
आप सबको नए साल की शुभकामनायें--- ये नया साल आपके जीवन में नई खुशियाँ लायें और प्रगति के नए पथ पर लाये...
कहते हैं भारत विविधताओं से भरा देश है, विविध लोग...विविध नज़ारे और विविध प्रकार की बातें.....हर बार जिंदगी का नया रूप और नई तस्वीर....लेकिन सब कुछ हमारी अपनी जिंदगी का हिस्सा...इसलिए बिल्कुल बिंदास...
५ राज्यों में विधानसभा चुनाव के परिणाम आ गए. कांग्रेस और भाजपा ने मिलकर इन राज्यों की सत्ता आपस में बाँट ली. अन्य सभी दल महज तमाशबीन बनकर रह गए. वैसे भी इन राज्यों में अन्य दलों के लिए कोई स्कोप नहीं था. हा राजस्थान में जरूर अन्य दलों और निर्दलीय विधायकों के पास मौका है कि वो लोकतंत्र की मलाई खा सकें. जीत के बाद जीतने वाले दलों के नेताओं ने कहा कि आतंकवाद समेत सभी मुद्दें बेमानी साबित हुए और हमें जीत से नहीं रोक सके. इन्हें इस बात कि खुशी है कि आतंकवाद कोई चुनावी मुद्दा नहीं बन सका. अगर ऐसा सच में हुआ है तो ये खेदजनक है. अगर लोग अपनी सुरक्षा को चुनाव में मुद्दा नहीं बना सकते तो फ़िर तो भगवान ही इसका मालिक है. इसके साथ ही एक और काम होना चाहिए कि किसी भी दल को ये अधिकार नहीं मिलना चाहिए कि वो आतंकवाद जैसे मसले को चुनाव में भुनाए. लोगों को भी ये समझना होगा कि चुनाव ही आखिरी हथियार नहीं है. अगर जीतने के बाद भी कोई सरकार उनकी सुरक्षा के साथ ढिलाई बरतती है तो लोगों को सरकार से सवाल करना चाहिए। लोगों को अपनी सुरक्षा और विकास जैसे मसलों पर मुखर होना होगा तभी हम भारत को दुनिया की सबसे बड़ी लोकतंत्र के रूप में वास्तव में स्थान दिला पायेंगे.
बटला हाउस में मुठभेड़, मालेगांव धमाकों और मुंबई में हमले जैसे मसले पर जिस तरह से देश ने राजनीति होते हुए देखी वो हमारे लोकतंत्र के लिए कहीं से भी सहीं नहीं माना जा सकता। लेकिन इस बार आतंकवाद के मसले पर यहाँ के मुस्लिम भाई लोगों ने जिस तरह से मुखर होकर विरोध किया यही रवैया उन्हें आगे भी जारी रखना होगा ताकि यहाँ का बहुसंख्यक हिंदू समुदाय उनपर भरोसा कर सके. यहाँ के हिंदू समुदाय को भी धर्म के मामले को केवल राजनीति के लिए उठाने वाले लोगों से सावधान होना होगा. लोगों को राजनितिक बिरादरी में उस तबके को आगे करना होगा जो समाज के लिए काम करने के मकसद से राजनीति में आ रहा है और ऐसे लोगों को राजनीति से बाहर करना होगा जो केवल सत्ता का सुख भोगने के लिए राजनीति में आ रहे हैं.
अमेरिका में ओबामा की जीत पर जश्न मनाने वाली भारतीय जनता को अगर अपने लिए काम करने वाला और परिवर्तन लाने वाला नेता चाहिए तो पहले उन्हें ख़ुद मुखर होना होगा और फ़िर जब वे ऐसा नेता चुनेंगे जो दागदार न हो और अपराधी न हो और जो जाति-धर्म जाति-धर्म बात न कर विकास जाति-धर्म की बात करे तभी यहाँ सही मायने में लोकतंत्र का विकास हो पायेगा.
आज अचानक मुझे नई दिल्ली स्टेशन जाना पडा। वहां बैठे हुए मैं बातें कर रहा था। अचानक मेरे सामने एक हाथ बढ़ा और साथ ही एक महिला की आवाज भी आई- कई दिनों से भूखी हूँ खाने के लिए कुछ दे दो बेटा. अपनी आदत के अनुसार मैंने आगे बढ़ने का इशारा किया और खुश होता हुआ अपनी बातों में लग गया. सामने खड़ी महिला आगे बढ़ गई. अचानक मेरी नज़र उसपर गई. एकदम कमजोर सी दिख रही उस महिला के उम्र का अंदाजा लगा पाना सम्भव नहीं था, फ़िर भी ऐसा लग रहा था कि उम्र ६० साल से ज्यादा ही होगा. कपड़े के नाम पर शरीर पर एक पुरानी सी साड़ी थी और चेहरे से उसकी दयनीयता झलक रही थी। मेरे बाद वो महिला करीब १५ लोगों के सामने हाथ फैलाती रही और सब ने उसे कुछ देने से नकार दिया. तब जाकर मुझे लगा कि शायद मुझे कुछ करना चाहिए. मैंने अपनी जेब टटोली और उसके खाने भर पैसे निकाल कर उसे देते हुए बोला जाकर कुछ खा लीजिये. उस महिला ने मुझसे पूछा कि खाना कहाँ मिलेगा. मैंने दूकान की ओर इशारा करते हुए कहा कि वहां जाओ वहीँ मिलेगा. वो महिला मुझे हाथ जोड़ते हुए दूकान की ओर बढ़ गई. मेरी नज़र उसे जाते हुए देखती रही. अचानक मुझे महसूस हुआ की मेरी आँखे भर आई है। मेरे आगे एक सवाल था कि इस उम्र में आके क्यूँ इस महिला के सामने ऐसा वक्त आया है? मेरी मदद से उस महिला का कुछ नहीं होने वाला है। इस उम्र में वो काम करने में सक्षम नहीं है और मैं सोचता हुं कि वो महिला अब स्टेशन पर ही कहीं वैसे ही सोई होगी और फ़िर कल दिन में खाने के लिए उसे किसी के आगे हाथ फैलाना होगा। और ये सिलसिला उसके जीवन के आखिरी वक्त तक चलता रहेगा। हम चाहे तो ऐसे लोगों को धिक्कार सकते हैं लेकिन मेरा मानना है कि ऐसा तबतक सम्भव नहीं है जबतक इंसान बहुत बेबस नहीं हो। किसी के आगे हाथ फैलाना इतना आसान काम नहीं है। लेकिन ऐसी स्थिति का होना हमारे समाज के लिए बड़ी असफलता है.
अक्सर सड़क चलते चौक-चौराहों पर या फ़िर कहीं सार्वजानिक स्थानों पर बैठे हुए कोई जब हमारे सामने हाथ फैला देता है हम आदतन ये सोचते हैं कि ये सब तो चलते रहता है। हम अक्सर हाथ फैलाने वालों को आगे बढ़ने का इशारा कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो लेते हैं। ऐसा करते वक्त कई बार अपने साथ खड़े लोगों पर इम्प्रेशन जमाने के लिए हम कह बैठते हैं कि इन लोगों को तो कोई काम ही नहीं। जहाँ देखों हाथ फैला देते हैं. बस स्टेशनों या रेलवे स्टेशनों पर कई बार जब छोटे बच्चे ऐसा काम करते हैं तो हम उनके माँ-बाप को उनको जन्म देकर कोसते हुए कह बैठते हैं कि जब पालना-पोषना ही नहीं था तो पैदा क्यूँ किया. लेकिन मेरे विचार में ये इतना छोटा सवाल नहीं है. ये सवाल मेरे कुछ सोचने या नहीं सोचने से ज्यादा सामाजिक है. सवाल सामजिक सुरक्षा का है. हम क्यूँ ऐसा समाज नहीं बना पाये हैं जिसमे सभी को सामाजिक सुरक्षा प्रदान किया जा सके. जो काम करने में सक्षम हैं उनकी बात नहीं है लेकिन जो बच्चे काम करने लायक नहीं है और अनाथ हैं या फ़िर ऐसे बुजुर्ग जो कुछ कर सकने में सक्षम नहीं है और उनके पास जीविका का कोई साधन भी नहीं है उनके लिए व्यवस्था को कुछ जरूर करना होगा. केवल राजधानी दिल्ली में ७५,००० ऐसे लोग है जो सड़कों पे अपनी जिंदगी बिताते हैं और दिन में चौक-चौराहों पर मांगते हैं। लोग उन्हें कुछ दे रहे हैं या फ़िर उसे देश की समस्या बताकर चुप रह जाते हैं ये उनका अपना मामला है। लेकिन हमारे समाज को इस बारे में कुछ करना चाहिए।
"जिस्म तो ख़ाक हो गया बेबसी के बोझ से,
आँखों में भी बेहिसाब पानी ही पानी था।".....