Thursday, 27 March 2008

आओ मिलकर मैकाले को गाली देते हैं!

बीबीसी की वेबसाईट पर एक विशेष स्टोरी छपी थी- भारत में प्राथमिक स्कूल। क्या कहें इस ख़बर में जो तथ्य दिए गए थे वे यहाँ की शिक्षा व्यवस्था की बदहाली की कहानी बयां कर रहे थे। इसे पढने के बाद समझ में नहीं आ रहा था की किसे दोष दें। वैसे भी जब हमारे देश में शिक्षा पर किसी को दोष देने की बात आती है तो मैकाले हमारे सबसे अच्छे शिकार होते हैं। अमूमन सभी गाली देकर अपनी भडास निकल लेते हैं और फ़िर अपने काम में लगे रहते हैं। लेकिन कभी भी हमने ये सोचने की जरूरत नहीं समझी की आजादी के ६० सालों के बाद भी हम अपने लोगों को शिक्षा देने लायक क्यों नहीं बन सके। केरल जैसे केवल कुछ इलाकों में ही ऐसा हो सका।

अब आइये स्टोरी में दिए गए कुछ तथ्यों पर नजर डालते हैं। भारत के 85 प्रतिशत विद्यालय सरकारी स्कूलों की श्रेणी मे आते है।यह पूरी दुनिया का दूसरा सबसे बडा स्कूली तंत्र है लेकिन ये भी एक सच है की सबसे ज़्यादा अशिक्षित लोग भारत में ही हैं। अगर अंग्रेजों को दोष देकर हम ये कहें की उन्होंने हमे पढाने के लिए कुछ नहीं किया तो ये ग़लत होगा। पिछले ६० सालों में जब हम अपने लिए ऐसा नहीं कर पाये तो अंग्रेज भला हमारे लिए क्यों करते। आज के वक्त में जब हम अपने लोगों को सही रस्ते पर ला नहीं पा रहे हैं तो १८वि शताब्दी में भला अंग्रेज ये काम कैसे कर सकते थे। वो तो भला हो की अंग्रेजी, रेल और ऐसे ही ना जाने कितने चीज वे हमे दे गए वरना हम शायद इन तक पहुँचने में सदियों लगा देते।

हमने बच्चों को स्कूल तक लाने के लिए कई योजनायें शुरू की। उन्हें मुफ्त में किताबे दी गई, मुफ्त ड्रेस दी गई, इतना ही नहीं बच्चों के लिए दोपहर के खाने तक की व्यवस्था की गई। लेकिन फ़िर भी ६० साल में हम अपनी अधिकांश आबादी को नहीं पढ़ा सके। हालांकि इस दौरान काफ़ी बड़ी संख्या में लोग पढे-लिखे भी और दुनिया भर में अपनी काबिलियत का लोहा मंवाये भी लेकिन ये सब केवल अंग्रेजी की बदौलत सम्भव हो सका और इसके लिए हम मैकाले को गाली नहीं दे सकते। जहाँ हमें कुछ करना चाहिए वहाँ हम असफल रहे हैं। सरकार एक ऐसी व्यवस्था है जिसे इसलिए बनाया जाता है की जिस समुदाय का वह प्रतिनिधित्व करती है उसके लिए सामुहिक काम वो करे। ६० सालों में ऐसा शासन नहीं दे पाए जो हमे रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाये दे सके। जाहीर ये हमारी कमी है। हम ख़ुद के लिए लोकतंत्र नहीं बना पाये। इसे भी किसी और देश से कॉपी किया और गले में टांग कर घूमते रहे और हालत ऐसी हो गई की कौन आपका नेता बनेगा ये आप नहीं तय कर सकते बल्कि आपको ये नेता लोग अपने प्रचार माध्यमों से मजबूर कर बताते हैं।

भारत में 53 प्रतिशत छात्र प्राथमिक शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाते और पढ़ाई छोड़ देते हैं। इसको रोकने के लिए सरकार ने बाल मजदूरी सहित कई बुराइयों को रोकने के लिए कानून भी बनाये लेकिन फ़िर भी ये नहीं रुका। बचे आज भी दुकानों से लेकर खेतो में काम करते हैं और पढाई कर पाने की औकाद उनकी बन पाये इसके लिए कुछ ठोस सामने नहीं आ पा रहा है। प्राथमिक स्कूलों में बच्चे आज भी पढ़ नहीं पाते, मास्टर चुनाव सहित तमाम काम में लगे रहते हैं और उन्हें बच्चों को पढाने का समय नहीं हैं। उल्टे अब तो उन्हें दोपहर का भोजन बनवाकर बच्चों को खिलाने का भी काम मिल गया है। अब तो उनकी व्यस्तता और भी बढ़ गई है। जब हम ख़ुद अपने बच्चों को पढाने के लिए समय नहीं निकल पा रहे हैं तो भला ६० साल हो जाए या फ़िर ६ शताब्दी। हम कभी भी अपने लिए कुछ नहीं कर सकते.....

Sunday, 9 March 2008

किसान अचानक लाईमलाईट में क्यों आ गए!

हमेशा किसानों की बदहाली का रोना रोने वाले हमारे देश में किसान अचानक लाईमलाईट में आ गया है। चुनाव का साल है और लगभग सभी पार्टियां अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए नए-नए तरिएक तलाशने में जुट गई है। इसकी शुरुआत इस साल के आम बजट में किसानों का कर्ज माफ़ करने की घोषणा कर केन्द्र सरकार ने की। बजट के इस फैसले को अपने पक्ष में भुनाने के लिए जहाँ सत्ता में साझी पार्टियां इसे अपने दबाव का परिणाम बताने लगीं वहीं विपक्ष जब कुछ नहीं कह सका तो कहा गया की ये फैसला देर से लिया गया। इस फैसले से अपने टीवी चैनल वालों को भी खूब मसाला मिल गया। कई चैनलों में तो तुरंत खटिया (ग्राफिक्स वाला) बिछाया गया और रोज टाई-सूट में दिखने वाले पुरूष और महिला एंकर खटिया पर धोती-लुंगी-कुरता और साड़ी पहने नजर आने लगे। ताकि मीडिया के मार्फ़त दर्शक भी इस फैसले के बाद किसानों के चेहरे पर आयी खुशी को महसूस कर सकें।

अब जब किसानों का मौसम (सच कहें तो चुनावी मौसम) आ ही गया तो चुनाव की तैयारी तो करनी ही पड़ेगी। देश की एक बड़ी पार्टी के राजकुमार ने भारत को खोजने के लिए अपनी देश-व्यापी यात्रा शुरू कर दी। ये यात्रा देश के सबसे गरीब इलाके के रूप में मीडिया में जाने जाने वाले उडीसा के कालाहांडी से शुरू किया गया। युवराज ग्रामीण इलाको और आदिवासी इलाकों का दौरा कर भारत की खोज करेंगे। जहीर है जल्द ही अन्य पार्टियां भी जल्द ही इसकी काट के लिए कोई नई यात्रा शुरू करेंगे।

इन सबसे आगे रहे बिहार में विपक्ष के विधायक( इनकी पार्टी पिछले १५ साल से बिहार में राज कर रही थी।)। किसानों की समस्याओं पर नीतिश सरकार का ध्यान दिलाया जाए इसके लिए इस दल के ४ विधायक बैलगाडी पर बैठकर विधानसभा चले और मीडिया का ध्यान खीचने का पुरा प्रयास किया। बैलगाड़ी में चारों तरफ ईख बंधा था। और पीछे-पीछे इन विधायकों की नई माडल की चमचमाती गाड़ी। विधानसभा के बाहर खड़े पत्रकारों को उस दिन का मसाला यूं ही मिलगया।

आप भी सोच रहे होंगे की जब सबको किसानों की फिक्र हो रही है तो अब जरूर किसानों की हालत सुधरेगी। लेकिन ये इंडिया है और जो दिखता है वैसा होता नहीं। बिल्कुल उस मदारी वाले के करतब की तरह - जो पूरे भीड़ को अपने तरह-तरह के करतब से खुश कर देता है और वैसा होता कुछ भी नहीं है। लेकिन चुकी सबको किसानों को खुश करना है क्योंकि राजनीति की दिशा अब भी भारत का किसान ही तय करता है। और किसी भी दल को भारत पर राज करने के लिए किसानों की रहम की जरूर्रत पड़ेगी ही इस लिए जरूरी है की किसान लाइम्लाईट में ही रखे जायें। और सब फील गुड करते रहें........

Saturday, 8 March 2008

चलो अब महिला दिवस भी मना ही लें!

हमारे देश में अक्सर कोई न कोई दिवस आता रहता है। अब आज की बात देखिये कई जगह खबरों में कल के लिए खास तैयारी की खबरें आती रही। अब आप सोच रहे होंगे की कल कौन सा दिवस है। कल महिला दिवस है। और उसको मनाने के लिए देश में न जाने कितने सेमिनार, सभा और कार्यक्रम किए जायेंगे। तमाम जगहों पर महिलाओं के लिए उनके कल्याण के लिए भाषण दिए जायेंगे। लेकिन ऐसा नहीं है की कल महिला दिवस है तो देश में महिलाओं के ख़िलाफ़ कोई अपराध नहीं होंगे या उनपर देश में कोई अत्याचार नहीं होंगे। तमाम भाषणों और दावों-प्रतिदावों के बिच भी उनपर जुल्म की कई खबरें परसों के अखबारों में छपेंगी। क्योंकि अब तक का अनुभव यही कहता है की दिवस मनाने से किसी आदत को नहीं बदला जा असकता है।

चलिए फ़िर बात करते हैं दिवस वाले मामले पर। अब सवाल उठता है की कल महिला दिवस है तो फ़िर पुरूष दिवस कब मनाया जाता है। जहाँ तक मुझे मालूम है ऐसा कोई दिवस मनाया ही नहीं जाता। कई लोग इसे पुरुषों के प्रति जुल्म कह सकते हैं लेकिन अगर ये सच है तो सच है। हमारे देश में पहले ये दिवस कुछ कम थे, जैसे की गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस जैसे कुछ बड़े-बड़े दिवस मनाने का ही चलन था। लेकिन इधर जब से देश में आधुनिकता का चलन कुछ बड़ा है दिवसों की संख्या भी बढ़ती चली जा रही है। जबसे हम ग्लोबल बनने का सपना सजाने लगे हैं तबसे कई ग्लोबल दिवस हमारे देश में अपनी पैर पसारने लगे हैं। इन ख़ास दिनों पर अब दिवाली-दशहरा से भी ज्यादा रौनक दिखने लगी है। इन ग्लोबल त्योहारों में वैलेंताईन डे को कुछ ख़ास रूतबा हासिल है। इस दिन को इंडियन मीडिया भी खूब कवरेज़ दे रही है। ऐसा नहीं है की सभी ग्लोबल त्यौहार निजी मामलों से ही जुड़ी हाउ है । कुछ ऐसे भी त्यौहार आयत हुए हैं जो परिवार से ताल्लुक रखते हैं। इनमें फादर्स डे, मदर्स डे, फ्रेंडशिप डे जैसे त्यौहार भी शामिल हैं। जो भारत में परिवर्तन के ताजे हवा का झोंका ला रहा है।

मेरे जैसे न-आधुनिक लोगों के लिए ये नई संस्कृति थोडी चुभने वाली जरूर है लेकिन उससे कुछ होने वाला नहीं है। मेरे लिए हमेशा से किसी एक खास घंटे को, खास दिन को या फ़िर किसी खास दिवस पर ही खुश होना और उस खुशी के लिए लोगों से बधाई लेना तकलीफदेह रहा है। जैसे अगर दिसम्बर माह के ३१ तारीख की रात को १० बजे अगर किसी मित्र से मिलिए तो सबकुछ आम दिनों की तरह रहेगा लेकिन जैसे ही रात के बारह बजे अचानक लोग एक-दुसरे के गले लग कर बधाई देने लगेंगे। इस पल में मेरे लिए सहज रह पाना थोडा मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा कुछ नए दिवस भी मुझे तकलीफ पहुचाने वाले रहे है। जिनका आयात भी पश्चिम से ही हुआ है। जैसे मदर्स डे, फादर्स डे। इसे कुछ और दिवस भी जल्द ही जुड़ सकते हैं- जैसे सिस्टर्स डे, ब्रोद्र्स डे, सन् डे, डॉटर डे, वाइफ डे। इन सबसे ऊपर फमिली डे हो सकता है जिस दिन एक परिवार से जुड़े हुए लोग अपने परिवार को याद करेंगे। हालांकि ग्लोबल और आधुनिक होते समाज में परिवार को बाकी परिवार से अलग करके देखना एक चुनौती साबित हो सकती है।

लेकिन इतनी बातों के बारे में सोचकर अपना भेजा ख़राब करने के बाद मैंने सब से अच्छा रास्ता निकला है एसेमेस का। जैसे फ्रेंडशिप डे है तो अपने दोस्तओं की लिस्ट निकालिए और सबको एक ही मैसेज भेज कर छुट्टी पा लीजिये। इसी तरह सारे दिवस पर उससे जुड़े लोगों को मैसेज करिये और उनके करीब आ जाइए। वैसे भी मैसेज करना आजकल महंगा नहीं रह गया है। मोबाइल कंपनियां कई ऐसे स्कीम लाती रहती हैं जिसमें महीने में सैकड़ों या फ़िर हजारों मैसेज फ्री होते हैं। फ़िर तो हम अनलिमिटेड मैसेज सुविधा के साथ अनलिमिटेड दिवसों को मनाने का लुत्फ़ उठा सकते हैं।तो फ़िर देर किस बात की है कल महिला दिवस है और मुफ्त मैसेज की सुविधा भी फ़िर चलिए मानते है महिला दिवस.....

Friday, 7 March 2008

कश्मीर सिंह और किशन सिंह दोनों भारतीय हैं?

कश्मीर सिंह और किशन सिंह में कई समानताये हैं। मसलन दोनों भारतीय हैं। दोनों आजकल चर्चा में हैं। एक लंबे अरसे के बाद आजकल दोनों अपने "घर" पर हैं। लेकिन कश्मीर सिंह घर वापस लौटकर खुश है वही किशन सिंह घर वापस पहुँच कर दुखी है। कश्मीर सिंह के मामले पर सरकार खामोश है तो किशन सिंह के मामले पर संसद में भी चर्चा हुई है। कई समानताओं के साथ-साथ इन दोनों के बीच कई अंतर भी है।

पहले हम कश्मीर सिंह की बात करते हैं। कश्मीर सिंहकी उम्र अब ६० साल है। उनकी कहानी थोडी भावुक है- वे पंजाब के रहने वाले हैं, पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में पकड़े गए, उनपर जासूसी का आरोप लगा, उन्हें मौत की सजा सुनाई गई। उन्होंने ३५ साल पाकिस्तान की जेलों में गुजारा। फ़िर उन्हें माफ़ी मिली और अब वे आज़ाद होकर अपने परिवार के बीच खुशी से वापस लौट आए हैं।

किशन सिंह की उम्र ३७ साल है। वे एक भारतीय हैं, और भारत में ही रहे। लेकिन आम भारतीयों की तरह वे नहीं है क्यूंकि वे बिहार के रहने वाले हैं। वे भारत के अन्दर बसे एक "दूसरे मुल्क" में पकड़े गए। और वहाँ के बासिंदों के अत्याचार के शिकार हो गए। अपनी ३७ साल की उम्र में से उन्होंने २७ साल अपने प्रान्त बिहार में gujaare और आखिरी १० साल महाराष्ट्र में। बिहार के सिवान जिले के अपने गाँवको छोड़कर १० साल पहले वे पुणे चले गए। वहाँ उन्होंने चने बेचने का काम शुरू किया। चने बेचने से उनकी इतनी कमाई नहीं होती थी अपना घर खरीद सके या किराए पर ले सके। इसलिए वे दिनभर चने बेचते और जब सारी दुनिया अपने घर को वापस लौट जाती तो वे सड़क किनारे फुटपाथ पर सो जाते। उन्हें लगता था की अपने देश में ही हैं। और उन्हें कोई खतरा नहीं है। उन्होंने संविधान में कहीं पढ़ा तो नहीं था की उन्हें देश के किसी भी हिस्से में जाकर रहने और रोजी रोटी के लिए कोई काम करने का अधिकार है। लेकिन पता नहीं कहाँ से उन्हें ये मालूम था की वे ऐसा कर सकते हैं। लेकिन वे चैन से अपना ये काम नहीं कर सके। पिछले महीने की एक रात उनपर और उन जैसे काम करने वाले और फुटपाथ पर जीवन गुजारने वाले लोगों पर भीड़ ने हमला किया। भागते वक्त वे गिरे और बेहोश हो गए और फ़िर जब होश में आए तो उनके दोनों हाथ गायब थे। अब वे चने नहीं बेच पाएंगे, क्योंकि हाथ के बिना चने बेचने का काम सम्भव नहीं है। मामला संसद में भी उठा, गृहमंत्री महोदय ने कहा की ऐसे हमलों के शिकार सभी लोगों को फ़िर से बसाया जाएगा। लेकिन क्या किशन सिंह को फ़िर से बसाया जा सकता है। भले ही किशन सिंह कश्मीर सिंह की तरह दूसरे मुल्क में नहीं पकड़े गए थे, उन्होंने संविधान के अनुसार कोई अपराध भी नहीं किया था लेकिन क्या करें मुल्क के अन्दर कई मुल्कों को वे पहचान नहीं पाए और यही उनका अपराध था.......

Thursday, 6 March 2008

उजड़े शहर दोबारा बसते नहीं है क्या!

आज एक साथ दो खबरें मीडिया में छाई रही। राज ठाकरे के पूज्य चाचाजी(पहले राज उनके नक्शे-कदम पर चल रहे थे, लेकिन अब समय बदल गया है) बाल ठाकरे साहब ने सामना में एक लेख लिखकर बिहार के लोगों को खूब गाली दी। कई लोगों ने कहाँ "ई चाचा बिहार के लोगों से इतना फ्रस्टिया काहे गए हैं" जबकि कई लोगों ने कहाँ नहीं चाचा तो अपने भतीजे के कदम से फ्रस्टिया गए हैं। हालांकि कई लोग तो ये कहकर उन्हें बख्शने के मूड में थे की उम्र का असर है। अक्सार लोग इस उम्र में अनाप-शनाप बोलने लगते हैं। हमारे देश की संस्कृति रही है की ऐसे लोगों की बातों का लोग बुरा नहीं मानते। दूसरी ख़बर हमारे देश के गृहमंत्री जी के इसी मामले पर आए बयां से बना था। गृहमंत्री आज राज्यसभा में बोल रहे थे। उन्होंने महाराष्ट्र में उत्तर भारतीय लोगों पर हो रहे हमलों की निंदा करते हुए कहा कि सरकार उन लोगों को फ़िर से वहा बसायेगी। उन्हे वहाँ सुरक्षा प्रदान की जायेगी।

आज से एक दिन पहले यानी की कल एक ख़बर देखी थी- जम्मू-कश्मीर के बडगाम में सरकार के द्वारा बनाए गए फ्लैटों में कश्मीरी पंडितों के ३० परिवारों को लाया गया। इस तरह के कई और आवासीय परिसर राज्य में बनाकर सरकार राज्य से भाग कर गए लोगों को फ़िर वापस लाएगी(वहाँ से पलायन का सिलसिला दशकों से जारी है)। कुछ इसी तरह का वाकया असम में भी हो रहा है। वहाँ के कुछ आतंकी संगठन असम में रह रहे बाहरी लोगों के ख़िलाफ़ अभियान चलाये हुए हैं। ये अभियान अब हिंसक हो चुका है। कुछ इसी तरह का काम पिछले दिनों महाराष्ट्र में राज ठाकरे के लोगों ने भी शुरू किया। जिससे आजीज आकर बिहार और उत्तर प्रदेश के काफ़ी लोग महाराष्ट्र छोड़कर भागने को मजबूर हुए। सरकार कह रही है की वो फ़िर से इन लोगों को वहाँ बसायेगी। लेकिन सवाल है की कब तक ये लोग ख़ुद को वहाँ सुरक्षित मानेंगे।

ऐसा नहीं है की इस तरह की राजनीति केवल भारत में ही होती है। मैं खबरों कि दुनिया में हूँ इस लिए कई होनी-अनहोनी खबरें रोज देखनेको मिल जाती हैं। सबसे ज्यादा ह्रदय विदारक खबरें अफ्रीकी महाद्वीप से आती है। अभी पिछले महीने केन्या में नस्ली हिंसा कि खबरें काफ़ी छाई रही। वहाँ भी चुनावी राजनीति ने लाखों लोगों को बेघर किया। इसी तरह रवांडा, कांगो, नाईजीरिया सहित कई देशों और खाड़ी के कई देशों में भी इसी तरह की लड़ाई जारी है। अगर यही हाल यहाँ भी जारी रहा तो लाखों लोग जो देश के अन्य इलाकों में रह रहे हैं उनके लिए सरकार को बार-बार आशियाने बनाकर देते रहने पडेगा। और आगे चलकर इसके लिए अलग से बजट बनाना पडेगा। लेकिन आशियाने देने के बदले सरकार को लोगों को ये समझाने में ज्यादा ताकत लगाएं की लोगों को संविधान ने देश में कहीं भी बसने और कोई भी वैध कारोबार करने का हक़ दिया है।

Wednesday, 5 March 2008

किसानों की कर्ज माफ़ी का श्रेय किसे दिया जाए!

इस साल २९ फरवरी को जैसे ही वित मंत्री महोदय ने लोक सभा में बजट भाषण के दौरान किसानों के कर्ज माफ़ी की घोषणा की मानों भूचाल आ गया। सरकार और विपक्ष के लोग टीवी चैनलों पर दिखने लगे, सभी इस फैसले का श्रेय ख़ुद लेने में लग गए। सरकार में शामिल सभी दल इसे अपनी जीत बताने में लग गए। संसद से बाहर निकलते हुए जब मीडिया वालों ने सभी दलों के नेताओं को घेरा तो सता पक्ष से जुड़े नेता इसे आजादी के बाद का सबसे बड़ा फ़ैसला बताने लगे तो भाजपा के लोग इसे फरेब ठहराने में लग गए। सभी ख़ुद को किसानों का हमदर्द दिखाने के करतब में लग गए। सरकार ने कहा- ये फ़ैसला किसानों की तक़दीर बदल देगी तो विपक्ष ने कहाँ सरकार ने देर क्यों की। अब करीब एक सप्ताह होने को आए हैं फ़िर भी मीडिया इस पर विचार अब भी कर रहा है। लोक सभा के चुनाव नजदीक है और मीडिया में ये बहस तेज होता जा रहा है कि इस फैसले का श्रेय किसे मिलना चाहिए।

ये फैसला जैसा की मीडिया में दिखाया जा रहा है इस साल के बजट का सबसे बड़ा फैसला माना जा सकता है। लेकिन मेरे विचार में इस मामले को लोक सभा चुनाओं के अलावे दो और मसलों से जोड़कर देखा जाना चाहिए। हालांकि बजट के एक दिन पहले कांग्रेस के युवराज राहुल गाँधी प्रधानमंत्री जी से मिले और आम लोगों का बजट पेश करने का आह्वान किया। फ़िर जो फैसला आया वो सबके सामने हैं।

१- संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन द्वारा शासित राज्यों में से महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश। जहाँ कि अगले साल चुनाव होने हैं, और इन्ही २ राज्यों में किसानों की आत्महत्या का मामले सबसे ज्यादा सामने आता रहा है। जहीर है सरकार के इस फैसले के पीछे इन दोनों राज्यों कि सरकारों का दबाव भी काफ़ी कारगर रहा होगा।

२। बजट के २ दिन पहले पंजाब के किसानों का एक प्रतिनिधिमंडल कांग्रेस नेताओं के साथ प्रधानमंत्री मनमोहन संघ और सप्रंग अध्यक्ष सोनिया गाँधी से मिला। मीडिया में पीएम का जैसा बयान चल रहा था उसके अनुसार प्रधानमंत्री जी ने उन्हें कहा था की बजट से २ दिन पहले मैं आप लोगों को साफ-साफ कुछ नहीं बता सकता लेकिन आपकी मांगों पर जरूर कदम उठाया जायेगा। प्रधानमंत्री जी का ये बयान पंजाबी भाषा में था।

इसके अलावे एक और सवाल जो उठाया जा रहा है की किन किसानों को इस फैसले से फायदा होगा। जहीर है की पंजाब, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों को इससे फायदा होगा। इसका फायदा ज्यादातर बड़े किसानों को हो सकता है। छोटे किसान कभी कर्ज लेकर खेती नहीं करते, अगर लेते भी हैं तो साहूकारों से आगे उनकी पहुँच नहीं हो पाती। मैंने बिहार के किसानों को बैंक से खेती के लिए लोन लेते नहीं देखा है। वे अपने खेती के लिए या तो साहूकारों से पैसा उधार लेते हैं या फ़िर अपने खेत बेचकर खेती के काम को आगे बढाते हैं।

इधर हाल के वर्षों में देश के जो इलाके किसानों की समस्याओं के लिए चर्चा में रहे हैं उनमें- विदर्भ, तेलंगाना और बुंदेलखंड सबसे आगे हैं। इन इलाकों को इस फैसले से सबसे ज्यादा फायदा मिलना चाहिए। सच कहें तो उन किसानों को इस फैसले का श्रेय देना चाहिए जिन्होंने अपनी जान देकर सरकार को ये फैसला लेने को मजबूर किया। लेकिन सरकार को ऐसे किसानों को भी कर्ज मुक्त कराने का जिम्मा उठाना चाहिए जो बैंक से कर्ज न लेकर साहूकार से लेते हैं। और जो पीढियों से कर्ज के बोझ में दबे हुए हैं। मैंने ग्रामीण इलाकों में कई ऐसे किसानों को देखा है जो सहुकारो के कर्ज से मुक्त होने में असमर्थ हैं। वे कर्ज की राशी से ज्यादा व्याज दे रहे हैं और भारी बोझ में दबे हुए हैं। इस कर्ज को ख़त्म करने का श्रेय भी किसी को लेना चाहिए।

यूपी विधानसभा में विधायकों पर नजर रखेगा सीसीटीवी!

उत्तर प्रदेश सरकार ने फैसला किया है की राज्य विधानसभा में सीसीटीवी कैमरे लगाए जायेंगे। ये कैमरे असामाजिक तत्वों पर निगाह रखने के लिए लगाये जायेंगे। साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार ने विधायकों, कर्मचारियों और यहां आने वाले लोगों को इलेक्ट्रॉनिक स्मार्ट कार्ड देने का भी फैसला लिया है। इसी ख़बर को एक वेबसाइट इस तरह से लिखा था। उसकी ख़बर की दूसरी लीन थी-- विधायकों की गतिविधियों पर नजर रखने और असामाजिक तत्वों की आवाजाही की जांच के लिए उत्तरप्रदेश सरकार ने विधानसभा में क्लोज्ड सर्किट कैमरे (सीसीटीवी) लगाने का फैसला लिया है। जाहीर है सरकार के इस फैसले के पीछे हाल में घटी कुछ घटनाये हैं, जिन्होंने लोक्तान्त्रन्त्रिक संस्थाओं की मर्यादा को भी कलंकित किया है।

भारत के उतारी राज्य जम्मू-कश्मीर से लेकर लगभग सभी राज्यों की विधानसभा मार-पीट की गवाह बन चुकी है। इन घटनाओं से लोकतंत्र को कितना नुकसान पहुँचा है ये कहना तो मुश्किल है। लेकिन लोकतंत्र के हमारे स्थल जरूर इन घटनाओं से खबरों में आते रहते हैं। सरकार के इस फैसले से एक बात और साफ हो गई की अब सरकार भी इस तथ्य को स्वीकार करने लगी है की विधानसभा में गरम खून वाले लोग पहुँचने लगे हैं। इस नतीजे तक पहुचाने के पहले सरकार ने पूरे तथ्य जरूर जुटाए होंगे। अधिकारियों ने इस फैसले की घोषणा करते हुए बताया की करीब 81 सीसीटीवी कैमरों को परिसर में कई महत्वपूर्ण जगहों पर लगाया गया है। ये कैमरे विशेष तौर पर सत्र के दौरान विधायकों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए लगाए जा रहे हैं। यह भी बताया गया कि हाल ही में बजट सत्र के दौरान समाजवादी पार्टी के विधायक गैस से भरे गुब्बारे अपने शॉल में छुपाकर विधानसभा में लेकर आ गए थे। इस तरह की हरकतें दोबारा न होने देने के लिए सरकार ने यह कदम उठाया है।

Thursday, 28 February 2008

लोकतंत्र में कॉमन मैन का क्या काम!

दुनिया में लोकतंत्र के दो बड़े स्तंभों भारत और अमेरिका में चुनाव का माहौल बनने लगा है। अमेरिका में चुनाव इसी साल है तोइंडिया में अगले साल। दोनों जगह की सरकारें अब लोगों को लुभाने में लग गई हैं। अमेरिका में कोई लोगों को अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं देने का सपना दिखा रहा है तो कोई विदेश निति का झांसा दे रहा है। याद करिये भारत में भी कुछ ऐसा चल रहा है। दोनों जगह का मामला अमूमन एक जैसा ही है। भारत के लोग धार्मिक मामलों पर थोडा भावुक है इस कारण यहाँ धार्मिक मसले भी छाये हुए हैं। अमेरिका में कुछ अलग मसला है। वहाँ मामला बहुदेशिये है इसलिए अफ्रिका, एशिया और तमाम नश्लों के लोगों का मसला उठ रहा है।

दोनों जगह राजनीति का सबसे बड़ा मोहरा कॉमन मैन बना हुआ है। अमेरिका में उम्मीदवार वहाँ के कॉमन मैन को बेरोजगारी और स्वास्थ्य सुविधा और विश्व दरोगा अमेरिका बने रहने का सपना दिखा रहे हैं। लेकिन एक बात ध्यान रहे की दुनिया में सबसे ज्यादा अमेरिकी लोग हैं जो दुसरे देशों की लड़ाई लड़ रहे हैं। लगभग हर देश में अमेरिका अपने बड़े लोगों की सम्पति और कारोबार बचाने के लिए शान्ति का लबादा ओढ़कर लड़ाई लड़ रहा है। और उसके लाखों सैनिक जवान दुसरे-दुसरे देशों में लड़-मर रहे हैं। ये जवान वहाँ के कॉमन मैन हैं। जो अमेरिका के आर्थिक सुपर पॉवर बनने से फायदा नहीं उठा पाये हैं। और आज भी कम पैसे में ख़ुद की जान जोखिम में डालने को तैयार हैं। कमोवेश यही हालत भारत के कॉमन मैन का भी है।

शायद आपको याद हो, हामरे देश में जिस पार्टी का राज है उसका नारा भी- हमारी पार्टी का हाथ, आम आदमी(कॉमन मैन) के साथ' । आजादी के ६० सालों बाद भी आज लगभग हर चुनाव में सभी पार्टियां कॉमन मैन के लिए अपने आश्वासनों का पिटारा खोल देती है। सभी के दावे एक से बढ़कर एक। लेकिन अगले ५ साल में फ़िर से वही वादे-वही आश्वासन। और कॉमन की हालत तो ऐसी है की इतनी सरकार आई और काम करती रही। प्रगति के तमाम रिपोर्ट भी पेश होते रहे लेकिन कॉमन मैन का पेट है की भरने का नाम ही नहीं ले रहा है। भारत के आम लोग ऐसे हैं की इतने सालों तक सरकार के और हमारे नेताओं के अथक परिश्रम को बेकार कर देते। भारत का स्थान विकास सूचकांक में १०० के करीब पहुँच गया लेकिन यहाँ के लोग हैं की ख़ुद को संपन्न बना ही नहीं पा रहे हैं। लेकिन ये एक सच्चाई है की यहाँ का कॉमन मैन है और कॉमन ही रहेगा। और आने वाले चुनाव भी इसी कॉमन मैन के बूते पार्टियां लड़ती रहेंगी..... कॉमन मैन तेरी यही कहानी..हाथों में झंडा और मुंह में नारा लेकिन अनवरत रहेगा आँखों में है पानी.

Sunday, 24 February 2008

कबूतरबाजो, गुर्दागर्दो का नया हब है भारत!

भारत में आजकल रोज विकास के नए-नए मापदंड बन रहे हैं। हमारा प्यारा देश भारत पहले सोने की चिडिया था--ऐसा ही मैंने बचपन में किताबों में पढा था। लेकिन अब जबसे अखबार पढने की आदत लगी है कुछ शब्द लगभग रोज कई-कई बार(और बड़े-बड़े शब्दों में भी--जिनपर आँखे टिकाना मजबूरी बन जाए) पढने पड़ते हैं। इनमें कबूतरबाजी और आजकल 'गुर्दागर्दी' शब्द खूब छाये हुए हैं। इसके साथ ही व्यापारियों की दो नई कॉम भी सामने आई है-- कबूतरबाज़ और गुर्दागर्द।

ये दोनों व्यापार इतना मालामाल लगने लगें हैं की कई लड़के तोअब इस कारोबार को अपनाने पर गंभीरता से सोचने लगे हैं। हों भी क्यों ना जो लोग भी इस कारोबार से जुड़े पकड़े जाते हैं टीवी चैनलों पर कई दिनों तक छाये रहते हैं। इतना ही नहीं फरारी के दौर में जब ये पकड़े जाते हैं तो करोडो रूपये के साथ। अब अपने किडनी कुमार जी को देख लीजिये जब ये नेपाल में पकड़े गए तो इनके पास से लगभग डेढ़ करोड़(?) रुपया का देशी-विदेशी नोट पकडा गया। उनके बारे में कई दिनों तक अखबारों और टीवी चैनलवों पर ख़बर चलता रहा की इस देश में इनकी इतने करोड़ की sampati है तो falanaa देश में इनके इतने बैंक बैलेंस हैं। इतना ही नहीं अब कबूतरबाजी के धंधे में ही फायदा देखिये कितना ज्यादा है की बड़े-बड़े लोग इस काम में शामिल होने लगे हैं। भी जब इतना फायदा है तो नई पीढ़ी के लोग इस धंधे की ओर आयेंगे ही।

आने वाले २० सालों के बाद जब हमारे देश के इतिहासकार देश का इतिहास लिखने के लिए अखबारों के कतरन से कुछ उठाएंगे तो भारत के आर्थिक विकास के आयामों में इन हस्तियों का नाम बड़े गर्व से लिखेंगे। इतना ही नहीं उस दौर की कवितायें भी कुछ इस तरह की होंगी--- मेरे देश की धरती कबूतरबाज़ उगले, उगले गुर्दागर्द॥ मेरे देश की धरती........फ़िर ये गाने उस वक्त के सभी राष्ट्रिय त्योहारों मसलन वैलेंटाइन डे, माता दिवस, पिटा दिवस, पत्नी दिवस जैसे महान अवसरों पर गाए जायेंगे।..................

क़ानून असफल होगा तो सफल होगा ही भीड़तंत्र!

एक ही दिन यानी की २३ फरवरी को दो खबरें आई। दिल्ली में 'जुडिसिअल रीफोर्म' (न्यायिक सुधार) पर एक सम्मेलन में राष्ट्रपति ने कहा की देश में लंबित पड़े मामलों की सुनवाई के लिए जरुरी है की न्यायिक सुधार हों। ठीक इसी दिन बिहार के हाजीपुर में भीड़ ने हत्या के आरोप में पुलिस हिरासत में बंद आरोपी को खीचकर मार डाला। इस तरह के कई मामले समय-समय पर सामने आते रहते हैं जब लोग न्याय मिलने में देरी को पचा नहीं पाते और ख़ुद न्याय करने पर उतारू हो जाते हैं।

कुछ सालों पहले इसी तरह के एक मामले पर बनी फ़िल्म गंगाजल काफ़ी मशहूर हुई थी। जो बिहार के भागलपुर में दो दशक पहले हुए भीड़तंत्र के न्याय पर बनी थी, इसके बाद इस मामले पर देश में काफ़ी बहस हुई थी। तमाम लोगों ने इसपर अपनी राय दी। जहाँ तक मुझे याद है तो महाराष्ट्र के अकोला में एक गुंडे के आतंक से परेशान होकर महिलावों ने ख़ुद ही क़ानून अपने हाथ में लिया। क़ानून और न्यायपालिका के लिए इस तरह के सवालों का जवाब देना उतना आसान नहीं है की क्यों लोगों को समय पर न्याय नहीं मिल पा रहा है। हर मामले में कुछ न कुछ अपने-अपने कारण होते हैं। लेकिन लोगों को न्याय चाहिए और समय पर चाहिए। और उसके लिए लोग अपने बचाव के लिए भीड़ का सहारा लेते हैं। और न्याय के नाम पर भीड़ को भड़काना वैसे भी मुश्किल काम नहीं है। इस कारण लोगों का ये प्रयास अक्सर सफल होता है। भारत की जनता वैसे भी काफ़ी भावुक मानी जाती है।

देश में हालांकि इस समस्या के निदान के लिए तरह-तरह के कदम उठाये जा रहे हैं। जैसे गुजरात ने शाम में न्यायलय का काम शुरू कर लंबित पड़े मामलों को निपटाने के लिए नई पहल की है। वैसे ही कई अदालतों में न्यायाधीशों की संख्या बधाई जा रही है ताकि लोगों को समय पर न्याय मिले और लोग भीड़ का हिस्सा बन ख़ुद न्याय करने पर मजबूर ना हों। कई बार भीड़ तंत्र का इस्तेमाल लोग अपना निजी हित साधने के लिए करते हैं। एक बार फ़िर मैं हाल में आई फ़िल्म हल्ला बोल का उदाहरण देकर समझाने का प्रयास करूंगा। फ़िल्म में अपनी बात कहने के लिए कई बार भीड़ तंत्र का सहारा लेते हुए दिखाया गया है। उसमें अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के मकसद साधने का काम करते हुए दिखाया गया है।..........

Saturday, 23 February 2008

अगर राजनीति में भी कोई आईपीएल बन जाए!

अभी हाल ही में क्रिकेट में आईपीएल नाम का एक बड़ा संघ सामने आया है। सब कुछ अगर सोचे हुए रस्ते पर चला तो जल्द ही यह क्रिकेट का महाकुम्भ बन जायेगा। मुम्बई में इस संघ कि मंडी सजाई गई और क्या पोंटिंग क्या सचिन सबकी औकात की बोली लगी। औकात के मामले में भारतीय कप्तान धोनी सबसे अव्वल रहे। पोंटिंग सहित कई खिलाडी अपनी औकाद की कम कीमत से नाराज भले ही होते रहे लेकिन मंडी में इन सबका कोई असर नहीं होने जा रहा है। भले ही इसके बाद कई खिलाडी अब अपनी टीम में भी इसी नए कीमत से आंके जायेंगे। सच कहें तो अब तक प्रचार से धन कमा कर ये खिलाडी टीवी पर लोगों को उनकी औकात बताते फ़िर रहे थे। लेकिन इस मंडी में उनकी ख़ुद की औकाद नप गई।

कल अचानक बातचीत में मेरे एक मित्र ने एक प्रस्ताव रख दिया। और कहा की क्यो ना देश की राजनितिक स्थिति में सुधर के लिए आईपीएल की तर्ज पर कोई लीग बनाया जाए। इससे जैसे आईपीएल क्रिकेट में छेत्रवाद को ख़त्म कर रहा है वैसे ही राजनीति में भी छेत्रवाद ख़त्म हो सकेगा। वहाँ बैठे सभी लोगो को ये आईडिया पसंद आया। लेकिन जब बात कीमत लगाने की आई तो फ़िर मामला फिल्मी स्टारस पर आकर ठहर गया। लोगों ने कहा की भाई कुछ भी कहो इस लीग में तो सबसे ज्यादा कीमत फ़िल्म से राजनीति में आई हस्तियों की ही लगेगी। या फ़िर ये भी हो सकता है किज्यादा कीमत लगती देख मलिक्का सहरावत जैसे ज्यादा डीमांड वाली लड़किया फिल्में छोड़कर राजनीति में ही शामिल होने लगें और मजबूर होकर राजनीति वाले उसी तरह का आन्दोलन करने लगें जैसे राज ठाकरे के समर्थक मुम्बई में उत्तर भारतीयों को आने से रोकने के लिए कर रहे हैं।

फ़िर आगे बात बढ़ी तो नेता लोगों की कीमत पर आई। अब सवाल उठा की नेता में से कौन किस टीम में लिया जायेगा। और टीम बनने केक्या होगा। किसी ने कहा की अगर राज ठाकरे को बिहार वाले खरीद ले जाए तब। मेरे एक मित्र महोदय तुरंत बोल उठे। भाई इसकी संभावना सबसे ज्यादा है। जैसे सैमोंड्स की कीमत धोनी के बाद सबसे ज्यादा लगी उसी तरह राज ठाकरे को तो बिहार वाले किसी भी कीमत पर अपने टीम के लिए खरीद कर ले जायेंगे। फ़िर सवाल उठा की मोदी जी के क्या होगा। सामने बैठे मेरे एक मित्र का कहना था की भाई वो तो अहमदाबाद टीम के अईकन प्लेयर रहेंगे। फ़िर हुआ की लालू जी का क्या होगा, जवाब था की भाई वो तो उसी टीम में जायेंगे जिस टीम में उनकी धाक बनी रहेगी चाहे इसके लिए कोई भी कीमत क्यों ना लगवानी पड़े।

बात ख़त्म ना होते देख मैन्स कहा भी ये कीमत तो लगती रहेगी। फिलहाल अभी इस लीग के आईडिया तो कोई सुझाए। फिलहाल तो आईपीएल के खेल ही देखिये और मजे लीजिये। इस लीग की एक ख़ास बात ये भी रहेगी की कोई भी टीम हारे किसी कि जान जाने लायक बात नहीं रहेगी। क्योंकि जितने वाली टीम में भी कोई ना कोई पसंदीदा खिलाडी तो रहेगा ही। उसी के बारे में सोचकर खुश हो लेंगे लोग। .....

Sunday, 17 February 2008

यहाँ परीक्षा में नक़ल एक सत्य बन चुका है!

एक बड़ी सी इमारत की चहारदीवारी के चारों ओर पुलिस का घेरा है। गेट पर कई सुरक्षा कर्मी खड़े हैं। इतना ही नहीं छत पर भी सुरक्षाकर्मी खड़े होकर चारों ओर नजर दौड़ा रहे हैं। उस इमारत के चारों तरफ़ सैकड़ों लोगों का हुजूम जमा है। ये किसी पोलिंग बूथ का नजारा नहीं है बल्कि इंटर की परीक्षा के लिए बने सेंटर वाले स्कूल का नजारा है। गेट पर आने वाले हर परीक्षार्थी की सघन तलाशी ली जा रही है। यहाँ तक कि कई छात्रों के जूते तक खुलवा कर तलाशी ली जा रही है। धीरे-धीरे समय बीतता है और परीक्षा शुरू होती है। आप सोच रहे होंगे कि अब क्या होने वाला है। नक़ल के सारे सामान तो बाहर गेट पर ही निकलवा लिए गए थे।

अभी करीब एक घंटा बीता होगा। सामने से एक गाड़ी आती हुई दिखायी दे रही है। सुरक्षा कर्मी चुस्त-दुरुस्त होते हैं। स्कूल कि खिद्कीयों से लटके लोग अचानक खदेड़ दिए जाते है और स्कूल के गेट के बाहर जमा लोग भी दूर खेतों कि ओर दौर लगाने लगते हैं। गाड़ी में से कोई अफसर नुमा आदमी बाहर आता है और कई क्लास रूम में तलाशी लेने लगता है। करीब १० मिनट बाद वो बाहर आता है और उसके साथ चल रहे सुरक्षाकर्मियों के साथ कई परीक्षार्थी भी आते हैं। उनमें से कई तो उनके साथ नाजाने से बचने के लिए उनके पैरों तक में गिर रहे होते हैं। ये सारे बच्चे नक़ल करते हुए पकड़े गए हैं। आप सोच रहे होंगे की जब गेट पर ही सारे कागज़ पकड़ लिए गए थे तो ये अन्दर किन कागज़ के साथ पकड़े गए। ये समझना आपके बस की बात नहीं है। ये तो बस मेरे यहाँ का मशहूर जुगाड़ टेक्नोलॉजी है।

अफसर के पीछे चल रही गाड़ी में वे सारे बच्चे बैठा दिए जाते हैं। उनकी उम्र १४-१८ वर्ष के बीच की है। जैसे ही गाड़ी आगे बदती है बाहर खड़ी भीड़ गाड़ी पर पत्थरबाजी करने लगती है। पुलिस वाले गाड़ी से उतरकर पत्थर चलाने वालों को खादेरने में लग जाते हैं। इसी बीच पकड़े गए लड़कों में से दो हाथ छुडा भागने में सफल हो जाते हैं। थोडी दूर तक पुलिस उनका पीछा करते है और फ़िर वापस आकर गाड़ी में बैठ जाते। लगभग हर परीक्षा के दौरान इस प्रकार का दृश्य बनता है। लेकिन भैया घबराने की कोई बात नहीं ये अब एक सच्चाई बन गई है। और पड़ने वाला लड़का भी इसे आजमाने को मजबूर होता है वरना वो औरों से पिछड़ जायेगा।

Saturday, 16 February 2008

कल के मानव को मशीनों के साथ जीना पडेगा?

वैलेंटाइन डे के सुरूर के बीच मेरी निगाह दो ऐसी खबरों पर गई जो वाकई काफी चौकाने वाली थी। एक ख़बर इंडिया टीवी पर चल रही थी। जिसका मजमून था की वर्ष २०५० तक मानव रोबोट के साथ शादी कर सकेगा और गृहस्थ जीवन बीता सकेगा। इस ख़बर को नीदरलैंड के एक लेखक डेविड लेवी की एक किताब मी लिखे तथ्यों से लिया गया था जिसमें जापान में रोबोट पर हो रहे काम को आधार बनाकर २०५० के मानव को दिखाया गया है। इस किताब का नाम है 'मैरेज एंड सेक्स विथ रोबोट' । जो दृश्य टीवी पर दिखाए जा रहे थे उसमे शायद किसी फ़िल्म से लिए गए दृश्य थे लेकिन वे दृश्य निश्चय ही हमारी पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी को चौकाने वाले थे। ख़बर में ये भी बताया गया की ये रोबोट आदमी या औरत के काफ़ी पसंदीदा जीवनसाथी बन सकेंगे। क्योंकि आप इनसे मनचाहा काम करवा सकेंगे। जाहीर है इसके लिए प्रोग्रामिंग की जरुरत पड़ेगी। और इसके माध्यम से लोग अपने पसंद का रोबोट जीवनसाथी बनवा सकेंगे। आज की दुनिया में जिस तरह से लोगों का एक-दुसरे से विश्वास उठता जा रहा है वैसे में अगर कल का मानव इंसान से ज्यादा विश्वास अगर मशीनी जीवनसाथी पर करने लगे तो कोई हैरत नहीं होगी।

दूसरी ख़बर आईआईटी कानपुर से आई थी। इंग्लैंड से आए एक वैज्ञानिक ने कहा है की इसी शताब्दी में अपने शरीर में चिप लगवा कर मानव सुपरमैन बन सकता है। उनका दावा है कि इस पद्धति से मनाव जहाँ कई बीमारियों पर लगाम पा सकेगा वहीं कई मानवीय भूलों पर भी काबू पाना सम्भव हो सकेगा। उन्होंने baताया कि उन्होंने वर्ष १९९८ में फिल्म जुरासिक पार्क और टर्मिनेटर से प्रेरणा लेकर शोध करना शुरू किया था। उन्होंने बताया कि स्वयं उन्होंने ऑपरेशन कराकर अपने हाथ में ट्रेकिंग डिवाइस चिप लगवा रखी है और इससे शरीर के नर्वस सिस्टम से जोड़ दिया गया है और दिमाग के सिग्नल कंप्यूटर में जाने लगे हैं। इससे दिमाग कंप्यूटर की तरह काम करने लगता है और उसकी सोचने-समझने और काम करने की क्षमता बढ़ जाती है। और apne aur अपने सारे काम वो कम्पूटर के निर्देशों के आधार पर करेगा। आगे उनका कहना था कि इसी तरह मानव सुपरमैन kii तरह बन सकेगा।

Saturday, 9 February 2008

राज भी औरों की तरह राजनीति कर रहे है तो गलत क्या है!

राज ठाकरे के बयान पर पूरे देश में हो-हल्ला मचाया जा रहा है। उत्तर भारतीय लोगो के मुम्बई में रहने पर राज ने आपति जताते हुए कहा था कि इन लोगों का लगाव मुम्बई से न होकर अपने राज्यों से होता है। थिक ऐसा ही बयान दिल्ली के उपराज्यपाल का भी आया. उनका कहना था की उत्तर भारत के लोग दिल्ली में ट्राफिक नियमों को तोड़ने में अपनी शान समझते हैं। हालांकि अब दोनों के बयानों में कुछ नरमी आई है। इसी वक्त में राज ने देश के विभिन्न राजनितिक दलों द्वारा इसी तरह की राजनीति पर मीडिया से खुलकर बात की। उन्होने सभी राजनितिक दलों को धो डाला और कहा की जो लोग उनके बयान का विरोध कर रहे हैं वी सभी के सभी अपने-अपने इलाको में इसी तरह की राजनीति कर रहे हैं और अगर उन्होने अपने लोगों के हित की बात की है तो इसमें गलत क्या है।

राज ने कहा है कि अगर मैं और मेरी पार्टी महाराष्ट्र व मराठी अस्मिता की बात करते हैं तो हमें गुंडा ठहराया जाता है। तो क्या भिंडरावाला को शहीद कहने वाला अकाली दल, एलटीटीई का समर्थन करने वाली तमिलनाडु की पार्टियां और सौरभ गांगुली को भारतीय क्रिकेट टीम से बाहर करने के बाद दंगा करने वाली कम्युनिस्ट पार्टियां संकुचित प्रांतवाद की राजनीति नहीं करतीं ?' राज ने आगे कहा की जब फ्रांसीसी राष्ट्रपति भारत की यात्रा पर आए तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वहां सिखों की पगड़ी पर लगी रोक हटाने को लेकर बात की थी। यही नहीं , अकाली दल सिखों के पवित्र स्थल दमदमी टक्साल में जरनैल सिंह भिंडरवाला का फोटो शहीद का दर्जा देते हुए लगवाता है। उन्होंने आगे लिखा है कि यह साफ है कि एलटीटीई ने राजीव गांधी की हत्या करवाई थी लेकिन तमिलनाडु की सभी राजनीतिक पार्टियां इस उग्रवादी संगठन से किसी न किसी तरह जुड़ी हुई हैं। जब सौरभ गांगुली को भारतीय टीम से निकाल दिया जाता है तो कम्युनिस्ट पार्टियां बंगाल और बंगालियों के हितों की पैरोकार बनकर सामने आ जाती हैं। एक बार फिर अमिताभ को निशाना बनाते हुए राज ने लिखा है कि वह खुद को ' छोरा गंगा किनारे वाला ' कहने में गर्व महसूस करते हैं। राज पूछते हैं कि क्या ये सब संकुचित या क्षेत्रवाद नहीं है। और अगर नहीं है तो मेरा महाराष्ट्र और मराठियों की अस्मिता के बारे में बात करना कैसे संकुचित हो गया है?

हालांकि देश के किसी भी हिस्से में किसी के रहने और काम करने के अधिकार पर किसी भी प्रकार के कुठाराघात की निंदा होनी चाहिए। लेकिन ऐसा करने वाली सभी पार्टियों को भी अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। अब शिव सेना प्रमुख बला साहब ठाकरे अमिताभ के बचाव में सामने आये हैं लेकिन अब तक उनकी राजनीति इन्ही उत्तर भारतीयों के खिलाफ थी। आज अचानक जब राज ठाकरे ने मराथावाद का टोटका आजमा कर जब शिव सेना के साम्राज्य के लिए ख़तरा पैदा कर दिया तो अब सब की आंखों में खटकने लगे।

Wednesday, 6 February 2008

देश की राजधानी दिल्ली में ७५,००० भिखारी?

देश की राजधानी दिल्ली में २०१० में राष्ट्रमंडल खेल होने हैं। इसके लिए राज्य सरकार ने अभी से तैयारियां शुरू कर दी है। दिल्ली को लक-दक बनाने के लिए रोज नए-नए प्लान सामने आ रहे हैं। इसके अलावे भी दिल्ली में रोज नयी-नयी समस्याएं पैदा होती रहती है। जैसे बंदरों को पुनर्वासित कर इनके आतंक से लोगों को सुरक्षित करना, या दिल्ली की सड़कों और चौक-चौराहों को भिखारियों से मुक्त कराना। भिखारियों के मामले पर सरकारी अधिकारियों की कई बैठकें हो चुकी है। और जो परिणाम बैठकों के बाद निकला है उसपर ४ फरवरी को हिन्दुस्तान टाइम्स में एक खबर छपी थी। जिसके अनुसार देश की राजधानी दिल्ली में ७५००० भिखारी रहते हैं। और उनके लिए राजधानी में ११ पुनर्वास केन्द्र हैं।


अगर देखा जाये तो भीख मांगना कोई सामजिक समस्या नहीं है। इसका किसी जाति या धर्म से कोई नाता नहीं है। कानूनी रुप से भीख मांगना अपराध भले ही हो लेकिन भारत जैसे देश में भीख देना धार्मिक काम माना जाता है। और यही कारण है कि यहाँ के शहरों से लेकर गाँव तक में इस पेशे ने अब संगठित रुप अख्तियार कर लिया है। लेकिन राजधानी दिल्ली में भिखारियों की इतनी बड़ी संख्या हैरान करने वाली लग रही है। क्योंकि देश में सडकों पर रह रहे लोगों खासकर बच्चों के कल्याण के नाम पर सैकड़ों ग़ैर सरकारी संगठन काम कर रही हैं और जाहिर है उनमें से सबसे अधिक संगठनों का ध्यान राजधानी पर ज्यादा होगा। फिर भी इतनी बड़ी संख्या कैसे अब भी इस पेशे से जुडी हुई है।


राजधानी में आज ये एक बड़ी समस्या बन गयी है। आप कहीं भी बाहर निकलते हैं और छोटे-छोटे बच्चे आपको किसी भी सार्वजनिक स्थान पर घेर सकते हैं और आपसे पैसा मांगते हुए आपको अच्छा-खासा जलिल कर सकते हैं। मैंने इन लड़कों को अपने शिकार तक पहुँचने के पहले योजना बनाते हुए देखा है। मांगने वाले लोग पूरे समूह में होते हैं और ज्यादा पैसा देने वाले शिकार की पहचान करने के बाद उसमे से एक अपने काम पर लगता है। और वो सरेआम तबतक उस आदमी के आगे हाथ फैलाना जारी रखता है जबतक की वो आदमी शर्म से बचने के लिए उसे पैसे दे न दे।

देश की राजधानी दिल्ली में रेलवे स्टेशनों के बाहर कई लोग देश के झंडे की छोटी-छोटी तस्वीरें लेकर खड़े रहते है और जैसे ही कोई बाहरी आदमी मिलता हैं उसकी ओर लपक लेते हैं। इससे पहले की वो आदमी कुछ समझे। तीरंगा उसके पॉकेट पर लहराने लगता है। अब होता है उससे किसी स्कूल या किसी आश्रम के कल्याण के नाम पर पैसे मांगने का काम शुरू। और २०-२५ रूपये तक देकर लोग इस जनकल्याणकारी टीम से पीछा छुराने में सफल होकर जल्द से विजयी मुस्कान लिए वहा से आगे बढ़ते हैं। मुझे नहीं समझ में आता की ये कैसी जन कल्याण है।

इस पेशे को ख़त्म करते वक्त एक चीज का ध्यान जरूर रखना चाहिए। जैसे कुछ लोग अगर विकलांगता और अधिक उम्र के कारण इस काम को अपना रहे हैं तो उन्हें इसकी अनुमति देनी चाहिए। लेकिन वो भी खुलेआम सडकों पर नहीं। इसके लिए केवल धार्मिक स्थानों पर ही अनुमति मिलनी चाहिए।

Monday, 4 February 2008

लंदन में दिवाली मनाना तो अच्छा लगता है...

एक हैं राज ठाकरे। महाराष्ट्र की राजनीति में जगह बनाने के लिए ये इन दिनों काफी उछ्ल-कूद मचाये हुए है। कारण हैं इन्हें खुद को बाला साहब ठाकरे के समान कद बनाना है। लेकिन इन्हें इस काम के लिए अब तक सही मौका नहीं मिल पाया है। लेकिन अब उन्होने ये मौका खोज लिया है। अपनी रणनीति के तहत पहले दिन उन्होने मुम्बई में उत्तर प्रदेश दिवस मनाने पर ऐतराज़ जताया और अगले दिन लगे हाथों अमिताभ बच्चन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। और तीसरे दिन का इनका कारनामा ये रहा की भोजपुरी कार्यक्रम का प्रदर्शन कर रहे एक थियेटर पर हमला करने के लिए अपनी senaa की tukdii लेकर पहुंच गए।

हम पहले इनके पहले दिन के बयान की बात करेंगे। राज ठाकरे ने कहा कि मुम्बई में आकर उत्तर प्रदेश दिवस मनाना गलत है। राज जी आपने कभी लंदन में दिवाली मनाने का विरोध तो नहीं किया और ना ही किसी अमेरिकी सदन में वेद मंत्रों के उच्चारण पर हाय-तौबा machaaii। हालांकि वहाँ कई सरफिरे हैं जो वहाँ रह रहे हिन्दुओं को दिवाली मनाने का अधिकार देने का विरोध करते हैं। राज जी आपको भारत के संविधान में यहाँ के नागरिकों को मिले अधिकार को एक बार याद दिलाना चाहूंगा। भारतीय संघ का संविधान यहाँ रहने वाले हर नागरिक को देश के किसी भी हिस्से में जाकर रहने और अपने इक्छानुसार धर्म का पालन करने और roji-रोटी के लिए काम-dhandhe का अधिकार देता है। आपके हाय-तौबा मचाने से इसमें कोई बदलाव नहीं आने जा रहा है।

अब आऊँगा अमिताभ बच्चन के मसले पर। तो उनका नाम लेकर राज अपना कद बढाना चाह रहे हैं। अमिताभ सुपर स्टार हैं और उन्हें जितना मुम्बई के लोग मानते हैं उतना ही उत्तर प्रदेश के लोग भी और उतना ही बिहार के लोग भी। रही बात उत्तर प्रदेश से उनके लगाव की तो मैं याद दिलाना चाहूँगा की हमारा देश उन लोगों का भी स्वागत करता है जिनके पूर्वज सदियों पहले सूरीनाम, फिजी, मारीशस जैसे देशों में जाकर बस गए थे। आप तो एक देश के लोगों के बीच भेद पैदा करना चाहते हैं वो भी ऐसे शहर में जहाँ के ३० फीसदी लोग उत्तर भारतीय इलाकों से आये हुए हैं। और वहाँ की व्यवस्था में अच्छी-खासी पैठ रखते हैं। अमिताभ जी का janm उत्तर प्रदेश के alahaabaad में हुआ था और अगर उन्हें मुम्बई के alavaa उत्तर प्रदेश से भी लगाव है तो इसे aitraaj करने लायक maslaa कहना hasyaspad prayas माना जाएगा।............................जय भारत.

Friday, 1 February 2008

बीस हजार की बाईक और एक लाख की कार!

२००८ का साल भारतीय खरीददारों के लिए बहुत ही शुभ दिख रहा है। कम से कम पहले महीने का हाल तो कुछ ऐसा ही दिख रहा है। अब देखिए साल के शुरू में टाटा ने अपना लखटकिया कार दिखा कर लोगों को काफी ललचाया और अभी जनवरी का महीना ख़त्म भी नहीं हुआ था कि ग्लोबल ऑटोमोबाइल्स ने १०० सीसी की बाईक मात्र बीस हजार में उतार कर आम भारतीय खरीदारों के सामने एक और चारा हाजिर कर दिया। विशेषकर भारत के माध्यम आय वाले लोगों के लिए ये दोनो उत्पाद काफी मायने रखते हैं। जैसे बजाज ने दो पहिया वहाँ उतर कर उदार होने का प्रयास कर बाज़ार को कई लाख नए खरीदार दे दिए थे उसी तरह ये दोनो उत्पाद लाख नहीं बल्कि करोडों में बाज़ार को खरीदार दे सकते हैं। हालांकि जितने नए खरीदार बनेंगे उसने कई गुना ज्यादा भारतीयों के लिए ये एक लाख की कार और २०,००० की बाईक अब भी एक स्वप्न के समान रहेगा।

इन दोनों उत्पादों की एक खासियत ये होगी कि शहर के साथ-साथ गाँव भी इन उत्पादों पर टूट पड़ेंगे। जहाँ तक मैंने गांवों को देखा है तो मुझे लगता है की गाँव की एक बड़ी आबादी इन दोनों उत्पादों को खरीदने में सक्षम है। मेरे कहने का ये कतई मतलब नहीं लगाया जाये की भारत के गांवों में रहने वाला हर इंसान अब बाईक या कार पर चलने लायक हो गया है लेकिन हां एक बड़ी आबादी ऐसी है जो २०,००० की बाईक और एक लाख की कार खरीद भी सकती है और उसपर चल भी सकती है। इसका कारण है भारत में आर्थिक उदारीकरण के बाद बढ़ी आर्थिक प्रतिस्पर्धा। जिसने भारत के किसान से लेकर बड़े से बड़े व्यवसायी तक को अपने उत्पाद पर ज्यादा से ज्यादा फायदा कमाने का मौका दिया। आप कल्पना नहीं कर सकते की आज के वक्त में बिहार जैसे परम्परागत खेती के मशहूर राज्य का एक किसान अब नकदी फसल की ओर ज्यादा जोर देने लगा है। क्योंकि वो जानता है की धान और गेंहू जैसे फसल बोकर वो बमुश्किल अपना खर्च निकाल पाएगा फायदे की बात तो दूर रही। मेरा मानना है की देश में आई सूचना क्रांति को इसका श्री देना चाहिए। बिहार और उडीसा जैसे पिछडे प्रांतों के लोगों तक ये सूचना अब आसानी से पहुंच रही है की कैसे गुजरात और पंजाब के किसान नकदी फसल बेचकर अमीर होते जा रहे हैं।

Thursday, 31 January 2008

अगर जल्लिकट्टू में आस्था है तो रामसेतु में क्यों नहीं!

सवाल केवल रामसेतु का नहीं है। अब ये हिन्दू आस्था का सवाल बन गया है। अगर कोई रामसेतु मामले पर आस्था के सवाल को टालने की फिराक में है तो उसे तमिलनाडु में हाल में मिले जल्लिकट्टू यानि की सांढों की बर्बर लड़ाई के आयोजन को आस्था के नाम पर अनुमति मिलने का विरोध करना चाहिए फिर उसे राम सेतु पर हिन्दू भावनाओं की बात को नकारने की मांग रखनी चाहिए। राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील हो चुके सेतुसमुद्रम परियोजना को रोकने और इसे आगे बढाने को लेकर तमाम दावे और तर्क दिए जा रहे हैं। इसमें ताजा बयान तटरक्षक बल का आया है। जिसने आदम पूल या रामसेतु को तोड़ने और वहाँ सेतुसमुद्रम परियोजना पर काम करने को देश की समुद्री सीमा के लिए ख़तरा बता कर राम सेतु को तोड़ने का समर्थन करने में लगे लोगों को एक झटका दे दिया है। तटरक्षक बल के 31 वें स्थापना दिवस की पूर्व संध्या पर संवाददाताओं को संबोधित करते हुए संगठन के महानिदेशक रूसी कांट्रैक्टर ने कहा कि इस परियोजना से सुरक्षा के कई मुद्दे जुड़े हैं और पड़ोसी देश की सीमा के यह बहुत नजदीक है जो समस्याओं का सामना कर रहा है। उन्होंने कहा कि सेतुसमुद्रम का रास्ता भी बहुत संकरा और किसी पोत के वहां फंसने से पेचीदगियां पैदा हो सकती हैं।

कांट्रैक्टर ने कहा कि यह एक बड़ी परियोजना है और इससे सुरक्षा के कई मुद्दे जुडे़ हैं। इसके अलावा पर्यावरण के भी मामले इससे संबद्ध हैं। महानिदेशक ने कहा कि उन्होंने तटरक्षक बल की राय सरकार को बता दी है और उस पर विचार किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह परियोजना श्रीलंका की सीमा से बहुत नजदीक है जो समस्याओं का सामना कर रहा है। अब सुनिए उन्होने इस प्राकृतिक सीमा रेखा को बचाने के पीछे क्या तर्क रखे हैं। उन्होंने कहा कि अगर समुद्र का यह रास्ता मुक्त रूप से खोल दिया गया तो पाइरेसी और आतंकवाद समेत तमाम तरह के समुद्री खतरों से जुडे़ मुद्दों से भी निपटना होगा। जाहिर है राम सेतु को बख्शने के पीछे आस्था के साथ-साथ अब सुरक्षा का मसला भी तर्क का काम करेगा।

भले ही कांट्रैक्टर का यह बयान कई राजनीतिक पार्टियों के लिए वोट जुटाने का कारण बन जायेगा, लेकिन आम हिन्दू जनमानस जिनके लिए आज भी राम काफी श्रधेय हैं और जो किसी भी कीमत पर राम से जुडे सभी स्मारकों को बचाने के पक्ष में है एक बड़ी सफलता है। राम आज भी लाखों-करोडों हिन्दू घरों में पूजे जाते हैं. और सभी हिन्दुओं के लिए रामसेतु आस्था का एक सवाल बन गया है। अगर आज के वक्त में राम सेतु को तोड़ने का साहस कोई भी सरकार करेगी तो ये सीधे तौर पर हिन्दू भावनाओं पर कुठाराघात के रूप में देखा जायेगा और जाहिर है कि उस सरकार को हिन्दुओं के गुस्से का सामना करना पडेगा। इस मामले पर हो रही राजनीति इसे अयोध्या मामले के राह पर लेकर जा रही है।

Wednesday, 30 January 2008

भाषण की पुरानी शैली अब बोर करने लगी है!

मुझे आज लगता है कि जैसे चिट्ठी लिखने की शैली अब बोरियत वाला काम लगने लगा है वैसे ही नेताओं की भाषण देने की पुरानी शैली भी अब बोर करने लगी है। बहुत साल नहीं हुए, यही कोई १०-१२ साल हुए होंगे जब मैं गाँव में रहता था। उस समय मुझे याद है की मेरे गाँव में उस समय टेलीफोन नहीं हुआ करते थे और अगर था भी तो पीसीओ वाले के पास। उस समय घर से बाहर रहने वाले लोगों के पास चिट्ठी भेजना पड़ता था। एक दिन चिट्ठी लिखिए फिर उसे जाकर ३ किलोमीटर दूर के डाकखाने में डालना होता था। ८-१० दिनों में चिट्ठी पहुंचती थी और फिर अगले ८-१० दिनों बाद उसका जवाब आता था। आगे जब फोन की सुविधा बढ़ी तब ये काम बहुत बोरियत वाला लगने लगा। हालांकि गाँव छोड़ने के बाद भी २-३ सालों तक मैंने चिट्ठी लिखने के काम को अपने परिवार की परम्परा मानकर धोया। लेकिन समय के साथ ये काम बड़ी बोरियत वाला लगने लगा और अब तो चिट्ठी की जगह फोन ने ले ली है . बस मोबाइल उठाया और फ़ोन घुमा दिया। और कर ली बात। और हां चिट्ठी में जो भूमिका होती थी बड़ी मजेदार लगती थी। मैंने अपने बचपन में अपने दादा जी की चिट्ठी से जो भूमिका चुराई थी उसे कुछ sansodhanon के साथ आख़िर तक चेपता रहा।

ठीक इसी तरह भाषण का भी हाल अब बोर करने लगा है। बचपन में १५ अगस्त और २६ जनवरी को मास्टर साहब लोगों और इलाक़े के सज्जन लोगों के भाषण सुनने पड़ते थे। लेकिन लड्डू के चक्कर में वो अखरता नहीं था। आगे जाकर कॉलेज में छात्र नेता लोग कभी-कभी बोर करते थे। वो भी चला। वैसे भाषण से कोई परहेज तो नहीं रहा है मुझे लेकिन जो भाषण का पहला हिस्सा होता है वो श्रीमान, श्रीमती, सज्जनो और भाईयो-बहनो वाला भाग हमेशा से बोरियत वाला लगता रहा है। लेकिन अब जाकर ये भाग काफी झेलाऊ लगने लगा है। मैंने कभी किसी नेता का भाषण सुनने के लिए कोई मुसीबत अब तक नहीं उठाई है। सच कहें तो कभी कोई भाषण सुनने के लिए मैं कहीं गया ही नहीं। लेकिन अब एक पत्रकार के तौर पर कभी-कभी सुनना पड़ता है। हालांकि अपने काम भर ध्यान देता हूँ और बाक़ी सर के ऊपर से जाने देना अच्छा लगता है। लेकिन आज ३० जनवरी को करीब आधे घंटे तक लोगों को लोगों को गांधी जी के बारे में सुनना पडा और वो भी एक आम श्रोता की तरह। वो भी ये जानते हुए की बोलने वालों में से किसी का भी गांधीजी से कोई वैचारिक लगाव नहीं है। आप सोच सकते हैं की कितना झेलाऊ आधा घंटा काटा है मैंने आज। आज एक आम श्रोता की तरह भाषण सुनने के बाद दिन भर में मेरे मन में कई बार ये विचार आया की अब नेता लोगों को भी भाषण का अपना पुराना तरीका बदल देना चाहिए। जब मैं आधे घंटे में इतना बोर हो सकता हूँ तो लोग तो अपने नेता को सुनने के लिए कई-कई घंटे तक इंतज़ार करते हैं और उसके बाद भाषण को सुनते भी हैं। पता नहीं लोगों में इतनी सहनशीलता कहाँ से आती है।

Sunday, 27 January 2008

बाबा ने कहा- इस बार किस्मत जरूर बदलेगी।

इस बार गाँव जाना हुआ। वहां पर कई साधू-महात्मा लोगों से मुलाक़ात हुई। वहाँ कि दुनिया वैसी ही है। बाबा लोगों के लिए गाँव अभी भी ठौर बने हुए है। ऐसे ही एक बाबा आये हुए थे। परिवार के सब लोगों को भविष्य की किस्मत का चिटठा बंचवाते देखा तो सोचा कुछ अपने बारे में भी जानता चलूँ। कौन नहीं चाहता की उसे उसके भविष्य के बारे में पता चले। मैंने भी झट से पंडित जी के आगे हाथ पसार दिया। मैंने सोचा परिवार के फीस में ही अपना भी काम चल जायेगा। बाबा ने कुछ देर ह्थेली को देखा। करीब ४-५ सेकंड तक। फिर बोले बच्चा अब तेरे अच्छे दिन आ गए हैं। मैं नहीं समझ सका इन ४-५ सेकंड में बाबा को मेरे हाथ में ऐसा क्या दिख गया। बाबा ने कहा बस एक पत्थर चांदी की अंगूठी में लगाकर पहन ले और भी अच्छे दिन आ जायेंगे। इतना सुनना था की मेरे दादा जी का कान उनकी बात पर आकर ठहर गई। झट से कलम मंगाया गया और पंडित जी को देकर कहा गया पत्थर के बारे में पूरा डीटेल लिखकर दे दीजिए। मैंने हाथ बढाया लेकिन लोगों को मुझपर भरोसा नहीं था, उन्हें लग रहा था की शायद कहीं गलत नाम ना लिख दूँ इस लिए पंडित जी के हाथ से ही लिखवाना बेहतर होगा। मैंने भी लोगों की इक्षा को देखते हुए पंडित जी के हाथों से अपनी किस्मत लिखता हुआ देखने की बात मान ली। अगर कोई विरोध करता तो आस्था तोड़ने का आरोप झेलना पड़ता।

इससे पहले भी कई बार मेरे बारे में ज्योतिष लोगों ने कई-कई भविष्यवानियाँ की है लेकिन पता नहीं क्या हुआ लेकिन इस बार की भविष्यवावाणी के बाद लग रहा है की शायद किस्मत का हाल कुछ-कुछ वैसा ही बदल जायेगा जैसे कि नीतिश सरकार के आने के बाद बिहार की जनता को लगने लगा है कि राज्य की किस्मत जरूर बदल जायेगी. यही हाल है एक मेरे मित्र का भी. वे बेचारे फील गुड के चक्कर में हमेशा ज्योतिष के चक्कर में फंसते रहते हैं। अब एक दिन उनके किसी ज्योतिष ने कह दिया की आपकी कुंडली में बुढापे तक प्रेम का योग है। अब क्या था उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। मेरा भी मानना है कि उनके अतीत को देखकर उनके भविष्य के बारे में पंडित जी का आकलन जरूर सही होना चाहिए।