Saturday, 20 December 2008

विरोध के सबसे सस्ते हथियार का जनक कौन...शायद जैदी...

कल अख़बार में एक कार्टून पर नज़र गई। कार्टून में एक नेताजी को भाषण देते हुए दिखाया गया था. वे माइक नीचे कर डायेस की ओट में से छुपकर भाषण दे रहे थे. उनकी सुरक्षा के लिए सामने खड़ा पुलिसवाला कह रहा था कि सर खड़े होकर बोलिए कोई खतरा नहीं है. ये पूरा ऑडिटोरियम शू-फ्री( आप इसे जूता मुक्त जोन भी पढ़ सकते हैं) है...जाहीर है ये कार्टून इराकी पत्रकार मुन्तदर-जैदी के हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति बुश पर फेंके गए जूते पर आधारित था. किसी ने दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति के प्रमुख के ऊपर जूते फेंके. ये कार्टून उसी से उपजे डर को प्रदर्शित कर रहा था. जिस नेता बिरादरी पर हमारी व्यवस्था को चलाने की जिम्मेदारी होती है वही नेता बिरादरी विरोध के इस नए हथियार के निशाने पर है. मुंबई में भी जब आतंकी हमले हुए और लोगों ने आम लोगों की सुरक्षा के लिए मुखर होकर बोलना शुरू कर दिया तब भारत में भी ऐसा ही हुआ था. जब आम लोग केवल वोटर बने रहने की हद से आगे बढे और राजनेताओं के खिलाफ बोलने लगे तो यहाँ भी आवाज को दबाने का प्रयास हुआ था. कुछ लोगों ने तो विरोध करनेवालों और अपनी जान की सुरक्षा की मांग करने वाले लोगों को आतंकवादी तक करार दे दिया था. लेकिन ये भी सच है कि लोग जब बोलने की ठान लें तो उन्हें कोई रोक नहीं सकता. जैदी ने यही साबित किया. जिस बात को इराक के लोग कई सालों से दुनिया को नहीं सुना पा रहे थे उसे जैदी ने इतनी आसानी से और बिना किसी खर्च के पूरी दुनिया को सुना दिया.

जैदी वाली घटना के बाद तो अमेरिकी मीडिया में भी बुश द्वारा इराक में अपनाई गई नीति पर सवाल उठने लगा है. हालाँकि इस सस्ते हथियार की सफलता के लिए जैदी को भारी कीमत चुकानी पड़ी है. हिरासत में उसे इतना मारा गया कि उसकी हड्डी-पसलियाँ तक टूट गई. इस मामले की सुनवाई कर रहे जज ने ये बातें मीडिया को बताई. बुश पर जूता फेंकने वाला ये युवा पत्रकार आज दुनिया के उन लोगों के लिए किसी हीरो से कम नहीं हैं जो ये पसंद नहीं करते कि अमेरिका दुनिया पर अपनी दादागिरी दिखाए. दुनिया भर में इस घटना को लेकर प्रतिक्रियाएं आई. लोगों ने अपनी-अपनी तरफ़ से इस घटना की तारीफ की या फ़िर विरोध किया। ब्राजील के राष्ट्रपति हुगो शावेज ने जैदी को एक बहादुर और साहसी नौजवान बताया तो पूरे अरब जगत ने भी इस कदम को एक साहसी कदम बताया. बहरीन के एक अमीर ने अपनी मर्सिडीज कार उस पत्रकार को इनाम में देने की घोषणा की तो इराकी फुटबॉल टीम के एक पूर्व खिलाड़ी ने बुश की ओर चलने वाले जूते को नीलाम करने की घोषणा कार दी। लेकिन क्या अमेरिका इसे बर्दाश्त कर सकता था कि कोई कल को इस जूते को कहीं प्रदर्शनी में रखकर ये कहे कि देखो ये वही जूता है जो सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका के राष्ट्रपति पर फेंका गया था। जाहीर है अमेरिका इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता था और उसने किया भी नहीं। अमेरिकी सैनिकों ने उस पत्रकार को हिरासत में तो तोडा ही उसके जूते को भी सुरक्षा जांच के नाम पर नष्ट कर दिया। कहा गया कि ये देखने के लिए कि उस जूते में कहीं बम तो नहीं है सुरक्षा अधिकारीयों ने उसे नष्ट करवा दिया.

सवाल ये भी है कि जैदी ने ऐसा क्यूँ किया. जाहीर है पिछले कई वर्षों से इराक के लोग जो जीवन जी रहे हैं उसके लिए अमेरिका सबसे ज्यादा जिम्मेदार है या फ़िर जो भी हो. रोज मर-मर कर जीने लायक हो गए इस इस जीवन ने जैदी जैसे पढ़े-लिखे युवाओं को ऐसा करने पर मजबूर कर दिया है. वो पेशे से पत्रकार जरूर है लेकिन वो ख़बरों से समाज और लोगों की जिंदगी बदलने के जुमले को आजमाते-आजमाते उब गया लगता है और आख़िर में उसने वो कर दिया जो व्यवस्था से मायूस युवा हर देश में करते हैं. जैदी के साथ-साथ अन्य लोगों को भी शायद यही लगता है कि इराक की दुर्दशा के लिए अमेरिका ही सबसे ज्यादा दोषी है और कलम की ताकत को आजमाकर थक चुके जैदी ने तब जूते का सहारा लिया. दुनिया के हर हिस्से का आम आदमी आने वाले कल में अपने जिंदगी में बदलाव की उम्मीद लिए जी रहा है और जो भी उसे रोकने का प्रयास करेगा वो उसका विरोध करेगा. जैदी ने तो दुनिया को बस विरोध का एक नया हथियार भर दिया है. अमेरिका इसे बर्दाश्त कर भी कैसे सकता था उसने विरोध के इस नए प्रतिक को नष्ट करवा दिया. लेकिन क्या इस नए हथियार को रोका जा सकता है. शायद नहीं...लेकिन फ़िर भी इस घटना ने दुनिया को और खासकर आम लोगों को विरोध का एक हथियार तो दे ही दिया. कि जो तुम्हे लगातार जूते मार रहे हैं और तुम्हारी जिंदगी को नरक बनाये हुए हैं उन्हें तुम भी जूते मारो...

2 comments:

vikas pal said...

सही कहा लोग अबतक कलम छोड़कर हथियार उठाने की नसीहत दिया करते थे लेकिन अब वे कलम छोड़कर जूता उठाने की बात भी कर सकेंगे. वाकई ये एक समाजवादी हथियार है.

परमजीत बाली said...

अब नेताओं को कुछ तो डर रहेगा।एक बढिया रास्ता सुझा दिया जैदी ने।