Sunday, 28 September 2008

ऐसे तो मिट गया आतंकवाद...

दिल्ली में आज फ़िर एक ब्लास्ट हुआ। इस बार धमाका महरौली में फूलों के बाज़ार में हुआ। १३ सितम्बर को हुए सिलसिलेवार धमाके को भी लोग अभी कहाँ भूल पाए हैं। तब से अब तक लगातार चर्चा जारी है कि कैसे आतंकवाद पर काबू पाया जाए। आज जब फ़िर धमाका हुआ तब विदेश मंत्री ने कहा कि पूरी सख्ती से कुचला जाएगा आतंकवाद। विदेश यात्रा पर गए प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में सरकार के शीर्ष नेता प्रणब मुखर्जी ने गृह मंत्री शिवराज पाटिल को घर बुला कर हालात पर चर्चा की। इसके बाद उन्होंने कहा, 'सरकार किसी को नहीं छोड़ेगी और सख्त कार्रवाई करेगी।'--- अगर मैं भूला नहीं हूँ तो ऐसा १३ सितम्बर को हुए धमाको के बाद भी कहा गया था। सरकार ने संसद पर हुए हमले, लाल किले पर हुए हमले, सरोजिनी नगर में हुए हमले और लगभग हर हमले के बाद ऐसा ही कहा था। लेकिन हालत क्या है। संसद पर हमले के दोषियों की सजा राजनीतिक दांवपेंच में उलझ कर रह गई है। बाकी के हमलों में क्या हुआ किसी को पता नहीं। कुछ होने की उम्मीद भी किसी को नहीं।

दिल्ली में आज हुए धमाको में २ की जान चली गई। किसने लिए, क्यूँ गई किसी को नहीं पता। लेकिन गई और दो लोगों की गई। इसकी जिम्मेदारी किसी की नहीं। दो निर्दोष लोग मारे गए। उनके परिवार को शायद कुछ मुआवजा मिल जाए, सरकारी खाते में एक और केस शुरू हो गया। जांच शुरू हो गई। शायद कोई पकड़ा भी जाए और शायद ना भी। अगर पकड़ा भी गया तो शायद केस प्रूव नहीं हो पाए और वो छुट जाए। कुछ नहीं कहा जा सकता इस देश में। सब कुछ सम्भव है यहाँ।

१३ सितम्बर को हुए धमाकों के बाद पुलिस और गृह मंत्रालय पर कुछ करने का जब दबाव बना तो करवाई हुई। फ़ोन काल्स से मिले सुराग के आधार पर दिल्ली के जामिया इलाके में पुलिस ने छापे मारे। मुठभेड़ हुआ और २ आतंकी मारे गए। कई आतंकी पकड़ लिए गए। अब उनपर ये आरोप साबित होगा-नहीं होगा ये कानूनी मसला है। पुलिस का एक वीर जवान भी शहीद हुआ। पुलिस ने देश भर में हुए आतंकी हमलों के तार इस ग्रुप से जोड़ दिया और पूरे देश की पुलिस इस खुलासे में लग गई। कई आतंकी पकड़े गए...लेकिन हमारे यहाँ की राजनीति है कि थमने का नाम ही नहीं ले रही है। मारे गए और पकड़े गए सभी आतंकी एक समुदाय से है इसके लिए राजनीति शुरू हो गई। दुसरे समुदाय को कोई हैरानी नहीं हुई क्योंकि वो इस तरह की सुनने का आदि हो चुका है। लेकिन जिस समुदाय पर ये आरोप लग रहा है वो चुप कैसे रहता। उन लड़कों के घर वालों ने तो उन्हें आतंकी मानने से मना किया ही, धार्मिक गुरुओं ने भी अपने को शांत रखना मुनासिब नहीं समझा। हर हमले के बाद पकड़े गए लोगों के घर का दौरा करने वाले सबसे बड़े धर्मगुरु ने फ़िर वही किया। मुठभेड़ में मारे गए लोगों के अन्तिम संस्कार में गए और उन्हें क्लीन चिट दे दिया। इसके पहले गुजरात धमाकों में संदिग्ध पाए गए लोगों के घर जाकर भी वे ऐसा कर आए थे। उस विश्विद्यालय, जिससे ये kaii संदिग्ध जुड़े हुए थे ने तो इन्हे कानूनी सहायता मुहैया कराने तक की घोषणा कर दी. धार्मिक ध्रुवीकरण होता देख कई राजनेता भी अपना मुगदर भांजने में पीछे नहीं रहे। सभी ने बयां देना शुरू कर दिया। सिमी जैसे संगठनों तक को ye नेता लोग (जिसमें वर्तमान सरकार के कई मंत्री भी शामिल हैं) क्लीन चिट देने लगे. वो भी इतने विश्वास के साथ जैसे की उनकी सारी गतिविधियों की उन्हें पूरी जानकारी हो और कुछ भी करने से पहले इन संगठनों के नेता इनसे पूछ कर ही कोई कदम उठाते हों. कोई कहता कि आतंकवाद को किसी एक समुदाय से जोड़ कर कैसे देखा जा सकता है. जाहीर है ऐसा नहीं होना चाहिए. लेकिन जब हर मामले के बाद एक ही समुदाय के लोगों पर शक जाए तो कैसे यकीं नहीं हो.... ऐसा भी हुआ है कि उस समुदाय से बहुत सारे लोग देश के लिए काम करने के कारण प्रसिद्ध हुए हैं और देश ने उन्हें सर-माथे पर बैठाया भी है। इसलिए ये कहना कि देश एक समुदाय विशेष को निशाना बना रहा है बिल्कुल ग़लत है। इस समुदाय के लोगों को इसका उपाय तलाशना चाहिए कि उनके बच्चे देशविरोधी कामों में शामिल न हों इसके बदले ये समुदाय गलती मानने से ही इंकार कर रहा है. ऐसे में अगर दुसरे धर्मों से जुड़े संगठन ध्रुइकरण कराने में सफल हो गए तो कौन रोक पायेगा उन्हें.

ये मौका धर्मनिरपेक्षता के नाम पर राजनीति करने वाले सभी नेताओं के लिए एक बड़ा अवसर बनता जा रहा है. यही सारे नेता हिंदूवादी संगठनों पर लगातार प्रतिबन्ध लगाने की मांग करते आ रहे हैं. उनका आरोप है कि ये हिंदूवादी संगठन देश में साम्प्रदायिकता फैला रहे हैं. इनके अनुसार सिमी जैसे संगठनों को to वैसे ही बदनाम किया जा रहा है. सच कहें तो अगर ये अपनी बातों पर कायम रहना चाहते हैं तो इन्हे पहले विपक्ष के बदले अपनी सरकार से लड़ाई लड़नी चाहिए. जिस सरकार का गृह मंत्रालय सिमी पर प्रतिबन्ध जारी रखने के लिए अदालत में लड़ाई लड़ रहा है उसी सरकार के मंत्री उसी संगठन को क्लीन चिट कैसे दे सकते हैं. दूसरी बात ये कि अगर कोई धर्मगुरु क़ानून से आगे बढ़कर किसी आपराधी को क्लीन चिट देने का प्रयास करता है तो उसे भी क़ानून के दायरे में लाना चाहिए. अगर इतनी इक्छाशक्ति हो तो फ़िर आतंकवाद से लड़ा जा सकता है और अगर ऐसा सम्भव नहीं है तो फ़िर ये बयान आगे भी हर हमले के बाद जारी रहेगा और जनता भी इसे हर शनिवार को अखबारों में छपने वाली फिल्मी गॉसिपस की तरह पढ़ती रहेगी.....

2 comments:

Mrs. Asha Joglekar said...

अत्यंत दुख:द है । सचमुच क्या हमारा देश नपुंसकों का देश हो गया है ?

सौरभ कुदेशिया said...

sharamnak hadsa or us se bhi jyaada sharamnak netao ki netagiri