और सब-कुछ पॉजिटिव ही करना पड़ता है। इस दिन पॉजिटिवीटी अनिवार्य हो इसके लिए धार्मिक डर भी होता है। लेकिन ये बात पश्चिम के पाजिटिव थिंकिंग डे में नहीं है। वैसे एक चीज इस डे में अच्छी है। भारत में ज्योतिष हस्तरेखा, रूद्राक्ष आदि का सहारा लेकर जो अपने जीवन में पॉजिटिवीटी लाना चाहते हैं उनके बनिस्पत तो ये दिवस मनाना ज्यादा व्यावहारिक ही कहा जाएगा। हो सकता है ये समाज के लिए नई परिपाटी गढ़ रही हो... और आने वाले समय में समाज कि दिशा तय करे...समय के बदलते रुख पर किसी कवि ने सच ही कहा है...
"जानें क्या रौंदें
क्या कुचलें
इनकी मनमानी
लगता है
अब तो सिर तक
आ जाएगा पानी
आने वाला कल
शायद इनके
तिलिस्म तोडे।

Sunday, 31 August 2008

कोसी, कंधमाल और कश्मीर के देश में...

आज की तारीख में अखबारों, टीवी और तमाम तरह की मीडिया में बस ये ३ मसले छाये हुए हैं। इन तीनों जगहों से सम्बन्ध रखने वाले लोग अपना अस्तित्व और अपनी जान बचाने की जद्दोजहद में लगे हुए हैं। लेकिन ये बाकी के देश के लिए मसले हैं और देश इनको बड़ी ही उत्सुकता से देख रहा है। बाढ़ से घिरे और अपना सबकुछ गवां कर रोते हुए लोगों को टीवी पर देखकर लोग सहानुभूति के दो शब्द कह लेते हैं, कश्मीर का मसला इससे थोड़ा अलग है। सब अपने चश्में से इस मामले को देख रहे हैं। कंधमाल का मामला तो और भी अलग है। इसे धार्मिक बर्चस्व और एक दूसरे के धर्म के लिए खतरा बनने जैसे शब्दों से प्रज्वलित किया जा रहा है।

बिहार में बाढ़ आई है। शायद नई पीढी के लिए अब तक की सबसे भयंकर बाढ़। लाखों लोग अपने घरो से बाहर धकेल दिए गए हैं और सड़कों, बांधों और अन्य ऊँची जगहों पर शरण लेकर जीने को बिवश हैं। बड़े नेता लोग वहां का हवाई सर्वेक्षण करके लौट चुके हैं और मदद के लिए घोशनाए हो चुकी है। सत्ता-पक्ष और विपक्ष के बिच बयानबाजी चल रही है कि इस बाढ़ के लिए दोषी कौन है. सत्ता पक्ष का कहना है कि पिछली सरकार की लापरवाही के कारण ऐसा हुआ तो विपक्ष का कहना है कि वर्तमान सरकार ने अगर समय रहते हमारी बात सुन ली होती तो ये तबाही नहीं होती. इन तमाम बयानों के साथ नेता जी लोग रोज अखबारों में छप रहे हैं और जनता वहां पानी-पानी हुई जा रही है. ऐसे मौके पर अपनी जान और अपनी प्रतिष्ठा बचाना लोगों के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है.

कश्मीर का मामला कुछ अलग ही है। वहां जो जिस पक्ष से हैं वे उसी पक्ष को सही मानते हैं। किसी के लिए जम्मू-कश्मीर में अमरनाथ जमीन विवाद धर्म और राष्ट्रहित का मसला बन गया है तो कोई इसे कश्मीरियों की हक़ की लड़ाई मानकर जायज ठहरा रहा है। बिच-बिच में पड़ोसी पकिस्तान भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता रहा है. भले ही उसे ख़ुद के अपने घर में आग लगी हो लेकिन हमारे घर कि इस लड़ाई में बोले बिना उसे भी चैन नहीं आ रहा है. कई दिनों से जारी जद्दोजहद के बाद आज जब सरकार ने बीच का रास्ता निकला है तो आग फ़िर भड़क उठी है। सम्झुते के अनुसार वो जमीन अमरनाथ यात्रा के वक्त बोर्ड को इस्तेमाल के लिए दी जायेगी लेकिन इसका उसे मालिकाना हक़ नहीं रहेगा. होना तो चाहिए था इसपर दोनों पक्षों को खुश लेकिन जब मामला सलट ही जाएगा तो फ़िर राजनीति का क्या होगा. इसलिए अभी भी कश्मीर और जम्मू में हाई अलर्ट जारी है. कश्मीर में कश्मीर के अलगाववादी इसका विरोध कर रहे हैं तो जम्मू में आतंकवादी हमले का डर बढ़ गया है. ऐसे में लोग क्या करे. अपने घर में दुबक के रहने के सिवा. और वो भी क्या भरोसा कि आतंकवादी उनके घरों में नहीं घुस जायेंगे.

कंधमाल भी जल रहा है। पड़ोसी जिले भी जल रहे हैं. हिंदू किसी को इसाई बन्ने नहीं देंगे और इसाई अन्य लोगों को ईसाई बनाने से नहीं मानेंगे. अब आप ही बताओ कि इसका हल क्या हो. हिंदू संगठन नहीं मानेंगे और रोम के पोप भी लगातार इसपर बयान देते रहेंगे तो फ़िर कौन पीछे हटेगा. सभी दलों कि राजनीति इसपर अलग-अलग है।

ये मसले देश के लिए है, देश की जनता के लिए है लेकिन नेतृत्व के लिए और भी कई मसले हैं जो इससे ज्यादा जरूरी है। भाजपा के लोग कर्णाटक में होने वाली राजनीतिक कार्यकारिणी की बैठक की तैयारियों में लगे हुए हैं, अगले हफ्ते होने वाली बैठक में अगले लोकसभा चुनाव के लिए मुद्दों कि तलाश के लिए तैयारियां जारी है. कांग्रेस के पास परमाणु करार जैसे कई मसले हैं. जिनपर उनकी प्रतिष्ठा टिकी हुई है. अगले लोकसभा चुनाव में ये उनके लिए मुद्दा बन सकता है. बुश प्रशासन के लिए भी तो ये एक चुनावी मुद्दा बन गया है. अब अगर अमेरिका के लिए ये इतना बड़ा मसला है तो फ़िर हमारे लिए बाढ़, दंगा और मार-काट से बड़ा मसला क्यूँ नहीं हो सकता. इस मुद्दों की लड़ाई में कौन किससे पीछे रहे. ऐसे ही मुद्दे बनते रहेंगे और बिगरते रहेंगे. जनता ऐसे ही समस्यायों से जूझती रहेगी और फ़िर चुनाव के लिए भीड़ बनती रहेगी. उसे न तो अपने लिए नेतृत्व बनाने आया है और ना ही वो अपने लिए इसका इस्तेमाल कर सकेगी...और ऐसे ही देश में कोसी...कंधमाल और कश्मीर और भी ना जाने क्या-क्या बनते रहेंगे...

Thursday, 28 August 2008

दुनिया के हर 3 में से 1 गरीब भारतीय...!

ऐसा नहीं है कि विश्व बैंक के इस आंकडे पर हमें कोई हैरानी हुई है. क्योंकि न तो हम भारत को विकसित देश मानने के मुगालते में जी रहे हैं और ना ही हमारी नज़र में भारत के चमकते मॉल पूरे देश की सम्पन्नता का प्रतीक है. लेकिन विश्व बैंक के ताज़ा अध्ययन से प्राप्त आंकडे बताते हैं कि गरीबी में हमने सबसे गरीब माने जाने वाले सारा-सहारा अफ्रीका इलाके को भी पीछे छोड़ दिया है. और रही बात हमेशा चीन से तुलना करने की हमारी आदत की तो चीन ने हमें अब इस लायक नहीं छोड़ा है. चीन में गरीब(?) हमारे देश की तुलना में आधे से भी कम हैं. विश्व बैंक द्वारा गरीबी के आकलन का ये हिसाब प्रतिव्यक्ति आय और खरीद क्षमता से लगाया गया है. जिसके अनुसार हर वो व्यक्ति गरीब माना जाएगा जो रोज १.२५ डॉलर से कम कमा पाता है.

आंकडे बताते हैं कि २००५ में हमारे देश में गरीबी रेखा से निचे जीवन-यापन करने वाले लोगों की संख्या ४५ करोड़ के आसपास है. ये अलग बात है कि भारत में गरीबी रेखा का मानक कुछ और है और पश्चिमी देशों में कुछ और. लेकिन गरीबी तो गरीबी है, वो चाहे भारत में हो या फ़िर पश्चिम के किसी देश में. वैसे भी भारत हो या कोई और देश चुनाव के वक्त सबसे ज्यादा बिकाऊ आइटम गरीबी ही होता है. अगर ऐसा नहीं होता तो हमारे देश में राजनीति चमकाने के लिए सभी बड़े नेता गरीबों के साथ फोटो क्यूँ खिंचवाते. गरीबो के घरों का दौरा क्यूँ करते और गरीबों के घरों की रोटियाँ तक क्यूँ खाते.

भारत में गरीबी के इस भारी-भरकम आंकडे को देखकर मन में कई सवाल उठते हैं. आंकडों के अनुसार एक अरब से ज्यादा आबादी वाले इस देश के करीब ४२ फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करते हैं. असल मसला ये है कि इस गरीबी के परिधि में कौन-कौन लोग शामिल हैं. जाहिर है इसमें देश के खेतों में पसीना बहाने वाले लोग तो शामिल होंगे ही. खेतो में पसीना बहाने वाले अधिकाँश लोगों की रोजाना की आय न तो १.२५ डॉलर से ज्यादा है और न ही उनके पास पूरे साल भर के लिए काम होता है. भारत में ऐसे लोगों के पास काम हो इसके लिए सरकार ने ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना शुरू की ताकि कम से कम इनके पास साल में १०० दिनों का रोजगार सुनिश्चित किया जा सके. इसके तहत लोगों को सड़क आदि बनाने के काम में रोजगार प्रदान किया जाता है. इस योजना में कई पेंच है. किसी के लिए ये सूटेबल नहीं है तो किसी के लिए ये पाना आसान नहीं है. दूसरी बात की अगर साल में १०० दिन ८० रुपया कम भी लोगों तो साल भर की औसत कमाई आपको गरीबी रेखा से ऊपर नहीं पहुँचा सकती.

इस ४२ फीसदी की परिधि में वे भारतीय भी शामिल हैं जो किसी न किसी प्राकृतिक आपदा के शिकार होते रहे हैं. अब बिहार में ही देखिये वहाँ इन दिनों भयंकर बाढ़ आई हुई है. नेपाल से आने वाली कोसी नदी का पानी १५ जिलों में घुस चुका है और ३० लाख से भी ज्यादा लोग अपना घर छोड़कर बांधों और टीलों पर जीवन बिताने को मजबूर हैं. ये लोग ऊँचे स्थानों पर बैठकर अपने घर के सामानों को बाढ़ के पानी में बहते हुए देखने को मजबूर हैं. कितने डूबकर मर गए इसका हिसाब लगाने की फुर्सत किसी को नहीं हैं. तत्काल राहत के लिए लोग भले ही पैसे की बरसात कर रहे हों लेकिन किसी को भी इसके स्थायी हल के लिए कुछ नहीं करना है. उत्तर प्रदेश, असम जैसे कई राज्यों में भी ऐसी ही बाढ़ आई हुई है. इन राज्यों में हर साल ऐसी बाढ़ आती है. दूसरी ओर कई राज्य सूखे की समस्या की जद में हैं. विदर्भ, तेलंगाना, बांदा जैसे इलाके के लोगों के लिए सुखा जैसे उनकी नियति बन गया है. अब अगर ये लोग गरीबी रेखा से ऊपर ख़ुद को नहीं उठा पा रहे हैं तो इसमें उनका क्या कसूर है. वे न तो नेपाल से आने वाले पानी को रोक सकते हैं और ना ही सूखे के लिए ख़ुद कोई प्रबंध कर सकते हैं. गरीबी रेखा में रहना उनके लिए गाड गिफ्टेड है.

वर्ल्ड बैंक के इस आंकडे में उडीसा और जम्मू-कश्मीर के वे लोग भी शामिल हैं जो कार्फू के कारण अपने काम पर नहीं जा पाते होंगे, जिनकी दुकाने, जिनके घर, जिनकी गाडियां और अन्य सामन दंगाइयों ने तहस-नहस कर डाली. उन्हें भले ही उन मुद्दों से कोई मतलब नहीं हो जिनके नाम पर जारी बवाल में उन्हें नुक्सान उठाना पड़ रहा हो लेकिन इसी बहाने बिना कोई गलती किए ये लोग वर्ल्ड बैंक द्वारा चिन्हित गरीबों की सूचि में डाल दिए गए.

इन आंकडों में वे लोग भी शामिल होगे जो झारखण्ड, छत्तीसगढ़, बिहार, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र आदि राज्यों के नक्सल प्रभावित इलाकों में रहते हैं और खुलकर अपना जीवन जीने की सुविधा से भी वंचित हैं. ये लोग विभिन्न नक्सली संगठनों की आपसी लड़ाई के सबसे आसान शिकार बन्ने के आदि हो गए हैं. इस आंकडे में पूर्वोत्तर भारत के वे लोग भी शामिल होंगे जो अलगाववाद की राजनीति की लड़ाई में बम-गोलियों के शिकार हो रहे हैं.

सवाल उठता है कि अगर वर्ल्ड बैंक के आंकडों में भारतीय गरीबी का ग्राफ ऊपर उठता जा रहा है तो इसके लिए किसे कसूरवार ठहराया जाए. मेह्नात्कास भारतियों को गरीब बनाने वाला कोई एक कारण हो तो कुछ बात भी बने लेकिन जब इतने सारे कारण हो तो मामला काफ़ी जटिल हो जाता है. दूसरी बात ये भी है कि अगर देश से गरीबी मिट गई तो चुनाव के वक्त गरीबी हटाओ का नारा देकर भूखे-नंगे लोगों को गोलबंद करने का अवसर भी ख़त्म हो जाएगा. इसके लिए भी देश में गरीबों का होना जरुरी है. लेकिन इसका मतलब ऐसा भी नहीं है हमारी राजनितिक बिरादरी इस समस्या पर कुछ नहीं कर रही है. चुनावी रैलियों और सभाओं में भीड़ जुटाने के लिए लोगों को पैसे देकर लाने की परिपाटी भी तो रोजगार प्रदान करने का एक प्रयास ही माना जाना चाहिए. क्या पता ऐसे प्रयासों से ही वर्ल्ड बैंक के गरीबों के ग्राफ में हम नीचे अपना स्थान बना सकें...

Monday, 25 August 2008

इस बार के नाटक का टॉपिक क्या हो...

गाँव में सालाना नाटक के मंचन का दिन नजदीक आता जा रहा है। हर साल नाटक मंडली में सक्रिय रहने वाले लोगों को इस बार कोई मुद्दा ही नहीं सूझ रहा है। सूझता भी कैसे, कल ही के अखबार में सरकार का बयान पढ़ा था कि इस बार विपक्ष के पास कोई मुद्दा ही नहीं है। जाहिर है जब विपक्ष के पास मुद्दा ही नहीं है तो सत्ता पक्ष के पास मुद्दे कहाँ से होंगे। सत्ता पक्ष तो वैसे भी हमेशा मुद्दाविहीन होता है। इस मुद्दाविहीन माहौल में उम्मीद की किरण तलाशने के लिए शाम को गाँव के चौपाल पर बैठक बुलाई गई। शाम को जल्दी ही सब तैयारी में लग गए, आख़िर अपने लिए एक अच्छा रोल झटकना था। कोई भी तैयारी में कमी नहीं रहने देना चाहता था। तैयारी भी ऐसी कि संचालक मंडल के सदस्य इम्प्रेस होकर उनका मनचाहा रोल देने के लिए हामी भर दे।

चौपाल सजी। बीच में बुधुवा काका आसान लगाये बैठे। मंडली के सबसे वरिष्ठ सदस्य होने के नाते ये स्थान उनके लिए पक्का है। भले ही १० सालों से बुधुवा काका स्टेज पर नहीं दिखे हो लेकिन ऑफ़ स्टेज उनके अनुभव और मैनेजमेंट के सब कद्रदान है। अब रामलीला के दौरान हुई घटना को कौन भूल सकता है। राम-सीता के विवाह का सीन नजदीक आ रहा था और सीता का रोल कर रहा मंगल बाहर दर्शकों की भीड़ देखकर अचानक शरमा गया। शरम के मारे मंगल स्टेज पर आने को तैयार ही नहीं दिख रहा था। ऐन वक्त पर बुधुवा काका ने उबार लिया। मंगल के कान में जाने काका ने क्या मन्त्र फूंका। मंगल स्टेज पर भी पहुँचा और ऐसी अदाकारी दिखाई कि दर्शकों को जी भरकर तालियाँ पीटनी पड़ी।

हाँ तो हम बात मुद्दे की कर रहे थे। बुधुवा काका ने चौपाल पर बैठे बाकी साथियों पर एक नज़र दौडाई और कार्यक्रम शुरू किया। हां तो भाइयों इस बार गाँव में भारी बारिश और बाढ़ से बहुत तबाही हुई है और कल ही पंडित जी कह रहे थे कि देवी माई की नाराजगी के कारण ऐसा हुआ है। तो क्यूँ न इस बार का नाटक देवी माई को प्रसन्न करने के लिए खेला जाए। मंडली के बाकी सदस्यों ने हो-हो कर काका का सपोर्ट किया। लेकिन लक्ष्मण को ये प्रस्ताव बिल्कुल नहीं जंची। उसे लगा कि अगर नाटक देवी माई पर खेला जाएगा तो रोज अखबारों में से पढ़े हुए उसके राजनीतिक ज्ञान का क्या इस्तेमाल होगा। उसने फट से कह डाला- काका, मेरे विचार में इस बार कुर्सी के खेल पर नाटक खेलते हैं। सब अचानक लक्ष्मण की ओर देखने लगे। तवा गरम देख हथौरा मारने की बात सोच उसने कहा- काका इस बार देश-दुनिया में कई दिग्गजों की कुर्सियां चली गई और कई की जाने वाली है। क्यों न हम इसपर नाटक खेले। परमाणु करार के बवाल में झारखण्ड के मधु कोडा को कुर्सी से हाथ धोना पडा और गुमनामी में दिन काट रहे गुरूजी को अचानक कुर्सी हथियाने का मौका मिल गया। उधर पाकिस्तान में जनरल साहब की कुर्सी चली गई। १० सालों से मुल्क में मनमानी कर रहे जनरल साहब पर वक्त की मार ऐसी पड़ी कि कुर्सी तो गई ही मुल्क छोड़ने तक का मौका नहीं मिला। कहाँ कल तक सबको अन्दर किए जा रहे थे और भारत को गरियाया करते थे, आज उसी मुल्क में अपने ही घर में नजरबन्द पड़े हुए हैं। मुश् साहब के अलावा अपने बुश साहब की कुर्सी जाने का वक्त भी आ गया है। इराक़, अफगानिस्तान और ईरान को सुधारने में लगे हुए कब वक्त बीत गया पता ही नहीं चला। और अब इन सबकों न सुधार पाने की टीस मन में लिए बुश साहब इस बार व्हाइट हाउस को अलविदा कह देंगे। कुर्सी जाने का खतरा तो अपने सरदार मनमोहन सिंह जी पर भी आ गया था। वो तो किस्मत अच्छी थी कि विपदा टल गई. सबको खामोश देख लक्ष्मण ने आवाज ऊँची करते हुए कहा कि इस बार के नाटक के लिए ये आईडिया हिट साबित हो सकता है.

लक्ष्मण को बोलते देख रंगीला से नहीं रहा गया। फट से बोल उठा- का इ बोरिंग आईडिया सुन रहे हैं आपलोग। इस बार तो कजरारे-कजरारे टाइप कुछ रंगीन होना चाहिए। मन ही मन रंगीला सोच रहा था कि अगर इस बार स्टेज पर डांस करने का मौका मिल गया तो पूरे गाँव के साथ चमकी भी तो मेरे लटके-झटके देख सकेगी। क्या पता इस बार उसका दिल मुझ पर आ ही जाए। और मेरे स्टाइलिश बालों की कटिंग पर हर महीने खर्च होने वाला २० रुपया भी तो वसूल हो जाएगा। बाल लहराते हुए उसने अपना आईडिया सबको सुना डाला। सबके चेहरे चमक उठे लेकिन जैसे ही सवाल उठा कि आइटम गर्ल कौन बनेगा तो सब के मुंह पर ताला लग गया। रंगीला का आईडिया स्टेज पर आने के पहले ही फ्लॉप हो गया।

रंगीला को पस्त होते देख झब्बू की बांछे खिल उठी। आख़िर रंगीला ही तो गाँव की लड़कियों के लिए रेस में उसे टक्कर देता है। लेकिन झब्बू अपनी निशानेबाजी के लिए पूरे गाँव में मशहूर है। आम के पेड़ पर से आम तोड़ने में शायद ही उसके किसी ढेले का निशाना फेल होता है। ओलम्पिक के समय से तो लोग उसे गाँव के अभिनव बिंद्रा के नाम से पुकारने लगे हैं। झब्बू भी इधर कुछ दिनों से मैडल जैसा कुछ गले में लटका कर घुमने लगा है। उसका सपना है कि आस-पास के गाँव में कभी कोई ढेलेबाजी का चैंपियनशिप हो तो वो गोल्ड मैडल जीत कर लाये और तब असली मैडल गले में लटका कर घूमेगा। तभी चमकी को इम्प्रेस कर रंगीला को पछाडा जा सकेगा। झब्बू ने ओलम्पिक पर नाटक का प्रस्ताव रखा। लेकिन राम्बुझावन बीच में बोल उठा- भाई टीवी हम भी देखते हैं। ओलम्पिक के आईडिया तक तो ठीक है लेकिन उदघाटन समारोह के लिए छोटे-छोटे कपड़े पहने बहुत सी लडकियां कहाँ से लोगे। सब फ़िर खामोश हो गए और झब्बू मन मसोस कर रह गया।

झब्बू के पीछे बैठा रामखेलावन अलग ही दुनिया में खोया हुआ था। उसकी आंखों में इस बार गाँव में आई बाढ़ का सीन तैर रहा था। बीमार माँ-बाप और नन्हे भाई-बहनों को लेकर पानी से भरे अपने घर को छोड़कर उसे ४० दिन तक गाँव के नहर पर रहना पडा था। पहली बार इस बार उसे श्यामू काका के साथ नाव पर चढ़ने का भी मौका मिला था। और सबसे ज्यादा मजा तो उसे तब आया था जब खाना गिराने वाला हेलीकाप्टर ऊपर मंडरा रहा था। शायद पहली बार आकाश में उड़ते हुए हेलीकाप्टर को उसने इतने करीब देखा था। लेकिन तब उसे इस बात का होश कहाँ था। ऊपर से गिरते हुए खाने के पाकेटों को लुटने के लिए उसे हमेशा बापू की शाबाशी मिलती थी। आगे-पीछे भागते लोगों को धकिया कर २ पाकेट खाना तो वो आसानी से लूट लाता था. रामखेलावन के मन में आया कि बाढ़ पर नाटक का आईडिया काका को सुना दे लेकिन लक्ष्मण, रंगीला और झब्बू के रंगारंग आईडिया को फ्लोप होते देखकर अपने आईडिया को वह मन में ही दबा गया. फ़िर बाढ़ वाले दिन का वो पल तो वो कभी भूल ही नहीं सकता है. कैसे घुमने आए नेताजी ने उसके सर पर हाथ फेरा था. रामखेलावन ये तो नहीं जानता था कि ये नेता जी कौन हैं और उनका काम क्या है. पूछने पर श्यामू चाचा ने बस इतना ही कहा कि नेता जी बहुत बड़े आदमी हैं और पास के ही गाँव के हैं. लेकिन हम लोगों के कल्याण के लिए इन दिनों दिल्ली में रहने लगे हैं. इस काम के लिए सरकार ने उन्हें दिल्ली में बड़ा सा बंगला दिया है और ऊपर उड़ने वाले हवाई जहाज से ही ये आते जाते हैं. रामखेलावन ने हवाई जहाज तो देखा था लेकिन दिल्ली कभी नहीं देखा. उसे लगा जैसे उसके पास रहने के लिए उसका अपना घर है वैसे ही नेताजी के पास दिल्ली होगी। चौपाल पर क्या चल रहा था इससे रामखेलावन को कोई मतलब नहीं रह गया. वो अपनी पुरानी यादों में खो गया. झब्बू और रंगीला की तरह उसका कोई सपना भी नहीं था. उसके ख्यालों में बाढ़ का पानी और उसमें डूबते-उतराते उसके अपने घर का सामान तैरने लगा। उसके सपनों में नहर पर जमा इत्ते सारे लोग और चारो ओर पानी का अथाह समंदर और भी जाने क्या-क्या घुमड़ने लगा...

Saturday, 23 August 2008

बिहारी होने का मतलब कोई कुछ भी कहेगा क्या...

गोवा के गृह मंत्री रवि नाईक का एक बयान इन दिनों चर्चा में है. महाराष्ट्र के राज ठाकरे की तरह जब उन्हें चर्चा में आना था तो उन्होंने एक बयान दे डाला. अब बात थी कि बयान किस मसले पर दिया जाए. जाहीर था कि सबसे आसान निशाना बिहार को बनाया जा सकता था. मौका भी उन्हें मिल गया. पटना से गोवा की राजधानी पणजी जाने वाली नई प्रस्तावित रेल गाड़ी का मसला उठा उन्होंने बयान दे डाला कि इस रेल के चलने से बिहार से बड़ी संख्या में भिखारी गोवा आने लगेंगे. उन्हें मालुम था कि ये ऐसा मसला है जिसपर उन्हें स्थानीय लोगों और तमाशबीनों की वाहवाही मिलेगी. अब रवि नाइक ने अपने पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र से ही तो सबक लिया है. वहाँ जब भी किसी की राजनीति की धार भोथरी होती है तो उसे चमकाने के लिए सभी को बाहरी लोगों के विरोध का रास्ता दिखाई देता है. फ़िर चाहे बाला साहब ठाकरे हो या राज ठाकरे- सब ने इस मोहरे का जमकर इस्तेमाल किया है और इस खेल में सबसे आसान शिकार बिहार के लोग बनते है जो रोजी-रोटी के लिए देश के विभिन्न राज्यों में बड़ी संख्या में फैले हुए हैं और बिहारियों की यही खूबी उन्हें सबका निशाना बनाती है.

ऐसा नहीं है कि बिहारियों को केवल महाराष्ट्र और गोवा में ही ऐसे भेदभाव का शिकार होना पड़ता है. बल्कि राजधानी दिल्ली हो, पश्चिम बंगाल हो, पंजाब हो या फ़िर देश का कोई भी हिस्सा सभी जगह बिहार के लोग रोजगार के लिए एक खतरे के रूप में देखे जाने लगे हैं और स्थानीय लोगों का यही डर वहां ने नेताओं के लिए भुनाने लायक मसाला बन जाता है. पंजाब, दिल्ली जैसे जगहों पे तो हालत ऐसी है कि अन्य किसी राज्य का रिक्शा चालाक तक आसानी से किसी भी हंसने लायक बात को बिहार से जोड़कर दांत निपोरने की आदत बना चुका है. राजधानी दिल्ली के बसों में काम करने वाले खलासी तक किसी भी मजदूर से दिखने वाले आदमी को बात-बात पर बिहारी कहने से नहीं चुकता. वे इसका इस्तेमाल ऐसे करते हैं जैसे कोई गाली दे रहे हों. भले ही जिसे वे कह रहे हैं वे किसी भी राज्य से हो लेकिन हर मजदूर दिखने वाला आदमी उसे बिहारी दीखता है. भले ही उसकी ख़ुद की हालत उस सामने वाले से ज्यादा ख़राब हो.

मैं पिछले ४ सालों से देश की राजधानी दिल्ली में रह रहा हूँ. मैं यहाँ जब नया-नया आया था तब ये चीजे मुझे भी बिचलित करती थी. यहाँ जब भी कोई अपराध होता था तब लोग इसे सीधे बिहार से जोड़ देते थे, चाहे मामूली चोरी हो या फ़िर हत्या तक का मामला. लेकिन अब मेरा नजरिया बदल चुका है. इन सालों में मैंने इतने मामले होते हुए यहाँ देखे हैं और उनमे अन्य राज्य के लोगों कि संलिप्तता देखकर लगता है कि ये सब कुछ लोगों की मानसिकता का दोष है जो वो किसी भी अपराधी को बिहार से ही जोड़कर देखते हैं. कुछ चर्चित मामले जैसे कि नॉएडा का आरुशी-हेमराज हत्याकांड, निठारी-हत्याकांड, मुंबई का नीरज ग्रोवर हत्याकांड जैसे मामलों में एक भी आरोपी को लोग बिहार से नहीं जोड़ सके और ये सारे लोग वैसे राज्यों से रहे जिन्हें अपने होने पे बहुत गर्व है. इन राज्यों के कुछ लोग अपनी कुंठा में हमेशा बिहार को ग़लत चीजों से जोड़कर देखने की आदत बना चुके हैं.

इतना ही नहीं जिस गोवा के गृहमंत्री का ये बयान आया है उसी गोवा में अब से कुछ महीने पहले एक ब्रिटिश किशोरी पर्यटक की हत्या कर दी गई. इस मामले में पता नहीं नशा और जाने किन-किन बुराइयों की चर्चा हुई. पर्यटन के नाम पर चमक-दमक में लिपटे गोवा के समंदर किनारे के इन इलाकों की सच्चाई भी इस मामले में खुलकर लोगों के सामने आ गई. देश में मौजूद हर बुराई के लिए बिहार जैसे राज्यों को दोष देने वाले बड़े शहर अगर अपने अगड़े होने पर गर्व करते हों तो वहां की सच्चाई इस पर सवाल खड़ा करती है. अब राजधानी दिल्ली के अखबारों में रोज ही ख़बर छपती रहती है कि २ करोड़ की हेरोइन के साथ इतने लोग पकड़े गए तो ३ करोड़ के चरस के साथ इतने लोग गिरफ्तार किए गए. ऐसी खबरें यहाँ की अखबारों में रोज ही छपती है. ये तो बस उतना ही होता है जितना पकड़ा जाता है इससे भी जाने कई सौ गुना ज्यादा माल तो पकड़ में ही नहीं आ पाता होगा. अब ये बताइए कि ये सारा गाजा, चरस, अफीम कौन खाता होगा. अब इसके लिए किसे दोषी कहा जाए. इन सब चीजों से इन बड़े कहे जाने वाले राज्यों का सर शर्म से नहीं झुकता.

उन्हें तो परेशानी इस बात से होती है कि बिहार से अगर सीधी रेल चलने लगेगी तो वहां से भिखारी ज्यादा संख्या में आने लगेंगे. अगर बिहार में ये भिखारी ज्यादा होते हैं तो देश के अन्य इलाकों में कौन सी हालत ठीक है. दिल्ली में सरकार के आंकडों पर गौर करे तो यहाँ की सड़कों और चौराहों पर ७५,००० भिखारी हैं. ऐसी ही हालत इन सभी राज्यों और शहरों में भी है. अब इस बात का फ़ैसला कैसे हो कि कितने किस राज्य से आए हैं. क्योंकि यहाँ तो सभी राज्यों से सीधी ट्रेन आती है...

Sunday, 17 August 2008

आखिरकार भगत सिंह को संसद परिसर में मिली जगह!

देश की आजादी की ६२वे वर्षगाँठ के अवसर पर आज़ाद हवा में साँस ले रहे हर भारतीय के लिए एक ख़बर सुकून देने वाली रही। इन्कलाब जिंदाबाद के नारे के साथ देश के लिए महज २३ साल की उम्र में फांसी पर चढ़ जाने वाले वीर शहीद भगत सिंह की प्रतिमा संसद भवन परिषद् में लगाई गई। भगत सिंह देश से मिलने वाले इस सम्मान के हकदार थे लेकिन इतने साल बाद भी देश के इस वीर सपूत को ये सम्मान नहीं दिया जा सका था। सरकार का ये कदम वाकई स्वागत योग्य है। इसके आगे भी इस देश के इस बहादुर बेटे को भारत रत्न जैसे सम्मान मिलने चाहिए.

आजादी की वर्षगाँठ के इस अवसर पर पत्रकार कुलदीप नैयर की भगत सिंह पर लिखी किताब "विदाउट फीयर-द लाइफ एंड ट्रायल ऑफ़ भगत सिंह" का विमोचन भी हुआ। इसमें देश की आजादी और लोगों की आजादी के लिए चल रही लड़ाई में आवाज उठाने के लिए भगत सिंह द्वारा अपनाए गए रास्ते पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है. विमोचन के अवसर पर लेखक ने कहा कि भगत सिंह हिंसा में विश्वास नहीं करते थे और विधानसभा में खाली जगह पर बम फेंककर उन्होंने ये सिद्ध कर दिया. बल्कि भगत सिंह का विश्वास था एकजुट भारत में- जो साम्प्रदायिकता और तमाम तरह के भेदभाव से मुक्त हो. और जहाँ व्यवस्था का काम गरीब और जरुरतमंदों के लिए काम करना हो.

बाकी चीजे तो आज के अवसरवादी युग में सम्भव नहीं लग रहा है लेकिन कम से कम इस शहीद को देश के लिए किए गए उसके त्याग और बलिदान के लिए सम्मान मिला यही बड़ी बात है. भगत सिंह ने जो किया सभी के लिए ऐसा कर पाना मुमकिन नहीं है. २३ साल की उम्र में जब युवा तमाम तरह की फंतासी में डूबे रहते हैं ऐसे में इस वीर ने जान-बूझकर विधानसभा में बम फेंका ताकि अंग्रेजी प्रशासन और देश तक अपनी बात पहुचाने के लिए उसे अदालत का मंच मिल जाए. अंग्रेजी शासन ने जब भगत को फांसी पर चढाया तब भी हँसते-हँसते ये वीर फांसी के फंदे पर झूल गया. ...ऐसे वीर को शत-शत नमन....