Sunday, 31 August 2008

कोसी, कंधमाल और कश्मीर के देश में...

आज की तारीख में अखबारों, टीवी और तमाम तरह की मीडिया में बस ये ३ मसले छाये हुए हैं। इन तीनों जगहों से सम्बन्ध रखने वाले लोग अपना अस्तित्व और अपनी जान बचाने की जद्दोजहद में लगे हुए हैं। लेकिन ये बाकी के देश के लिए मसले हैं और देश इनको बड़ी ही उत्सुकता से देख रहा है। बाढ़ से घिरे और अपना सबकुछ गवां कर रोते हुए लोगों को टीवी पर देखकर लोग सहानुभूति के दो शब्द कह लेते हैं, कश्मीर का मसला इससे थोड़ा अलग है। सब अपने चश्में से इस मामले को देख रहे हैं। कंधमाल का मामला तो और भी अलग है। इसे धार्मिक बर्चस्व और एक दूसरे के धर्म के लिए खतरा बनने जैसे शब्दों से प्रज्वलित किया जा रहा है।

बिहार में बाढ़ आई है। शायद नई पीढी के लिए अब तक की सबसे भयंकर बाढ़। लाखों लोग अपने घरो से बाहर धकेल दिए गए हैं और सड़कों, बांधों और अन्य ऊँची जगहों पर शरण लेकर जीने को बिवश हैं। बड़े नेता लोग वहां का हवाई सर्वेक्षण करके लौट चुके हैं और मदद के लिए घोशनाए हो चुकी है। सत्ता-पक्ष और विपक्ष के बिच बयानबाजी चल रही है कि इस बाढ़ के लिए दोषी कौन है. सत्ता पक्ष का कहना है कि पिछली सरकार की लापरवाही के कारण ऐसा हुआ तो विपक्ष का कहना है कि वर्तमान सरकार ने अगर समय रहते हमारी बात सुन ली होती तो ये तबाही नहीं होती. इन तमाम बयानों के साथ नेता जी लोग रोज अखबारों में छप रहे हैं और जनता वहां पानी-पानी हुई जा रही है. ऐसे मौके पर अपनी जान और अपनी प्रतिष्ठा बचाना लोगों के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है.

कश्मीर का मामला कुछ अलग ही है। वहां जो जिस पक्ष से हैं वे उसी पक्ष को सही मानते हैं। किसी के लिए जम्मू-कश्मीर में अमरनाथ जमीन विवाद धर्म और राष्ट्रहित का मसला बन गया है तो कोई इसे कश्मीरियों की हक़ की लड़ाई मानकर जायज ठहरा रहा है। बिच-बिच में पड़ोसी पकिस्तान भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता रहा है. भले ही उसे ख़ुद के अपने घर में आग लगी हो लेकिन हमारे घर कि इस लड़ाई में बोले बिना उसे भी चैन नहीं आ रहा है. कई दिनों से जारी जद्दोजहद के बाद आज जब सरकार ने बीच का रास्ता निकला है तो आग फ़िर भड़क उठी है। सम्झुते के अनुसार वो जमीन अमरनाथ यात्रा के वक्त बोर्ड को इस्तेमाल के लिए दी जायेगी लेकिन इसका उसे मालिकाना हक़ नहीं रहेगा. होना तो चाहिए था इसपर दोनों पक्षों को खुश लेकिन जब मामला सलट ही जाएगा तो फ़िर राजनीति का क्या होगा. इसलिए अभी भी कश्मीर और जम्मू में हाई अलर्ट जारी है. कश्मीर में कश्मीर के अलगाववादी इसका विरोध कर रहे हैं तो जम्मू में आतंकवादी हमले का डर बढ़ गया है. ऐसे में लोग क्या करे. अपने घर में दुबक के रहने के सिवा. और वो भी क्या भरोसा कि आतंकवादी उनके घरों में नहीं घुस जायेंगे.

कंधमाल भी जल रहा है। पड़ोसी जिले भी जल रहे हैं. हिंदू किसी को इसाई बन्ने नहीं देंगे और इसाई अन्य लोगों को ईसाई बनाने से नहीं मानेंगे. अब आप ही बताओ कि इसका हल क्या हो. हिंदू संगठन नहीं मानेंगे और रोम के पोप भी लगातार इसपर बयान देते रहेंगे तो फ़िर कौन पीछे हटेगा. सभी दलों कि राजनीति इसपर अलग-अलग है।

ये मसले देश के लिए है, देश की जनता के लिए है लेकिन नेतृत्व के लिए और भी कई मसले हैं जो इससे ज्यादा जरूरी है। भाजपा के लोग कर्णाटक में होने वाली राजनीतिक कार्यकारिणी की बैठक की तैयारियों में लगे हुए हैं, अगले हफ्ते होने वाली बैठक में अगले लोकसभा चुनाव के लिए मुद्दों कि तलाश के लिए तैयारियां जारी है. कांग्रेस के पास परमाणु करार जैसे कई मसले हैं. जिनपर उनकी प्रतिष्ठा टिकी हुई है. अगले लोकसभा चुनाव में ये उनके लिए मुद्दा बन सकता है. बुश प्रशासन के लिए भी तो ये एक चुनावी मुद्दा बन गया है. अब अगर अमेरिका के लिए ये इतना बड़ा मसला है तो फ़िर हमारे लिए बाढ़, दंगा और मार-काट से बड़ा मसला क्यूँ नहीं हो सकता. इस मुद्दों की लड़ाई में कौन किससे पीछे रहे. ऐसे ही मुद्दे बनते रहेंगे और बिगरते रहेंगे. जनता ऐसे ही समस्यायों से जूझती रहेगी और फ़िर चुनाव के लिए भीड़ बनती रहेगी. उसे न तो अपने लिए नेतृत्व बनाने आया है और ना ही वो अपने लिए इसका इस्तेमाल कर सकेगी...और ऐसे ही देश में कोसी...कंधमाल और कश्मीर और भी ना जाने क्या-क्या बनते रहेंगे...

1 comment:

Mrs. Asha Joglekar said...

Bilkul sahee jayaja liya hai aapne janta ke behali ka aur rajneetibajon ke usaka fayada uthane ka. Jammu ke logon ko chhiye ki apne ko usee tarah sangathit rakhen jaise is chkka jam ke duaran rakha tha is ke chlate atanki bhi apne aap samhal ke rahege.