कहते हैं भारत विविधताओं से भरा देश है, विविध लोग...विविध नज़ारे और विविध प्रकार की बातें.....हर बार जिंदगी का नया रूप और नई तस्वीर....लेकिन सब कुछ हमारी अपनी जिंदगी का हिस्सा...इसलिए बिल्कुल बिंदास...
Tuesday, 5 May 2009
चुनावी मैदान से सकुशल पीछे हटने की कला...
एक हफ्ते बाद वापस आकर अपने वचन के अनुसार मैंने उन्हें सूचना देने के लिए फोन किया कि मैं वापस आ गया हूँ और अब आपको समय दे सकता हूँ। उनकी भाषा बदली हुई थी और उन्होंने तुंरत खुशखबरी सुनाई- भाई मैंने इलाके के हित के लिए चुनाव से अपना नाम वापस ले लिया है। मैंने कहा फिर क्या करना है. उनका जवाब था कि भाई मैंने फलाना पार्टी के लिए चुनाव प्रचार शुरू कर दिया है. इसके साथ ही उन भाई साहब ने नयी पार्टी जो कि उनके पहले वाले दल की विचार के स्तर पर पूरी तरह विरोधी थी की जमकर तारीफ शुरू कर दी. इतना ही नहीं जल्द ही उनके जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन भी दिखने लगे। जब मैं उनके घर पहुंचा तो उनके घर में रंग-रोगन का काम लगा हुआ था और भाई साहब का जोश दुगुना-चौगुना दिख रहा था। कल तक एक-एक पैसे के लिए रोने वाले भाई साहब ने अपना आगे का आईडिया सुना डाला. भाई साहब जल्द ही व्यापर शुरू करने वाले थे और इस बार उन्होंने किसी संभावित फाइनेंसर का नाम लिए बिना व्यापार की अपनी योजना सुना डाली. हैरानी में मैं उनके चेहरे को ताक रहा था. आखिर चुनाव में खडा होने और फिर बैठ जाने के दौरान इतनी ताकत कहाँ से आ गयी इनमें. हमें छोड़ने के लिए वे मोहल्ले में निकले और लोगों से अपनी नयी पार्टी के बारे में उसी अंदाज से बात करते जा रहे थे जैसे १० दिन पहले पिछली पार्टी के बारे में करते उन्हें देखा था. उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी. मैंने इसका कारण पूछा तो उन्होंने फिर साफगोई के साथ कहा- तुम नहीं समझोगे यही राजनीति है॥
धीरे से कहे हुए उनके ये शब्द मेरे कानों में गूंज रहे थे...मेरे लिए ये भी एक नया राजनीतिक ज्ञान था.
Sunday, 3 May 2009
राजनीति में ईमानदारी और खर्चे का झमेला!
मुझे याद है जब २ साल पहले मेरे गाँव में ग्राम प्रधान और ब्लाक प्रमुख के चुनाव हुए थे। तब उम्मीदवारों के घर में जैसे मेला लगा रहता था. आम दिनों में घर के आस-पास तक न फटकने वाले इलाके के लोग उनके आगे-पीछे ऐसे दिखने लगे थे जैसे उनसे कई पुश्तों की रिश्तेदारी हो. पडोसी होने के कारण हर गतिविधि पर नज़र हमेशा बनी रहती थी. तब उनके घर से आने वाली मीट और मशाले की खुशबु मुंह में पानी भर दिया करती थी. तब रोज सुबह उठकर दोनों घरो के बीच स्थित गढ्ढे में झांकना मैं नहीं भूलता था. देशी विदेशी शराब के खाली बोतल ऐसे पड़े रहते थे जैसे दीपावली के बाद पटाखों के कागज के टुकडे. शाम में जैसे ही अँधेरा होता लोग गमछे में कुछ छिपाकर ले जाते हुए दिखने लगते. दादाजी से पूछने पर पता चला लोग इन दिनों मुफ्त के मदिरे का जमकर लुत्फ़ उठा रहे हैं. दादाजी ने एक को रोक कर पूछा था भाई रोज खाने के समय से लेकर शाम तक यहीं दिख रहे हो वोट तो इन्हें दोगे न. ये जानकार कि हम ये बात हम किसी को नहीं बताएँगे उस आदमी ने धीरे से कहा---काहेका जब तक जहाँ से जो मिल रहा है ले लो. फिर कौन देखता है किसे वोट दिया. दुसरे उम्मीदवार के पीछे मिठाई के दुकान के बाहर क्या लाइन लगती थी. मिठाई वाले ने पूछने पर बताया था नेता जी ने कहा है चुनाव के दिन तक खाता चलाओ जिन्हें मैं कहूँ उन्हें ही देना और जिनके लिए कहने के बाद ना का इशारा करूँ उन्हें टरका देना. जनता भी कम चालाक नहीं है चुनाव हुआ और चालक जनता ने फिर इन दोनों नेता जी लोगों को टरका दिया. बाहरी उम्मीदवार जीत गया और दोनों की सारी उम्मीदें धरी की धरी रह गयी. निचले स्तर का चुनाव था दोनों ने जमकर पैसे लुटाये थे. इस उम्मीद में कि जीतने पर सारा वसूल लेंगे.
Wednesday, 29 April 2009
मोबाइल हो गयी अपनी राजनीति!
राजनीतिक चीयरलीडर्स...
राजनीतिक प्रचार के तरीके लगातार बदल रहे हैं. जब से चुनाव और आईपीएल साथ-साथ शुरू हुए हैं सब जगह चीयरलीडर्स दिखाई दे रहे हैं. वैसे आईपीएल में इसका कांसेप्ट नया-नया है लेकिन अपने यहाँ राजनीति में इसका क्रेज बहुत पुराना है. पहले भी चुनावों के वक्त भीड़ खिंचने के लिए फ़िल्मी सितारों और खिलाड़ियों को मंच पर लाया जाता रहा है. कई बार चुनावों में टिकट लेकर ये सितारे संसद और विधानसभाओं तक पहुँचते रहे. हालांकि पिछले कुछ सालों में जिन क्षेत्रों के लोगों ने अभिनेताओं और अभिनेत्रियों की चमक-दमक में आकर इन्हें चुनकर संसद भेजा उन्हें पछताना पड़ा. इनमें से केवल कुछ ही राजनीति में खुद को पूरी तरह से शामिल कर सकें हैं.बाकी कईयों को तो दुबारा चुनने की जहमत उठाने को लोग तैयार नहीं हैं...
Sunday, 26 April 2009
बूझो तो जाने: किसने तोड़ा बाबरी मस्जिद!
आम आदमी के सामने इतने सारे जवाब और जवाब देनेवाला हर इंसान देश का जाना-माना चेहरा. किसपर भरोसा करें और किसे झूठा माने. इतने सारे कन्फ्यूजन के बीच घिरा भारत का आम आदमी करीब २ दशकों से जवाब तलाश रहा है. इतने में पूरी एक पीढ़ी बदलने को आ गई. पुरानी पीढ़ी इसका जवाब नहीं पा सकी नई पीढ़ी को यही सवाल बार-बार सुनाया जा रहा है ताकि भूल न सके. जिसे भी जिम्मेदार समझो लेकिन याद रखो जरूर. इस पाले में रहोगे या उस पाले में काम तो आओगे न...
Friday, 24 April 2009
वोटर न हुआ जैसे कोई बड़ा अपराध कर डाला!
सुबह जैसे ही टीवी खोला उस पर एक ऐड चल रहा था "जो वोट देने नहीं जायेगा वो पप्पू कहलायेगा"। मेरे भतीजे ने पूछा चाचा आप वोट देने जा रहे हो कि नहीं. मेरे नहीं कहते ही वो बोल पड़ा आज से हम आपको पप्पू कहेंगे. उसकी खुश होती मुद्रा से डर-कर मैंने फैसला किया कि चाहे जितनी भी मुसीबतों का सामना करना पड़े वोट डालने जरूर जाऊंगा. रोज-रोज पप्पू के नाम पर जलील होने से तो अच्छा है एक दिन मेहनत कर ही ली जाये. लेकिन वोट डालने जाने से पहले सोचा कि टीवी समाचारों में जरा बाहर के माहौल का पता तो कर लिया जाये. चैनल बदलते ही देखा समाचारवाचक चीख रहा था और बता रहा था कि फलाना राज्य में नक्सलियों ने सुरक्षाकर्मियों पर हमले किये और कइयो को मार डाला. मतलब जिन सुरक्षाकर्मियों को वोटरों कि सुरक्षा के लिए बुलाया गया था वही सुरक्षाकर्मी नक्सली हिंसा के शिकार हुए. किसी महान आदमी ने कहा था कि एक वोटर ही वोटर का दर्द समझ सकता है. तुंरत मेरे दिमाग में उस इलाके के वोटर का दर्द उभर आया. क्या इतनी बड़ी खबर के बाद उस इलाके का वोटर मतदान केंद्र तक जाने कि हिम्मत करेगा. पिछले कुछ समय से नक्सलियों द्वारा जारी चेतावनी को तो वो सुरक्षाकर्मियों का चेहरा देखकर टाल गया था लेकिन अब जब उनका विकराल रूप सामने दिख गया है तो कौन मां अपने बेटे को, कौन पत्नी अपने पति को और कौन सी बहन अपने भाई को लोकतंत्र के इस महापर्व में आहुति देने के लिए भेजेगी.
ऐसे ही अचानक जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य के लोगों का चेहरा भी दिमाग में घूम गया। अब समझ में आया कि वहां के लोग किस मानसिकता में जी रहे होंगे. अगर वे वोट देने न जाये तो सुरक्षाकर्मी उन्हें अलगाववादी समझ बैठते होंगे और अगर देने जाए तो आतंकी उन्हें अपना दुश्मन मां बैठते हैं. अब बताइए बेचारा वोटर न घर का रहा न घाट का. इतना ही नहीं देश के अन्य हिस्सों में भी कहानी ऐसी ही है. अगर आपने मतदान में हिस्सा लिया और बाहुबली भाई लोग को खबर लग गयी कि फलाना गाँव के लोग मेरे विरोध में मतदान किये थे. बस क्या चुनचुन कर निशाना बनते हैं बेचारे वोटर.
ये सारे नज़ारे दिमाग में घूमते ही फिर मन में एक डर बैठ गया, वोट करने जाऊँ या नहीं। एक तरफ लोकतंत्र के सबसे बड़े पहरुए लोगों का डर मन में समाया हुआ था तो दूसरी तरफ पप्पू के नाम से विख्यात होने का भय. समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ. अब खुद के १८ साल का होने पर अफ़सोस होने था कि अच्छा था हम वोटर लिस्ट में शामिल ही नहीं थे. कम से कम कह तो सकते थे कि अभी १८ साल के हुए ही नहीं हैं. घर से बाहर निकलते ही पडोसी ने पूछा अरे भाई साहब किसे वोट दे रहे हो इस बार. मन में अचानक एक डर समां गया पता नहीं किस पार्टी से जुडा है. कहीं विरोधी पार्टी का नाम ले लिया और इसने जाकर बता दिया तो पता नहीं क्या होगा. मैंने मामले को संभालते हुए झट से कह दिया अरे नहीं तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही थी दावा लेने जा रहा हूँ...और तेज कदम वापस घर की ओर हो लिए...मन में ख़ुशी थी चलो जान बची...
Monday, 13 April 2009
लेटेस्ट मोर्चा और देश का फ्यूचर!
दल नंबर एक-
चुनाव चिन्ह लालटेन। नारा समाजवाद का. सबको साथ लेकर चलने का. हालाँकि पहले के नारों में स्वर्ण जाति के लोग निशाना बनते रहे हैं. जाति-वाद और सांप्रदायिक रणनीति के हिसाब-किताब पर इस दल ने एक राज्य में करीब १५ साल तक राज्य किया. जब विकास के सभी आंकडों पर राज्य सबसे नीचे दिखने लगा तो उसके लिए भी इसी दल को जिम्मेदार ठहराया गया. चुनाव चिन्ह लालटेन के साथ १५ साल के शासन में राज्य अँधेरे में ही डूबा रहा और जगमगाती बिजली का सपना संजोये राज्य की जनता ने इसे राज्य की सत्ता से बेदखल कर दिया. बाद में दल के सुप्रीमो ने केन्द्रीय मंत्री के नाते अपनी छवि सुधारी और फिर इसी बदली हुई इमेज के बल पर इस चुनावी समर में उतरे हैं. गठबंधन के ज़माने में एकला चलो का कोई मतलब नहीं देख फ़िलहाल इस लेटेस्ट गठबंधन की नाव पर सवारी शुरू की है.
दल नंबर दो-
चुनाव चिन्ह झोपडी। जातीय समीकरण के बल पर कुछ सीटें लगातार जीतते रहे और केंद्र में बनी हर सरकार में मंत्रीपद का जुगाड़ होता रहा. जीतने वाले अधिकांश सांसद या तो दलप्रमुख के खानदान के रहे या फिर बाहुबली. विधानसभा चुनाव के दौरान मुस्लिम मुख्यमंत्री देने का वादा कर कई सीट जीतने में कामयाब रहे. लेकिन अपना आकलन करने में भ्रमित हो ये कहते घूमते रहे कि सरकार बनाने की चाभी मेरे पास है और मेरे बिना कुछ हो ही नहीं सकता. इसी जिद में राज्य को एक साल के अन्दर दूसरे चुनाव का दर्शन कराया. अगले चुनाव में जनता ने पूछा ही नहीं और भावः कम हो गया. लेकिन आत्मविश्वास डिगने का नाम नहीं ले रहा और इस चुनाव में झोपडी के साए में फिर मैदान में हैं. सफ़र में मन लगे इसलिए लेटेस्ट गठबंधन का दामन थामा है.
दल नंबर तीन-
तकनीकी क्रांति के दौर में बने इस लेटेस्ट गठबंधन में शामिल इस दल का चुनाव चिन्ह साइकिल है। जमीनी राजनीति, जातीय समीकरण और सांप्रदायिक झुकाव के दम पर देश के सबसे बड़े राज्य में हमेशा राजनीतिक दबंगता बनी रही. जमीनी राजनीति के बाद इस दल को उद्योगपतियों के साथ जुगलबंदी के कारण आलोचना का सामना करते रहना पड़ा. हाल ही में इस दल ने अपना मेनिफेस्टो जारी किया. भविष्य के लिए इस दल का अजेंडा जरा सुनिए. चुनाव चिन्ह साइकिल है ही. सत्ता में आने पर ये दल अंग्रेजी भाषा और कम्प्यूटर पर बंदिश लगा देगी. इतना ही नहीं सत्ता में आने पर वायदा कारोबार, शेयर कारोबार और मॉल कल्चर पर भी अंकुश लगाया जाएगा।
लोकतंत्र की परिपक्वता और २१वी सदी में जीने की दुहाई देते अपने देश का भविष्य क्या होगा- लालटेन...झोपड़ी और साइकिल. साथ में देश से अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा भी हटा दीजिये और कंप्यूटर को तो भूल ही जाईये. साथ में शेयर कारोबार और मॉल जैसी चीजों को भी भुला दीजिये. लो अब बन गया न आपके सपनो का भारत...जाइए एन्जॉय कीजिये.
Saturday, 11 April 2009
ऐसी चुनावी नौटंकीबाजी के लायक ही हैं हम...
हाँ तो हम फिर उस नज़ारे पर आते हैं जब इसे मंच पर माइक पकड़ा दिया जाता है। शख्स माइक लेता है और लोगों की सहानुभूति लेने के अंदाज में शुरू होता है. कहता है- मैंने टाडा कानून का दर्द झेला है. मुझपर जो आरोप लगाये गए हैं गलत हैं. मुझसे जबरन आरोप कबूलवाया गया, मारपीट कर. टाडा और पोटा जैसे कानून हटा देने चाहिए. सामने खड़ी जनता हो-हो करती है. नारे लगाती है. भीड़ चिल्लाती हैं--मुन्ना भाई जादू की झप्पी दे दो. मंच से आवाज आती है पहले हमें चुनाव में जिताओ और दिल्ली पहुचाओ फिर जादू की झप्पी मिलेगी. भीड़ फिर चिल्लाती है मुन्नाभाई जिंदाबाद...पार्टी जिंदाबाद...वगैरह...वगैरह.
राजनीति को फ़िल्मी नौटंकी बनाती इस भीड़ में कौन शामिल है. हम-आप और कौन. ऐसी भीड़ देश में रोज हो रही सैकडों रैलियों में शामिल है. पार्टियों के बैनर-पोस्टर से सजी यह भीड़ लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहरुआ मानी जा रही है. गाड़ियों में भर-भरकर यह भीड़ एक शहर से दूसरे शहर में, एक राज्य से दूसरे राज्य में लाई जा रही है. महीने भर के इस महापर्व में जाने भीड़ में शामिल कितने लोगों का गला बैठ जायेगा. चुनाव ख़त्म होगी, नयी सरकार बनेगी फिर यह भीड़ भी चैन की सांस ले सकेगी. लेकिन अपने नेताओं की शान में कशीदे पढने और नारा लगाने की आदत लगा चुकी यह भीड़ कब तक चुप रहेगी. फिर जीतने के बाद जब यह नेता लोग अपने इलाके में पहुचेंगे तो उनके स्वागत कार्यक्रम में नारा लगाने के लिए यह भीड़ फिर से एक-जूट हो जायेगी. अपने बैठे हुए गले को तर करके फिर से भीड़ जीवंत हो सकेगी और लोकतंत्र की रक्षा के नारे लगा सकेगी...
Thursday, 9 April 2009
जूता क्या... नए ज़माने का हथियार कहिये इसे...
जैसा कि हम अक्सर सुनते हैं कि पुरानी शैली के कपडे कुछ समय बाद फिर फैशन में आते हैं उसी तरह से जूते का फैशन भी फिर से लौट आया है। इसका श्रेय जाता है इराकी पत्रकार मुंतजर अल जैदी को. बम-गोलों-मिसाइलों की मार झेलकर टूट-फूट चुके इराक के नागरिक जैदी(नागरिक के आलावा पत्रकार भी लेकिन वो बाद में) ने जूते को अपना हथियार बनाकर अमेरिका पर प्रहार किया और भरी सभा में अमेरिकी राष्ट्रपति बुश के मुंह पर जूता दे मारा. जैदी के साथ जो हुआ वो हुआ लेकिन पूरी दुनिया ने अमेरिका को जूता खाते देखा. अधिकांश लोगों के लिए ये मौका काफी खास रहा. चीनी राष्ट्रपति बेन जियाबवो के ऊपर (कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में) जूता भी जल्दी चल गया. लेकिन सहनशील भारत में जूता इतनी जल्दी चलेगा इसकी उम्मीद किसी ने नहीं की थी.
१९८४ में हुए दंगों की टीस को यहाँ की सिख बिरादरी अभी तक नहीं भूली है और न्याय की आस अब भी उसके मन में जिन्दा है इसका संकेत दिया एक सिख पत्रकार जरनैल सिंह ने. जरनैल सिंह ने साबित किया कि वो पत्रकार हैं लेकिन उसके पहले एक इन्सान है जो अच्छे-बुरे को महसूस करता है और शरीर पर लगे जख्म उसके दिल में भी दर्द पहुचाते हैं. पत्रकार वार्ता के दौरान जरनैल ने गृह मंत्री के ऊपर जूता उछाल दिया. जरनैल का कहना था कि सत्ताधारी दल ने १९८४ दंगों में शामिल अपने नेताओं को बचाने के लिए सीबीआई का इस्तेमाल किया है और पीडितों को न्याय मिलना चाहिए. जरनैल का जूता ऐसा तगड़ा लगा कि देश भर में सिख बिरादरी न्याय के लिए सड़कों पर आ गयी और वोट बैंक की चिंता में पार्टी को अपने इन दोनों नेताओं को लोकसभा चुनाव से हटानी पड़ी...कहते हैं न कि आम आदमी बोलता नहीं है और जब बोलता है तो जमकर बोलता है...जैदी और जरनैल के रूप में आम आदमी बोला और बोला तो ऐसा बोला कि अब तक बोलते रहने वालों की बोलती बंद हो गयी.
Sunday, 29 March 2009
किसी की जय हो तो किसी की भय हो...
Friday, 27 March 2009
तस्लिमा के आने से कौन भड़क सकता है?
अब हाल ही में हुए कुछ राजनीतिक गठजोड़ पर गौर फरमाए. देश के सत्ताधारी दल ने कल ही एक ऐसे दल के साथ चुनावी गठजोड़ किया जिसने पिछले साल जॉर्ज बुश के सर पर करोडों का इनाम घोषित किया था. देश के विपक्षी दल के नेता उस नौजवान के पक्ष में गोलबंदी के लिए लालायित दिख रहे है जिसे कल तक कोई राजनीति में गंभीरता से नहीं ले रहा था और आज एक संप्रदाय विशेष के खिलाफ भड़काऊं बयान देकर वो रातो-रात हीरो बन गया है. जबसे चुनाव का माहौल बना है अल्पसंख्यक जमात के नेताओं को(कई तो बस अल्पसंख्यक दिखने भर की योग्यता रखते हैं) सभी दलों के नेता प्रेस कांफेरेंस के दौरान अपने बगल में बैठाते हैं. राजनीति में शामिल ऐसे ही धाकड़ राजनीतिज्ञों और देश का भविष्य सुधारने(शायद!) के काम में जुड़े महान लोगों को चिंता है कि कहीं तस्लिमा जैसे बेबाक लोग आकर उनके रंग में भंग न डाल दे. वे इतनी मेहनत से, इतनी तिकरम से लोगों को अपने से जोड़ रहे हैं लेकिन अब कोई आकर उनका काम ख़राब कर दे तो अखरेगा ही...इसलिए समय रहते ही कदम उठा लिया गया.
कुछ शब्द मां के लिए...
जब भी मेरे पांव जवाब देने को होते है,
उखड़ने को होती है मेरी साँसे
जब सो जाना चाहता हूँ मैं भी
वक्त के निर्मम छाँव में...
तभी मेरे जेहन में आ बसता है
उस मां का चेहरा
जिसकी उम्मीदों और अपेक्षाओं का
आखिरी सिरा जुड़ा है मुझसे...
घर से निकलते वक्त
उम्मीद और आकाँक्षाओं से भरी
मुझे निहारती मां की आँखे...
और बाहर से सकुशल लौट आने की
उसकी हिदायते भी...
शायद ऐसे ही
हर किसी की जिंदगी में होता है
स्थान--- मां का...
और शायद ऐसी ही होती है
उसकी छाया....।
Thursday, 26 March 2009
जो पप्पू नहीं उन्हीं की देन है ये लोकतंत्र...
हम-आप में से कई लोग अपने वोट का इस्तेमाल करते ही हैं... और शायद जम्मू-कश्मीर के लोग इस काम में सबसे हिम्मत का प्रदर्शन करते हैं वहां के जो लोग पप्पू कहलाना पसंद नहीं करते उन्हें बम-गोलों का भी सामना करना पड़ता है। शायद हमारे जैसे लोगों के कारण ही पिछले ५० सालों से भारतीय लोकतंत्र की गाड़ी चल रही है. लेकिन कई अच्छाईयों के साथ-साथ हमारे लोकतंत्र का एक बदरंग चेहरा भी है. जो लोग खुद को पप्पू न कहला पाने के मुगालते में जी रहे है उन्ही के कारण संसद और विधानसभा दागी छवि वाले इंसानों, अपराधियों, हत्यारों और अन्य अवांछित लोगों का सबसे सुरक्षित अड्डा बना हुआ है. अगर इन्हें गैर-पप्पू लोगों ने नहीं चुना है तो किसने चुना है. कोई अपराधी किसी एक के वोट से सांसद-विधायक नहीं चुना जाता. बल्कि कई-एक लाख लोग मिलकर किसी माननीय को चुनते हैं और अगर ऐसे लोग चुने जाते है तो हमारे समाज और उसके सभ्य होने के हमारे मुगालते पर एक करारा तमाचा है.
मैं बिहार प्रान्त से आता हूँ। जब मैं वोट देने का अधिकार नहीं रखता था तब से देख रहा हूँ अपने यहाँ की लोकतांत्रिक व्यवस्था को. मैंने बूथ कैप्चरिंग का दौर भी देखा है. तब वोट मत-पत्रों से डलते थे. उस दौर में मेरे गाँव में चुनाव के दिन शाम को जो भी मिलता अपनी बहादुरी के किस्से सुनाता. मसलन आज दिन में उसने किस तरह से मतदानकर्मियों को उल्लू बनाया और किस चालाकी से वह कई बार वोट डालने में कामयाब हुआ. फिर समय बदला और तकनीक ने हम सभी लोगों को एक मौका दिया है पप्पू बन जाने का. ये भी एक सच्चाई है कि अगर हम व्यवस्था से दूर भागेंगे तो बदलाव कैसे आयेगा लेकिन जो चीज पूरा देश देख रहा है उसे क्या रोका जा सका है. अभी हाल ही में देश की संसद में सरकार बचाने को लेकर पैसे बाँटने(करोड़ो में) का किस्सा सबने देखा, संसद में नोट के बण्डल लहराते भी सबने देखा तो क्या. क्या वे सारे लोग चुनावी परिदृश्य से गायब हो गए. नहीं....
सच्चाई ये है कि हम भले ही पप्पू न कहलाने के मुगालते में रहें लेकिन बदलाव कुछ नहीं आने वाला. अगर ऐसा होता तो चुनाव के दौर में शराब की बिक्री इतनी नहीं बढती और प्रशासन को शराब बाँटने वाले लोगों पर शिकंजा कसने के लिए कसरत नहीं करनी पड़ती. लोगों का मत शराब के पौवे पर तय नहीं होता और अगर हम वाकई सुधरने के लायक होते तो हमारा नेतृत्व और उसकी मांग करने चुनाव में उतरने से पहले लोग कई बार सोचते.हम ये तय भी करते कि हमारा भविष्य तय करने वाला पढ़ा-लिखा भी होना चाहिए और योग्य भी होना चाहिए. हम उसकी जवाबदेही भी तय करते और उससे सवाल करने की हिम्मत भी रखते. और फिर तब हमें पप्पू कहलाने में शर्म भी आती और पप्पू कहलाने से बचने के लिए मतदान केन्द्रों तक पहुचना हमारी मजबूरी भी होती. लेकिन अभी के हालात में अगर हम पप्पू हैं तो कोई बुरे नहीं है...
Saturday, 14 March 2009
वादे पे यकीं करो...तो सभी गरीबों को स्मार्ट फोन मिलेगा!
चुनावी समर में उतरने के बाद अब सबका ध्यान जीत पर है... सभी दल बड़े-बड़े वादे कर रहे हैं। आज भाजपा के पीएम इन वेटिंग आडवाणी जी ने अपना चुनावी घोषणापत्र जारी किया...इसके मुख्य वादे है कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आई तो गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले सभी लोगों को स्मार्ट फोन दिए जायेंगे, सबको रोजगार मुहैया कराया जायेगा, हर स्कूल में इन्टरनेट शिक्षा दी जायेगी और हर भारतीय का बैंक खाता खोला जायेगा। क्या मान लें कि अब भारत से गरीबी के दिन लदने वाले हैं. अगर वाकई में ऐसा हो गया तो फिर विश्व बैंक और तमाम बड़े संगठन और गरीबी को लेकर लगातार अपना आकलन दे रहे विश्लेषक किस काम के रह जायेंगे.
अब आप ही सोचो कि अगर देश के हर गरीब(यूँ कहें कि जिनके पास नहीं है...वैसे इससे भी ज्यादातर वही लोग लाभान्वित होंगे जो वास्तव में गरीब नहीं होंगे) को स्मार्ट फोन पकडा दिया जाये। सोचो कि पूरा देश मोबाइल हो जायेगा। कितनी तेजी से लोग अपना काम कर पाएंगे और देश कितनी तेजी से तरक्की कर पायेगा। वैसे देश के दक्षिणी राज्यों में राजनीतिक पार्टियाँ चुनाव के वक्त जनता से वादा करती रही है कि जीतने के बाद टीवी वगैरह देंगे. जहाँ तक देश के सभी लोगों को रोजगार देने की बात है तो ये काम हमारे देश की वर्तमान सरकार के वादों के खटोले में भी है. सच कहें तो रोजगार गारंटी योजना के तहत भी हर ग्रामीण नागरिक को रोजगार देना है जो मेहनत-मजदूरी करने को तैयार हो. इसमें प्रावधान है कि अगर रोजगार नहीं दिया जा सका तो भत्ता मिलेगा. लेकिन इस नए घोषणापत्र की परिधि में देश का हर नागरिक है. चाहे वो ग्रामीण हो या शहरी ये नयी सरकार सबको रोजगार देगी॥ अब ये कैसे होगा ये बता पाना मुश्किल है. जहाँ तक बैंक खाता खोलने की बात है तो रोजगार गारंटी योजना में भी ऐसा प्रावधान है कि सभी के खाते खुले और उनकी मजदूरी उसी खाते में भेजी जाये. अब ये राशिः सही तरीके से कितनो को मिल पाती है ये कहा नहीं जा सकता.
सरकार में आने की चाह में भाजपा ने वादा किया है कि देश के सभी स्कूलों में इन्टरनेट शिक्षा प्रदान की जायेगी। अगर सच में ऐसा हो जाये तो शहर तो शहर गाँव के लोग भी ग्लोबल विलेज में शामिल हो जायेंगे और बाकि दुनिया से कदम से कदम मिलाकर चल सकेंगे. लेकिन इस सपने के पहले इस बात का भी ध्यान होना चाहिए कि हमारे अधिकांश गांवों में आज भी कभी-कभार ही बिजली आती है और आज भी हमारे गाँव लालटेन युग में ही जी रहे हैं.
चुनाव के वक्त राजनीतिक बिरादरी के वादों को सुनकर ठहाका लगाना और उसका उपहास उडाने का वक्त अब गया। क्या हमें इन वादों को ध्यान से सुनना नहीं चाहिए और फ़िर अपने द्वारा चुनी हुई सरकार से उन वादों को पूरा नहीं करवाना चाहिए। अगर अब भी हम ऐसा नहीं करवा सके तो फ़िर वैसे ही ये वादे भी उसी तरह हवा होते रहेंगे जैसे पिछले ६ दशकों से होते रहे हैं...
चुनावी मौसम में सब अपनी जगह फिट हो रहे हैं...
चुनावी लड़ाई में उतरने से पहले सभी दल तैयारी में लगे हुए हैं॥ जैसा कि सब कह रहे हैं और लोकतंत्र की हमारी किताब में भी लिखा हुआ है-- इन सबका मकसद आम जानता की भलाई और उनका हित करना है...अब आइये देखते हैं क्या तरीका अपना रहे हैं सब राजनीतिक दल जानता के दिल में अपनी जगह बनाने के लिए...दलों ने लोकप्रिय हुए गानों कि धुन खरीद ली है..प्रचार के दौरान उनके दल के नारों के साथ वो धुन बजेगा और उनका अभियान भी इन हिट गानों की तरह हिट हो जायेगा... लोकप्रिय फ़िल्मी कलाकारों और छक्का-चौका जड़ने वाले क्रिकेटरों को अपने से जोड़ने के लिए तमाम प्रयास हो रहे हैं। कई फ़िल्मी सितारों को मैदान में उतारा गया है और फिल्मों में उनके द्वारा निभाई गयी भूमिका को आधार बनाकर वोट मांगे जा रहे हैं. बिहार की सड़कों को ड्रीमगर्ल के गालों की मानिंद चमका देने का आश्वासन देने वाली हमारी राजनीतिक बिरादरी ने भाई को गांधीगिरी के काम पर लगा दिया है. गाँधीजी के द्वारा उपयोग किये गए चप्पल..कटोरे आदि सामान को राष्ट्रिय अस्मिता वाली चीज बताने वाली राजनीतिक बिरादरी अब उसकी कोई कोई सुध लेने को व्याकुल नहीं दिखती...कोई भारतीय अगर उसे नहीं खरीद लता तो ये भी एक चुनावी मुद्दा बना दिया जाता...गाँधी से बड़ा बिकाऊ राजनीतिक मसला अपने देश में और क्या मिल सकता था..वो तो कहो की किसी भारतीय ने नीलामी में इसे खरीदकर इसे राजनीतिक मसला बनने से बचा लिया...
इस चुनाव में एक नया शब्द मिला है--पीएम इन वेटिंग... सबके अपने-अपने प्रधानमंत्री हैं. हर दल के पास प्रधानमंत्री पद के लिए अपना एक उम्मीदवार है, और हर दल किसी गठबंधन से जुड़ा हुआ है..हर दल का पीएम अपने गठबंधन पर दबाव बना रहा है कि उसे गठबंधन की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया जाये. इसमें कुछ गलत भी नहीं है..अनिश्चितता के इस दौर में कब किसकी लौटरी लग जाये कुछ कहा नहीं जा सकता इसलिए पार्टी वालों के आलावा निर्दलियों के भी अपने पीएम इन वेटिंग होंगे..भले ही उन्होंने अभी अपना प्लान मन में ही रखा है...सब अपनी जगह पर हैं और जो गलत जगहों पर फंसे हुए हैं उनका भी जी-तोड़ प्रयास यही है कि जैसे भी हो अपनी मुक्कमल जगह हासिल की जाये...वैसे भी लोकतंत्र में सबको अपनी जगह हासिल होनी चाहिए..तभी जाकर लोकतंत्र अपने मानदंडो पर खरा उतर पायेगा..
Sunday, 8 March 2009
कौन कहता है कि गाँव वहीँ ठहरे हुए हैं?
गाँव के चौक पर दुकानों की कतारों के आखिर में कुछ दुकानों देखी। पता किया वहां देसी-विदेशी दारु मिलती है. तार के पेड़ से निकलने वाली ताड़ी भी कई जगह सजी थी. इसे बेचने वालों के पास दुकाने नहीं हैं वे खुले में बेचते हैं. ये दारु का खर्च न उठा सकने वालों का पसंदीदा पेय है, कई बार लोग टेस्ट बदलने के लिए इसे चखते हैं. लेकिन ऐसा नहीं हैं कि केवल यही पसंदीदा है. दुकानों में कोल्ड ड्रिंक्स भी खूब बिक रहे थे और बच्चों को हर ब्रांड की खबर भी है. हाँ दूध मिलना जरूर कम हो गया है. बचपन में हर घर में गाय-भैंश होते थे, अब इक्का-दुक्का घरो में ही दीखते हैं. लोगों को ग्वाले द्वारा लाये गए दूध पर भरोसा नहीं है और बच्चे उसमें होर्लिक्स मिला कर पी रहे हैं और तंदुरुस्त होने के सपने के साथ जवानी की ओर बढ़ रहे हैं.
मेरे साथ मेरे गाँव का समाज भी जवान हो गया है. बचपन में देखे हुए अधिकांश परिवार टूट चुके हैं. लगभग हर परिवार में नई पीढी ने कमान संभाल ली है. लोग जागरूक हो गए हैं. पीठ पर झोला लादकर स्कूल जाते बच्चे अब भी दीखते हैं लेकिन बहुत सारे बच्चों के पीठ पर झोले की जगह स्कूल बैग ने ले लिया है. स्कूली बच्चे बोरे से उठकर बेंच पर आ गए हैं. बच्चे धुले हुए स्कूल ड्रेस पर टाई लगाकर जाने लगे हैं. मिटटी के घडों की जगह पक्के माकन दिखने लगे हैं हालाँकि अभी भी गाँव के बाहरी इलाकों में बसे काफिघर मिटटी के ही हैं और हर साल बरसात के बाद लिपे जाते हैं. खेती में भी बड़ा बदलाव आ गया है. बैल नहीं दीखते और उनकी जगह ट्रैक्टर और अन्य मशीनों ने ले लिया है. शहर की तरह गाँव में भी क्रिकेट ने गहरी पैठ बनायीं है. बच्चे बर्थडे पर बैट गिफ्ट मांगने लगे हैं और अपने प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री-राष्ट्रपति के नाम उन्हें याद हो न हो देशी-विदेशी क्रिकेट खिलाडियों के नाम उन्हें जरूर याद हैं...ये पिछले एक दशक में आया हुआ परिवर्तन है और अब शायद मैं ये कहने के पहले कई बार सोचूंगा कि गाँव बदलाव की बयार से अछूते हैं और वहीँ के वहीँ रह गए हैं.
Sunday, 1 February 2009
हमारे तालिबान.उनके तालिबान...
जहाँ तक मुझे याद है तो ये शब्द मुझे सबसे पहले अफगानिस्तान के सन्दर्भ में सुनने को मिला था। वहां दशकों तक चले सत्ता संघर्ष में विजेता के रूप में कुछ नकाबपोश लोग दिखने लगें। जैसा कि मैंने सुना और ख़बरों में पढ़ा उन्होंने पूरी सभ्यता को बंधक बना लिया. इसके बाद पाकिस्तान में भी लगातार ये बढ़ता रहा. अफगानिस्तान आने से पहले भी इसकी उपज पाकिस्तान में ही होती हुई दिखी थी. इन दोनों देशों में 'तथाकथित तालिबान' ने कई स्वघोषित कानून लागू किए---लाठी के बल पर. लड़कियों का स्कूल जाना बंद कर दिया गया. उन्हें परदे में रहने का फरमान सुनाया गया. उनपर वो सारी पाबंदियां लागू की गई जो शायद मध्यकालीन समाज के लिए भी स्वीकार्य नहीं कहा जा सकता. पाकिस्तान में पिछले महीनों में स्वात घाटी में कट्टरपंथियों और सरकारी व्यवस्था में घमासान जारी है. कौन हावी होगा कहा नहीं जा सकता लेकिन फ़िर भी अभी कट्टरपंथी हावी हैं. १०० से ज्यादा स्कूल तबाह कर दिए गए हैं. स्कूलों को साफ़ कहा गया है की लड़कियों को मत पढाये. लोगों को कहा गया है कि अपनी कुंवारी बेटियों की शादी आतंकियों से कर दें वरना गंभीर परिणाम भुगतने को तैयार रहें. इन इलाकों में पुरूष वैसे ही आतंकी गतिविधियों के लिए सुलभ हैं और अब महिलाओं को भी जबरन इसका परिणाम भुगतने को मजबूर किया जा रहा है. वैसे भी किसी समाज में पुरूष और महिला की किस्मत एक दूसरे से जुड़ी होती है.
बेंगलूर की घटना की निंदा करने वाले ऐसा करने वालों को फासीवादी और तालिबान और न जाने क्या-क्या कह रहे हैं. इसका तरीका भले ही ग़लत कहा जा सकता है और इसे रोकना भी चाहिए लेकिन इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि क्या पब संस्कृति को रोका नहीं जाना चाहिए. अगर ये जरूरी नहीं है तो क्यूँ गोवा के बीच पर नए साल के दौरान पार्टी वगैरह पर रोक लगाई गई थी. मुंबई के डांस बार पर रोक क्यूँ लगाई गई. गोवा का स्कारलेट केस क्यूँ हुआ. देश की राजधानी दिल्ली में रोज-रोज पकड़ा जाने वाला नशीला और मादक द्रव्य किसके लिए आता है. जाहीर है कि जितना पकड़ा जाता है उससे कई गुना ज्यादा माल शहर में खप जाता होगा. इन सब कामों में शामिल लोग कौन हैं, हमारे बीच के लोग ही न. इन्हें रोकने का तरीका जरूर बदला जाना चाहिए लेकिन इन्हें रोकने वालों को तालिबान कहना कहीं से भी उचित नहीं लगता. इन्होने न तो लड़कियों के घर से बाहर निकलने पर रोक लगाई है और न ही परदे के भीतर जिंदगी जीने को मजबूर किया है. हा इन्हे रोकने के तरीकों को जरूर बदला जाना चाहिए.
Tuesday, 20 January 2009
लो आ गया आपका ओबामा...
बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति बन गए। शपथ ग्रहण के इस ऐतिहासिक अवसर पर वहां २० लाख से ज्यादा लोग जमा थे. इतना ही नहीं पूरी दुनिया टीवी के परदे पर ये घटना देख रही थी. बहुत कम ऐसे मौके होते हैं जब सभी समाचार चैनल एक ही चेहरा दिखा रहे होते हैं. लेकिन ओबामा उस समय हर टीवी चैनल पर दिख रहे थे.केवल अमेरिका ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की उम्मीदों के बोझ तले दबे ओबामा काफी आत्मविश्वासी दिख रहे थे. ओबामा की यही बात दुनिया को पसंद आती है. ओबामा बोलता है और किसी भी समस्या पर मुस्कराते हुए जवाब देता है और उसका जवाब कभी भी थका-हारा नहीं होता है. ओबामा के अन्दर का यही युवापन दुनिया को भाता है और इसी कारण दुनिया आज ओबामा की दीवानी है. पूरी दुनिया के लोग ओबामा को ध्यान से सुनते हैं... यही है ओबामा जो दुनिया भर का न होकर केवल अमेरिका का है लेकिन उसने जो किया या फ़िर जो करेगा उससे दुनिया खुश है...यही उसपर दुनिया की उम्मीदों का बोझ भी बढाती है. लेकिन ओबामा जिस अंदाज में दुनिया से मुखातिब होता है वो अदा सभी को रास आती है..और सब ओबामा को इसीलिए अपना मानते हैं.
Saturday, 10 January 2009
इस कलयुग में...सपना तो देख ही सकते हो!
इसमें सबसे ज्यादा मारामारी प्रधानमंत्री पद के लिए मची हुई है। जब से देश में चुनावों का मौसम शुरू हुआ है सब ख़ुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार पेश करने में लग गए हैं. सबसे पहले लौह पुरूष ने इसमें बाज़ी मारी. जैसे ही उनके लिए रास्ता साफ़ हुआ उन्होंने इसकी घोषणा करने में देरी नहीं की. जैसे ही उनके राह के कांटे हटे उन्होंने तुंरत अपने दल को राजी कर और सहयोगियों को भी साथ लेकर -पीएम इन वेटिंग- घोषित करवा लिया और निकल पड़े दिग्विजय यात्रा पर. लेकिन ये उन्ही के दल के कुछ लोगों को रास नहीं आया और इससे पहले कि उनका कुछ होता उन्होंने पार्टी के सबसे बुजुर्ग सदस्य को ये कहते हुए खड़ा कर दिया कि वे सबसे बुजुर्ग हैं इसलिए पहले इस पद पर दावा उन्हीं का बनता है. पार्टी अब जनता की समस्याओं पर क्या ध्यान देती ख़ुद अपनी अंदरूनी लड़ाई में सब भिड गए.
दूसरे दल के लोग भी क्यूँ चुप रहते। उन्हें भी इस बात की जल्दी थी कि कब ये पद परिवार के भविष्य के हाथों सौंप दें और दुनियादारी से मुक्त हो जायें। इसी उधेड़-बुन में वे कई बार वे भी बोल जाते हैं जिसे बोलने के लिए बाद में उन्हें पछताना पड़ता है। लोग नई पीढी को सत्ता सौपने की भविष्यवाणी करने को इतने लालायित रहते हैं जैसे वे इसी काम के लिए यहाँ रुके हुए हैं और इसे पूरा करते ही उनको इस कलयुग से छुटकारा मिल जाएगा.
प्रधानमंत्री पद पर आने के लिए अपनी बहनजी भी कम सपने नहीं सजाये हुए है। बल्कि यूँ कहे तो वे इसके लिए इतनी जल्दी में हैं कि सम्भावना ऐसी बन रही है कि अगली सरकार किसी की भी बने बहन जी दिल्ली की सत्ता तक पहुँच बनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ने वाली हैं. ऐसा नहीं है कि बहती गंगा में हाथ धोने का सपना केवल उनका है. उनके जैसे जितने भी प्रादेशिक छत्रप हैं वे भी मन ही मन में ये सपना पाले बैठे हैं और अपने ज्योतिष से लगातार संपर्क बनाये हुए है. देखते हैं इस घोर कलयुग में किस-किस के सपनो को पंख लग पाते हैं.
इधर सपने पूरे होने के लिए सबसे उपयुक्त जगह(हॉट फेवरेट) मानी जा रही है--झारखण्ड. वहां आजकल सत्ता का जैसा लॉटरी सिस्टम चल रहा है उसमें कोई नहीं कह सकता कि कब उसकी किस्मत चमक जाए और वो राज्य के मुख्यमंत्री पद पर आसीन हो जाए. वहां तो सबसे फायदेमंद है निर्दलीय विधायक बनना. जबतक सरकार को विश्वासमत साबित करना है तबतक उसे मुफ्त में किसी राज्य की यात्रा करने का मौका मिल सकता है और फ़िर सरकार बनने पर मंत्री पद पक्का. और अगर आप कलयुग के सही बन्दे हैं तो फ़िर कुछ महीनों में पाला बदलकर अपनी किस्मत फ़िर से चमका सकते हैं...मतलब आपको अपने सपनों को अगर साकार करना है तो झारखण्ड की यात्रा सबसे फायदेमंद रहेगी...
Friday, 9 January 2009
"राजनीति" ऐसी कि सिर शर्म से झुक जाए...
एक हैं हमारे गुरूजी। सच कहाँ जाए तो उन्होंने एक राज्य को जन्म दिया. उसकी स्थापना के लिए उनके द्वारा उठाई गई आवाज आखिरकार मान ली गई लेकिन उन्हें सत्ता का मोह छू गया. कई सालों तक जी-तोड़ मेहनत के बाद उन्हें सत्ता तो मिली लेकिन इसके पहले कि वे सत्ता सुख उठा पाते उस राज्य की कृतघ्न जनता ने उन्हें विधायक के पद से भी महरूम कर दिया. अब आप ही बताइये कि जब गुरूजी विधायक ही नहीं रहे तो राज्य का सदर कैसे बने रह सकते थे. क्या गुरूजी को इतना छोटा सम्मान देने लायक भी नहीं समझना चाहिए था. आखिरकार गुरूजी भी उस राज्य कि जनता के गुरु ठहरे. उन्होंने भी कह दिया कि कोई बात नहीं इस हार ने मुझे प्रायश्चित करने को प्रेरित किया है और अब वे दुबारा चुनाव लड़कर ये पूरा करेंगे. अब गुरु तो गुरु ही ठहरे. जिसने उनसे बेवफाई की उसे सबक तो सिखायेंगे ही.
हमारे यहाँ एक ऐसे ही महान नेता हैं। राजनीतिक गलियारे में उन्हें बड़ी तेजी से संकट मोचन के रूप में पहचान मिलती जा रही है. हाल में जब दिल्ली में पुलिस के साथ मुठभेड़ में कुछ आतंकवादी मारे गए तो उस महान नेता ने अपने दौरे में कहा कि पुलिस निर्दोष लोगों को फंसा रही है. पुलिस को पहले जांच करनी चाहिए फ़िर दोषियों को पकड़ना चाहिए. ऐसे ही हाल में नोएडा में एक एमबीए की छात्रा के साथ गैंग रेप होने पर जब स्थानीय लड़के पकड़े गए तो नेताजी वहां के लोगों के समर्थन में प्रदर्शन करने पहुँच गए और कहा कि पुलिस निर्दोष लोगों को सता रही है और दोषियों को बचाने का प्रयास कर रही है.
हम आख़िर कह भी क्या सकते हैं. नेताजी विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्ति हैं और दुनिया के सबसे बड़े और शायद सबसे पुराने लोकतंत्र के सम्मानित नागरिक भी हैं. अगर उन्होंने कहा है तो सही ही कहा होगा.
Tuesday, 6 January 2009
आतंकियों से कड़ी सजा मिलनी चाहिए रेपिस्टों को...
कल राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा शहर में एक घटना घटी। दिल्ली की रहने वाली एक युवती वहां अपने मित्र के साथ घुमने गई थी. वहां कुछ लड़कों ने (मैं शायद ग़लत हूँ क्यूंकि उन्हें लड़का कहना ग़लत होगा-क्यूंकि लड़के किसी के भाई होते हैं या किसी के बेटे) उसे अगवा कर लिया. उसे उसी के कार में उठा ले गए और चलती कार में उसके साथ उन्होंने बलात्कार किया. वो लड़की युवा थी और एमबीए की छात्रा थी. इस अपराध में शामिल कुछ लड़के पकड़े भी गए हैं और शायद उन्हें सजा भी मिल जाए. लेकिन इससे इस समस्या का कोई हल होता हुआ नज़र नहीं आता. वे लड़के कौन थे मुझे नहीं मालूम लेकिन क्या इनके इस करतूत से उस परिवार की बदनामी नहीं होगी जिनके ये सपूत रहे होंगे और जिस परिवार ने इन सपूतों के जन्म पर मिठाइयां बांटी होगी. अब मजबूरी में वे परिवार अपनी बदनामी का दाग धोने में लग गए होंगे और कुछ इस मामले को दबाने में भी.
ऐसा नहीं है कि दिल्ली और आस-पास के शहरों में ये इस तरह कि कोई पहली घटना है. ऐसे मामले यहाँ हमेशा होते रहते हैं. ऐसे सपूत पता नहीं कितने घरों ने पैदा किए हैं. कितने ऐसे सपूत अपनी जिंदगी जेल में काट रहे हैं और कई अपने सुकर्मों की सजा काटकर वापस फ़िर से अपने परिवार का नाम रोशन करने के लिए लौट आयें हैं. और ऐसा भी नहीं है कि आगे से ऐसे सपूत सामने नहीं आएंगे. बलात्कार के आरोपियों को कड़ी सजा देने की मांग न जाने कितने समय से हो रही है. लेकिन ये सब किताबी बातें हैं और किताबों में ही सिमट कर रह गई है और अगर ऐसा करने वालों को सजा मिली भी तो बाकी लोगों को इससे रोकने में शायद ही कामयाबी मिल पाई. सच कहें तो ऐसे लोग देश के लिए आतंकवादियों से भी ज्यादा खतरनाक हैं. आतंकवादियों के लिए पोटा और अन्य कानून बनने की मांग करने वाले इस देश में इन सपूतों के लिए भी कड़े कानून की जरुरत है ताकि ये किसी की जिंदगी तबाह न कर सकें और अगर ऐसी गलती कर भी दे तो फ़िर से आजाद होकर जीने की उम्मीद न कर पायें. ताकि ये किसी के लिए खतरा नहीं बन सकें और अपने परिवार के मुंह पर कालिख न पोत पायें...