Monday, 8 December 2008

चुनाव ही नहीं हो जनता का आखिरी हथियार...

५ राज्यों में विधानसभा चुनाव के परिणाम आ गए. कांग्रेस और भाजपा ने मिलकर इन राज्यों की सत्ता आपस में बाँट ली. अन्य सभी दल महज तमाशबीन बनकर रह गए. वैसे भी इन राज्यों में अन्य दलों के लिए कोई स्कोप नहीं था. हा राजस्थान में जरूर अन्य दलों और निर्दलीय विधायकों के पास मौका है कि वो लोकतंत्र की मलाई खा सकें. जीत के बाद जीतने वाले दलों के नेताओं ने कहा कि आतंकवाद समेत सभी मुद्दें बेमानी साबित हुए और हमें जीत से नहीं रोक सके. इन्हें इस बात कि खुशी है कि आतंकवाद कोई चुनावी मुद्दा नहीं बन सका. अगर ऐसा सच में हुआ है तो ये खेदजनक है. अगर लोग अपनी सुरक्षा को चुनाव में मुद्दा नहीं बना सकते तो फ़िर तो भगवान ही इसका मालिक है. इसके साथ ही एक और काम होना चाहिए कि किसी भी दल को ये अधिकार नहीं मिलना चाहिए कि वो आतंकवाद जैसे मसले को चुनाव में भुनाए. लोगों को भी ये समझना होगा कि चुनाव ही आखिरी हथियार नहीं है. अगर जीतने के बाद भी कोई सरकार उनकी सुरक्षा के साथ ढिलाई बरतती है तो लोगों को सरकार से सवाल करना चाहिए। लोगों को अपनी सुरक्षा और विकास जैसे मसलों पर मुखर होना होगा तभी हम भारत को दुनिया की सबसे बड़ी लोकतंत्र के रूप में वास्तव में स्थान दिला पायेंगे.

बटला हाउस में मुठभेड़, मालेगांव धमाकों और मुंबई में हमले जैसे मसले पर जिस तरह से देश ने राजनीति होते हुए देखी वो हमारे लोकतंत्र के लिए कहीं से भी सहीं नहीं माना जा सकता। लेकिन इस बार आतंकवाद के मसले पर यहाँ के मुस्लिम भाई लोगों ने जिस तरह से मुखर होकर विरोध किया यही रवैया उन्हें आगे भी जारी रखना होगा ताकि यहाँ का बहुसंख्यक हिंदू समुदाय उनपर भरोसा कर सके. यहाँ के हिंदू समुदाय को भी धर्म के मामले को केवल राजनीति के लिए उठाने वाले लोगों से सावधान होना होगा. लोगों को राजनितिक बिरादरी में उस तबके को आगे करना होगा जो समाज के लिए काम करने के मकसद से राजनीति में आ रहा है और ऐसे लोगों को राजनीति से बाहर करना होगा जो केवल सत्ता का सुख भोगने के लिए राजनीति में आ रहे हैं.

अमेरिका में ओबामा की जीत पर जश्न मनाने वाली भारतीय जनता को अगर अपने लिए काम करने वाला और परिवर्तन लाने वाला नेता चाहिए तो पहले उन्हें ख़ुद मुखर होना होगा और फ़िर जब वे ऐसा नेता चुनेंगे जो दागदार न हो और अपराधी न हो और जो जाति-धर्म जाति-धर्म बात न कर विकास जाति-धर्म की बात करे तभी यहाँ सही मायने में लोकतंत्र का विकास हो पायेगा.

2 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आप ने बिलकुल सही लिखा। जनता के जागरूक हिस्सों को ही आगे आना होगा।

umeshawa said...

आतंकवाद को पनपने के लिए खुली छुट देने वाली शक्ति को लोगो ने जिस प्रकार से बढचढ कर वोट दिया है यह कर देख मन अवसाद से भर जाता है। लगता है की हमारे भाग्य मे और दुखः भोगना लिखा है। देशभक्त एवम राष्ट्रवादी शक्तियो को यह विचार आत्मविश्लेष्ण करना होगा की वह क्यो लोगो को साथ में ले कर नही बढ पा रहे हैं।