Saturday, 10 January 2009

इस कलयुग में...सपना तो देख ही सकते हो!

हमारे यहाँ के एक पूर्व राष्ट्रपति ने एक किताब लिखी थी- सपनों की उडान। उन्होंने कहा कि इन्सान को सपने देखने चाहिए. हमारे देश के लोगों ने इसे अपनाया या नहीं ये तो नहीं मालूम लेकिन हमारी राजनीतिक बिरादरी ने इसे दिल से अपना लिया है. इधर राजनीतिक बिरादरी के लोगों के लिए दो सपने सबसे ज्यादा आम हो गए हैं. जब से देश में गठबंधन राजनीति का जमाना आया है तब से सब प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देखने लगे हैं. यहाँ तक कि १०-२० सीटों के स्तर तक सीमित रहने वाले दल के नेता भी ये मानकर चलते हैं कि कभी न कभी उनकी लॉटरी लग सकती है. इसलिए सब अपने ज्योतिष से ये पता करवाने में जुटे हुए हैं कि उनकी कुंडली में इसका योग कब का बन रहा है.

इसमें सबसे ज्यादा मारामारी प्रधानमंत्री पद के लिए मची हुई है। जब से देश में चुनावों का मौसम शुरू हुआ है सब ख़ुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार पेश करने में लग गए हैं. सबसे पहले लौह पुरूष ने इसमें बाज़ी मारी. जैसे ही उनके लिए रास्ता साफ़ हुआ उन्होंने इसकी घोषणा करने में देरी नहीं की. जैसे ही उनके राह के कांटे हटे उन्होंने तुंरत अपने दल को राजी कर और सहयोगियों को भी साथ लेकर -पीएम इन वेटिंग- घोषित करवा लिया और निकल पड़े दिग्विजय यात्रा पर. लेकिन ये उन्ही के दल के कुछ लोगों को रास नहीं आया और इससे पहले कि उनका कुछ होता उन्होंने पार्टी के सबसे बुजुर्ग सदस्य को ये कहते हुए खड़ा कर दिया कि वे सबसे बुजुर्ग हैं इसलिए पहले इस पद पर दावा उन्हीं का बनता है. पार्टी अब जनता की समस्याओं पर क्या ध्यान देती ख़ुद अपनी अंदरूनी लड़ाई में सब भिड गए.

दूसरे दल के लोग भी क्यूँ चुप रहते। उन्हें भी इस बात की जल्दी थी कि कब ये पद परिवार के भविष्य के हाथों सौंप दें और दुनियादारी से मुक्त हो जायें। इसी उधेड़-बुन में वे कई बार वे भी बोल जाते हैं जिसे बोलने के लिए बाद में उन्हें पछताना पड़ता है। लोग नई पीढी को सत्ता सौपने की भविष्यवाणी करने को इतने लालायित रहते हैं जैसे वे इसी काम के लिए यहाँ रुके हुए हैं और इसे पूरा करते ही उनको इस कलयुग से छुटकारा मिल जाएगा.

प्रधानमंत्री पद पर आने के लिए अपनी बहनजी भी कम सपने नहीं सजाये हुए है। बल्कि यूँ कहे तो वे इसके लिए इतनी जल्दी में हैं कि सम्भावना ऐसी बन रही है कि अगली सरकार किसी की भी बने बहन जी दिल्ली की सत्ता तक पहुँच बनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ने वाली हैं. ऐसा नहीं है कि बहती गंगा में हाथ धोने का सपना केवल उनका है. उनके जैसे जितने भी प्रादेशिक छत्रप हैं वे भी मन ही मन में ये सपना पाले बैठे हैं और अपने ज्योतिष से लगातार संपर्क बनाये हुए है. देखते हैं इस घोर कलयुग में किस-किस के सपनो को पंख लग पाते हैं.

इधर सपने पूरे होने के लिए सबसे उपयुक्त जगह(हॉट फेवरेट) मानी जा रही है--झारखण्ड. वहां आजकल सत्ता का जैसा लॉटरी सिस्टम चल रहा है उसमें कोई नहीं कह सकता कि कब उसकी किस्मत चमक जाए और वो राज्य के मुख्यमंत्री पद पर आसीन हो जाए. वहां तो सबसे फायदेमंद है निर्दलीय विधायक बनना. जबतक सरकार को विश्वासमत साबित करना है तबतक उसे मुफ्त में किसी राज्य की यात्रा करने का मौका मिल सकता है और फ़िर सरकार बनने पर मंत्री पद पक्का. और अगर आप कलयुग के सही बन्दे हैं तो फ़िर कुछ महीनों में पाला बदलकर अपनी किस्मत फ़िर से चमका सकते हैं...मतलब आपको अपने सपनों को अगर साकार करना है तो झारखण्ड की यात्रा सबसे फायदेमंद रहेगी...

1 comment:

Mired Mirage said...

हम भी तो ज्योतिषी के पास से ही होकर आ रहे हैं। अब हम भी सपने देख रहे हैं।
अच्छा लिखा है आपने।
घुघूती बासूती