Thursday, 31 December 2015

आम आदमी की गौरव गाथा! (व्यंग्य)...

२०११ के अपने ब्लॉग से....
((आपने सिंदबाद और गुलीवर की रोमांचकारी जीवनशैली और साहसिक यात्राओं की कहानियां अनेको बार पढ़ी होंगी लेकिन आज आपके सामने प्रस्तुत है हमारे देश में हमेशा चर्चा के केंद्र में रहने वाले आम आदमी की एडवेंचरस जिंदगी की कहानी।))

मैं आम आदमी हूं। चेहरा 120 करोड़ में से..अरे नहीं..नहीं बीपीएल के 40 करोड़ चेहरों में से कोई भी एक चेहरा समझ लीजिए। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और कभी सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत भूमि में जन्मा आम आदमी। जिसकी गौरव गाथा आपको किसी भी बहस मुबाहिसे, राजनीतिक रैली, भाषणबाजी या टीवी पर हो रही चर्चाओं में अक्सर गुंजती हुई सुनाई पड़ सकती है। कई बार तो मुझे लेकर एसी सेमिनार हॉलों में चर्चा गर्मा भी जाती है। वैसे अगर लाइमलाइट(रील लाइफ) से निकलकर देखें तो मेरी रीयल लाइफ की कहानी भी काफी एडवेंचरस मिलेगी। जो जन्म से शुरू होकर अंतिम संस्कार या कई बार उसके बाद तक खींच जाती है, अगर उसपर राजनीति शुरू हो जाये या फिर टीवी चैनलों की पीपली लाइव टाइप कुछ मेहरबानी हो जाये।

हां, तो हम बात कर रहे थे अपने जन्म की।
तो हमारे जन्म की संभावनाएं दशकों से देश में चल रही तमाम परिवार नियोजनों की योजनाओं और तमाम आकलनों से कहीं ऊपर होती हैं। प्रसव की कहानी भी कम रोमांचकारी नहीं होती। गांव-घर की दाईयों की मदद से धरती पर अगर पांव रख दिया तो ठीक वरना सरकारी अस्पतालों की ओर गर्भ में रहते ही मेरी दौड़ शुरू हो जाती है। अस्पताल में दाखिल होने का नंबर मिला तो ठीक वरना अस्पताल के बाहर सड़क पर ही मैं अपना अवतरण पूरा कर लेता हूं। वैसे कई बार अस्पताल तक पहुंचने की नौबत भी नहीं आती और प्रसव प्रक्रिया को लाखों-करोड़ों की लागत वाली सड़कों में देवदूतों की तरह उभर आये गढ्ढे ही कई बार पूरा कर देते हैं।

चलिए ये तो रही मेरे पैदा होने के एडवेंचर की कहानी, अब थोड़ी शिक्षा-दीक्षा से जुड़ी हुई बातें भी कर ली जाये जिसका मुझे इस देश में अनिवार्य और मुफ्त प्राप्ति का अधिकार प्रदान किया गया है। हां, तो अगर मैं स्कूल जाने में सफल रहा तो वहां दोपहर के पहले का समय खिचड़ी के इंतजार में और उसके बाद का समय छुट्टी के वक्त में कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता। और अगर स्कूल नहीं जा सका तो किसी साहब के घर में घरेलू कामकाज या फिर किसी साइकिल पैंचर की दुकान पर या रेस्टोरेंट वगैरह में काम पाकर अल्पआयु में ही रोजगार हासिल करने वाले देश के कुछेक खुशकिस्मत बच्चों में शामिल होने का गौरव प्राप्त करता हूं। तब हर साल बाल मजदूर दिवस के अवसर पर अखबारों में छपे हमारे फोटो व उसके ईर्द-गीर्द छपे बड़े-बड़े नेताओं की तस्वीरों व हमारे कल्याण के नारों से हमें फिर साल भर जी-तोड़ मेहनत करने की ऊर्जा मिल जाती है।

खैर जवानी की दहलीज पर कदम रखते वक्त हम भी मन में कई सपने सजाते हैं जैसे सिने स्टार्स की तरह लकदक जिंदगी हो, धूंए के छल्ले उड़ाते हीरोज की तरह स्टाइल हो या फिर बाहों में हीरोइनों को देखने की तमन्ना आदि।

हालांकि, जवानी के दिनों में हमे रोजगार के लिए देश ने काफी अच्छी लोकतांत्रिक व्यवस्था दे रखी है। अगर पढ़ लिया तो घर की खेती-बाड़ी या मां-बाप की बची-खुची पूंजी लेकर कोई नौकरी दिलाने वाले बहुत सारे समाजसेवी मिल जाते हैं और अगर पढ़ लिख नहीं सके तो सरकार साल में सौ दिन के रोजगार की गारंटी तो देती ही है। इसी बहाने सड़क, पूल, तालाब आदि बनवाने के काम में जुटकर थोड़ी-बहुत देश की सेवा भी हो जाएगी। हां ये अलग बात है कि 100 दिन का काम पाने के लिए भी कई लोगों को चाय-पानी का प्रबंध तो करना ही पड़ता है लेकिन कहते हैं न कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है। सो हम तो भई संतुष्ट हैं। वैसे भी हमारी संस्कृति का संदेश भी यही है- संतोषः परम् सुखम्।

इधर एक संतोष की खबर और आई है हमारी जमात के लिए। कल सुना था रेडियों में कि सरकार ने फिर कहा है कि आम आदमी की तरक्की के लिए हम प्रतिबद्ध हैं। सुना है भूख हड़ताल वाले बुजुर्ग समाज सेवी भी हमे ही भ्रष्टाचार के चंगुल से निकालने के लिए अनशन पर बैठते हैं और जल्द ही इसपर कोई कानून भी बनने वाला है।

वैसे साल में 365 दिन होते हैं। 100 दिन की समाजसेवा से मुक्ति पाकर शेष दिनों में हमारे करने लायक बहुत कुछ होता है इस देश में। चुनावों के मौसम में राजनीतिक रैलियों में जनसमर्थन बनकर मैं ही अपार भीड़ के रूप में दिखता हूं। मैं न होऊं तो भला नेताजी लोगों का भाषण सुनेगा कौन... और कौन उनकी रैलियों को ऐतिहासिक व सफल बनाएगा। कौन उनके बैनर पोस्टर और झंडे ढोएगा। मैं ही सभी राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों में आश्वासनों और वादों का लक्ष्य होता हूं और मुझे ही लुभाने के लिए लोकलुभावन नारे भी दिये जाते हैं। अपने पसंदीदा उम्मीदवार को चुनाव जीताने के लिए हम ही लंबी लाइनों में लगते हैं और फिर जीतकर जाने के बाद जब वे पांच साल तक वापस लौट कर नहीं आते तो हम कोई शिकायत भी नहीं करते। सही मायनों में देश में लोकतंत्र के असल पहरूए हम ही हैं।

मैं आम आदमी हूं। मैं ही रोजाना सुबह टीवी पर आने वाले बाबा लोगों के प्रवचनों के दौरान भक्तों के अपार जनसमूह के रूप में अपनी समस्याएं सुना रहा होता हूं और उनके चमत्कारी समाधान के लिए बाबा लोगों के गुणगाण भी मैं हीं गाता हूं। अब सोचो अगर मैं ना रहूं तो कैसे रहेगा इस तरह के विज्ञानों और ऐसे विद्वानों का मान।

मेरे ही कल्याण के लिए दिल्ली के सत्ता प्रतिष्ठानों में पिछले 64 साल से तमाम योजनाएं बनती आ रही हैं और विदेशों से पढ़-लिखकर स्वदेश आयातित योजनाकार मेरे कल्याण के लिए ही इतने सालों से योजनाएं बना रहे हैं। उनका मान रहे इसके लिए उनके द्वारा तय किये 32 रुप्ये, 26 रुप्ये व 20 रुप्ये जैसी छोटी राशियों में भी हंसी-खुशी अपना जीवन हमी जीते हैं। ये अलग बात है कि इन योजनाओं के बदले वे लाखों-करोडो़ कमा ले जाते हैं।

यही है हमारी यानि इस महान भारत भूमि के आम आदमी की गौरव गाथा। तो कृप्या हर टीवी शो, राजनीतिक रैली व बहस-मुबाहिसों में हमारी लोकप्रियता से जलने वालों अब तो समझों हमारे त्याग को जिस कारण हम आज भी विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के केंद्र बिंदू बने हुए हैं।
भई... हम तो इस गौरव से खुश है और बस यही कहना चाहेंगे..
"अगले जनम मोहे आम आदमी ही कीजो..."

Tuesday, 18 June 2013

कल्लन काका की चिंता...कोई मुझे भी सेकुलर कह दे..

मेरे गांव के लोकप्रिय सरपंच कल्लन काका इन दिनों नई चिंताओं से घिरे हुए हैं। देश में सेकुलर कहलाने की होड़ लगी हुई है। जिसे देखों वहीं खुद को सेकुलर कहलाने में लगा हुआ है और अबतक किसी ने उन्हें सेकुलर नहीं कहा। आज अचानक सुबह चौपाल पर बैठे-बैठे कल्लन काका के दाहिने हाथ मोहन ने विचार दिया कि क्यों नहीं जल्दी से जल्दी खुद को सेकुलर घोषित करवा ही लिया जाए। अब सवाल उठा कि किससे इसकी घोषणा करवाई जाए। कल्लन काका के राजनैतिक सलाहकार पप्पू पांडे ने अपनी जुबां खोली--भईया राजनेताओं की इन दिनों लोकप्रियता थोड़ी कम है और उसमें बेदाग छवि के राजनेता खोजने में काफी वक्त लग सकता है। क्रिकेटर भी ठीक नहीं रहेंगे क्योंकि इन दिनों फिक्सिंग के फेर में कईयों के नाम बदनाम हो गए हैं। फिर कुर्सी से उछलते हुए लोचन ने सलाह ही कि इसके लिए फिल्मी दुनिया से किसी को लाया जाए...आने वाला वक्त सनी लियोनी जैसी अदाकाराओं का हैं इसलिए उन्हें अप्रोच किया जाए। काका के दाए बैठे मोहन ने कहा कि इतनी बड़ी हस्ती के पास हमारे लिए वक्त कहां से होगा सो मेरे विचार में गांव की डांस पार्टी की हिरोईन चंपा से ही कल्लन काका को सेकुलर कहलवा दिया जाए..युवाओं में वह काफी लोकप्रिय भी है। अभी कल ही की बात है उत्तर टोले के रमेश ने चंपा की बुराई करने पर अपनी वीवी को क्या दुरूस्त किया था। पड़ोसियों के हस्तक्षेप के बाद ही हंगामा शांत हो पाया था। कल्लन काका को ये सुझाव पसंद आया..इसके लिए रविवार का दिन तय हुआ क्योंकि इस दिन ज्यादा से ज्यादा लोग गांव में रहेंगे। कार्यक्रम की तैयारियां शुरू हो गईं। रविवार का दिन भी आ गया। कल्लन काका और उनकी पूरी कोर टीम मंच पर थी और तभी मुख्य अतिथि के रूप में चंपा का स्टेज पर आगमन हुआ। चंपा ने अपनी अदाओं के साथ भीड़ की ओर हाथ हिलाकर अभिवादन किया...वहां मौजूद युवाओं का उत्साह और जोश मानो आसमान पर चढ़ता नज़र आया। आते ही चंपा जी ने कहा कि मेरे प्रिय गांववासियों आज मै आपके प्रिय नेता और जनसेवक कल्लन जी के सौजन्य से आपके बीच हूं..मुझे आपके सामने लाकर उन्होंने साबित कर दिया है कि वही असली सेकुलर हैं। इसके साथ ही जनता की भीड़ में खड़े कल्लन काका के समर्थकों के बीच से नारा गूंज उठा..."आज का असली सेकुलर कौन..कल्लन काका..कल्लन काका"..मंच पर बैठे कल्लन काका का सीना गर्व से चौड़ा हो गया और उन्होंने तय कर लिया कि इस बार वे सरपंच के चुनाव में अपनी सेकुलर छवि और चंपा फैक्टर के साथ युवाओं के बीच जाएंगे। उनके समर्थक और रणनीतिकार भी खुश थे कि इस बार के चुनाव का एजेंडा तय हो गया और मीटिंग में बेवजह की माथापच्ची नहीं करनी पड़ेगी।

Friday, 24 May 2013

इस देश में ईमानदारी की ऐसी की तैसी...!

आईपीएल को लेकर चारो ओर चिल्ल-पौं मची हुई है। क्या क्रिकेट या आईपीएल इतना ज्यादा अहम हो गया है इस देश के लिए..जिसे देखिए वही अपनी बात रखे जा रहा है..बंद कर दो..सजा दे दो..पकड़ लो..कुछ लोग सट्टेबाजों, खिलाड़ियों आदि के बीच धन के लेन-देन की राशि सुनकर ही हैरान है..बाप रे बाप एक-एक बॉल के लिए 40-40 लाख..एक-एक खिलाड़ी करोड़ो-करोड़ ले रहा है..एक खिलाड़ी पकड़ाया है शायद वह रोज सट्टेबाजों से लड़कियां मंगवाता था...फिल्मी दुनिया से जुड़ा एक छोटा-मोटा अभिनेता..या शायद बुकी या फिर जैसा रिपोर्टों में आ रहा है लडकियों का सप्लायर...उसने पूछताछ में माना कि अबतक 17 लाख वह कमा चुका है इस धंधे से..सुनकर लोग हैरान है..जिस देश में रोजगार गारंटी के तहत दिन-भर पसीना बहाकर अगर ठेकेदार और स्थानीय नेता की वसूली से बच गए तो 120 रुप्या मिलता हो..या फिर योजना आयोग 32 रुप्ये में रोज का खर्च चलवाने की बात मानता हो वहां खेल में लाखो-करोड़ो की बात सुनकर सब हैरान है...मैं खुद क्रिकेट खेलना या देखना पसंद करता हूं लेकिन आईपीएल एकदम पसंद नहीं..एक भी मैच या कहें कि एक भी ओवर कभी नहीं देखा..चैनल बदलते वक्त एक-दो बॉल कभी भले ही दिख जाता हो...विश्व कप या फिर दो देशों के बीच मैच देख लेता हूं..अगर यही हाल रहा तो पूरी तरह क्रिकेट से तौबा ही करना पड़ेगा।

जेंटलमैन गेम में पैसे के लेन-देन के ये आंकड़े वैसे इस देश की वर्तमान हालात को देखते हुए इतनी ज्यादा भी नहीं है। गरीबी की मार झेल रही इस देश की जनता पिछले कुछ सालों में लाखो-हजार करोड़ के घोटालों के आंकड़े सुनकर ऐसे ही हैरान-परेशान है। कोई भी घोटाला आजकल दस-बीस हजार करोड़ से कम की नहीं होती। हाल ही में जब एक मंत्री जी को भांजे द्वारा 90 लाख लेते पकड़े जाने पर अपना मंत्रिपद गंवाना पड़ा तो लोगों ने मजाक उड़ाया..कैसे नेता हैं जो लाखों की रिश्वत में ही पकड़े गए...वैसे आजकल शरीफ लोगों की भी शामत आई हुई है। घर में पत्नियां फब्तियां कसती रहती हैं। अजी बड़े-बड़े फेंकते हो..ऑफिस में ये कर लिया—वो कर लिया और कमाकर लाते हो हजारो में...।..यहां देखों 9वी-10वी पास लड़के क्रिकेट खेलकर साल-दो साल में करोड़ो-करोड़ कमाते जा रहें हैं। कुछ करते क्यों नहीं... अब बेचारे भला क्या जवाब दें।

Wednesday, 1 May 2013

उफ् ये लोकतंत्र--इधर सांपनाथ ऊधर नागनाथ

दुनिया के इस तथाकथित सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में क्या अब भी लोकतंत्र का कोई मतलब रह गया है? सत्तारूढ़ दल घोटालों पर घोटाले करता जा रहा है। अब उसे जनता, न्यायपालिका या नैतिकता का कोई डर नहीं है। विपक्ष को मुद्दे उठाने आते नहीं। सच कहें तो जनता को विपक्ष से भी कोई अच्छा काम करने की उम्मीद नहीं रह गई है। ऐसे में क्या देश के युवाओं का झुकाव किसी नए तरह के नेतृत्व के विकल्प की ओर हो सकता है? आजादी के बाद के छह से अधिक दशक से ये देश लोकतंत्र के नाम पर चुनाव, चुनावी रैलियां, भाषण, आश्वासनों के ढेर, पैसे बांटकर अपने पक्ष में वोट डलवाते आ रहे राजनीतिक दलों के पैंतरें, गरीबी हटाओं जैसे बोर करने वाले नारे सुन और देखकर बोर हो चुका है। क्या अब वक्त आ गया है इस देश में पुराने तरह की राजनीति को नकार देने की?

Thursday, 13 September 2012

कोयला घोटाले और अन्य घोटालों के साथ अब महंगाई का यूपीए गिफ्ट

''कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ'' का नारा शायद ही कोई भूला होगा..यही कहकर कांग्रेस की वर्तमान सरकार सत्ता में आई थी लेकिन आज एक के बाद एक लाखो-करोड़ो के घोटालों के दाग से दागदार ये सरकार अब देश के आम आदमी को महंगाई के बोझ तले दबाकर मारने का पाप भी अपने माथे ले रही है। शायद उसे अपने समर्थकों के अजर-अमर समर्थन का संबल हो या फिर हार का डर खत्म हो चुका हो इसी कारण वह डीजल, गैस आदि के दामों में बंपर वृद्धि करती आ रही है। उसे अपने नेताओं द्वारा जनता के धन की लूट-खसोट का भी डर नहीं रहा। अगर इस देश में जनता वाकई अपने अधिकार का इस्तेमाल करना जानती है तो इस बार घोटालेबाजो को एक भी सीट नहीं मिलना चाहिए...एक भी नहीं..एकदम शून्य सीटें। 

Saturday, 26 May 2012

टीम अन्ना की भ्रष्टाचार पर सरकार को खुली चुनौती...अब क्या करेगी सरकार...

भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे समाजसेवी अन्ना हजारे ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अलावा 14 केंद्रीय मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोप लगाए हैं। टीम अन्ना ने इस बारे में दस्तावेज के साथ एक पत्र प्रधानमंत्री को भेजा है। 24 जुलाई, 2012 तक इस पर कोई कार्रवाई न करने पर टीम अन्ना ने आंदोलन की चेतावनी दी है। टीम अन्ना ने प्रधानमंत्री से कहा है कि "सख्त लोकपाल कानून इसलिए पारित नहीं कराया जा रहा क्योंकि यह नेताओं के भ्रष्टाचार को रोकेगा और नेता अपने खिलाफ कानून पारित नहीं कराना चाहते। आपके मंत्रिमंडल के 34 में से 15 मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगते रहे हैं। हमने इन्हीं आरोपों की जानकारी इकट्ठी की है। ये आरोप हम नहीं लगा रहे हैं, बल्कि ये सुप्रीम कोर्ट और सीएजी जैसी सर्वोच्च संस्थाओं ने लगाए हैं।" सीबीआई पर सवाल उठाते हुए टीम अन्ना ने कहा है कि सीबीआई उन्हीं के कंट्रोल में है, जिनके खिलाफ उसे जांच करनी है। यही वजह है कि आज तक सीबीआई केवल 3 नेताओं को सजा दिलवा पाई है। टीम अन्ना ने इन सबके खिलाफ आरोपों की जांच के लिए एक स्वतंत्र जांच दल बनाए जाने की मांग की है। टीम अन्ना ने कहा है कि जांच दल को सभी सुविधाएं मिलें और वह अपनी जांच 6 महीने में पूरी करे। टीम अन्ना ने 6 रिटायर्ड जजों के नाम देकर कहा है कि जांच दल का अध्यक्षता इन्हीं में से कोई हो। टीम अन्ना ने अपने खिलाफ भी लगाए गए आरोपों की जांच इसी दल द्वारा कराए जाने की मांग की है और आरोप साबित होने पर कानून में तय सजा से दोगुनी सजा देने के लिए कहा है।

हमेशा शासन में सुचिता और साफगोई की बात करने और खुद को आम आदमी की हितैषी बताने वाली इस सरकार के मुखिया और इमानदारी की छवि की हमेशा बात करने वाले प्रधानमंत्री महोदय और उनकी पार्टी के और नेताओं को इन आरोपों की स्वतंत्र जांच कराके देश के समक्ष अपनी इमानदारी साबित करनी चाहिए...अगर वे वाकई सच्चे हैं वरना इन आरोपों के बाद जरूरी नियत पर सवाल उठेंगे। अब जरूर सामने आकर अपनी सफाई पेश करनी होगी क्योंकि कई घोटालों और भ्रष्ट्चार के आरोपों के बाद अब सरकार वाकई जनता की नजर संदेहास्पद हो रही है...

Sunday, 25 March 2012

तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है..


योजना आयोग ने एक बार फिर आकड़े देकर शहरों में 28 रुप्या और गांव में 22 रुप्या रोजाना कमाने वालों को गरीबी रेखा से ऊपर घोषित कर दिया है। वैसे भी दिल्ली के चश्में से देखने वालों के लिए भारत एक चमकता हुआ देश है। जहां रोज मॉल बन रहे हैं..मल्टीप्लेक्स खुल रहे हैं, गगनचुंबी होटल खड़े होते जा रहे हैं और भी न जाने क्या-क्या हो रहा है इस भारत देश में...लेकिन दूसरी तरफ दो-तिहाई लोग आज भी गरीबी का जीवन जी रहे हैं..उनके यहां चौबीसो घंटे बिजली नहीं रहती, गैस पर खाना नहीं बनता, चमचमाती लक्जरी गाड़ियां नहीं हैं, छुट्टिया मनाने के लिए वे प्लेन में दुनिया की सैर नहीं करते। अभी भी उनका अधिकांश समय दो जून की रोटी जुगाड़ने में बितता है। खुद को सुपर पावर कहलवाने की जी-तोड़ कोशिश में लगे इस भारत में गरीबी हटाओं का नारा लगने के 40 सालों बाद भी इस आबादी की गरीबी अभी तक नहीं मिटी है।

शायद ऐसी ही स्थिति के लिए जनकवि अदम गोंडवी ने कभी लिखा था...

"तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है

उधर जम्हूरियत का ढोल पीते जा रहे हैं वो
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है नवाबी है

लगी है होड़ - सी देखो अमीरी औ गरीबी में
ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है

तुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने के
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है"

Sunday, 4 March 2012

बुरा न मानो होली है...

भारत में परंपराओं को जिंदा रखने औऱ जीवन में खुशहाली फैलाने के एक पर्व का नाम है होली...इसे बरकरार रखा जाना चाहिए। यह वसंत के मौसम में जीवन को उत्साह, हंसी और खुशहाली से भर देने वाला रंग बिखेरता है। जब आपको कोई रंगो से सराबोर कर दे और आपके कपड़े गंदे हो जाये और चेहरा मुस्करा उठे तो इसी को कहते हैं होली..."बुरा न मानो होली है" की एक पंक्ति ही जीवन की सारी दुश्वारियों को भुलाकर मुस्करा देने को मजबूर कर देती है। भारतीय जीवन और संस्कृति के इसी रंग का नाम है होली।...

आप सब को होली की ढेरो शुभकामनाएं....लेकिन होली पर शराब आदि नशे को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति से भी बचा जाना चाहिए। होली हमारे जीवन में खुशियां लाएं न कि किसी की परेशानी का सबब बने। यही हमारी संस्कृति और भारतीय जीवनशैली की ब्यूटी है।


इस मौके पर एक मित्र द्वारा बुरा न मानो होली है के नोट के साथ भेजा हुआ एसएमएस शेयर करना चाहुंगा-

Today's Headlines-
1. Digvijay Singh joins RSS.
2. Book of PM Manmohan Singh's jokes released.
3. Subrahamaniyan Swamy ties friendship band to Sonia.
and
4. Mahesh Bhatt's new film "Aaadarsh Bahu" released with Veena Mallik in lead role.
बुरा न मानो होली है। 

एक बार फिर से हैपी होली...

Tuesday, 14 February 2012

वैलेंटाइन डे की तिलिस्मी दुनिया के पार--


1997 में आई हिंदी फिल्म -दिल तो पागल है- ने "वैलेंटाइन डे" की जानकारी भारतीय समाज के घर-घर में पहुंचाई। तब समाज के अधिकांश लोगों ने इस उत्सव को एक अनोखे मौके के रूप में और कौतुहल के साथ देखा। लेकिन महज डेढ दशक में जिस तरह इस पर्व ने देश में प्रेम उत्सव के रूप में अपनी जगह बनाई है उससे साफ लगता है कि यहां का समाज प्रेम और निजी भावनाओं को लेकर किस कदर अकुलाहट का सामना कर रहा था। वैलेंटाइन दिवस को तेजी से अपनाने वाली देश की नई पीढी ने दिखाया कि किस कदर हमारे देश में निजी संबंधों की स्वतंत्रता को लेकर खालीपन था और उसे एक आवाज की दरकार थी जिसे वैलेंटाइन डे के मौके ने भरा। 
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उदारीकरण के बाद उभरे तरूणाई वाले भारत में प्रेम को लेकर किस कदर अकुलाहट थी और किस कदर समाज के अंदर पुराने केंचुल को उतार फेंक कर प्रेम के नए प्रतीक गढ़ने को लेकर तीव्र भावना पनप रही थी। वैसे ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि भारत में प्रेम जैसी कोई अवधारणा इससे पहले नहीं थी। लेकिन उसे सभ्यता के मोटे पर्दे के पीछे कहीं -कहीं पनपने का मौका मिल पाता था। क्या आज खुलकर प्रेम का इजहार करने वाली और वेलैंटाइन डे को प्रेम उत्सव के रूप में मनाने वाली ये पीढ़ी कभी इस बात पर भरोसा करेगी कि कभी इस देश में शादी के पहले लड़के-लड़कियां एक-दूसरे को देखने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। वो तो छोड़िये पति-पत्नी तक दिन के उजाले में एक-दूसरे के सामने नहीं आते थे। परिवार के लोगों के सामने बात करना तो बहुत दूर की बात थी। इस दौर के बीते अभी बहुत ज्यादा वक्त भी नहीं हुआ। आज वही भारत है और वही समाज है जहां कि मीडिया वेलैंटाइन डे आने से कई हफ्ते पहले से उपहार और कार्ड आदि की मंडी सजाकर बैठा है और टीवी चैनलों पर तथाकथित विशेषज्ञों की लंबी-चौड़ी फौज प्रेम के इतिहास, वर्तमान और उसके भविष्य को लेकर जेरो-बहस में मशगूल हैं।
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वो दौर बीते भी ज्यादा वक्त नहीं हुआ जब अभिभावक अपने बच्चों को वेलैंटाइन दिवस के दिन घर पर रोकेने के लिए हर तरकीब अपनाते थे। अगर जोर-जबर्दस्ती भी करनी पड़े तो लोग पीछे नहीं हटते थे। आज वही समाज है और वही अभिभावक लेकिन नज़ारा बिल्कुल बदला हुआ है। आज निजी जीवन में उन्मुक्त व निजी विचारों के सम्मान करवाने की भावना इतनी प्रबल है किअभिभावक भी इस रास्ते में बाधा बनने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। कही बच्चे कह न दें---
"Mind your own business, this is my life"..

Monday, 6 February 2012

(व्यंग्य) आम आदमी की गौरव गाथा!

((आपने सिंदबाद और गुलीवर की रोमांचकारी जीवनशैली और साहसिक यात्राओं की कहानियां अनेको बार पढ़ा होगा लेकिन आज आपके सामने प्रस्तुत है हमारे देश में हमेशा चर्चा के केंद्र में रहने वाले आम आदमी की एडवेंचरस जिंदगी की कहानी।))
मैं आम आदमी हूं। चेहरा 120 करोड़ में से..अरे नहीं..नहीं बीपीएल के 40 करोड़ चेहरों में से कोई भी एक चेहरा समझ लीजिए। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और कभी सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत भूमि में जन्मा आम आदमी। जिसकी गौरव गाथा आपको किसी भी बहस मुबाहिसे, राजनीतिक रैली, भाषणबाजी या टीवी पर हो रही चर्चाओं में अक्सर गुंजती हुई सुनाई पड़ सकती है। कई बार तो मुझे लेकर एसी सेमिनार हॉलों में चर्चा गर्मा भी जाती है। वैसे अगर लाइमलाइट(रील लाइफ) से निकलकर देखें तो मेरी रीयल लाइफ की कहानी भी काफी एडवेंचरस मिलेगी। जो जन्म से शुरू होकर अंतिम संस्कार या कई बार उसके बाद तक खींच जाती है, अगर उसपर राजनीति शुरू हो जाये या फिर टीवी चैनलों की पीपली लाइव टाइप कुछ मेहरबानी हो जाये।
हां, तो हम बात कर रहे थे अपने जन्म की।
तो हमारे जन्म की संभावनाएं दशकों से देश में चल रही तमाम परिवार नियोजनों की योजनाओं और तमाम आकलनों से कहीं ऊपर होती हैं। प्रसव की कहानी भी कम रोमांचकारी नहीं होती। गांव-घर की दाईयों की मदद से धरती पर अगर पांव रख दिया तो ठीक वरना सरकारी अस्पतालों की ओर गर्भ में रहते ही मेरी दौड़ शुरू हो जाती है। अस्पताल में दाखिल होने का नंबर मिला तो ठीक वरना अस्पताल के बाहर सड़क पर ही मैं अपना अवतरण पूरा कर लेता हूं। वैसे कई बार अस्पताल तक पहुंचने की नौबत भी नहीं आती और प्रसव प्रक्रिया को लाखों-करोड़ों की लागत वाली सड़कों में देवदूतों की तरह उभर आये गढ्ढे ही कई बार पूरा कर देते हैं।
चलिए ये तो रही मेरे पैदा होने के एडवेंचर की कहानी, अब थोड़ी शिक्षा-दीक्षा से जुड़ी हुई बातें भी कर ली जाये जिसका मुझे इस देश में अनिवार्य और मुफ्त प्राप्ति का अधिकार प्रदान किया गया है। हां, तो अगर मैं स्कूल जाने में सफल रहा तो वहां दोपहर के पहले का समय खिचड़ी के इंतजार में और उसके बाद का समय छुट्टी के वक्त में कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता। और अगर स्कूल नहीं जा सका तो किसी साहब के घर में घरेलू कामकाज या फिर किसी साइकिल पैंचर की दुकान पर या रेस्टूरेंट वगैरह में काम पाकर अल्पआयु में ही रोजगार हासिल करने वाले देश के कुछेक खुशकिस्मत बच्चों में शामिल होने का गौरव प्राप्त करता हूं। तब हर साल बाल मजदूर दिवस के अवसर पर अखबारों में छपे हमारे फोटो व उसके ईर्द-गीर्द छपे बड़े-बड़े नेताओं की तस्वीरों व हमारे कल्याण के नारों से हमें फिर साल भर जी-तोड़ मेहनत करने की ऊर्जा मिल जाती है।
खैर जवानी की दहलीज पर कदम रखते वक्त हम भी मन में कई सपने सजाते हैं जैसे सिने स्टार्स की तरह लकदक जिंदगी हो, धूंए के छल्ले उड़ाते हीरोज की तरह स्टाइल हो या फिर बाहों में हीरोइनों को देखने की तमन्ना आदि।
हालांकि, जवानी के दिनों में हमे रोजगार के लिए देश ने काफी अच्छी लोकतांत्रिक व्यवस्था दे रखी है। अगर पढ़ लिया तो घर की खेती-बाड़ी या मां-बाप की बची-खुची पूंजी लेकर कोई नौकरी दिलाने वाले बहुत सारे समाजसेवी मिल जाते हैं और अगर पढ़ लिख नहीं सके तो सरकार साल में सौ दिन के रोजगार की गारंटी तो देती ही है। इसी बहाने सड़क, पूल, तालाब आदि बनवाने के काम में जुटकर थोड़ी-बहुत देश की सेवा भी हो जाएगी। हां ये अलग बात है कि 100 दिन का काम पाने के लिए भी कई लोगों को चाय-पानी का प्रबंध तो करना ही पड़ता है लेकिन कहते हैं न कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है। सो हम तो भई संतुष्ट हैं। वैसे भी हमारी संस्कृति का संदेश भी यही है- संतोषः परम् सुखम्।
इधर एक संतोष की खबर और आई है हमारी जमात के लिए। कल सुना था रेडियों में कि सरकार ने फिर कहा है कि आम आदमी की तरक्की के लिए हम प्रतिबद्ध हैं। सुना है भूख हड़ताल वाले बुजुर्ग समाज सेवी भी हमे ही भ्रष्टाचार के चंगुल से निकालने के लिए अनशन पर बैठते हैं और जल्द ही इसपर कोई कानून भी बनने वाला है।
वैसे साल में 365 दिन होते हैं। 100 दिन की समाजसेवा से मुक्ति पाकर शेष दिनों में हमारे करने लायक बहुत कुछ होता है इस देश में। चुनावों के मौसम में राजनीतिक रैलियों में जनसमर्थन बनकर मैं ही अपार भीड़ के रूप में दिखता हूं। मैं न होऊं तो भला नेताजी लोगों का भाषण सुनेगा कौन... और कौन उनकी रैलियों को ऐतिहासिक व सफल बनाएगा। कौन उनके बैनर पोस्टर और झंडे ढोएगा। मैं ही सभी राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों में आश्वासनों और वादों का लक्ष्य होता हूं और मुझे ही लुभाने के लिए लोकलुभावन नारे भी दिये जाते हैं। अपने पसंदीदा उम्मीदवार को चुनाव जीताने के लिए हम ही लंबी लाइनों में लगते हैं और फिर जीतकर जाने के बाद जब वे पांच साल तक वापस लौट कर नहीं आते तो हम कोई शिकायत भी नहीं करते। सही मायनों में देश में लोकतंत्र के असल पहरूए हम ही हैं।
मैं आम आदमी हूं। मैं ही रोजाना सुबह टीवी पर आने वाले बाबा लोगों के प्रवचनों के दौरान भक्तों के अपार जनसमूह के रूप में अपनी समस्याएं सुना रहा होता हूं और उनके चमत्कारी समाधान के लिए बाबा लोगों के गुणगाण भी मैं हीं गाता हूं। अब सोचो अगर मैं ना रहूं तो कैसे रहेगा इस तरह के विज्ञानों और ऐसे विद्वानों का मान।
मेरे ही कल्याण के लिए दिल्ली के सत्ता प्रतिष्ठानों में पिछले 64 साल से तमाम योजनाएं बनती आ रही हैं और विदेशों से पढ़-लिखकर स्वदेश आयातित योजनाकार मेरे कल्याण के लिए ही इतने सालों से योजनाएं बना रहे हैं। उनका मान रहे इसके लिए उनके द्वारा तय किये 32 रुप्ये, 26 रुप्ये व 20 रुप्ये जैसी छोटी राशियों में भी हंसी-खुशी अपना जीवन हमी जीते हैं। ये अलग बात है कि इन योजनाओं के बदले वे लाखों-करोडो़ कमा ले जाते हैं।
यही है हमारी यानि इस महान भारत भूमि के आम आदमी की गौरव गाथा। तो कृप्या हर टीवी शो, राजनीतिक रैली व बहस-मुबाहिसों में हमारी लोकप्रियता से जलने वालों अब तो समझों हमारे त्याग को जिस कारण हम आज भी विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के केंद्र बिंदू बने हुए हैं।
भई... हम तो इस गौरव से खुश है और बस यही कहना चाहेंगे..
"
अगले जनम मोहे आम आदमी ही कीजो..."