Monday, 21 May 2007

हर फिक्र को हंसी में ही मिला दिए

कमोबेश रोजाना ही ऐसा होता है कि जब मैं खबरों कि तलाश में में खबरिया चैनलों पर पहुँचता हु तो वहा कोई ना कोई हँसी का सुरमा ठ्हहाके लगाते और तालिया पिटवाते मिल जाता है । कही 'हसोगे तो फसोगे' तो कही कुछ और जहा देखो दिनभर लोग हसते रहते है । और सन्डे को तो अति ही हो जाती है ।

ऐसा हो भी तो क्यों नही , हमारे देश में कभी सबसे ज्यादा अहमियत दी जाती थी राजनितिक खबरों को । आज राजनीति में जामे हमारे सूरमाओं ने ऐसी हालत कर रखी है की लोग राजनीती और नेताओ का नाम सुनते ही ऐसे मुँह बिच्काते है जैसे मिर्ची लग गयी हो ।

लोगो में तस्ते में आये इसी बदलाव का ही परिणाम है की गम्भीर राजनीतिक मस्लो पर लिखने वाले हमारे लेखक या तो बाज़ार से बहार होते जा रहे या फिर वो भी क्रिकेट और खाना जैसे मुद्दों पर लिखने लगे है । एक दिन बातचीत के दौरान एक विख्यात लेखक ने दबे शब्दो में ही सही लेकिन अपनी इस चिन्ता पत्रकारो कि टोली में रख ही दी ।

अब लोग क्या करे राजनीति और राजनेता से उनकी अब कोई उम्मीद तो रही नही सो हसी में ही अपने सारे गमो को मिटाने कि जुग्गत लगाने कि आदत डालने लगे है लोग ।

1 comment:

नितिन व्यास said...

कभी तो बदलेगी तस्वीर, बहुत अच्छा लगा!