Friday, 24 April 2009

वोटर न हुआ जैसे कोई बड़ा अपराध कर डाला!

जब से चुनाव का कार्यक्रम शुरू हुआ है वोटर रुपी मानव के लिए मानो संकट का समय शुरू हो गया है। पिछले सालों में नेताओं द्वारा काम नहीं करने की आदत को देखकर थक-हार चुकी जनता ने इस बार वोट देने न जाने का मन बना लिया था. सोचा था कि इस बार घर बैठ कर टीवी पर ही देख लेंगे लोकतंत्र के इस सबसे बड़े महापर्व को. जैसे किस शहर में कितने कम लोग मतदान के लिए जाते हैं, कहाँ-कहाँ लोग इस महापर्व के दिन नक्सली हमलों के शिकार बन इस महापर्व के दिन शहीद होने का गौरव प्राप्त करते हैं. कहाँ-कहाँ के वोटर बाहुबली भगवान् लोगों के आशीर्वाद से फलीभूत होते हैं. इसके आलावा किन जगहों पर वोटरों की किस्मत में धनबलियों के आशीर्वाद को पाने में सफल होना लिखा है. लेकिन इस दिन को सुकून से मनाने का मेरा ख्वाब टीवी वालों ने पूरा नहीं होने दिया.

सुबह जैसे ही टीवी खोला उस पर एक ऐड चल रहा था "जो वोट देने नहीं जायेगा वो पप्पू कहलायेगा"। मेरे भतीजे ने पूछा चाचा आप वोट देने जा रहे हो कि नहीं. मेरे नहीं कहते ही वो बोल पड़ा आज से हम आपको पप्पू कहेंगे. उसकी खुश होती मुद्रा से डर-कर मैंने फैसला किया कि चाहे जितनी भी मुसीबतों का सामना करना पड़े वोट डालने जरूर जाऊंगा. रोज-रोज पप्पू के नाम पर जलील होने से तो अच्छा है एक दिन मेहनत कर ही ली जाये. लेकिन वोट डालने जाने से पहले सोचा कि टीवी समाचारों में जरा बाहर के माहौल का पता तो कर लिया जाये. चैनल बदलते ही देखा समाचारवाचक चीख रहा था और बता रहा था कि फलाना राज्य में नक्सलियों ने सुरक्षाकर्मियों पर हमले किये और कइयो को मार डाला. मतलब जिन सुरक्षाकर्मियों को वोटरों कि सुरक्षा के लिए बुलाया गया था वही सुरक्षाकर्मी नक्सली हिंसा के शिकार हुए. किसी महान आदमी ने कहा था कि एक वोटर ही वोटर का दर्द समझ सकता है. तुंरत मेरे दिमाग में उस इलाके के वोटर का दर्द उभर आया. क्या इतनी बड़ी खबर के बाद उस इलाके का वोटर मतदान केंद्र तक जाने कि हिम्मत करेगा. पिछले कुछ समय से नक्सलियों द्वारा जारी चेतावनी को तो वो सुरक्षाकर्मियों का चेहरा देखकर टाल गया था लेकिन अब जब उनका विकराल रूप सामने दिख गया है तो कौन मां अपने बेटे को, कौन पत्नी अपने पति को और कौन सी बहन अपने भाई को लोकतंत्र के इस महापर्व में आहुति देने के लिए भेजेगी.

ऐसे ही अचानक जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य के लोगों का चेहरा भी दिमाग में घूम गया। अब समझ में आया कि वहां के लोग किस मानसिकता में जी रहे होंगे. अगर वे वोट देने न जाये तो सुरक्षाकर्मी उन्हें अलगाववादी समझ बैठते होंगे और अगर देने जाए तो आतंकी उन्हें अपना दुश्मन मां बैठते हैं. अब बताइए बेचारा वोटर न घर का रहा न घाट का. इतना ही नहीं देश के अन्य हिस्सों में भी कहानी ऐसी ही है. अगर आपने मतदान में हिस्सा लिया और बाहुबली भाई लोग को खबर लग गयी कि फलाना गाँव के लोग मेरे विरोध में मतदान किये थे. बस क्या चुनचुन कर निशाना बनते हैं बेचारे वोटर.

ये सारे नज़ारे दिमाग में घूमते ही फिर मन में एक डर बैठ गया, वोट करने जाऊँ या नहीं। एक तरफ लोकतंत्र के सबसे बड़े पहरुए लोगों का डर मन में समाया हुआ था तो दूसरी तरफ पप्पू के नाम से विख्यात होने का भय. समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ. अब खुद के १८ साल का होने पर अफ़सोस होने था कि अच्छा था हम वोटर लिस्ट में शामिल ही नहीं थे. कम से कम कह तो सकते थे कि अभी १८ साल के हुए ही नहीं हैं. घर से बाहर निकलते ही पडोसी ने पूछा अरे भाई साहब किसे वोट दे रहे हो इस बार. मन में अचानक एक डर समां गया पता नहीं किस पार्टी से जुडा है. कहीं विरोधी पार्टी का नाम ले लिया और इसने जाकर बता दिया तो पता नहीं क्या होगा. मैंने मामले को संभालते हुए झट से कह दिया अरे नहीं तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही थी दावा लेने जा रहा हूँ...और तेज कदम वापस घर की ओर हो लिए...मन में ख़ुशी थी चलो जान बची...

1 comment:

परमजीत बाली said...

बढिया पोस्ट।