Tuesday, 22 May 2007

'मशीन पिर्ची नही देगी' हिंदी कि ऐसी-तैसी

सुबह-सुबह एटीएम मशीन तक पहुंचा । सामने एक पर्ची लगी थी जिसको मैं अक्षरश यहाँ लिख रहा हूँ ।
" एटीएम में पिन्ट आउट हो गया है मशीन पिर्ची नही देगी - थैंक यू "

आप सोच सकते है हमारी हिंदी भाषा कहा तक विकास कर चुकी है । वैसे इसका सारा श्रेय हमारी टीवी को है । अब तो इसने मुम्बईया हिंदी को हमारे युवा पीढी के जबान पर ला ही दिया है । कल बाज़ार में घूम रहा था अचानक तेज़ी से उभरी आवाज ने उधर खिंच लिया करीब १०-१२ साल का एक लड़का जोड़-जोड़ से आवाज दे रहा था " आंटी तू जाता किधर है, पुदीने वाला इधर है"

भैया अब हम का कहे अब आप ही लोग तय करो कि हम कैसी हिंदी सीखते जा रहे है । ये केवल पुदीने वाले या उस बैंक के एटीएम तक ही सीमित नही रह गया है बल्कि हमारी रोज कि जिंदगी में शामिल होता जा रहा है ।

4 comments:

विशाल सिंह said...

मुम्बईया हिन्दी ही सही टी.वी. और फिल्मो के कारण लोग हिन्दी तो सीख रहे हैं. भारत सरकार के राजभाषा विभाग से ज्यादा योगदान आकाशवाणी, फिल्मो और टीवी ने किया है.
धीरे-धीरे लोग अच्छी हिन्दी भी बोलने लगेंगे.

परमजीत बाली said...

यह दोष हमारे कर्णधारों का है जो हिन्दी को उसका सही स्थान नही दिला पाए।

आदिविद्रोही said...

भाई आपको हिन्दी की चिंता है तो अपनी हिन्दी भी कुछ ठीक कर लीजिए। जोड़-जोड़ से नहीं, ज़ोर-ज़ोर से।

हरिराम said...

सूरदास, तुलसीदास से लेकर अनेक महाकाव्यकारों के बारे में हिन्दी एम.ए./पी.एचडी पाठ्यक्रमों में पढ़ाई होती है। क्या उनके लिखे एक भी वाक्य/पद को हम वर्तमान हिन्दी व्याकरण के अनुसार शुद्ध कह सकते हैं? लेकिन वे हिन्दी के महान् विद्वान माने जाते हैं।

व्याकरण की त्रुटियों को नजरअन्दाज करके अर्थ को समझना ही विद्वता है, न कि कोरे व्याकरण का राग अलापना।

कम से कम हिन्दी में ऐसा प्रचलन आम जनता को कुछ अर्थबोध तो करा देता है आसानी से। अंग्रेजी या अन्य भाषाओं में पर्ची हुई तो अधिकांश आम जनता के लिए काला अक्षर भैंस बराबर होगा।