Tuesday, 1 January 2008

न्यू ईयर पर मिडनाईट सेलीब्रेशन का तडका!

नए साल को मनाने के लिए लोग आधी रात तक जगे हुए थे। पूरे देश में नए साल कि तैयारियां हुई थी और जैसे घड़ी में रात के १२ बजे (मैं बस एक मिनट कि बात कर रहा हूँ।) लोगों में न जाने कहाँ से गजब का उत्साह आ गया। इधर घड़ी कि सुई १२ पर पहुंची और उधर लोग झूम उठे । सबसे ज्यादा उछल रहे थे टीवी चैनल वाले। १२ बजते ही उनका उत्साह भी अचानक कई गुना हो गया। मुझे ये महीन समझ में आया कि आख़िर इस एक मिनट में ऐसा क्या बदल गया। तारीख तो रोज बदलती है और उसपर तो लोग बस ये मानकर खुश हो लेते हैं कि चलो एक और दिन गुजर गया। इधर पिछले कुछ सालों में न्यू ईयर पर टीवी चैनलों मिडनाईट सेलीब्रेशन का तडका लगाकर लोगों का उत्साह बढ़ा दिया है। दिल्ली के कई होटलों ने तो लोगों को आधी रात का ये जश्न मनाने के लिए लाखों का बजट थमा दिया। अब बड़ा कहलाना है तो भाई इस तरह के खर्च तो करने पड़ेंगे।

आधी रात को लोग इसी तैयारी में रहते हैं कि १२ बजे और अपने लोगों को नयी साल कि बधाई दे दी जाये। लोग इसके लिए सुबह तक इंतज़ार नहीं कर सकते। भाई अब लोगों में इतना धीरज कहाँ। लेकिन मुझे तो कई बार इस आधुनिक शैली के नक़ल के चक्कर में मुझे दांत सुन्नी पड़ी है। १२ बजे मैंने किसी को बधाई देने के लिए फ़ोन लगा दिया। वो परेशान हो कर उठा, फ़ोन उठाते ही बोला क्या हुआ। इतनी रात गए पता नहीं क्या बिपत्ती आ गयी। मैंने कहाँ अरे नए साल कि बहुत-बहुत बधाई। सामने तो नहीं बोला लेकिन लगा मन में गालियाँ दिए जा रहा हो। भंड में गया नया साल और भंड में गयी बधाई। सुबह तक इंतज़ार नहीं कर सकते क्या।

Monday, 31 December 2007

काश मेरा जन्मदिन भी साल में कई-कई बार आता!

प्रेम और जन्मदिन में क्या संबंध है?
आप भी सोचियेगा कि क्या फालतू का सवाल मैं कर रहा हूँ। सीधे तौर पर तो नहीं लेकिन आधुनिक प्रेम में जन्मदिन का काफी महत्त्व है। आज-कल कई बार ऐसा होता है कि किसी दोस्त के बारे में एक साल के अन्दर कई बार उसके जन्मदिन के बारे में सुनने को मिल जाता है। पहले तो थोडी हैरत होती थी लेकिन अब इसमे कोई हैरानी नहीं होती। अब दोस्ती का मामला है भेद तो खोल नहीं सकता।

एक मेरे मित्र ने अप्रैल में एक बार जन्मदिन मनाई थी लेकिन अभी २-३ माह ही बीते थे कि बेचारे को एक दिन प्रेम हो गया। अब जो लड़की पसंद आई थी उसको इम्प्रेस करने के लिए उन्होने पार्टी देने कि सोची और कहा कि मेरा जन्मदिन पहली जनवरी को है। और इसी के साथ साहब ने अपनी नयी प्रेमिका को जन्मदिन मनाने के लिए पार्टी के लिए १ तारीख को दावत दे दी। मुझे पार्टी के लिए आमंत्रित करते हुए बताया गया कि बताना मत। अब मैं क्या कह सकता था। अगर मुझे ६ माह में सालाना जलसे की मिठाई खाने को मिले तो मुझे क्या हर्ज हो सकता था।

लेकिन मुझे सबसे ज्यादा हैरानी अपने मित्र महोदय के आत्मविश्वास से हुआ। उन्हें इस बात का पक्का यकीं था कि अगले साल पहली जनवरी से पहले इस महबूबा से छुटकारा मिल जायेगा। नहीं तो बेचारे ने इतना झूठ बोलने कि हिम्मत नहीं की होती। अब भईया हम तो साल में एक बार जन्मदिन मनाने का मौका मिलता नहीं २ बार-३ बार कहाँ से मनाता, आख़िर किसके लिए मनाता। ये सब बडे जिगर वालों का काम है जो प्यार को इस तरह से मैनेज करने का जिगर रखते हैं। वैसे भी प्यार कोई बच्चों का खेल नहीं।

भाजपा को फिर से याद आये रामजी!

रविवार ३० दिसम्बर को भाजपा के नेताओं के लिए काफी व्यस्त दिन रहा। एक दिन में दो बड़े आयोजन थे। हिमाचल में भाजपा की सरकार सत्ता में आई थी प्रेम कुमार धूमल को मुख्यमंत्री पद कि शपथ लेनी थी वही दिल्ली में विश्व हिन्दू परिषद कि रैली थी जो राम सेतु के मसले पर बुलाई गई थी। पहले जब शिमला में मंच पर पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह नहीं दिखे तो लोगों को हैरत हुई कि अरे ये क्या हुआ. पार्टी का इतना बड़ा आयोजन और राजनाथ जी कैसे गायब हो सकते हैं। शिमला के मंच पर दिल्ली से आडवाणी जी और नकवी जी दिखे।

थोडी देर बाद जवाब खुद मिल गया। दिल्ली में विहिप की रैली के मंच पर बाक़ी के नेता दिख गए। राजनाथ सिंह जी के साथ मुरली मनोहर जोशी जी और सुषमा जी भी विहिप की रैली में मंच पर साधू-संतों की भीड़ में दिख गए। जोशी जी ने बाहर निकल कर मीडिया के बीच राम सेतु मसले पर केन्द्र की कांग्रेस सरकार को घेरने का प्रयास किया। राजनाथ जी की दिल्ली में उपस्थिती ये बता रही थी की हिमाचल में जीत की ख़ुशी मनाने से ज्यादा जरूरी पार्टी अध्यक्ष जी के लिए राम सेतु के मसले पर हो रही रैली थी। लेकिन काफी लोगों को दिल्ली के इस मंच पर मोदी जी को न देखकर निराशा हुई।

गुजरात के कुछ ऐसे लोगों से मेरी बात हुई जो विहिप से जुडे हुए है और काफी सक्रिय हैं। रैली में मोदी के न आने को लेकर उनमें कोई हैरानी नहीं थी। उनका कहना था की मोदी जी ने अपने काम के बदौलत सत्ता बरक़रार रखी है और दिल्ली रैली में मोदी के न आने को लेकर उनका कोई स्पष्ट विचार सामने नहीं आया। लेकिन राम सेतु के मसले ने बीजेपी को एक ऐसा मसला दे दिया है जिसे अगले चुनाव में बीजेपी राम मंदिर के मामले के बदले भुना सकती है और बीजेपी इस बात की गंभीरता को समझ रही है। इसी कारण राम सेतु पर कोई भी मौका बीजेपी गवाना नहीं चाहती। बीजेपी को ऐसा लगने लगा है कि जो पार्टियां अभी इसे हल्के में ले रही है आगे चलकर उन्हें इसका नुकसान हो सकता है। बीजेपी इसे ऐसे मौक़े के रुप में देख रही है जिस पर वह दक्षिण भारत के हिन्दुओं को भी अपने पक्ष में गोलबंद कर सकती है। अपने पक्ष में अचानक आये इस मौक़े को देखकर बीजेपी को फिर वो राम याद आ गए हैं जिन्हें १९९८ में सरकार बनाने के बाद उसने भुला दिया था।

Sunday, 30 December 2007

न्यू ईयर पर बाज़ार में खूब बिक रहा है दिल!

न्यू ईयर पर बाज़ार में ग्रीटिंग कार्ड्स की धूम में दिल की खूब बिक्री हो रही है । कई कार्ड्स पर तो एक की बजाय कई-कई दिल छपे हुए है। किसी को उपहार देना हो बाज़ार में एक रूपये से लेकर मंहगे से महंगा ग्रीटिंग कार्ड है। लेकिन एक बात सब में समान है। सब में नए साल की शुभकामनाएं छपी है साथ में लगभग हर कार्ड में एक , दो या फिर ढेर सारे दिल लगे हुए है। आपको अब अगर किसी को दिल देना है तो अपना दिल जाया करने कि जरूरत ही क्या है, जाइये बाज़ार और खरीद lijiye एक सस्ता सा दिल और उसपर किसी शायरी कि किताब से एक अच्छी सी शायरी चुनकर अच्छी सी लिखावट में लिख डालिए और दे दीजिए अपने अजीज को अपना ये प्यारा सा दिल ।

इस दिल के कई फायदे हैं। अगर बाद में आपके अपने अजीज ने आपका दिल तोड़ दिया तो आपकी जिंदगी बर्बाद होने से भी बच जायेगी. और इस खेल में आपका खर्च भी बमुश्किल एक या दो रूपये का आयेगा। वैसे भी इस सस्ते दिल की आजकल के युवावों को काफी जरुरत है। अब उन्हें कईयों को अपना दिल देना पड़ता है। अब भाई असली दिल इतने कहाँ से आएंगे। वो तो केवल गानों में होता है कि दिल के टुकरे हजार हुए , कोई यहाँ गिरा- कोई वहाँ गिरा। अब असल में दिल के अगर कई हिस्से हुए तो न वो बेचारा किसी काम का रहेगा और न ही बेचारे का बेचारा दिल। वैसे अब अगर आपका अजीज आपसे काफी दूर है तो आपको अपना दिल भेजने के अब कई माध्यम मिल जायेंगे। इंटरनेट पर जाइये और ग्रीटिंग्स में से कोई अच्छा सा दिल वाला ग्रीटिंग चुनकर ई-मेल कर दीजिए। वैसे भी न हो तो मोबाइल पर एक दिल वाला ग्रीटिंग ही चिपका दीजिए। अब अपने अजीज को ख़त भेजने के लिए ना तो किसी कबूतर कि मिन्नत करनी है और ना ही डाकिये की चिरोरी । आधुनिकता ने प्रेमियों को कितनी सुविधाये दे दी है। वैसे नए साल पर दिल भेजने वालों को थोडा सा दिल वैलेंटाइन डे के लिए भी बचाना पड़ता है कारण कि अब प्रेमियों का ये पर्व भी अब ज्यादा दूर नहीं है। इसकी तैयारी तो अभी से ही शुरू करनी पड़ेगी ना।

Sunday, 23 December 2007

विधायक, सांसद टाई-सूट में नज़र आएंगे!

ग्लोबलाइजेशन के बाद इधर अपने नेता जी लोगों के लिए विदेश यात्रा की संभावनाएं काफी बढ़ गयी है। तब से लेकर नेतागिरी के पेशे में आने वाले कुछ पढे-लिखे लोग हमेशा ये कोशिश करते रहे हैं कि जो नेता विदेश जाये उन्हें थोडा स्मार्ट बनाया जाये। अब चुकी ये बात तय नहीं है कि कौन विदेश जाएगा और कौन नहीं। इधर गठबंधन सरकारों के आने से पहली बार विधायक बने या फिर निर्दलीय विधायकों के विदेश जाने कि संभावनाए ज्यादा हो गई है। आख़िर सरकार चलाने की ज्यादा जिम्मेदारी अब उन्ही पर आ गई है। झारखण्ड इसका सबसे अच्छा उदाहर पेश कर रहा है। वहा तो किसी भी विधायक के लिए विदेश यात्रा बहुत ही आसान है, आख़िर निवेश लाने के लिए उनसे बेहतर विदेश यात्रा और कौन कर सकता है।

इसी बात को ध्यान में रखते हुए झारखण्ड के सारे विधायक जल्द ही जींस, रंग-बिरंगी शर्टे और टोपी पहने दिखाई दे सकते हैं । झारखड विधानसभा के अध्यक्ष्र आलमगीर आलम विधानसभा में एक ड्रेस कोड लागू करने का मन बना चुके हैं। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और स्वतंत्र विधायक इंदर सिंह नामधारी द्वारा ड्रेस कोड का मुद्दा उठाए जाने के बाद आलम ने कहा है कि सभी पार्टियों के नेताओं और विधायकों के साथ बैठक कर ड्रेस कोड की जरूरत पर सहमति बनाई जाएगी। ठीक ऐसा प्रयास केन्द्रिया संसदीय कार्य मंत्री प्रिय रंजन दास मुंशी भी कर चुके हैं। उनका विचार था कि सभी सांसद सूट - में आया करे । लेकिन दरजी के नाम पर सहमति नहीं बन सकी और ये प्लान अभी पूरा नहीं हो पाया है। हम उम्मीद करते है कि जल्द ही ये भी होगा।

जाएँ या रहें- मोदी तो मोदी ही रहेंगें!

अब कुछ घंटों में गुजरात विधानसभा चुनाव के परिणाम आने शुरू हो जायेंगे। पूरा देश इंतज़ार कर रहा है की क्या आयेगा परिणाम। इस चुनाव में सबसे ज्यादा नरेन्द्र मोदी का दांव पर लगा हुआ है। परिणाम कुछ भी हो मोदी ने आखिरी समय तक जिस आत्मविश्वास का परिचय दिया है भारत की जनता को अब आगे एक ऐसे ही प्रधानमंत्री कि जरूरत है। कार्यवाहक मुख्यमंत्री होते हुए भी राष्ट्रीय विकास आयोग कि दिल्ली में हुई बैठक में मोदी ने जिस आत्मविश्वास से देश से जुडे हुए मसलों पर प्रधानमंत्री और केन्द्र सरकार से नज़र मिलाकर बात की है देश में उससे बहुत अच्छा संकेत गया है। २१वी सदी के भारत और इसके सम्मान के बारे में सोचने वाले हर भारतीय के लिए अब मोदी एक प्रतीक बनते जा रहे हैं । इस चुनाव में मोदी का रास्ता रोकने के लिए उनकी पार्टी के अन्दर भी कई लोग खड़े हुए लेकिन ईससे मोदी का आत्मविश्वास नहीं डिगा और शायद मोदी कि यही छवि अब उन्हें गुजरात के अलावा पूरे देश में लोकप्रिय बनाती जा रही है। गुजरात में विपक्षी कांग्रेस तो मोदी के कद का कोई नेता भी नहीं दे सकी, मुद्दों कि बात ही छोड़ दीजिए।

रही विचारधारा कि बात तो अब मोदी ही अकेले ऐसे नेता दिख रहे है जो देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बन रहे आतंकवाद के खिलाफ खुलकर बोलने कि हिम्मत कर रहे है। बाक़ी तो सारे लोग जनता को या तो डराने का काम कर रहे है या फिर हमलों के बाद निंदा करने का। मोदी ने गुजरात में आतंकवाद पर लगाम लगा कर दिखाया है कि आतंकवाद को हराया जा सकता है, दबाया जा सकता है। जब पूरा देश आतंकवादियों से आजिज आ चुका होगा तब सभी मोदी की ओर ही देखेंगे।...

Thursday, 20 December 2007

अब 'भारत' भी चलेगा कार पर!

१९९० के दशक के अंत में देश में ये डिजिटल डिवाईड को लेकर बहस बहुत तेज थी । लगभग हर बहस-मुबाहिसे में भारत और इंडिया को अलग कर देखने और दोनों के जीवन स्तर में अंतर पर बाहर एक फैशन जैसा हो गया था। इन दोनों दुनिया में फर्क कार पर चलने वाली आबादी तय करती थी। अर्थात जो कार पर चलते हों वो अगर और जो कार पर नहीं चलते वो देश भारत के लोग।

इधर जल्द ही इस बारे में टाटा कंपनी बड़ा बदलाव लाने वाली है। january २००८ में वह lakhtakiyaa कार के साथ बाज़ार में उतरने वाली है। जाहीर है कि यह एक ऐसी राशी है जिसे देश की बहुसंख्यक जनता या तो खुद के कार खरीदने पर खर्च कर सकती है या फिर सर्वजिंक रुप से चलने वाली कारों की सवारी कर सकती है। कल ही एक खबर आई थी कि टैक्सी एजेंटों कि निगाह टाटा के इस कार पर टिकी है। अगर ये कार उनकी अपेक्षावों पर खरी उतरती है तो जहीर है भारत कि अधिसंख्य आबादी कारों पर चलने लायक होगी। और फिर शहरी आबादी को कारो पर चलन के अलावा आगरा दिखने के लिए कोई और जुमला गढ़ना होगा.....................

सब्सिडी नहीं तो फिर आरक्षण क्यूँ!

सरकार का हाथ आम आदमी के साथ नारे वाली पार्टी कि सरकार है हमारे देश में। उस सरकार के मुखिया ने एक दिन कहा कि अब वक्त आ गया है कि किसानों को मिलने वाली सब्सिडी ख़त्म कर दी जाये। सरकार का कहना है कि इस से सरकार के ऊपर बोझ बहुत ज्यादा हो गया है और सही लोगों को इसका फायदा भी नहीं पहुंच रहा है। इसके कुछ दिन बाद ही उस सरकार ने देश के अल्पसंख्यकों के लिए पंचवर्षीय योजना मी से १५ फीसदी फंड एलौट कर दिया । सरकार को ये कोई बोझ नहीं लगा। अगर इस बात का कोई विरोध करे तो ये सरकार उसे सांप्रदायिक कहने से पीछे नहीं हटने वाली।

अब सरकार को ये भी सुनिश्चित करना चाहिऐ कि बाक़ी के बचे ८५ फीसदी पैसे से बने सड़क पर कोई अल्पसंख्यक नही चले, उस पैसे से हुए किसी काम का फायदा किसी अल्पसंख्यक को नहीं हो। अगर देश का बहुसंख्यक समुदाय इस तरह की माँग उठाने लगे तो इसमे बुराई क्या है। अगर १५ फीसदी पैसे पर अल्पसंख्यकों का अधिकार है तो बाक़ी के ८५ फीसदी पर बहुसंख्यकों का अधिकार भी तय होना चाहिऐ। सरकार का ये कदम देश को सांप्रदायिक अधर पर बांटने वाला है। अब ये भी तय होना चाहिऐ कि इस पैसे का ऐसे लोगों को भी फायदा नहीं होना चाहिऐ जो देश के खिलाफ काम करने वाली शक्तियों से मिले हुए हों। आतंकी हमलों को रोक पाने में असफल रही इस सरकार को ये भी तय करना चाहिऐ।

Wednesday, 12 December 2007

नंदीग्राम में वामपंथ का पंथ गायब!

१९६० के दशक में पश्चिम बंगाल के नक्सल बारी में हुए वामपंथी आन्दोलन ने वाम पंथ के लिए एक आईने का काम किया था। उसने समाज को ये दिखाया था कि भारत का वामपंथ अपने पंथ से हट रहा है। उस दौर में बंगाल में मुख्यधारा की वामपंथी पार्टियों ने मध्य वर्ग को विस्वास में लेकर, विशेषकर ग्रामीण आबादी को भरोसे में लेकर पश्चिम बंगाल में सरकार बनाई थी. लेकिन आज नंदीग्राम में चल रही लड़ाई भारत के वामपंथी विचारधारा से ताल्लुक रखने हर आदमी के लिए अहम् है। आज वहाँ चल रही लड़ाई में किसान और आम आदमी जमीन अधिग्रहण के खिलाफ खड़ा है और जो वामपंथी सरकार और वामपंथी पार्टी (सत्ताधारी) है वो उसके खिलाफ लड़ाई के मैदान में है। इस लड़ाई में माकपा को छोड़कर अन्य जो पार्टियां हैं, चाहे वे सरकार में साझेदार ही क्यों न हो माकपा के खिलाफ हैं। लेकिन उन्हें अपनी आवाज इस दर से दबानी पद रही है कि कह इस लड़ाई(sattasangharsh) कि आड़ लेकर माकपा उनकी वाम विचारधारा और वोट बैंक को हाईजैक ना कर ले।

नंदीग्राम में संघर्ष शुरू हुए एक साल होने जा रहा है। वहाँ लड़ाई किसान की अपनी जमीन बचाने को लेकर है। अब नंदीग्राम की लड़ाई एक प्रतीकात्मक लड़ाई बन गई है। ये लड़ाई अब देश के हर उस किसान की है जो औधोगिक इकाई लगाने के लिए किसी भी कीमत पर अपनी जमीन नहीं देना चाहता। मेरे विचार में इस मामले पर एक कानून बनना चाहिऐ। आखिर एक किसान को अपने पुरखों कि जमीन को जबरदस्ती बेचने को मजबूर कैसे किया जा सकता है। अपनी जड़ों को छोड़कर वो कहाँ जायेगा। उसे इस बात का अधिकार होना चाहिऐ कि वो अपने पुरखों कि जमीन को बेचने से इनकार कर सके। इस लड़ाई में दूसरा पक्ष सरकारी मशीनरी है जिनका ये काम है कि वो किसी भी कीमत पर विकास का काम आगे बढाये। अब ये अलग मसला है की सरकारी मशीनरी किस पार्टी के हाथ में है।

Tuesday, 11 December 2007

'भाजपा का आत्मविश्वास लौट रहा है'

गुजरात में प्रथम चरण के चुनाव से महज १८ घंटे पूर्व भाजपा के सारे दिग्गज मीडिया के सामने आये और एक सुर से प्रधानमंत्री पद के लिए अपने उम्मीदवार के लिए आडवाणी जी का नाम घोषित कर दिया। इसी के साथ अब ये मान लिया जाना चाहिऐ की भाजपा में वाजपेयी युग का अंत हो गया। अब कमान आडवाणी जी के हाथ में होगी. आडवाणी जी अब भाजपा का चेहरा होंगे। केन्द्र की सत्ता से बहा होने के तीन सालों भाजपा ने आडवाणी जी को अपना नेता घोषित कर साहस का परिचय दिया है। अब तक भाजपा उन्हें आगे करने में अपने सहयोगी दलों के कारण डर रही थी। जाहिर है भाजपा ने अब इस डर से खुद को मुक्त कर लिया है।

१८० सीटें लेकर भाजपा जब १९९८ में सत्ता में आई थी तब से लेकर सत्ता से बाहर आने तक भाजपा सहयोगी दलों के हाथों में खेलती रही। वाजपेयी जी को पीएम के रूप में देखने की चाहत रखने वाले लोगों को उनके लचीलेपन से काफी निराशा हुई थी। भाजपा ने सरकार चलाने के लिए मुख्य मसलों को भुला दिया। लेकिन आज आडवाणी की ताजपोशी भाजपा के लौटते आत्मविश्वास का संकेत है। वैसे भी गुजरात के चुनाव में भाजपा पूरे आत्मविश्वास से उतर रही है। उसे उम्मीद है की गुजरात में फिर से उसकी सरकार बनेगी। भाजपा को ही नहीं उसकी विचारधारा से ताल्लुक रखने वाले लोगों को भी उम्मीद है की अगले साल होने वाले लोक सभा चुनाव के पहले भाजपा फिर से उन मुद्दों को उठाने का साहस कर लेगी जिन्हें सत्ता के लिए उसने पिछली बार भुला दिया था। देखते हैं आडवाणी जी की अगुवाई में भाजपा भारत के बहुसंख्यक समुदाय के लिए आवाज बुलंद करने का कितना साहस बटोरे पाती है? ये जरूर होगा की सहयोगी दल फिर से रुकावट डालेंगे। लेकिन ऊससे क्या फर्क पड़ता है। आप आगे तो बढो बाकि लोग साथ होते जायेंगे।

Wednesday, 5 December 2007

"इंटरनेशनल डॉग शो में ४२ लाख का कुत्ता"

एक कुत्ते कि कीमत ४२ लाख ! आपको शायद इसपर यकीन न हो लेकिन यही सच है। उत्तरांचल की राजधानी देहरादून के सर्द मौसम में दुनिया भर के कुत्तो को लेकर उनके मालिक(अभिभावक - कृपया कोई बुरा ना माने) पहुंचे। मौका था इंटरनेशनल डॉग शो का। बंगलोर से आये एक कुत्ते की कीमत ४२ लाख थी। और ना जाने कितने नए-नए नस्ल के कुत्ते भी यहाँ लाये गए थे। भैया हमारे लिए तो नयी बात थी। हम तो गाँव के रहने वाले हैं और हमे याद है बचपन में जो कुत्ते हमे पसंद आ जाते थे उन्हें स्चूल से लौटते वक्त हम अपने बसते में छुपा चुपके से उठा लाते थे। न कोई कीमत देना होता था और ना ही कोई दोग शो में जाना पड़ता था। और कुत्ते भी साहब बडे होने के बाद इतने बहादुर निकलते । थी किसी कि मजाल जो रात को हमारे घर की ओर कदम बढ़ा लें।

देहरादून में पौंचे कुत्ते एक से एक उन्नत नस्ल के। उनके साथ आये थे उनके नखरे उठाते आ रहे उनके अभिभावक भी मुझे इसके पहले जानकारी नहीं थी कि कोई इस तरह का आयोजन भी दुनिया में होता हैं। कहीं और होता है या नहीं लेकिन यहाँ अपने देश में इस तरह का ये मेरा पहला अनुभव था। मुझे बहुत ख़ुशी हुई कि चलो अब तक कुत्तों को मालिकों के प्रति वफादारी के लिए जाना जाता था और अब आने वाली दुनिया में मालिकों को उनके कुत्तो के प्रति संजीदगी के लिए भी जाना जाएगा। दूसरी जिस बात पर मुझे ज्यादा ख़ुशी हुई की चालों इस तरह के आयोजन से कुत्तो का अंतरराष्ट्रीयकरण हो रहा है।

मुझे याद है वो कवी सम्मेलन । बात तब की है जब मैं बनारस में रहता था। बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी के लंका गेट पर हुए एक कवि सम्मेलन में एक युवा कवि ने सुनाया था "काश मैं किसी आमिर का कुत्ता होता" । उस बेचारे कवि कि व्यथा थी अमीरों के कुत्तों कि देखरेख कि व्यापक व्यवस्था को लेकर। बेचारे कि कविता में आमिर कुत्तो कि सम्पन्त्ता से जलन साफ दिख रही थी।

Sunday, 2 December 2007

माउस नहीं हुआ जैसे अल्लादीन का चिराग हो गया!

रोज इस तरह की कोई न कोई नई खबर देखने को मिलती है- माउस दबाइए ट्यूटर पाईये। माउस दबाये अपने ग्रुप का ब्लड पाईये। अब आप का मनपसंद साथी मिलेगा बस माउस को क्लीक करिये । इस तरह कि खबरें रोज अखबारों में, वेबसाइट्स पर और सड़क किनारे लगे इस्तेहारों पर हर जगह मिल जायेंगे । अब आप ही बताईये क्या ये सारी सुविधाएं मुफ्त में मिलेगी। अब इनके दावे देखने से तो ऐसा लगता है कि जैसे ये अल्लादीन का चिराग हों । आपने मसला और जिन हाजिर होकर बोलेगा क्या हुक्म हैं मेरे आका. मैंने जैसे ही उससे कहा कि कोई परी कोई हर मेरे सामने पेश कर और वो बस पलक झपकते ही लाकर किसी नाज़नीं को मेरे सामने हाजिर कर देगा।

ऎसी ही एक वेबसाइट पर देखा मैंने कि नए दोस्त पैयी। मैंने भी सोचा यार चलो कुछ नए लोगों से दोस्ती कर ली जाये । आजकल के जमाने मैं अच्छे दोस्त मिलते भी कहाँ हैं। भैया इसी जोश में मैंने उस वेबसाइट पर रजिस्ट्रेशन के लिए लगी फॉर्म को भर दिया। बस क्या था मेरे सामने एक बधाई पत्र तुरंत आ गया। उसमे मुझे बधाई देते हुए कहा गया था कि २४ घंटे के बाद आप नये दोस्तों से सम्पर्क कर सकेंगे । अगले दिन मेरे उत्साह का पारा नही था। पट से फिर उसी साइट पर आ गया. लोगिन की और नए लोगों कि लंबी लिस्ट हाजीर । कोई बोम्बे से तो कोई कोलकाता से। कोई मोस्को से तो कोई न्यूयॉर्क से। मेरी ख़ुशी और धरकन एक साथ तेज हो रही थी। मैंने सोचा जब मौका मिला है तो पट से एक लड़की को पत्र लिख ही दूँ , लेकिन ये क्या, इससे पहले कि मैं कुछ लिख पाता सामने सुब्स्क्रिप्शन कि लिस्ट आ गयी । उसमे मेंबर शिप के लिए शुल्क कि कई श्रेणियां थी । सआरी किम्तें डॉलर में थी। अपन लोग दोस्ती पर रुपया तो खर्च कर सकते नहीं अब डॉलर कौन करे। सो कर दिए बाय। लोग कहते हैं ना कि खोजने से तो भगवान् भी मिल सकता है । भैया लेकिन दोस्त पाने के लिए खोजने के साथ - साथ डॉलर का होना भी उतना ही जरुरी हो जाता है। अब जाकर समझ में आया अब वक्त बदल गया है और इसी कारन आजकल लोगों को अच्छे दोस्त नहीं मिल पा रहे हैं।

गुजरात की बेजान पिच पर डटे धुरंधर!

गुजरात में चुनावी बिसात बिछ चुकी है, सारे धुरंधर अपने-अपने बल्ले और गेंद का जौहर दिखाने के लिए गुजराती पिच पर उतर चुके हैं। क्या भाजपा और क्या कांग्रेस सभी २०-२० स्टाइल में अपनी जीत कि उम्मीद लगाए हुए हैं। लेकिन कोई कुछ भी कहे भाजपा के मास्टर ब्लास्टर नरेन्द्र मोदी गुजरात के बेजान पिच पर फिर परचम लहराने कि स्थिति में लग रहे हैं। हालांकि कांग्रेस ने पूरा जोर लगा लिया है मोदी से असंतुष्ट लोगों को अपनी तरफ करने में लेकिन कई लोगों के जाने के बाद भी मोदी का दमख़म कम होता नहीं दिख रहा है।

बेजान पीच पर कांग्रेस ने पूरा प्रयास किया कि गेंद को मोदी के शरीर के सिद्ध में रखकर निशाना बनाया जाये और इसके लिए मोदी के गढ़ में दरार डालने कि कोशिस भी की गई । यहाँ तक कि जिस दंगे के लिए कांग्रेस मोदी को kos रही थी उसी मोदी सरकार के ग्रीह मंत्री को मोदी के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए तैयार दिख रही है। यहाँ बात वही हुई ना कि राजनीति में कोई स्थायी दुश्मन या दोस्त नहीं होता, और राजनीति किसी सिद्धांत कि मोहताज नहीं होती, मौका पड़ने पर राजनितिक दल अछे-बुरे कि अपनी परिभाषा बदल सकते हैं। हालांकि आखिरी फैसला गुजरात कि जनता को ही करना है। और अब वक्त भी ज्यादा नहीं बचा है। देखते है कौन गुजरात सीरीज़ मैं चैम्पियन बनके उभरता है।

पिछली बार मोदी ने दो तिहाई सीटें जीती थी इस बार ये आंकड़ा कम जरूर होगा लेकिन लगता नहीं है कि मोदी कि सत्ता को कांग्रेस अभी उखाड़ पाने में सफल होगी। कारन वही है कि कांग्रेस ने अबतक अल्पसंख्यक तुस्तीकरण पर ज्यादा ध्यान दिया है इसके ठीक उलट मोदी ने बहुसंख्यक आबादी को रिझाने पर ध्यान दिया है। मोदी का ये नज़रिया लोकतांत्रिक व्यवस्था के मनमाफिक ही लगता है। आलोचना करने वाले चाहे जो भी कहें लेकिन लोकतंत्र वास्तव में बहुसंख्यक आबादी कि सत्ता ही होती है।

Monday, 26 November 2007

कोई तो बताये तस्लीमा की गलती क्या है?

दो मामले आजकल मीडिया में खूब चर्चा का विषय बने हुए हैं। एक तसलीमा नसरीन और दूसरी सउदी अरब की वो लड़की जिसके साथ बलात्कार हुआ और अदालत ने ये कहते हुए उसे २०० कोड़े मारने कि सजा सुना दी कि उस समय वो कार में ऐसे आदमी के साथ बैठी थी जो उसका रिश्तेदार नहीं था। ये दोनो खबरें एक ही समाज से जुडी हुई है। बस फर्क ये है कि एक समाज के ऊपर एक लोकतांत्रिक व्यवस्था का दबाव(?) है और दूसरा २१ वी सदी में भी बेधरक अपने मध्यकालीन कानून लागू कर रहा है.

पहले आते हैं तस्लीमा वाली खबर पर। तस्लीमा का विरोध करने वाले लोगों का कहना है कि उसकी लेखनी इस्लाम के लिए खतरनाक है। लज्जा नमक जिस किताब का जिक्र हो रहा है उसमे तस्लीमा ने इस्लामी समाज में परदे के नीचे दबा दी गयी बातों की तह उघारने का प्रयास किया गया है। अगर समाज में हो रही किसी गलत बात को कोई सामने ला रहा है तो वो गलत कहाँ से है। ये कोई नयी बात नहीं है जब भी समाज में व्याप्त किसी बुराई के खिलाफ कलम चली है तब उसे रोकने का प्रयास हुआ है। चाहे १६वि समाज का यूरोप रहा हो, या भारत का हिन्दू समाज ही क्यों ना रहा हो, सभी समाजो ने अपनी बुराइयों को चर्चा से बचाने का हमेशा प्रयास किया है। जो लोग तलिमा के किताब का विरोध कर रहें हैं वे लोग ही मकबूल फ़िदा हुसैन कि पेंटिंग जलाने वालों की आलोचना करते हैं। जबकि हुसैन कि पेंटिंग में बुराइयों को सामने लाने का कोई प्रयास न होकर ओछी बाते ज्यादा होती हैं। तस्लीमा का मामला भारत के बुद्धिजीवी तबके के लिए अब अस्तित्व कि लड़ाई है। अगर आज ये कट्टरपंथी जीतते हैं तो ये कल हर काम पर पाबन्दी के लिए यही तरीका अपनाएंगे । सभी धर्मों के प्रगतिवादी लोगों को आगे आकर इस मामले पर तस्लीमा का साथ देना चाहिए। कट्टरवाद किसी भी धर्मं में हो उसका विरोध होना चाहिऐ।

अब आते हैं दूसरी खबर पर। सउदी अरब की एक खबर आजकल पश्चिमी मीडिया में खूब छाई हुई है। बलात्कार की शिकार एक लड़की ko वहाँ कि अदालत ने 200 कोड़े मारने के आदेश दिए हैं। अब ज़रा आप भी सुनिए क्या कारण है इस आदेश का। लड़की अपने किसी साथी के साथ कार में कही जा रही थी, रास्ते में ७ लोगों ने कार रुकवाकर उसके साथ बलात्कार किया। अदालत ने बलात्कारियों के साथ-साथ लड़की को भी सजा सुना दी। अदालत का कहना था लड़की एक ऐसे आदमी के साथ कार में घूम रही थी जो उसका रिश्तेदार नहीं था। यही उसके सजा का कारण है।

Friday, 23 November 2007

"'अब से ५ मिनट बाद होंगे कई धमाके'"

उत्तर प्रदेश के कई शहरों में बम धमाके हुए। इन्हें अंजाम देने वाले आतंकियों कि हिम्मत देखिए । २३ नवम्बर को कई न्यूज़ चैनलों को ईमेल मिले--- अब से ५ मिनट बाद उत्तर प्रदेश के कई शहरों में धमाके होंगे। ठीक सवा एक बजे वाराणसी, लखनऊ और फैजाबाद में कई जगह धमाके हुए। धमाके कोर्ट परिसर के बाहर हुए। इन तीनों अदालतों में आतंकवादियों के मामलों कि सुनवाई चल रही थी। १४ लोग मारे गए। सरकार ने अपना रूटीन पूरा किया- धमाकों की निंदा की, मुआवजे कि घोषणा की, जांच के आदेश दिए और तमाम शहरों में रेड अलर्ट जारी कर दिया। अब आगे क्या होगा?

पिछले सप्ताह लखनऊ में तीन आतंकी पकडे गए थे, उसके बाद भी इस हमले का कोई सुराग हमारी गुप्तचर एजेंसियों के हाथ नहीं लग सका। हालांकि इस तरह के हमलों पर लगाम लगा पाना किसी के लिए भी असंभव होगा। हालांकि हमलों में मारे गए लोगों के परिजनों को ये बात समझाया नहीं जा सकता। क्यूंकि उन लोगों ने बिना कारण के अपने लोगों को खोया है। हालांकि लोग अगर इसे किसी समुदाय विशेष से जोड़कर देखने लगें तो इससे सबसे ज्यादा प्रभावित निर्दोष लोगों को होना पडेगा। और यही तो ये आतंकी चाहते हैं । लेकिन अब समय आ गया है कि इस मसले पर कुछ तो होना चाहिए। कोई तो कोई हल तो जरूर निकालना होगा। वरना लोग घर से बाहर निकलने में भी हजार बार सोचने लगेंगे। कि पता नहीं वो वापस भी लौटेंगे भी या नहीं.

क्यों कट्टरपंथियों के निशाने हैं तस्लीमा

२१ नवम्बर कि सुबह कोलकाता की सड़कों par पत्थरबाजी हो rahi थी। अल इंडिया मईनोरिटी फोरम ने ३ घंटे का बंद बुलाया था। अचानक कुछ लोगों ने पुलिस वालों पर बोतलों, पत्थरों और तलवारों से हमला कर दिया। ४० से ज्यादा लोग घायल हुए। कई इलाकों में कर्फू लगाना पडा। बंद करने वाले तस्लीमा नसरीन कि वीजा अवधी बढाये जाने, नंदीग्राम में मुसलामानों की हत्या और रिज्वानुर मामले में कोलकाता पुलिस कि भूमिका का विरोध कर रहे थे। जाहीर था कि बहुसंख्यक जनता भी सड़क पर उतरती, किसी भी समाज में कोई भी बहुसंख्यक समुदाय किसी कि गुंडागर्दी बर्दास्त नहीं कर सकता। लोग सड़कों पर उतरे और कोलकाता में दंगा-फसाद शुरू हो गया।

अब आते हैं तस्लीमा के मामले पर। भारत में निर्वासन में रह रहीं विवादास्पद बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन को पश्चिम बंगाल से हटाकर राजस्थान ले जाया गया है। गुरूवार की सुबह केंद्र सरकार के दो वरिष्ठ अधिकारियों ने कोलकाता में तस्लीमा नसरीन से मुलाक़ात की और उनसे कहा कि कोलकाता में हुई हिंसा के बाद सुरक्षा की दृष्टि से उनका पश्चिम बंगाल में रहना ठीक नहीं है।

वे पहले कोलकाता छोड़ने को तैयार नहीं थीं लेकिन बाद में जब सुरक्षा की चिंताओं के बारे में उन्हें अवगत कराया गया तो वे भारत में कहीं और जाने को तैयार हो वे जयपुर पहुँच चुकी हैं और उनकी सुरक्षा के लिए पर्याप्त प्रबंध किए गए हैं, उन्हें वाई श्रेणी की सुरक्षा दी जाएगी.
तस्लीमा नसरीन का वीज़ा अगले वर्ष मार्च महीने तक वैध है और वे तब तक भारत में रह सकती हैं लेकिन उसके बाद उनके वीज़ा का नवीनीकरण होगा या नहीं, इस पर प्रश्नचिन्ह बना हुआ है।

विवाद कोलकाता में स्थिति बुधवार को तब बिगड़नी शुरू हो गई थी जब तस्लीमा नसरीन की वीज़ा अवधि बढ़ाए जाने के विरोध में प्रदर्शनकारी उग्र हो गए।
कई सार्वजनिक वाहनों को आग लगा दी गई और पुलिस के साथ कुछ स्थानों पर झड़पें भी हुई।

स्थिति बिगड़ती देख राज्य सरकार को कोलकाता के संवेदनशील इलाक़ों में सेना तैनात करने का आदेश देना पड़ा। माइनॉरिटी फ़ोरम के लोग बांग्लादेश की लेखिका तस्लीमा नसरीन को भारत से तुरंत बाहर निकाले जाने की माँग कर रहे हैं।

लेफ्ट की सरकार ने तस्लीमा मामले पर विरोध को जिस तरह से तवज्जो दी है वही इस विवाद कि जड़ है।। तस्लीमा के लेखन से कट्टरपंथी लोगों को अपनी सच्चाई सामने आने कभी रहता है। इस कारन वे अबतक तस्लीमा कि लेखनी को इस्लामी समाज के लिए खतरा बताते आये हैं. अब जरुरी है कि भारत का बुद्धिजीवी तबका तस्लीमा के पक्ष में खुलकर सामने आये और तस्लीमा का यहाँ रहना सुनिश्चित कराये।

Wednesday, 21 November 2007

देवेगौडा ने लोकतंत्र को उसकी औकात बताई है

देवेगौडा और कुमारस्वामी की जोड़ी ने कर्णाटक के पिच पर जमकर बल्लेबाजी कि है। इस जोड़ी ने लोकतंत्र के नाम पर लंबे-लंबे भाषण देने वाले लोगों को उनकी औकात बता दी है। बाप-बेटे कि इस जोड़ी ने लोकतंत्र को ठीक उसी तरह उसकी औकाद बता दी है जैसे धोनी और युवराज कि अगुवाई में भारत कि युवा टीम ने २०-२० क्रिकेट को उसकी औकाद बता दी थी। जेदिएस ने पहले कांग्रेस के साथ सरकार बनाई फिर भाजपा से सत्ता बाँट लिया। कहा पहले २० माह हम सरकार चलाएंगे फिर अगले २० माह आप चलाना । अपने तक तो ठीक लेकिन जब भाजपा कि बारी आई तो कहा नही हम एक सांप्रदायिक पार्टी को सत्ता नहीं सौप सकते।

राज्य में केन्द्र ने राष्ट्रपति शासन लगा दिया। अचानक एक दिन कुमारस्वामी ने कहा कि हम भाजपा को बिना शर्त समर्थन देने जा रहे हैं। सब चौंके।। लगा कर्णाटक में लोकतंत्र कि जीत हो रही है। चिल-पो मचा इन लोगों ने राष्ट्रपति शासन हत्वा दिया। येदुरप्पा ने सत्ता संभाली। लेकिन सवाल उठा कि जेदिएस कि ओर से उपमुख्यमंत्री का पद कौन संभाले । सहमति नही बनी और येदुरप्पा ७ दिन में ही सत्ता से दूर हो गए। अब फिर दोनो पार्टियों ने एक दुसरे के खिलाफ तलवार निकल ली हैं। लेकिन मैं तो कहूँगा इस तमाशे को लगातार देखने वाले किसी गफलत में नहीं रहेंगे । चुनाव के पहले और बाद में कभी भी कोई भी पार्टी साथ आ सकती हैं और लोकतंत्र की ऐसी कि तैसी कर सकती है। आख़िर कर्णाटक में मुख्य खिलाडी पितामह देवेगौडा जी जो हैं। अपने बेटों के लिए तो वो कुछ भी कर सकते हैं, आख़िर वे अपने बेटों के बारे में नहीं सोचेंगे तो कौन सोचेंगे। वैसे ही देश में बेरोजगारी बहुत बढ़ गयी है।

क्या आप हिंदुत्व की नई कसौटी पर खरे उतरते हैं!

मुझे अपने हिन्दू होने पर गर्व है। मेरे विचार में ये अकेला धर्म है जो मुझे किसी काम के लिए रोकता नही। अगर कोई रोके भी तो ये मुझे ये कहने कि शक्ति देता है कि आप तो जाये भाड़ में। आप शायद इसे मेरा हिंदुत्व के प्रति लगाव कह सकते . लेकिन ब्रिटेन के एक विद्यालय द्वारा तय कि गई हिंदुत्व कि नई कसौटियों ने मेरे हिन्दू होने पर ही सवाल उठा दिया है। हालांकि उनके मानक उनके यह नामांकन के लिए तय किये गए हैं. लेकिन आख़िर में उनके मानक तो सारे हिन्दुओं पर लागू होते हैं. आप भी तो जाने हिन्दू होने के लिए उनके मानक क्या-क्या हैं.

अपने दाखिले के आवेदन प्रपत्र में हिंदुत्व की अनोखी परिभाषा देने वाले इस विद्यालय के अनुसार सिर्फ उन्हीं लोगों को हिंदू माना जाएगा जो हर दिन ईश्वर की पूजा करते है, मंदिर में धार्मिक कार्यो में शरीक होते है और मांसाहारी भोजन एवं धूम्रपान से दूर रहते है। लंदन के हैरो स्थित कृष्णा अवंती प्राथमिक विद्यालय ब्रिटेन का पहला हिंदू विद्यालय है जिसे सरकार की ओर से वित्तीय सहायता दी जाती है। हैरो ऐसा क्षेत्र है जहां ब्रिटेन की किसी भी अन्य काउंसिल की तुलना में सबसे अधिक हिंदू आबादी है। यहां कुल 40 हजार हिंदू आबादी बसती है।

सितंबर 2008 में छात्रों के पहले बैच के दाखिले के लिए आवेदन प्रपत्र में हिंदूत्व की एक नई परिभाषा दी गई है। विद्यालय प्रशासन के मुताबिक ऐसे लोगों को हिंदू कहलाने का अधिकार है जो हर दिन घर पर या मंदिर में ईश्वर की पूजा करते है। वे हिंदू ग्रंथों, विशेष तौर पर भगवद्गीता में बताए गए मार्गो का अनुसरण करते हों। हिंदू कहलाने के लिए यह भी आवश्यक है कि वे कम से कम हफ्ते में एक बार मंदिर के धार्मिक अनुष्ठानों में हिस्सा लेते हों। हिंदू कहलाने के लिए मांसाहारी भोजन, शराब, धूम्रपान से दूर रहना भी जरूरी है।

इस विद्यालय का प्रायोजक एक स्वतंत्र चैरिटी संस्थान आई-फाउंडेशन है। संस्थान के प्रवक्ता ने बताया कि ऐसा नहीं है कि जो लोग हिंदुत्व की इस परिभाषा पर खरे नहीं उतरते, उनके आवेदन पर ध्यान नहीं दिया जाएगा। केवल 30 सीटे होने की वजह से निश्चित तौर पर हम उन लोगों को वरीयता देंगे जो इन कसौटियों पर खरे उतरते है। उन्होंने कहा कि हिंदुत्व को परिभाषित करने के लिए इन मानदंडों को बनाना बिल्कुल सही है। ऐसा कर हम समझ सकते है कि कौन हिंदू धर्म को सही तरीके से अपना रहा है।

Saturday, 17 November 2007

सेक्सी और कामुक एक चीज़ नहीं!

टीवी पर एक खबर चल रही थी । खबर थी कि बिपासा बासु को 2007 की सबसे सेक्सी एशियाई महिला घोषित किया गया है। यह घोषणा लंदन स्थित अखबार ' ईस्टर्न आई ' ने की है। मेरे सामने मेरे दो मित्र बैठे थे, पेशे से पत्रकार, दोनों देश कि एक प्रमुख टीवी न्यूज़ चैनल के लोग। पहले कि सीधी प्रतिक्रिया थी कि अब सबसे सेक्सी भी चुना जाने लगा है। मैंने कहा इसमे गलत क्या है, ये तो किसी के व्यक्तित्व कि तारीफ़ है। मेरे दुसरे मित्र ने मुझे सेक्सी का मतलब समझाया। उनका कहना था भी साहब आपको जानना चाहिए कि सेक्सी का मतलब कामुक होता है। भला इस जवाब का मेरे पास क्या जवाब हो सकता था, मैं कुछ समझा भी नही सकता था।

खैर मेरे विचार में सेक्सी का मतलब ऐसा नही है। मेरे लिए इस वर्ड का मतलब व्यक्तित्व के बोल्डनेस से है.
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' ईस्टर्न आई ' कि सूचि देखिए: इस सूची में बॉलिवुड की लोकप्रिय अभिनेत्री माधुरी दीक्षित दूसरे और प्रियंका चोपड़ा तीसरे स्थान पर हैं। अखबार द्वारा जारी 10 प्रमुख सेक्सी महिलाओं की सूची में बिपाशा बसु , माधुरी दीक्षित , प्रियंका चोपड़ा , एश्वर्य राय , लैला , शिल्पा शेट्टी , कैटरीना कैफ , करीना कपूर , लारा दत्ता और इमान अली शामिल हैं। अखबार द्वारा वर्ष 2007 की सेक्सी महिलाओं की सूची में ब्रिटेन में जन्मी एशियाई महिलाओं में लैला ( 2 5 ) , अमृता हूंजान (20), शोफी (33) , पूजा शाह (36) और कोनी हक (40) शामिल हैं। गौरतलब है कि यह लगातार तीसरा वर्ष है जब ' ईस्टर्न आई ' अखबार ने एशिया की 50 सेक्सी महिलाओं की सूची जारी की है। वर्ष 2005 में भी इस अखबार ने बिपाशा को ही सबसे सेक्सी एशियाई महिला के खिताब से नवाजा!.......

Wednesday, 14 November 2007

अब... बुद्धदेब को कोई हिटलर क्यों नहीं कहता!

'जैसा किया वैसा ही पाया' नंदीग्राम में हो रही हिंसा पर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेब साहब का यही ताजा बयान है। याद करिये गुजरात दंगे का वक्त जब मोदी ने यही कहा था, सारे देश के तथाकथित विद्वानों ने मोदी को हिटलर कहा । कहाँ है आज वो सारे दिग्गज, वी आज बुद्धदेब को हिटलर के खिताब से क्यों नहीं नवाजते।

अब पढिये बुद्धदेब साहब का बयान. पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य ने नंदीग्राम में सीपीएम कार्यकर्ताओं का बचाव करते हुए कहा है कि उन्होंने जो किया वह उन पर की गई कार्रवाई का जवाब था। कोलकाता में एक पत्रकारवार्ता में उन्होंने कहा कि नंदीग्राम में पहले तृणमूल कांग्रेस के हथियारबंद कार्यकर्ताओं ने सीपीएम कार्यकर्ताओं पर हमले किए थे और उन्होंने 'जैसा किया था वैसा ही पाया'।

मुख्यमंत्री ने उल्टा केन्द्र को ही दोषी ठहराते हुए कहा कि यदि केंद्र सरकार नंदीग्राम में पहले ही केंद्रीय बल भेज देती तो यह सब नहीं होता। बुद्धदेब भट्टाचार्य का कहना है कि उन्होंने केंद्र सरकार से 27 अक्तूबर को सीआरपीएफ़ भेजने की माँग की थी जबकि सरकार ने 12 नवंबर को केंद्रीय बल भेजा.
उन्होंने कहा, "यह मेरी विफलता नहीं है, अगर केंद्र सरकार समय पर जवान भेज देती तो हम इस स्थिति को टाल सकते थे.