Saturday, 23 August 2008

बिहारी होने का मतलब कोई कुछ भी कहेगा क्या...

गोवा के गृह मंत्री रवि नाईक का एक बयान इन दिनों चर्चा में है. महाराष्ट्र के राज ठाकरे की तरह जब उन्हें चर्चा में आना था तो उन्होंने एक बयान दे डाला. अब बात थी कि बयान किस मसले पर दिया जाए. जाहीर था कि सबसे आसान निशाना बिहार को बनाया जा सकता था. मौका भी उन्हें मिल गया. पटना से गोवा की राजधानी पणजी जाने वाली नई प्रस्तावित रेल गाड़ी का मसला उठा उन्होंने बयान दे डाला कि इस रेल के चलने से बिहार से बड़ी संख्या में भिखारी गोवा आने लगेंगे. उन्हें मालुम था कि ये ऐसा मसला है जिसपर उन्हें स्थानीय लोगों और तमाशबीनों की वाहवाही मिलेगी. अब रवि नाइक ने अपने पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र से ही तो सबक लिया है. वहाँ जब भी किसी की राजनीति की धार भोथरी होती है तो उसे चमकाने के लिए सभी को बाहरी लोगों के विरोध का रास्ता दिखाई देता है. फ़िर चाहे बाला साहब ठाकरे हो या राज ठाकरे- सब ने इस मोहरे का जमकर इस्तेमाल किया है और इस खेल में सबसे आसान शिकार बिहार के लोग बनते है जो रोजी-रोटी के लिए देश के विभिन्न राज्यों में बड़ी संख्या में फैले हुए हैं और बिहारियों की यही खूबी उन्हें सबका निशाना बनाती है.

ऐसा नहीं है कि बिहारियों को केवल महाराष्ट्र और गोवा में ही ऐसे भेदभाव का शिकार होना पड़ता है. बल्कि राजधानी दिल्ली हो, पश्चिम बंगाल हो, पंजाब हो या फ़िर देश का कोई भी हिस्सा सभी जगह बिहार के लोग रोजगार के लिए एक खतरे के रूप में देखे जाने लगे हैं और स्थानीय लोगों का यही डर वहां ने नेताओं के लिए भुनाने लायक मसाला बन जाता है. पंजाब, दिल्ली जैसे जगहों पे तो हालत ऐसी है कि अन्य किसी राज्य का रिक्शा चालाक तक आसानी से किसी भी हंसने लायक बात को बिहार से जोड़कर दांत निपोरने की आदत बना चुका है. राजधानी दिल्ली के बसों में काम करने वाले खलासी तक किसी भी मजदूर से दिखने वाले आदमी को बात-बात पर बिहारी कहने से नहीं चुकता. वे इसका इस्तेमाल ऐसे करते हैं जैसे कोई गाली दे रहे हों. भले ही जिसे वे कह रहे हैं वे किसी भी राज्य से हो लेकिन हर मजदूर दिखने वाला आदमी उसे बिहारी दीखता है. भले ही उसकी ख़ुद की हालत उस सामने वाले से ज्यादा ख़राब हो.

मैं पिछले ४ सालों से देश की राजधानी दिल्ली में रह रहा हूँ. मैं यहाँ जब नया-नया आया था तब ये चीजे मुझे भी बिचलित करती थी. यहाँ जब भी कोई अपराध होता था तब लोग इसे सीधे बिहार से जोड़ देते थे, चाहे मामूली चोरी हो या फ़िर हत्या तक का मामला. लेकिन अब मेरा नजरिया बदल चुका है. इन सालों में मैंने इतने मामले होते हुए यहाँ देखे हैं और उनमे अन्य राज्य के लोगों कि संलिप्तता देखकर लगता है कि ये सब कुछ लोगों की मानसिकता का दोष है जो वो किसी भी अपराधी को बिहार से ही जोड़कर देखते हैं. कुछ चर्चित मामले जैसे कि नॉएडा का आरुशी-हेमराज हत्याकांड, निठारी-हत्याकांड, मुंबई का नीरज ग्रोवर हत्याकांड जैसे मामलों में एक भी आरोपी को लोग बिहार से नहीं जोड़ सके और ये सारे लोग वैसे राज्यों से रहे जिन्हें अपने होने पे बहुत गर्व है. इन राज्यों के कुछ लोग अपनी कुंठा में हमेशा बिहार को ग़लत चीजों से जोड़कर देखने की आदत बना चुके हैं.

इतना ही नहीं जिस गोवा के गृहमंत्री का ये बयान आया है उसी गोवा में अब से कुछ महीने पहले एक ब्रिटिश किशोरी पर्यटक की हत्या कर दी गई. इस मामले में पता नहीं नशा और जाने किन-किन बुराइयों की चर्चा हुई. पर्यटन के नाम पर चमक-दमक में लिपटे गोवा के समंदर किनारे के इन इलाकों की सच्चाई भी इस मामले में खुलकर लोगों के सामने आ गई. देश में मौजूद हर बुराई के लिए बिहार जैसे राज्यों को दोष देने वाले बड़े शहर अगर अपने अगड़े होने पर गर्व करते हों तो वहां की सच्चाई इस पर सवाल खड़ा करती है. अब राजधानी दिल्ली के अखबारों में रोज ही ख़बर छपती रहती है कि २ करोड़ की हेरोइन के साथ इतने लोग पकड़े गए तो ३ करोड़ के चरस के साथ इतने लोग गिरफ्तार किए गए. ऐसी खबरें यहाँ की अखबारों में रोज ही छपती है. ये तो बस उतना ही होता है जितना पकड़ा जाता है इससे भी जाने कई सौ गुना ज्यादा माल तो पकड़ में ही नहीं आ पाता होगा. अब ये बताइए कि ये सारा गाजा, चरस, अफीम कौन खाता होगा. अब इसके लिए किसे दोषी कहा जाए. इन सब चीजों से इन बड़े कहे जाने वाले राज्यों का सर शर्म से नहीं झुकता.

उन्हें तो परेशानी इस बात से होती है कि बिहार से अगर सीधी रेल चलने लगेगी तो वहां से भिखारी ज्यादा संख्या में आने लगेंगे. अगर बिहार में ये भिखारी ज्यादा होते हैं तो देश के अन्य इलाकों में कौन सी हालत ठीक है. दिल्ली में सरकार के आंकडों पर गौर करे तो यहाँ की सड़कों और चौराहों पर ७५,००० भिखारी हैं. ऐसी ही हालत इन सभी राज्यों और शहरों में भी है. अब इस बात का फ़ैसला कैसे हो कि कितने किस राज्य से आए हैं. क्योंकि यहाँ तो सभी राज्यों से सीधी ट्रेन आती है...

3 comments:

vikas said...

bahut aacha sandip well written..... fact yeh hai ki haame 1dusre paar aarop lagane se aacha yah hai k vikas k baare main policy banani chahiye...lakin ghar ki safai main koun hath kharab karega..... every one is diffrent we cant blame one particular community of one basis....
best wishes...vikas gupta

सतीश पंचम said...

जी हां, अपने को बडा बताने की ललक में सब एक राज्य को ही निशाना बनाये जा रहे हैं, एसे मे जरूरत है बिहार को को ऐक ऐसे कैम्पेन चलाने की जो उसे साबित करे कि सिर्फ वही नहीं है अपराध का सिरमौर, और भी राज्य हैं जो इस मामले मे आगे हैं, बाकायदा उदाहरण सहित बताया जा सकता है कि कहां क्या - क्या हुआ। यह बात बेतुकी भले लगे लेकिन है बिल्कुल जरूरी, वर्ना कभी भी कोई कुछ भी कहने से बाज नहीं आयेगा और बिहार का नाम यूं ही सब बदनाम करते रहेंगे।
अच्छी पोस्ट रही।

ग़ुस्ताख़ said...

अरे संदीप भाई कुछ नहीं ध्यान नहीं देना इन की बातों का ये गधे.. बिहारियों की प्रतिभा से आतंकित हैं।