Saturday, 15 October 2011

आम आदमी की गौरव गाथा! (व्यंग्य)

((आपने सिंदबाद और गुलीवर की रोमांचकारी जीवनशैली और साहसिक यात्राओं की कहानियां अनेको बार पढ़ा होगा लेकिन आज आपके सामने प्रस्तुत है हमारे देश में हमेशा चर्चा के केंद्र में रहने वाले आम आदमी की एडवेंचरस जिंदगी की कहानी।))

मैं आम आदमी हूं। चेहरा 120 करोड़ में से..अरे नहीं..नहीं बीपीएल के 40 करोड़ चेहरों में से कोई भी एक चेहरा समझ लीजिए। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और कभी सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत भूमि में जन्मा आम आदमी। जिसकी गौरव गाथा आपको किसी भी बहस मुबाहिसे, राजनीतिक रैली, भाषणबाजी या टीवी पर हो रही चर्चाओं में अक्सर गुंजती हुई सुनाई पड़ सकती है। कई बार तो मुझे लेकर एसी सेमिनार हॉलों में चर्चा गर्मा भी जाती है। वैसे अगर लाइमलाइट(रील लाइफ) से निकलकर देखें तो मेरी रीयल लाइफ की कहानी भी काफी एडवेंचरस मिलेगी। जो जन्म से शुरू होकर अंतिम संस्कार या कई बार उसके बाद तक खींच जाती है, अगर उसपर राजनीति शुरू हो जाये या फिर टीवी चैनलों की पीपली लाइव टाइप कुछ मेहरबानी हो जाये।

हां, तो हम बात कर रहे थे अपने जन्म की।
तो हमारे जन्म की संभावनाएं दशकों से देश में चल रही तमाम परिवार नियोजनों की योजनाओं और तमाम आकलनों से कहीं ऊपर होती हैं। प्रसव की कहानी भी कम रोमांचकारी नहीं होती। गांव-घर की दाईयों की मदद से धरती पर अगर पांव रख दिया तो ठीक वरना सरकारी अस्पतालों की ओर गर्भ में रहते ही मेरी दौड़ शुरू हो जाती है। अस्पताल में दाखिल होने का नंबर मिला तो ठीक वरना अस्पताल के बाहर सड़क पर ही मैं अपना अवतरण पूरा कर लेता हूं। वैसे कई बार अस्पताल तक पहुंचने की नौबत भी नहीं आती और प्रसव प्रक्रिया को लाखों-करोड़ों की लागत वाली सड़कों में देवदूतों की तरह उभर आये गढ्ढे ही कई बार पूरा कर देते हैं।

चलिए ये तो रही मेरे पैदा होने के एडवेंचर की कहानी, अब थोड़ी शिक्षा-दीक्षा से जुड़ी हुई बातें भी कर ली जाये जिसका मुझे इस देश में अनिवार्य और मुफ्त प्राप्ति का अधिकार प्रदान किया गया है। हां, तो अगर मैं स्कूल जाने में सफल रहा तो वहां दोपहर के पहले का समय खिचड़ी के इंतजार में और उसके बाद का समय छुट्टी के वक्त में कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता। और अगर स्कूल नहीं जा सका तो किसी साहब के घर में घरेलू कामकाज या फिर किसी साइकिल पैंचर की दुकान पर या रेस्टूरेंट वगैरह में काम पाकर अल्पआयु में ही रोजगार हासिल करने वाले देश के कुछेक खुशकिस्मत बच्चों में शामिल होने का गौरव प्राप्त करता हूं। तब हर साल बाल मजदूर दिवस के अवसर पर अखबारों में छपे हमारे फोटो व उसके ईर्द-गीर्द छपे बड़े-बड़े नेताओं की तस्वीरों व हमारे कल्याण के नारों से हमें फिर साल भर जी-तोड़ मेहनत करने की ऊर्जा मिल जाती है।

खैर जवानी की दहलीज पर कदम रखते वक्त हम भी मन में कई सपने सजाते हैं जैसे सिने स्टार्स की तरह लकदक जिंदगी हो, धूंए के छल्ले उड़ाते हीरोज की तरह स्टाइल हो या फिर बाहों में हीरोइनों को देखने की तमन्ना आदि।

हालांकि, जवानी के दिनों में हमे रोजगार के लिए देश ने काफी अच्छी लोकतांत्रिक व्यवस्था दे रखी है। अगर पढ़ लिया तो घर की खेती-बाड़ी या मां-बाप की बची-खुची पूंजी लेकर कोई नौकरी दिलाने वाले बहुत सारे समाजसेवी मिल जाते हैं और अगर पढ़ लिख नहीं सके तो सरकार साल में सौ दिन के रोजगार की गारंटी तो देती ही है। इसी बहाने सड़क, पूल, तालाब आदि बनवाने के काम में जुटकर थोड़ी-बहुत देश की सेवा भी हो जाएगी। हां ये अलग बात है कि 100 दिन का काम पाने के लिए भी कई लोगों को चाय-पानी का प्रबंध तो करना ही पड़ता है लेकिन कहते हैं न कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है। सो हम तो भई संतुष्ट हैं। वैसे भी हमारी संस्कृति का संदेश भी यही है- संतोषः परम् सुखम्।

इधर एक संतोष की खबर और आई है हमारी जमात के लिए। कल सुना था रेडियों में कि सरकार ने फिर कहा है कि आम आदमी की तरक्की के लिए हम प्रतिबद्ध हैं। सुना है भूख हड़ताल वाले बुजुर्ग समाज सेवी भी हमे ही भ्रष्टाचार के चंगुल से निकालने के लिए अनशन पर बैठते हैं और जल्द ही इसपर कोई कानून भी बनने वाला है।

वैसे साल में 365 दिन होते हैं। 100 दिन की समाजसेवा से मुक्ति पाकर शेष दिनों में हमारे करने लायक बहुत कुछ होता है इस देश में। चुनावों के मौसम में राजनीतिक रैलियों में जनसमर्थन बनकर मैं ही अपार भीड़ के रूप में दिखता हूं। मैं न होऊं तो भला नेताजी लोगों का भाषण सुनेगा कौन... और कौन उनकी रैलियों को ऐतिहासिक व सफल बनाएगा। कौन उनके बैनर पोस्टर और झंडे ढोएगा। मैं ही सभी राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों में आश्वासनों और वादों का लक्ष्य होता हूं और मुझे ही लुभाने के लिए लोकलुभावन नारे भी दिये जाते हैं। अपने पसंदीदा उम्मीदवार को चुनाव जीताने के लिए हम ही लंबी लाइनों में लगते हैं और फिर जीतकर जाने के बाद जब वे पांच साल तक वापस लौट कर नहीं आते तो हम कोई शिकायत भी नहीं करते। सही मायनों में देश में लोकतंत्र के असल पहरूए हम ही हैं।

मैं आम आदमी हूं। मैं ही रोजाना सुबह टीवी पर आने वाले बाबा लोगों के प्रवचनों के दौरान भक्तों के अपार जनसमूह के रूप में अपनी समस्याएं सुना रहा होता हूं और उनके चमत्कारी समाधान के लिए बाबा लोगों के गुणगाण भी मैं हीं गाता हूं। अब सोचो अगर मैं ना रहूं तो कैसे रहेगा इस तरह के विज्ञानों और ऐसे विद्वानों का मान।

मेरे ही कल्याण के लिए दिल्ली के सत्ता प्रतिष्ठानों में पिछले 64 साल से तमाम योजनाएं बनती आ रही हैं और विदेशों से पढ़-लिखकर स्वदेश आयातित योजनाकार मेरे कल्याण के लिए ही इतने सालों से योजनाएं बना रहे हैं। उनका मान रहे इसके लिए उनके द्वारा तय किये 32 रुप्ये, 26 रुप्ये व 20 रुप्ये जैसी छोटी राशियों में भी हंसी-खुशी अपना जीवन हमी जीते हैं। ये अलग बात है कि इन योजनाओं के बदले वे लाखों-करोडो़ कमा ले जाते हैं।

यही है हमारी यानि इस महान भारत भूमि के आम आदमी की गौरव गाथा। तो कृप्या हर टीवी शो, राजनीतिक रैली व बहस-मुबाहिसों में हमारी लोकप्रियता से जलने वालों अब तो समझों हमारे त्याग को जिस कारण हम आज भी विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के केंद्र बिंदू बने हुए हैं।
भई... हम तो इस गौरव से खुश है और बस यही कहना चाहेंगे..
"अगले जनम मोहे आम आदमी ही कीजो..."

Wednesday, 21 September 2011

इन योजनाओं पर तरस आता है..32 रूपये में एक दिन जीकर दिखाएं ये नीति नियंता...

आज सुबह जब देश के लोग जगे तो मीडिया ने भारत देश के इस आम आदमी के सरकार का एक और ही रूप देश के सामने रखा। खबर थी कि सुप्रीम कोर्ट में एक एफिडेविट में देश के विकास की योजना बनाने के लिए जिम्मेदार योजना आयोग ने कहा है कि शहरी इलाके में जिंदगी जीने के लिए एक आदमी को रोजाना 32 रुपये और ग्रामीण इलाके में 26 रुपये की जरूरत है औऱ जो भी इतना खर्च करने की कुव्वत रखता है वह गरीब नहीं माना जाना चाहिए। अब आज महंगाई के हालात को देखते हुए ज्यादा आंकड़े देने की जरूरत नहीं है कि कैसे आज के हालात में एक आदमी दिल्ली और मुंबई जैसे शहर में 32 रुपये में खाना भी खा लेगा, रह भी लेगा, इलाज भी करा लेगा, ईएमआई भी भर लेगा, पढ़ाई भी कर लेगा, इलाज भी करा लेगा, आदि-आदि।

खैर इसमें दोष किसी का नहीं है। इस देश की जनता को सोचना होगा कि उनके विकास के लिए योजना कौन बनाए। ऐसे लोग जो विदेशों में पढ़-लिखकर और नौकरी कर आते हैं और सीधे ऊपर से योजना बनाने वाली एजेंसियों में बैठा दिए जाते हैं। उन्हें देश की जमीनी हकीकत का ना तो कोई अंदाजा है और ना ही वे समझने के लिए गांव की धूल कभी फाकेंगे। तो भई क्या कहा जाए ऐसे देश में जहां रईसी का जीवन जीने वाले लोग देश के आम आदमी को गरीबी रेखा से ऊपर उठने के लिए 32 रुपये वाला सर्टीफिकेट जारी करते हों। इस देश को सोचना होगा कि उन्हे अगर लोकतांत्रिक देश का हिस्सा बनकर रहना है तो इस व्यवस्था में उनका क्या स्थान होना चाहिए। किसानों के उत्पादों को मुफ्त में चाहने और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादों के लिए मुंहमांगी कीमत देने की मंशा पालकर पली-बढ़ी हमारी शहरी आबादी कभी भी देश के गांवों में बसे आम आदमी की असल स्थिति को नहीं समझ सकती। किसी को अगर फिर भी मुगालता हो तो एक दिन जरा इस सरकारी आंकड़े वाले 32 रुपये में शहर में और 26 रुपये में किसी गांव में बिताकर देख ले।

Monday, 12 September 2011

दुनिया की भीड़ में!

हम सब दुनिया की भीड़ में शामिल हैं जो सुबह से लेकर शाम तक कोई-न-कोई काम लेकर यहाँ से वहाँ दौड़ती रहती है। सड़क, गाडियाँ, रेड लाईट ये सब इस भीड़ की जिंदगी की रोजमर्रा में शामिल है। लेकिन क्या कभी आपने इस भीड़ से ख़ुद को अलग कर कहीं दूर बैठकर इस भीड़ को देखा है। लोगों को शायद ये अटपटा लगे लेकिन मुझे इस तरह के अनुभव लेने की आदत है। इस अनुभव पर मैं अपनी एक कविता के कुछ अंश नीचे दे रहा हूँ।

कभी देखिये
भीड़ से अलग होकर
दुनिया की भीड़ को
सड़क पर बेतहाशा
दौड़ती-भागती भीड़ को
सुबह से शाम तक
बस भागती हुई भीड़ को!

लेकिन ये भीड़ कभी रूकती नहीं है। दुनिया के हजारों-लाखों शहर और ग्रामीण इलाकों के सडकों और चौराहों पर पर यह भीड़ उतनी ही शिद्दत से दौड़ रही है। फर्क इतना है कि आज हम इस भीड़ का हिस्सा हैं, कल कोई और था और आने वाले कल में इस भीड़ में कोई और शामिल होगा...

आगे.........

कभी नहीं रूकती ये
बस थमती है
आधी रात को
केवल एक पहर के लिए
और फ़िर चल पड़ती है
सुबह होते ही।।

Friday, 19 August 2011

दीवालघड़ी की सूईंयां....मध्यवर्गीय जीवन पर आधारित हिंदी कहानी

दीवालघड़ी की सूईंयां

सोने का प्रयास करते-करते थक चुके रामजतन की निगाहें आखिरकार दिवार के सहारे टंगी घड़ी पर टिक गई। सुबह के चार बज रहे थे। आंखों से नींद गायब थी और दिल में सुकून नाम की कोई चीज नहीं थी। पिछले 18 घंटे से मन में एक ही सवाल कौंध रहा था कि सुबह 10 बजे तक नगरनिगम के अधिकारी को देने के लिए 3 लाख रुपये का जुगाड़ कहां से होगा? बेटे को आईआईएम में दाखिला दिलाकर कल हीं लौटे रामजतन ने अपनी पूरी सार्म्थ्य झोंककर फीस का जुगाड़ जैसे-तैसे किया था। पिछले साल बेटी की शादी के लिए घर और दूकान पर 7 लाख का कर्ज पहले ही ले रखा था। बेटे को एडमिशन दिलाकर घर लौटे तो दरवाजे पर नगरनिगम का नोटिस चस्पां देखा।

आनन-फानन में अपने परम मित्र परमानंद को लेकर निगम कार्यालय पहुंचे तो पता चला कि निगम की सर्वे टीम ने घर का नक्शा अवैध घोषित कर दिया है और 15 दिन में तोड़ने की कार्रवाई होगी। निगम का फरमान सुन रामजतन को अपने पांव के नीचे से जमीन खिसकती सी लगी। परमानंद जैसे-तैसे रिक्शे में उन्हें लादकर घर पहुंचे। उनकी श्रीमति कमला देवी ने सुना तो रो-रोकर पूरा मोहल्ला सर पर उठा लिया। खैर रोने-धोने से कुछ होने वाला तो था नहीं, सो परमानंद की सलाह पर रामजतन हर समस्या की तोड़ देने वाले मोहल्ले के छुटभैये नेता कल्लन काका के यहां पहुंचे और अपनी आपबीती सुनाई। उम्मीद के अनुरूप काका ने निराश नहीं किया और उन्हें लेकर इलाके के पार्षद के यहां पहुंचे। पार्षद महोदय ने उनकी बात सुनकर पहले तो व्यवस्था की खराबी और भ्रष्टतंत्र को खूब कोसा फिर फोन से निगम के एक वरिष्ठ अधिकारी से बात की। बात पूरी कर फोन रख पार्षद महोदय अपनी ओर उम्मीद भरी टकटकी लगाए रामजतन की ओर मुखातिब हुए और कहा कि अधिकारी अवैध मकान की सूचि से आपका नाम हटाने के लिए 4 लाख रुप्ये की मांग कर रहा है लेकिन मेरे कहने पर वह 3 लाख पर मान गया है। हां, लेकिन शर्त यह है कि पैसे कल सुबह 10 बजे देने होंगे वरना सूची वह ऊपर भेज देगा।

रामजतन की हालत ऐसी मानो काटो तो खून नहीं। नेता जी को ऊपरी मन से धन्यवाद देकर वहां से निकले। मन बेचैन हो गया। सूरसा के मुंह सा ये सवाल सामने तैर गया कि जिस घर को बनाने के लिए जिंदगी के 30 सालों की पूरी मेहनत की कमाई उन्होंने खपा दी उसी को बचाने के लिए अब 3 लाख रुप्ये कहां से लाएं? वे भी महज 24 घंटे के भीतर? हाथ वैसे ही आजकल खाली है। रास्ते में कल्लन काका ने हिसाब समझाया कि 30 लाख कीमत वाले घर को बचाने के लिए 3 लाख का सौदा महंगा नहीं है। इस बीच चार लाख से घटाकर तीन लाख कराने वाले नेता जी का अहसान गिनाने से भी वे नहीं चूके।

पूरे दिन भर हाथ-पांव मारने के बावजूद रामजतन को इन पैसों के बंदोबस्त होने की कोई संभावना दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रही थी। पूरी रात जगी आंखों में काट चुके रामजतन की निगाह फिर दीवालघड़ी पर जा टिकी। साढ़े चार बज गये थे और घड़ी की सूईंया अपनी गति में भागी जा रही थीं। मन हुआ कि उठकर दीवालघड़ी की सूईंयों को थाम लें ताकि इस रात की कभी सुबह न हो। रात ऐसे ही चलती रहे और किसी नगरनिगम का कोई कार्यलय फिर कभी न खुल सके। रामजतन को अपनी समस्या का यही एकमात्र हल अब दिख रहा था। लग रहा था जैसे काली स्याह रात और अनंत आकाश में उनके हाथ अपने-आप दीवालघड़ी की सूईयों की ओर बढ़े चले जा रहे हैं और सूईंयां उनसे दूर कहीं छिटकती जा रही हों।

Tuesday, 16 August 2011

हमारा नेतृत्व भूल गया है अपना काम...अन्ना जैसो को तो आगे आना ही पड़ेगा!

15 अगस्त 2011 को ऐसा पहली बार हुआ कि लाल किले के प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए माननीय प्रधानमंत्रीजी की हर एक बात ऐसी लग रही थी जैसे कोई झूठ का पुलिंदा पढ़ रहा हो। विकास और इमानदारी की एक-एक बात मन को ऐसे चुभ रही थी जैसे भुख से बिलखते किसी इंसान के सामने कोई आर्थिक तरक्की के अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों और परिभाषाओं का ज्ञान बघार रहा हो। हर साल स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के अवसर पर तरक्की और विकास के नारों से लबरेज भाषण को सुन-सुनकर पक चुकी देश की जनता अब ऐसे नारों को सुनना पसंद नहीं करती। ये बात हमारे हुक्मरानों को अब समझ जाना चाहिए।

{महंगाई रोकने के लिए हरसंभव कदम उठाए जा रहे हैं।
रोजगार के अवसर और समग्र विकास के लिए योजनाएं बनाई जा रही है।
भारत को शिक्षा का केंद्र बनाने के लिए तमाम प्रयास किए जा रहे हैं।
गांवों का विकास सरकार की प्राथमिकता है।
और
कृषि के विकास के लिए दूसरी हरित क्रांति की जरूरत है।
आदि-आदि जैसे भाषण रोज-रोज सुन-सुनकर लोग वाकई बोर हो गये हैं।}

क्योंकि रोज-रोज भाषण देने वाला हमारा नेतृत्व कभी ना तो कुछ ठोस करता हुआ दिखता है और ना ही उसकी ऐसी नियत दिखाई पड़ती है। आज ये सोच केवल मेरी नहीं है बल्कि देश में लगातार बेकाबू होती महंगाई, लूट-खसोट, बेइमान और भाई-भतीजावाद वाली इस व्यवस्था में जी रहे देश के हर आम आदमी की आज यही सोच बनती जा रही है। आज हमारे देश के नेतृत्व को इस बात पर विचार करने की जरूरत है कि आखिर क्या कारण है देश में ऐसी निराशावाद के बढ़ने की। क्यों अण्णा हजारे, अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी जैसे लोगों की अपील पर लोग अपने द्वारा चुनी हुई सरकारों के खिलाफ खड़े होते जा रहे हैं।

यहां असल सवाल उठ रहा है नेतृत्व के काम-काज और उसके द्वारा निभाई जा रही जिम्मेदारी को लेकर। आखिर किसी भी लोकतांत्रिक समाज में समाज या राष्ट्र के नेतृत्व का काम क्या है?
हमें ये बात अब साफ करना होगा कि कोई भी समाज कुछ लोगों को चुनकर सत्ता सौंपता है और नैतिकता और अनुशासन के सामुदायिक नियमों का इसलिए स्वेच्छा से पालन करता है ताकि ये चुने हुए लोग उनके सामूहिक उन्नति के लिए काम करे। सामूहिक तरक्की की योजनाएं बना सकें, उन्हें लागू कर सकें, वर्तमान जीवन की सामूहिक सुविधाओं जैसे अस्पताल, सड़क, स्कूल आदि का विकास कर सके। समाज के बेहतर भविष्य के लिए योजनाएं बना सके। ताकि वर्तमान के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी दुनिया को सुरक्षित और बेहतर बनाया जा सके। लेकिन क्या हमारे देश के हुक्मरानों में ऐसी कोई भावना, दूरदृष्टि या योजना दिखाई देती है या फिर ऐसा कुछ करने का नियत दिखाई देती है? बिल्कुल नहीं। बस उनके भाषणों में तरक्की और सबके उन्नयन की बातें होती हैं..एक तरफ देश भर में लोग भूखमरी के शिकार हो रहे हैं, बेरोजगारी और असुरक्षा बढ़ती जा रही है, किसान अपनी जमीनों से बेदखल किए जा रहे हैं, खेती की बदहाली बढ़ती जा रही है, देश कर्ज में डूबता जा रहा है और दूसरी ओर हमारी व्यवस्था के संचालक भ्रष्टाचार में लिप्त हुए पड़े हैं और इन्हें जनता की आवाज सुनाई ही पड़ती। सिविल सोसाइटी के सदस्य जनता की इसी पीड़ा की आवाज बनकर सामने आए हैं और अगर जल्द इसे नहीं सुना गया तो सत्ते के नशे में चूर ये राजनीतिक शक्तियां जनता के प्रत्यक्ष गुस्से का भी जल्द शिकार बनने लगेंगी। इसलिए जरूरत है कि वक्त रहते ये संभल जाएं और देश की तरक्की के लिए इमानदारी के साथ काम करना सिख जाएं।

Friday, 12 August 2011

क्यां नशा हमारे लिए आधुनिकता का प्रतीक बन चुका है?


रोहन की बर्थडे पार्टी थी और सभी दोस्तों की जिद पर उसने पार्टी का प्लान कर लिया. घर से अनुमति लेकर वह दोस्तों के साथ पार्टी के लिए निकला. उसने कभी कोई नशा नहीं किया था लेकिन दोस्तों के बार-बार ये कहने पर कि अरे बीयर में नशा थोड़े ही होता है उसने बीयर पी ली. उसके दोस्त अक्सर कहते थे कि अरे यार इन पुराने ख्यालों से बाहर निकल और जिंदगी के थोड़े मजे लिया कर. बार-बार ऐसा कहने पर उसने इसे आधुनिकता का प्रतीक मान लिया. इस बात के बीते अभी करीब एक साल हुए थे और इस एक साल में दोस्तों की संगत में रोहन ने शराब पीनी भी शुरू कर दी. पॉकेट खर्च के लिए घर से मिलने वाले थोड़े से पैसे से ये सारी जरूरते पूरी होनी संभव नहीं थी इसलिए रोहन और उसके दोस्तों ने स्नैचिंग की वारदातों को अंजाम देना भी शुरू कर दिया. उसके प्रतिभावान होने और हमेशा कालेज की पढ़ाई में व्यस्त रहने की ढोल पीटने वाले उसके घरवालों को इन सब बातों का पता तब लगा जब पुलिस ने दोस्तों समेत उसे स्नैचिंग के केस में धर दबोचा.

दिल्ली जैसे शहर में रोहन जैसी कहानी आपको हर गली-मोहल्ले में देखने को मिल जाएगी. सवाल यहाँ ये उठता है कि आखिर इन सब प्रवृतियों के बढ़ने का कारण क्या है? नशे की बढती लत पर रोक लगाने में हमारा समाज क्यूँ विफल रहा है? आधुनिकता के हमारे प्रतिमान ऐसे क्यूँ हैं? तमाम कानूनी रोक-थाम और पाबंदियों के बावजूद हम नशाखोरी को रोक क्यों नहीं पा रहें?

7 अगस्त को दिल्ली के एक स्‍कूल के परिसर में फ्रेंडशिप डे के नाम पर शराब पीते हुए 14 छात्राएं पकड़ी गईं। नागरिक उड्यन मंत्रालय के आंकड़ो पर अगर गौर करें तो पिछले तीन सालों में शराब पीकर उड़ान भरने की कोशिश करने वाले 67 पायलटों को परीक्षण के दौरान पकड़ा गया। सोचिये अगर ये पाईलट विमान उड़ाने में सफल रहते तो सैकड़ों लोग इनके भरोसे ही हवाई सफ़र पर होते. देश की राजधानी दिल्ली में ब्रह्मपुरी में हुआ शराब काण्ड या फिर देश के विभिन्न हिस्सों में अक्सर होने वाले शराब काण्ड जिनमे दर्जनों लोग अपनी जान गवाँते रहे हैं. या फिर हर बार नए साल के जश्न के पहले राजधानी दिल्ली में पुलिस द्वारा शराबियों और नशाखोरों पर शिकंजा कसने की प्रबल तैयारियां दर्शातीं हैं कि हम किस हद तक इन बुराइयों को अपने समाज की संरचना में बसा चुके हैं और ये बुराइयाँ ही अब हमें डरा रही हैं. जिनपर अब हम काबू नहीं पा सकते और जिनसे बचाने की गुहार लेकर अब हमें पुलिस प्रशासन की शरण में जाना पड़ रहा है.

आज ये बुराई केवल दिल्ली जैसी शहर की समस्या नहीं है बल्कि गाँव-देहात तक आज इसकी एक-समान पकड़ है. गांवों में शाम होते ही सड़क किनारे और ठेके के दुकानों पर ऐसे रेले उमड़ पड़ते हैं जैसे किसी स्कूल का नज़ारा हो और बिना अटेंडेंस वाला नुकसान उठाने को कोई भी तैयार न हो. खासकर होली जैसे त्यौहार और नए साल के जश्न को तो लोग शराब आदि चीजों के बिना मनाने की आज कल्पना भी न करें. आधुनिक होते हमारे समाज ने नशे को केवल शराब के दायरे तक ही सिमटे नहीं रहने दिया है. आज इसके तमाम आधुनिक प्रारूप हमारे सामने हैं- हेरोइन, स्मैक, गांजा, ब्राउन शुगर, चरस आदि के रूप में.

ऐसे में राजधानी दिल्ली में हाल में सामने आये कुछ मामलों पर नज़र डाल लेना जरूरी हो जाता है. 8 अगस्त २०११ को  दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने सवा करोड़ की हेरोइन के साथ तीन डीलरों को गिरफ्तार किया। ये लोग कानपुर के एक बड़े हेरोइन तस्कर से कोरियर के जरिए हेरोइन मंगवाते और दिल्ली के विभिन्न इलाकों में उसकी आपूर्ति करते थे। 4 जुलाई को क्राइम ब्रांच ने दो किलो हेरोइन जब्त कर दो अभियुक्तों को गिरफ्तार किया। पुलिस ने हेरोइन की कीमत दो करोड़ रुपये बताई। २८ जुलाई को स्पेशल सेल ने एक किलो हेरोइन के साथ एक धार्मिक शिक्षक को गुरु तेग बहादुर अस्पताल के पास से गिरफ्तार किया। सेल ने जुलाई के पहले हफ्ते में तीन को गिरफ्तार कर बवाना में ड्रग्स बनाने की फैक्टरी का पर्दाफाश किया था। यह गिरोह बदायूं, बाराबंकी व बरेली में अफीम की खेती करने वाले किसानों से अवैध रूप से अफीम खरीदकर अपने घर में हेरोइन तैयार करता था। पुलिस इनसे अब तक 9.622 किलो हेरोइन बरामद कर चुकी है। दिल्ली में करोडो के ड्रग्स के साथ तस्करों के पकड़े जाने के मामले हर दो-चार दिन में सामने आते रहता है.


देश की राजधानी में ड्रग्स जब्त होने के ये चंद मामले हैं और ये भी कोई छिपी हुई बात नहीं है कि जितना माल पकड़ा जाता है उसका कई-कई गुना यहाँ खप जाता होगा. वरना ये तस्कर कभी इस काम से नहीं जुड़ते. एक तरफ जहाँ पूरी दुनिया आर्थिक मंदी के प्रभाव से जूझ रही है वहीँ इनका कारोबार तेजी से फल-फूल रहा है. एक तरफ सरकार का अब भी यही नारा है कि नशा कोई भी हो वह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है वहीँ इससे प्राप्त होने वाला राजस्व सरकारें दोनों हाथों से बटोर रही हैं. दिल्ली में १ अप्रैल से १२ जुलाई तक शराब बिक्री से आबकारी विभाग ने 603.31 करोड़ रूपये का राजस्व प्राप्त किया जो कि पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 16.81 फीसदी अधिक है. यहां सवाल ये उठता है कि अगर आर्थिक लाभ को सामाजिक नफे-नुकसान से ऊपर उठकर देखा जाने लगा गया तो कैसे नशाखोरी जैसी समस्याओं पर काबू पाया जा सकेगा। ऐसे में ये बात जानना भी जरूरी हो जाता है कि राजधानी में आखिर इतनी बड़ी मात्रा में शराब और ड्रग्स कहाँ खप रहा है? और कौन इसका ग्राहक है? ये एक आर्थिक से बड़ा सामाजिक सवाल बन जाता है?

कई लोग तर्क देते हैं कि नशाखोरी के पीछे दर्द या गम को भुलाने की इंसानी मानसिकता काम करती है। कई लोग इन उत्पादों को शक्तिवर्द्धक करार देने का भी प्रयास करते हैं। इस बात में पड़ने से अच्छा है इसके मानसिक प्रभावों को देखा जाये। नशा इंसान की मानसिक स्थिति को बदल देता है। इंसान के काम करने की क्षमता कम हो जाती है। लोग नशे की लत में अपना घर-परिवार और करियर तक तबाह कर डालते हैं। ऐसे उदाहरण हमारे समाज में, आस-पास में ढेरो मिल जाएंगे जिसमें लोगों ने नशे की लत के चलते अपनी हंसती-खेलती जिंदगी तबाह कर डाली।

आज नशा शहरी संस्कृति का हिस्सा बनता जा रहा है। इसे करने वाले अपनी गलती छुपाने के लिए इसे आधुनिकता से जोड़ने की कोशिशें कर रहे हैं। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि समाज से इस मानसिकता के खिलाफ आवाज उठे। ताकि हमारे किशोर और आने वाली पीढ़िया अच्छे और बुरे का फर्क पहचान सके।

इन बातों के साथ अपनी बात खत्म करना चाहुंगा...
नशा कैसा भी हो, बुरा ही होता है। यह आदमी को बर्बाद कर देता है। इसलिए जरूरी है कि इंसान नशे से दूर रहे और अगर लत लग भी जाये तो पूरी कोशिश कर इसके चंगुल से आजाद हो जाये। यह मुश्किल जरूर है, मगर नामुमकिन नहीं।

Wednesday, 27 July 2011

ना जाने कब तक...


Two Faces of India
ना जाने क्या होगा...
नाउम्मीदियों-दुश्वारियों के इस देश में
ना जाने अभी और कितने इतिहास
लिखे जाएंगे तबाही और बरबादियों के.
ना जाने कितने  एवरेस्ट
अभी और तैयार होंगे
घोटालों, भ्रष्टाचार व आतंकी वारदातों के
इस महान भारत देश में।
.

ना जाने कब तक
पाये जाते रहेंगे
इस देश में गरीब और पिछड़े
जिनके साथ फोटो खिंचवाकर
नेता साबित करते रहेंगे
खुद को महान।
.
ना जाने कब तक
कालाहांडी और बुदेलखंड की सूखी-बंजर जमीन
सींचती रहेगी देश की राजनीति को।
कब तक सरकारी व्यवस्था की
अयोग्यता व अकर्मण्यता
ढकी जाती रहेगी
मुआवजों के लिहाफ से।
.
गांधी के इस देश में
न जाने कब तक
नियम-कायदों और फाइलों के ढेर में
पीसती रहेंगी हमारी पीढियां
और जड़ होती व्यवस्था को ढोते रहेंगे हम।
.
और न जाने कब तक
ऐसे ही चलता रहेगा सबकुछ
और हम कहलवाते रहेंगे
खुद को
सभ्य, सुसंस्कृत और महान।

Saturday, 25 June 2011

नेता काजू खा गये, जनता खाये घास..!

फ्रांसीसी क्रांति के दौरान जब भूख से तड़पती जनता सड़कों पर उतर कर अपने गुस्से का इजहार कर रही थी तो वहां की रानी के कहे वाक्य कि- "रोटी नहीं है तो लोग केक क्यूं नहीं खाते" आज भी तमाम दुनिया के लिए प्रशासनिक असंवेदनशीलता का उदाहरण बना हुआ है। भारत में भी आजादी के ६४ सालों बाद आज गरीबी, भूखमरी, महंगाई, लूटखसोट व घोटालों का सिलसिला और उसके प्रति हमारे सियासतदां लोगों की असंवेदनशीलता फ्रांसीसी क्रांति के दौर की याद दिलाती है जिसमें सत्ता में बैठे लोगों को आम जनता की समस्याएं ना तो दिखाई देती है और ना ही उसे समझने की किसी को फिक्र होती है। एक तरफ बड़े लोगों की सांठ-गांठ से जहां करोड़ों-अरबो रुपये लूटे जा रहे हैं तो दूसरी ओर सरकारी और राजनीतिक तंत्र के लोग महंगाई को दिन-दुनी रात चौगुनी बढ़ाकर आम जनता का जीना मुहाल बना रहे हैं। एक तरफ जहां करोड़ों करोड़ के घोटाले, अरबो-खरबों की संपत्तियों के पहाड़ कुछेक लोगों के पास खड़ी होती जा रही है वहीं दूसरी ओर देश की ४० फीसदी से ज्यादा की आबादी दो जून की रोटी के लिए भी मुहाल है। निश्चित तौर पर देश के राजनीतिक तंत्र को समझना चाहिए कि लोकतंत्र इसलिए है क्योंकि असंख्य जनता ने उसमें भरोसा बरकरार रखा है और किसी भी सूरत में ऐसी स्थिति नहीं बनाई जानी चाहिए जिससे लोगों का लोकतंत्र से भरोसा ही उठ जाये...।

Tuesday, 21 June 2011

लो अन्ना... मुकर गई सरकार..अब क्या कर लोगे?

देश में सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में चारो ओर फैले भ्रष्टाचार और सार्वजनिक धन की लूट-खसोट को खत्म करने के लिए कड़े लोकपाल कानून बनाने की  कवायद फिर एकबार थम सी गई लगती है। आज की बैठक के बाद सरकार एक बार फिर अपने पुराने ढर्रे पर लौटती दिख रही है। संविधान का नाम लेकर और उसकी रक्षा के नाम पर देश में सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता लाने की इस ऐतिहासिक  मुहिम को फिर वहीं लाकर छोड़ दिया गया जहां अपने अनशन के जरिये दो माह पहले  अन्ना हजारे और उनकी टीम और देश के तमाम लोगों ने लाकर पहुंचाया था।  लगता है "दिन भर चले अढ़ाई कोस" के मुहावरे को सच साबित करता हुआ जंतर मंतर से शुरू हुआ अन्ना और तमाम आशावादी भारतीयों का आंदोलन  एकबार वहीं वापस पहुंचा दिया गया है। अब समझे अन्ना..यही है हमारा सरकारी सिस्टम..! अब है कोई काट...अगर है तो फिर आगे बढ़ो नहीं तो ऐसे और भी कई तीर है हमारी राजनीतिक बिरादरी के तरकश में।


लोकपाल ड्राफ्टिंग कमेटी की आज की बैठक में असहमति पर सहमति बनने के फैसले की घोषणा करते हुए एक वरिष्ठ मंत्री महोदय ने जनता के समक्ष यह सवाल उछाल दिया कि अब देश की जनता के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या संवैधानिक ढ़ाचे के समानांतर लोकपाल नाम की एक और व्यवस्था को मंजूर किया जा सकता है?


मंत्री महोदय देश की जनता के पास भी अपने हूक्मरानों के लिए तमाम सवाल हैं जिसे वो रोज सोते-जागते उछालती है लेकिन उसकी गूंज अब तक हूक्मरानों तक नहीं पहुंची। मसलन चारो ओर लूट-पाट की इस परीपाटी पर रोक कैसे लगेगी? सार्वजनिक पदों पर बैठे लोग कैसे देश का और जनता का हजारो और लाखों करोड़ लूट ले रहे हैं और कोई मशीनरी उनपर काबू नहीं पा सकी?  देश के  अंदर से अरबो-खरबो रुप्या कैसे विदेशी बैंकों में पहुंच गया और अबतक उसे वापस क्यू नहीं लाया जा सका? मसलन करोड़ो-करोड़ लूट लेने वालों को कड़ी सजा क्यू नहीं दी जा सकती? गरीबो का भोजन और उनके विकास का पैसा डकार जाने वाले लोगों को डर क्यू नहीं लगता? अपराध, हत्या, अपहरण, घोटाले और देश के धन का लूट-पाट करने वाले लोग हमारे राजनीतिक सिस्टम का हिस्सा कैसे बने हुये हैं? ऐसे न जाने कितने सवाल हैं जिनपर सियासतदां मौन हैं? लेकिन याद रखिए जनता की आवाज की ज्यादा दिनों तक उपेक्षा नहीं की जा सकती और आज नहीं तो कल लोगों की बात माननी होगी और हमारे सियासतदां जनता की समस्याओं को लेकर या तो गंभीर होंगे या फिर उनकी सच्चाई और असंवेदनशील सोच सबके सामने आ जाएगी।

Sunday, 19 June 2011

देश को कतई नहीं चूकना चाहिए ये मौका...!

आजकल एक ही मुद्दा देश में चर्चा का विषय बना हुआ है भ्रष्टाचार और लोकपाल जैसे एक कड़े कानून बनाने का। इसपर सिविल सोसाइटी की ओर से किये जा रहे तमाम प्रयासों और राजनीतिक और सरकारी पक्ष की ढुलमुल चाल के बीच इसकी नियति अनिश्चित सी बनी हुई है। अपने एक मित्र द्वारा बार-बार उद्दाहरण देने के बाद मैने इसी मामले पर कल एक अखबार में प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा का एक लेख पढ़ा। उनके अनुसार राजधानी दिल्ली में चल रही इन तमाम कवायदों से देश की अधिकांश जनता अनजान और बेखबर है और उन्हें ऐसी बातों से कोई मतलब नहीं और ये सारे प्रयास बेकार औऱ लाइमलाइट में आने जैसी कवायदों का हिस्सा भर हैं। एक मानवाधिकार कार्यकर्त्ता के हवाले से गुहा जी ने कर्णाटक में हो रही सरकारी लूट के सामने नादिर शाह के लूटपाट को पाकेटमारी जैसा करार दिया है. अब वो महान मानवाधिकार कार्यकर्त्ता कौन हैं ये नहीं मालूम लेकिन उन्हें जरा क्रेडिट देने के अपने दायरे को बड़ा करके देश भर में मचे लूट-पाट का भी मूल्यांकन  करना चाहिए.


मेरे विचार में देश के हर आदमी को अपने और समाज की बेहतरी के लिए आगे आने और आवाज उठाने का अधिकार है और गुहा जी जैसे प्रसिद्ध लोगों को किसी भी तरह किसी एकपक्षीय अभियान का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। चलो मान लेते हैं कि उन्हें भी अपने हिसाब से सोचने का हक है तो जरूरी नहीं कि उनकी हर बात को देश का हर आदमी एक-दम ज्यों का त्यों मान ही ले। रही बात भ्रष्टाचार और समाज में पनपी बेईमानी की संस्कृति को खत्म करने के लिए कड़े कानून बनाने की मांग की बात तो इसे किसी भी आधार पर गलत नहीं ठहराया जा सकता। देश के लोगों को एक बात समझनी चाहिए कि आज जो मौका देश के सामने आया है उसे कतई नहीं चूकना चाहिए. अन्ना के रूप में आये इस मौके का अगर आज देश के लोगों ने समर्थन नहीं किया तो इसी भ्रष्ट व्यवस्था को आने वाली कई और पीढ़ियों को झेलना होगा और फिर न जाने कब इस देश में कोई व्यवस्था के सामने उठ खड़े होने का साहस करेगा. 

Tuesday, 12 April 2011

भ्रष्टाचार का मुद्दा और सरपंच कल्लन काका की गुगली..!


गांव के सरपंच कल्लन काका  ने सुबह से जब से अखबार में भ्रष्टाचार के खिलाफ देश की राजधानी दिल्ली में किसी अन्ना हजारे नाम के बुजुर्ग समाजसेवी की भूख हड़ताल की कहानी को पढ़ा था तभी से उनके चेहरे की चमक उड़ी हुई थी। कहीं ये आग देर-सबेर उनके गांव में भी न पहुंच जाये और गांधीजी के नाम की माला जपने वाले उनके विरोधी मास्टर रामनगीना कहीं इसी हथियार को अपनाकर उनके खिलाफ गांव के लोगों की सहानुभूति न बटोर ले जाये। इसी चिंता में काका सुबह से घुले जा रहे थे। अपने सिपहसलार मोहन को आते देख काका ने तुरंत अपनी चिंता उसे बताई और कहा कि इस आंधी से खुद को बचाने के लिए क्या उपाय किये जायें बताओ?
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काका को पता था कि भ्रष्टाचार के क्षेत्र में उनके लंबे कैरियर को भले ही अबतक वे गोपनियता और विशेषाधिकार के नाम पर बचाते आ रहे हों लेकिन अगर ये अन्ना हजारे वाली आंधी गांव में पहुंच गई तो रामनगीना मास्टर उनके खिलाफ मोर्चा खोलने का कोई मौका गंवाएंगे नहीं। काका ने मोहन से पूछ डाला कि अरे भाई ये  लोकपाल आखिर क्या बला है जिसके ऊपर ये अन्ना हजारे साहब दिल्ली में बैठे हुक्मरानों की नाक में दम किये हुये हैं। कहां मिलेगी ये? हम भी लाकर गांव में इसे स्थापित करवा दें ताकि रामनगीना मास्टर को मौका न मिले हमारे खिलाफ मोर्चा खोलने की। मोहन ने काफी कुछ सोचा और कहा कि आज शाम को इस मामले पर अपने कोर ग्रूप की बैठक बुला ली जाए ताकि जल्द से जल्द लोकपाल की मूर्ति की स्थापना कर गांव के लोगों को कल्लन काका की भलमनसाहत का परिचय दिया जा सके। शाम को बैठक हुई और सर्वसम्मति से रणनीति बना ली गई और कार्यक्रम के लिए 1 अप्रैल का दिन मुकर्रर किया गया। काका और उनकी टीम ने इस दिन की तैयारी के लिए पूरी ताकत झोंक दी आखिर अगले साल होने वाले सरपंची के चुनाव में जीत भी तो पक्की करनी थी।
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खैर यह दिन भी आ गया। पूरे गांव को फूल-माला से सजाया गया, एक-दम मेले जैसा मंजर था। खद्दर के कुर्ते में काका खूब फब रहे थे, पॉकेट में भाषण की तैयार की गई कॉपी रख काका मंच पर बिराजे। मंच पर काका की कुर्सी के पीछे गांधीजी की तस्वीर लगा दी गई और बगल में भारत माता का चित्र। काका ने जमकर भाषण दिया और भ्रष्टाचार के मामले पर जीरो टॉलेरेंस की अपनी प्रतिबद्धता पूरे जोश के साथ दोहराया। काका ने यहां तक कहा कि जबतक उनके शरीर में प्राण रहेगा गांव में भ्रष्टाचार को पनपने नहीं देंगे और इसी के लिए चौपाल पर लोकपाल की मूर्ति स्थापित करवा रहे हैं ताकि भ्रष्टाचार से लड़ने की उन्हें निरंतर प्रेरणा मिलती रहे। खैर मंच का कार्य़क्रम खत्म हुआ और गांव की जनता के लिए काका द्वारा व्यवस्थित सांस्कृतिक कार्यक्रम का दौर शुरू हुआ। गांव के युवाओं की विशेष इच्छा को देखते हुये काका ने पड़ोस के जिले से मशहूर बिजली रानी का ऑरकेस्ट्रा बुला रखा था। भ्रष्टाचार के ऊपर काका के जोशिले भाषण के बाद मुन्नी की बदनामी और शीला की जवानी की स्वरलहरियों पर बिजली के डांस ने  गांव के युवाओं को झूमा कर रख दिया। कार्यक्रम के समापन पर जहां गांव के सारे लोग काका के समारोह से खुशी में आकंठ डूबे लौटे वहीं भ्रष्टाचार पर उनकी प्रतिबद्धता और लोकपाल मामले पर उनकी पहल की भी कम सराहना नहीं हुई। अपनी योजना सफल होते देख काका की खुशी का भी ठिकाना नहीं था उन्हें पूरा भरोसा था कि अगले साल सरपंची के चुनाव में अब उनकी जीत को कोई नहीं रोक सकता।  उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे उनकी  उम्र १० साल घट गई हो। पर काका से ज्यादा खुशी उनके पीछे खड़े बब्बन को हो रही थी आखिर वहीं इस पूरे कार्यक्रम का फाइनेंसर था और अब काका की सफलता से उसे भरोसा दो गया था कि गांव में शराब के ठेके पर अगले पांच साल तक उसके कब्जे को कोई और चुनौती नहीं दे पाएगा। आखिर काका का हाथ उसके साथ जो है।

Monday, 11 April 2011

ब्रांड अन्ना और युवा भारत की आजाद मंशा..!


पिछला हफ्ता काफी गहमा-गहमी वाला रहा. भारत के राजनीतिक क्षितिज पर तमाम पुराने घाघ राजनेताओं की मौजूदगी और उनकी अनिक्क्षा के बावजूद ७२ साल के एक बुजुर्ग अन्ना हजारे का नाम इस तरह नमूदार हुआ कि सब भौचक देखते रह गए. इस पूरी लड़ाई में बुजुर्ग अन्ना और उनके पीछे खड़ा देश का युवा, कामगार वर्ग(सरकारी तंत्र से जुड़े लोगों को छोड़कर) और प्रौढ़ आबादी सीन में था और बाकी सब राजनीतिक चेहरे इस दौरान गौण हो गए. आखिर ऐसा क्या हुआ कि भारत के जिस युवा आबादी के बारे में कहा जा रहा था उसे क्रिकेट और मौज-मस्ती से फुर्सत ही नहीं है वह अचानक उठकर हाथों में तिरंगा थामकर अन्ना के पीछे खड़ा हो गया?
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मोटे तौर पर इसके दो कारण दिख रहे हैं.
पहला तो ये कि पिछले साल-दो साल में देश में जिस तरह से करोडो-अरबो के घोटाले लगातार सामने आते जा रहे थे और राजनीतिक नेतृत्व उसपर अपनी उदासीनता और बेशर्मी दिखाए जा रहा था उसे लेकर लोगों के मन में खासकर युवाओं के मन में काफी गुस्सा पनप रहा था. उसी गुस्से को अन्ना हजारे ने एक आवाज दी. लोगों को एक ऐसा मंच मिल गया जहाँ से उन्ही के मन की बात कोई कह रहा था. लोगों ने देर नहीं की और आन्दोलन के साथ हो लिए.
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दूसरा जो कारण दिख रहा है वह है कि आजाद भारत में पहली बार एक बड़े मंच से किसी ने राजनीतिक बिरादरी को यह बताने की जुर्रत की है कि सरकार का काम क्या है. अन्ना हजारे ने बार-बार जोर देकर कहा कि लोकतान्त्रिक भारत में जनता देश की मालिक है और हुक्मरान केवल सेवक. जिन्हें जनता की प्रगति और विकास के काम के लिए लगाया गया है. उसी काम के बदले देश के खजाने से उन्हें वेतन आदि दिया जाता है और इसी से उनके घर-परिवार की रोजी-रोटी चलती है. अत उन्हें अपने काम और कर्तव्य को समझना होगा.
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हुक्मरान बुरा माने या अच्छा... अन्ना हजारे ने अपने आन्दोलन के जरिये उन्हें एक मौका दिया है.. आगाह किया है कि इससे पहले कि देश की जनता अपना आपा खो दे हुक्मरानों को इस अंधेरगर्दी के दौर को ख़त्म कर ईमानदारी और जवाबदेही का रास्ता अख्तियार कर लेना चाहिए. २१वी सदी में दुनिया से कदम मिलाकर चलने को आटूर हिंदुस्तान की युवा आबादी नहीं चाहती कि कुछ चंद बेईमानो के कारण उनके देश को कोई भ्रष्ट और करप्ट देश कहे. ना ही यहाँ का कामगार वर्ग टैक्स चुकाने के बावजूद आपनी अगली पीढ़ी को एक भ्रष्ट व्यवस्था सौपना चाहता है.
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अन्ना हजारे के इस आन्दोलन ने एक और काम जो किया है वह यह कि ईमानदारी की बात करने वाले जिन लोगों को कल तक लोग पुराने ज़माने का आदमी और आज के भ्रष्ट व्यवस्था के लायक नहीं समझते थे अचानक से उनका मनोबल बढ़ गया है और वे अब अपनी ईमानदारी भरी बात एक बार फिर से बुलंद होकर करने लगे हैं और बेईमानों का स्वर हल्का पड़ गया है. यही है ब्रांड अन्ना का कमाल जो कि पिछले एक हफ्ते में मार्केट में आया है और अपनी अमिट छाप छोड़ गया है.

Tuesday, 15 February 2011

इस कलयुग में ईमानदार होने का दर्द!

कहानी भारतभूमि पर आज से ५० साल पूर्व जन्मे दीनानाथ चम्पकलाल की है जिन्होंने गांधीजी और शास्त्रीजी की शिक्षाप्रद कहानियों और उपदेशों से ओत-प्रोत होकर अपनी पूरी जवानी इमानदार बनने और उसका डंका पीटने में काट दी. युवा चम्पकलाल जब अपने किशोरकाल में अपने सीने पर चे-ग्वेरा की तस्वीर वाला टी-शर्ट चिपकाये घूमते थे तो उन्हें मोहल्ले में हीरो जैसी फीलिंग होती थी. हाँ. घर पहुचने पर उन्हें पिताजी की नसीहत जरूर सुनने को मिलती थी कि कुछ काम-धंधा सिख लो या पढ़ाई वगैरह कर लो. समय बड़ा ख़राब आ रहा है. तब चम्पकलाल मन ही मन सोचते- देश आजाद हो गया है, गाँधी-नेहरु का युग आ गया है, गोरे लोग चले गए अब काहे का डर, अब सब कुछ अच्छा ही होगा. इमानदारी की गठरी मन में दबाये चम्पकलाल मन ही मन अपने पिता की नासमझी पर तरस खाते और फिर चे-ग्वेरा की टी-शर्ट छाती पर चिपका घर से निकल पड़ते. असलियत से उनका सामना पहली बार तब हुआ जब वे देश सेवा का जज्बा दिल में लिए पुलिस में भर्ती होने के लिए जिला मैदान पहुंचे. भर्ती स्थल के बाहर खड़े दलाल ने उनकी ईमानदारी से भरी बातें सुनकर पहले ही उनका भविष्य बता दिया जो कि बाद में सच भी साबित हुआ. खैर अगले साल पुस्तैनी जमीन में से एक बीघा गवां कर उनके पिताजी उन्हें डाक खाने में बाबू बनवाने में सफल रहे. वहां भी ईमानदारी ने चम्पकलाल का साथ नहीं छोड़ा और करीब बीस सालों तक वे डाकखाने की फाइलों में उलझे रहे. फिर उनको होश तब आया जब उनके सुपुत्र जूनियर चम्पकलाल किशोरवय को प्राप्त हुए और उनका दाखिला कॉलेज में हो गया. फर्स्ट डे कॉलेज से वापस आते ही जूनियर ने पल्सर बाइक की डिमांड रख दी और तब ही माने जब सीनियर चम्पकलाल का पीएफ अकाउंट खाली होकर पल्सर बाईक की शक्ल में दरवाजे पर नमूदार हो गया।
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बेटी जवान हो रही थी और चम्पकलाल को उसकी शादी की चिंता भी सताए जा रही थी. तभी उनके मन में विचार आया की पुश्तैनी जमीन कब काम आयेगी. खैर पुश्तैनी जमीन का एक अच्छा-खासा हिस्सा गवांकर वे इस समस्या से भी निजात पाने में सफल रहे. २१वी सदी शुरू हो चुकी थी और अब भी चम्पकलाल ईमानदारी भरी सोच के चंगुल से निकल नहीं पा रहे थे. इमानदारी से डाकखाने की फाइलों में खोये चम्पकलाल की जिंदगी में तब फिर तूफ़ान उठ खड़ा हुआ जब पडोसी विमला चाची के यहाँ एलपीजी गैस के सीलिंडर का आगमन हुआ. तब करीब दो दशकों से चूल्हा फूंक-फूंक कर थक चुकी चम्पकलाल की श्रीमती कमला देवी का रहा-सहा धैर्य भी जवाब दे गया और उन्होंने साफ़ शब्दों में कह दिया कि जबतक गैस नहीं आएगा घर में खाना नहीं बनेगा. उनका ये क्रांतिकारियों टाइप रौद्र रूप देखकर चम्पकलाल को अपनी जवानी वाली टी-शर्ट पर छपे चे-ग्वेरा की तस्वीर याद आ गयी. खैर इमानदार चम्पकलाल पूरे दस्तावेजों के साथ गैस सीलिंडर के कार्यालय पहुंचे. वहां काउन्टर पर बैठे क्लर्क ने साफ़ शब्दों में उन्हें बताया कि अभी साल-दो साल तक नया नंबर नहीं लगेगा, हजारों लोग नंबर में हैं. चम्पकलाल के सर पर जैसे घरों पानी पड़ गया हो. बाहर एक आदमी से पूछने पर उसने बताया कि किसी सांसद-विधायक से सिफारिश करवाओगे तो तुरंत मिल जायेगा. अब भला चम्पकलाल सांसद-विधायक की सिफारिश कहाँ से लाते. उन्हें तो बस नेताओं का वह रूप याद था जब वे समर्थकों और बैनर-पोस्टर के साथ हर पांच साल पर हाथ जोड़े वोट मांगने आया करते थे. सांसद-विधायक तो उन्होंने कभी देखे ही नहीं थे. खैर पूछने पर पता चला कि मार्केट में गैस की दुकान वाला ब्लैक में सीलिंडर दिलवा देगा. बीवी की आक्रामक मुद्रा से सहमें चम्पकलाल ने दुकानवाले को तीनगुना रकम अदा कर गैस हासिल किया और तब घर में उनकी एंट्री हो पाई हालाँकि इस दौरान उनपर १० हजार का कर्ज चस्पा हो गया. फिर भी वे अटल रहे और अपनी ईमानदारी को न छोड़ने का संकल्प दोहराकर फिर अपनी डाकखाने की फाइलों में खो गए.
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इधर उन्होंने अपना संकल्प दोहराया उधर इतिहास भी खुद को दोहराने की तैयारी में था. कॉलेज पास कर जूनियर चम्पकलाल ने नौकरी दिलाने की जिद शुरू कर दी. अब बेचारे चम्पकलाल इसका जुगाड़ कहाँ से करते. एक माह की भागदौड़ के बाद गाँव के छुटभैये नेता कल्लन काका ने उन्हें नौकरी दिलाने का वादा कर दिया बदले में एक लाख रूपये की मांग भी रख दी. अब चम्पकलाल क्या करते बेटे को बेरोजगार तो छोड़ नहीं सकते थे. जो पुश्तैनी जमीन बची थी उसे भी ठिकाने लगाकर जूनियर चम्पकलाल को जिला कार्यालय में बाबू बनवाने में सफल रहे. इतिहास खुद को दोहरा गया था लेकिन चम्पकलाल को अब भी संतोष था. उन्हें यायावर कवि नागार्जुन की पंक्ति याद आ गई-
"बापू को हीं बना रहें हैं तीनों बन्दर बापू के
बापू के भी ताऊ निकले तीनों बन्दर बापू के"
चम्पकलाल के चेहरे पर अचानक मुस्कान बिखर गया पर उन्हें एक बात का संतोष अब भी था कि उन्होंने अपनी ईमानदारी नहीं छोड़ी है.

Sunday, 9 January 2011

प्याज के साइड इफेक्ट..!

तारीख १ जनवरी २०५०...की सुबह। देश नया साल मनाने को तैयार है।
स्थान- संसद भवन परिसर।
पत्रकारों की भारी भीड़ श्री-श्री बाबा प्याजेश्वर की एक झलक को कैमरे में कैद करने की धींगामुश्ति में जुटी हुई है, बाहर देशभर से आई जनता भी बाबा की एक झलक पाने के लिए आतुर है। भारत सरकार के लंबे समय से जारी अनुरोध को मानते हुये पड़ोसी देश चीन से आये बाबा नव वर्ष के अवसर पर भारतीय संसद को संबोधित करने आए हैं। बाबा की लोकप्रियता की कहानी ४० साल पहले २०१० में भारत से ही शुरू हुई थी। तब भारतवर्ष प्याज संकट के दौर से गुजर रहा था। चारो तरफ हाहाकार मचा हुआ था। हुक्मरानों के तमाम प्रयासों के बावजूद देश को प्याज के संकट से नहीं निकाला जा सका। देश के विभिन्न हिस्सों में और यहां तक कि घरों के अंदर और छतों पर भी प्याज उगाने के तमाम प्रयास कभी किसानों का देश कहे जाने वाले महान भारतभूमि की कल्याणकारी सरकार और जनता द्वारा किये गये। आखिरकार ५ सालों के असफल प्रयास के बाद देश को प्याज के मामले में दिवालिया घोषित कर दिया गया।
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ऐसी स्थिति में दिल्ली के चांदनी चौक में प्याज के परांठे की दुकान पर काम करने वाले गोलू को तब अचानक एक आइडिया आया। गोलू ने अपने गुरू और दुकान के चीन निवासी मालिक चेन लिउ के कान में कुछ कहा। पड़ोसी देश चीन की सरकार देश का कारोबार बढ़ाने वाले सभी उपायों को ध्यान से सुनती थी यह बात चेन लिउ महोदय को मालूम थी। झट से अगले दिन वे गोलू महोदय के साथ चीनी दुतावास पहुंच गये और फिर जैसे उनकी तरक्की को पंख लग गये। चीन की सरकार की मदद से उन्होंने चांदनी चौक की अपनी दुकान को प्याज प्रसंस्करण केंद्र में बदल दिया और आइडिया देने वाले गोलू जी को अपना एडवाइजर बनाया। दोनों की जोड़ी एकदम अकबर-बीरबल स्टाइल में काम करने लगी। चीन के अपने पुस्तैनी जमीन पर इन्होंने कृत्रिम प्याज बनाने की एक फैक्टरी लगा ली और फिर भारत को उसका निर्यात करना शुरू कर दिया। देखते-देखते गोलू जी कब प्याज वाले बाबा के नाम से जाने जाने लगे किसी को भनक तक नहीं लगी। फिर प्याज प्रोसेसिंग, प्रिजर्विंग और एक्सपोर्ट जैसे अंग्रेजी टाइप नामों वाली कई कंपनियां चेन लिउ महोदय के नाम पर चलने लगी। इधर लिउ महोदय ने दुनिया छोड़ी ऊधर गोलू जी ने बाबा प्याजेश्वर का नाम धारण कर प्याज पर ग्लोबल कंसलटेंसी का काम शुरू कर दिया। कृत्रिम प्याज बनाने की तकनीक जानने वाले वे धरती पर अब अकेले जीव बच गये थे। बाबा की तरक्की देखकर पड़ोसी देश चीन ने उन्हें अपने देश की नागरिकता देकर बुला लिया। भारत और चीन दोनों देशों में प्याजेश्वर बाबा की समान इज्जत थी क्योंकि उन्होंने दुनिया से प्याज के अस्तित्व को खत्म होने से बचाकर इसे बहुमूल्य धरोहर के रूप में ही सही जिंदा तो रखा था।
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देश में प्याज की इतनी इज्जत बढ़ गई थी कि इसने डायमंड और गोल्ड की जगह ले ली। ऐसे वक्त में जब अपने घरों में प्याज को सजा कर रखना देश के कुछेक अमीरों को ही नसीब हो पाता था। जैसे लोग पहले अपने बच्चों के नाम सोनालाल, चांदीराम और हीरामल रखा करते थे वैसे ही अब लोग अपने बच्चों का नाम प्याज प्रसाद, प्याजीलाल और प्याज प्रताप सिंह रखने में गर्व महसूस करने लगे थे। बल्कि प्याज पर नामों की बहुतायत को देखते हुये सरकार ने इसमें सभी जातियों और धर्मों के लिए आरक्षण की घोषणा भी कर दी और ऐसा नाम रखने पर भारी-भरकम फीस लगाने का फैसला कर लिया। लेकिन इज्जत पाने की खातिर धन खर्चने की आदत हमारे देश में काफी पुरानी है। सो इसपर भी नाम रखने वालों की भीड़ कम नहीं हुई तो सरकार ने प्याज के ऊपर नाम रखने की राशनिंग पद्धति लागू कर दी। हां नेताओं तक अपनी पहुंच के कारण कुछ लोगों के लिए इसकी अनुमति पाना अब बी आसान था, भारत ने अभी भी जुगाड़ की अपनी पुरानी धरोहर को मिटने नहीं दिया था।
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हां, तो हम बात कर रहे थे प्याजेश्वर बाबा के संसद में संबोधन की। बाबा के आते हीं सभी सांसदगण बाबा के सत्कार के लिए उठ खड़े हुये। सत्कार लेकर बाबा जैसे ही बैठे सामने की पंक्ति में बैठे चार सदस्यों से उनका परिचय कराया गया। ये चारों जापान से उपहार में मिले रोबोट मानव थे। उपहार में इन्हें पाकर देश की जनता और हमारे हुक्मरान इतने आह्लादित हुये थे कि इन्हें संसद की सदस्यता से सम्मानित किया गया। तभी से ये सभी विशिष्टगण संसद में सामने की सीटों की शोभा बढ़ाते आ रहे थे। बाबा के साथ आये उनके अनुचरों(आधुनिक शब्द में कहें तो उनके एक्जेक्यूटिव्स) ने सभी सांसदगणों को प्याज से बना एक-एक चॉक्लेट उपहार में दिया। सबने बाबा का आभार व्यक्त किया। बाबा ने अपने भाषण में दुनिया के प्याज संकट पर प्रकाश डालते हुये इससे निपटने के लिए वैश्विक प्रयासों का आह्वान किया। उनके साथ आए चीन के कृषि मंत्री ने चीनी सरकार की ओर से हर साल भारत को १० किलो प्याज के निर्यात का भरोसा भी दिलाया। हमारे विशिष्ट गणों ने प्याज देने की अनुकंपा के लिए चीन को धन्यवाद दिया। धन्यवाद के इस सुर में पीछे बैठे विपक्षी सांसद जोखीलाल के विरोध की आवाज दब सी गई। प्याज से बने चॉकलेट पाकर उनके दल के साथियों ने उनका साथ देने से इंकार कर दिया और उन्होंने हाथ में रखा पर्चा भी संकोचवश अपने पास ही छुपा लिया जिसमें देश में प्याज की खेती को बर्बाद करने के लिए पड़ोसी देश पाकिस्तान और उसके खुफिया संगठन आईएसआई को जिम्मेदार ठहराया गया था और उन्हें मिल रही गुप्त चीनी मदद पर विरोध जताया गया था। संसद भवन में अपना कार्यक्रम खत्म कर प्याजेश्वर बाबा एक अन्य कार्यक्रम के लिए निकल पड़े जहां उन्हें प्याज रत्न पुरस्कार प्रदान करना था और भारत-चीन मित्रता को मजबूत करने के लिए प्याजमैत्री कारवां को हरी झंडी दिखाकर रवाना करना था। बाबा ने अपने इस कार्यक्रम में अपना संदेश देते हुये दुनिया में सबको प्याज मिले इसकी कामना की और फिर प्लेन पकड़ने निकल पड़े जहां से उन्हें प्राचीन शिकागो विश्वविद्यालय में प्याज के इतिहास पर व्याख्यान देने के लिए रवाना होना था।

Saturday, 8 January 2011

अंधेर नगरी-चौपट राजा...!

आजादी के ६३ सालों बाद आज हमारा महान देश भारत अपने साहित्यकार भारतेंदू हरिश्चंद्र के इस उक्ति को सार्थक करने योग्य परिपक्वता हासिल कर चुका है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने बारे में हम चाहे जो भी कह लें लेकिन हमारी वास्तविकता क्या है हमे इसका पूरा आभास है। किसी भी देश के राजनीतिक नेतृत्व का काम होता है ऐसी चीजों को बढ़ावा देना जिससे देश और समाज अन्य समाजों की तुलना में टिकने योग्य बन सके और भविष्य की चुनौतियों का सामना करने लायक बन सके। लेकिन हमारे यहां आज हालात ऐसा बन गया है कि जिसे जिस पद पर बैठा दिया जाये वह वहीं से दोनो हाथों से राष्ट्र की संपत्ति के संचय में जुट जाता है। अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए तो हम कुछ करते नहीं उल्टे बुनियादी चीजों से हमारा ध्यान हटाये रखने के लिए हमारे हुक्मरान हमे सुपरपावर बनाने का वहम दिखाते रहते हैं। एक तरफ जहां हमारा पड़ोसी देश चीन रोज कामयाबी की नई कहानी लिख रहा है वहीं हम रक्षा, तकनीक, हथियारो और विमान आदि सभी चीजों के लिए आज भी दूसरे देशों पर ही निर्भर हैं और उसपर भी बेशर्मी इतनी कि हर साल राजपथ पर इन उधार की चीजों की प्रदर्शनी निकालकर गर्वान्वित होते रहते हैं। हम ५०-६० किलोमीटर की रफ्तार से चलने वाली मेट्रो ट्रेन जापान से लेकर इतने खुश हो रहे हैं जैसे कोई अद्भुत अविष्कार कर डाला हो, वहीं दूसरी ओर चीन जैसा पड़ोसी दुनिया की सबसे तेज रफ्तार ट्रेन खूद के बुते बनाकर नई मिसाल कायम करता जा रहा है। एक तरफ जहां हमारे अंतरिक्ष मिशन विफल हो रहे हैं वहीं चीन चांद पर जाने की तैयारियों को मुक्कमल बनाने में जुटा हुआ है।
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जिस देश की करीब दो-तिहाई आबादी गरीबी रेखा से चीने जीवन-यापन करती हो वहां हजारों करोड़ रुप्ये फूंककर खेल-तमाशे कराये जाते हैं और हमारे हुक्मरानों को इसपर शर्म भी नहीं आती। सबसे बड़ी गलती देश की जनता की है जो इतनी सारी विसंगतियों के बावजूद राजनीतिक बिरादरी को सबक सिखाने की बजाय उनके तमाशे पर मौन धारण किये हुए है। भ्रष्ट, घोटालेबाज, दागी और अपराधी तत्वों को अपने समाज की बागडोर सौंप कर हम न जाने किस खुशहाली की उम्मीद पाले हुये हैं।
आज हमारा समाज वास्तविक रूप से अंधेर नगरी-चौपट राजा की कहावत को चरितार्थ करने में सक्षम दिख रहा है।

Friday, 7 January 2011

आने वाली पीढियों के लिए आज का इतिहास..!

फर्ज करिए २०५० की एक सर्द सुबह में जब भारत का कोई बच्चा स्कूल जायेगा और उसके हाथों में भारतीय इतिहास के कालखंड १९९०-२०१० के बीच के गौरवमय इतिहास की पुस्तक की विषय सामग्री कुछ इस तरह की होगी.
"शुरूआत करते हैं १९९० के दशक की शुरुआत से जब देश ने वैश्विकरण और उदारीकरण का दामन थामकर सुपरपावर बनने का सपना नया-नया ही संजोया था। अभी कुछ साल पहले ही देश ने खुद की सुरक्षा के लिए विदेश से बोफोर्स नाम का आधुनिक प्रक्षेपास्त्र मंगाया था लेकिन इस सौदे ने देश को घोटाला नामक एक नया शब्द दिया जो कि आने वाले कई दशकों तक देश और दुनिया में भारत का नाम रौशन करता रहा। जिस भारत के नाम पर इससे पहले केवल एक जीरो की खोज का क्रेडिट था उसे इस नए शब्द ने एक बार फिर दुनिया में सर ऊंचा उठाने का हौसला दे दिया। जिस भारत को कभी पश्चिमी दुनिया सपेरों का देश कहा करती थी उन फिरंगियों को भारत के महान घोटालेबाज विभुतियों ने घोटाला नामक इसी हथियार से कुछ ही सालों में नतमस्तक कर दिया। देश में वैश्विकरण लाने वाले उस दौर के हमारे हुक्मरानों ने लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार को सुरक्षित रखने के लिए दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में लोकतांत्रिक भावना को और मजबूत करते हुये सांसद रिश्वत कांड की नई इबारत लिख डाली। अनाज उत्पादन के लिए किसानों को मिलने वाले यूरिया में घोटाला जैसी महत्वपूर्ण परियोजना को कार्यान्वित करने का श्रेय भी इसी दौर के हुक्मरानों को जाता है। फिर तो क्या कहने देश में घोटालों के विकास को जैसे पंख लग गये। शुरूआती कारनामों के नक्शेकदम पर चलते हुये हमारे शूरवीरों ने शेयर घोटाला, संचार और न जाने कितने घोटालों की कहानी लिख डाली। मलाईदार और रसूखदार पदों पर बैठे लोगों के यहां से छापों में बोरो में भर-भरकर नोट और सोने-चांदी के चप्पल-जूते मिलने लगे। जिस भारत की जनता अपने देश के बारे में ये सच्चाई भुलने लगी थी कि कभी भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था उन्हें हमारे इन शूरवीरों ने फिर से एहसास दिलाया कि भारत गरीब नहीं बल्कि अभी भी सोने की चिड़िया ही है।
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देश के लाल इतने से ही रूकने वाले नहीं थे उन्होंने प्रगति की रफ्तार थमने नहीं दी। इसी दौर में देश ने सही मायनों में समाजवाद को अपनाया। समाजवाद के नाम पर सत्ता में नये-नये शामिल हुक्मरानों ने भी प्रगति में योगदान देना शुरू किया। किसी ने पशुओं का चारा डकार लिया तो किसी ने सड़क बनने के लिए काम आने वाला अलकतरा तक अपने गले में उतार कर दुनिया को आसन्न संकट से वैसे ही बचा लिया जैसे भागवान शिव ने समुद्र मंथन में निकले विष को अपने गले में उतारकर ब्रहांड की रक्षा की थी। आखिर पशु चारा खाकर करते ही क्या और अलकतरे से बनने वाली सड़क ही कौन सी अनश्वर साबित होने वाली थी. कुछ ही सालों में उनमें गढ्ढे बन जाते और जनता को उन्ही गढ्ढों से होकर रोजाना दफ्तर और स्कूल जाना पड़ता। खैर हमारे हुक्मरानों ने वक्त से पहले ही अपनी जनता का दुख हर लिया।
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१९९० के इस गौरवमयी दशक के समापन के बाद भारत में सुपर पावर बनने का सपना(तब के कुछ सिरफिरे इसे महज वहम कहा करते थे) भी प्रबल हो चला था। इसी मजबूत इरादे के साथ देश ने २1वीं सदी का इस्तकबाल किया। देश के सबसे बड़े लोकतंत्र के हृदय कहे जाने वाले संसद भवन में नोटों की गड्डियां लहराई जाने लगी। इसी दौर में देश में प्रोफेशनलिज्म आया...और हमारे जनप्रतिनिधियों ने संसद में जनहित से जुडे सवाल पूछने के लिए भी फीस लेनी शुरू कर दी। युद्ध-भूमि में देश की रक्षा के लिए जान गंवाने वाले सैनिकों के लिए मंगाये गये ताबूत में से भी मुनाफा निकालकर तब के रसूखदार लोगों ने प्रगति की एक नई परिभाषा दुनिया को दी। ऐसे वक्त में जब शेष दुनिया अंतरिक्ष विज्ञान, चांद तक पहुंचने और विज्ञान-तकनीक के विकास जैसी छोटी-छोटी चीजों में उलझी हुई थी तब हमारे देश के शूरवीरों ने मनी-मंत्र नामक विचारधारा की खोज कर उसे आगे बढ़ाया। उस दौर के एक महान विचारक का कथन--- 'पैसा खुदा तो नहीं लेकिन खुदा से कम भी नहीं है' से उस दौर के उच्च विचारों का अंदाजा लगाया जा सकता है। इसी दौर में स्पेक्ट्रम आवंटन जैसी अलौकिक और अदृश्य घटनाएं भी घटी। तरक्की की मिसाल तो देखिए कि जिन ध्वनि तरंगों को आम इंसान देख भी नहीं सकता उन्हें बेचकर हमारे हुक्मरानों(समझे नहीं... मतलब तब के किंग-क्विन) और नौकरशाहों(मतलब देवदूत टाइप) ने करोड़ों-करोड़ का मुनाफा बनाया। देश में परिवार संस्था तब इतनी मजबूत हुआ करती थी कि हुक्मरान शहीद जवानों के परिवारजनों के लिए बने आवासों को भी अपने सगे-संबंधियों को दे देते थे। परिवार को लेकर ऐसा लगाव शायद की तब किसी और देश में पाया जाता हो। तब देश में हजारों हजार करोड़ खर्च कर खेल-तमाशे हुआ करते थे और उसमें भी रईसी ऐसी कि पूरी दुनिया ने दांतों तले उंगली दबा लिया। तब देश इतना अमीर हुआ करता था कि विदेशों से आने वाले मेहमानों के लिए हर बंदोबस्त राजशी ठाट-बाट वाले हुआ करते थे। मेहमानों को देश का कोई गरीब नहीं दिख जाये इसके लिए पहले ही उन्हें सड़क किनारे से हटा लिया गया था और कूड़े-कबाड़े के ढेरों को सुंदर-सुंदर बैनरों से ढक कर देश को सुंदरता प्रदान की घई थी। ऐसी भव्यता थी कभी अपने देश की। देश की जनता अपने लालों के कारनामों की मुरीद बन गई और जगह-जगह मांग होने लगी कि घोटाला नामक इस आविष्कार को कानूनी रूप देकर पेटेंट करा लिया जाये, कहीं विदेशी लोग इसे हड़प कर हमारी बराबरी न करने लगें। आम-आदमी की भी तब काफी इज्जत थी। उनके खाने-पीने की चीजें जैसे प्याज, टमाटर और दाल जैसी चीजे रोजाना टीवी पर दिखाई जाती थी और तब के कृषि मंत्री देश के प्राचीन ज्ञान ज्योतिष विज्ञान में खूब भरोसा रखते थे। तब आम आदमी की समस्याओं के समाधान के लिए हुक्मरान ज्योतिष विज्ञान का खूब इस्तेमाल करते थे और जनता-जनार्दन सरकार के इस कल्याणकारी रवैये से काफी खुश थी। लोग जिंदगी से इतने निश्चिंत थे कि तब की राजनीतिक रैलियों में हजारों और लाखों की संख्या में लोग पहुंचते थे और राजनेताओं द्वारा दिये गये उपदेश को सुनकर अपना जीवन धन्य करते थे।
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२१वी सदी शुरू होते ही देश ने दूध की नदी बहने जैसी प्राचीन कहावतों से पीछा छुड़ाते हुये अभिजात्य वर्ग का टॉनिक कहे जाने वाली शराब की नदी बहाने का लक्ष्य प्राप्त कर लिया था। देश का हर हिस्सा इस मामले में समान गति से विकास कर रहा था। इस नए प्रकार का दूध पीकर लोग अपना दुख-दर्द भूल जाया करते थे।
नारी सश्क्तिकरण को भी तब हमने खूब बढ़ावा दिया था। मुन्नी की बदनामी और शीला की जवानी देश के लोगों को तब उत्साह से लबरेज रखने के लिए टॉनिक का काम किया करती थी। पूरा देश इन स्वरलहरियों पर झूम उठता था और जो खुश नहीं थे उन्हें राखी सावंत जैसी उस दौर की महान न्यायवादी महिलाओं के इंसाफ से उनका हक मिलता था। पूरे भारत भर में राम राज्य जैसा माहौल था। सही मायनों में उस दौर को देश के लिए गोल्डेन एज कहा जा सकता है।

Sunday, 12 December 2010

इस बार बिहार ने भ्रष्टाचार पर एक रास्ता दिखाया है...

ऐसे वक्त में जब देश हर स्तर पर पैठ बना चुके भ्रष्टाचारी रुपी महारथियों से पार पाने के लिए त्राहिमाम कर रहा है और राजनीतिक नेतृत्व इस पर कुछ भी ठोस कर पाने में खुद को असहाय महसूस कर रहा है ऐसे वक्त में एक बार फिर बिहार एक नए जोश के साथ हमारी व्यवस्था में पैठ बना चुकी इस बीमारी के निदान के लिए आगे आया है. आज वहां की सरकार द्वारा उठाये गए दो कदमों का जिक्र करना जरुरी है.

पहली घटना--
बिहार में भ्रष्टाचार में लिप्त पूर्व मोटरयान निरीक्षक (एमवीआई) की सम्पत्ति जब्त करने के न्यायालय के आदेश के बाद सरकार ने अब उस भवन में विद्यालय खोलने की तैयारी प्रारंभ कर दी है। समस्तीपुर जिले में स्थित एमवीआई रघुवंश कुंवर के पैतृक गांव चैरा में बने मकान में विद्यालय खोलने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। परिवहन विभाग के अधिकारी कुंवर के पास समस्तीपुर के अलावा पटना में आलीशान मकान और जमीन है। उनके मकानों और जमीन के अधिग्रहण के लिए संबंधित जिलाधिकारियों को एक माह के अंदर तमाम प्रक्रियायें पूरी कर लेने को कहा गया है। उल्लेखनीय है कि भ्रष्टाचारियों की अवैध सम्पत्ति जब्त करने संबंधी कानून के तहत कुंवर और उनकी पत्नी ललिता देवी के पास मिली लगभग 45 लाख रुपये की अवैध सम्पत्ति जब्त होगी। सतर्कता विभाग के विशेष लोक अभियोजक राजेश कुमार के अनुसार रघुवंश के पास मौजूद आय से अधिक 44,99,318 रुपये की चल और अचल सम्पत्ति को जब्त करने के लिए विभाग की विशेष अदालत में इस वर्ष 12

अगस्त को एक मामला दायर किया गया था। गौरतलब है कि शिकायत मिलने के बाद 24 सितंबर 2008 को सतर्कता विभाग के अधिकारियों ने कुंवर को 50 हजार रुपये रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़ा था। जांच के बाद विभाग ने उनके खिलाफ मई 2009 में आय से अधिक सम्पत्ति का मामला दर्ज कराया था।

दूसरी घटना--
दूसरी महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तहत बिहार में स्थानीय क्षेत्र विकास निधि पर लगे भ्रष्टाचार के दाग धोने के प्रयास के तहत राज्य सरकार ने इस कोष को समाप्त करने का ऐतिहासिक निर्णय किया है. बिहार में विधानसभा और विधान परिषद के सदस्यों को स्थानीय क्षेत्र विकास कोष से हर वर्ष एक एक करोड़ रुपये दिए जाते हैं। स्थानीय क्षेत्र विकास विधायक और विधानपार्षद निधि की बिहार में शुरुआत वर्ष 1984 में की गई थी। इस निधि के तहत शुरुआत में हर सदस्य को प्रतिवर्ष विकास कार्यो के लिए एक लाख रुपये दिए जाते थे। बिहार में विधायक और विधान पार्षद स्थानीय क्षेत्र के विकास निधि के 26साल पुराने इतिहास में एक लाख रुपये प्रतिवर्ष से शुरू होकर यह सफर एक करोड़ रुपये तक पहुंचा। वर्ष 1986 में इस राशि को बढ़ाकर प्रतिवर्ष पांच लाख रुपये कर दिया गया, जबकि इसके चार साल बाद यानि 1990 में यह राशि बढ़ाकर 10 लाख रुपये कर दी गई। वर्ष 1996 में स्थानीय क्षेत्र विकास निधि में एक बार फिर बढ़ोत्तरी की गई जो बढ़कर 50 लाख रुपये हो गई। 2003 में 50 लाख रुपये की राशि को बढ़ाकर एक करोड़ रुपये कर दिया।

अब आगे चलकर केंद्र सरकार को भी प्रतिवर्ष सांसदों को मिलने वाले दो करोड़ रुपए के सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास निधि [एमपीलैड] को समाप्त करने के लिए तत्परता दिखानी चाहिए.

बिहार की नयी सरकार द्वारा उठाया गया ये कदम आज देश भर में व्यवस्था में पैठ बना चुके घोटालेबाजों के लिए एक सबक बन सकता है बशर्ते कि हमारी राजनीतिक बिरादरी ऐसा करने की हिम्मत जुटाए और ऐसा कदम उठाये कि अपना काम करते वक्त घुस मांगते हुए किसी भी सरकारी कर्मचारी के सामने भविष्य की बर्बादी का मंजर घूम जाये. इतना ही नहीं जैसा कि हमारे सिविल सोसाइटी के लोग लगातार मांग करते आ रहे हैं कि एक ऐसी राष्ट्रीय एजेंसी बने जो करोडो-अरबो डकार जाने वाले राजनीतिज्ञों-कारोबारियों और नौकरशाहों के नेक्सस को बिना किसी दबाव के दण्डित कर सके.
बिहार में उठाया गया ये स्वागतयोग्य कदम भ्रष्टाचार उन्मूलन की दिशा में ऐतिहासिक शुरूआत होगी।

Tuesday, 23 November 2010

अतिथि देवो भवः और कल्लन काका का इनक्रेडिबल विलेज..!

सब लोग खेतों से लौट कर घर पहुंचे ही थें कि चौपाल की घंटी बज गई। चाय-चबेना लेकर लोगों ने चौपाल की राह पकड़ी। सरपंच कल्लन काका पहले हीं वहां आसन जमाये हुये थे। मोहन उनके दायें तरफ अपनी जगह पर काबिज था तो जगन ने भी उनके बायें तरफ अपनी जगह संभाल रखी थी। मनोहर, सुंदर और श्याम ने आकर अपनी जगह पकड़ी तो हुक्का सुलगाने की कार्रवाई शुरू हो गई। इसके साथ ही छिड़ गया दिनभर की आपबीतियों को सुनाने का सिलसिला, जिसे सुनने के लिए काका दिनभर बेचैन रहा करते थे। दिनभर अखबार पढ़कर थक चुके और खटिया तोड़कर बोर हो चुके कल्लन काका लोगों से दिनभर गांव में हुये रोचक किस्से सुनने के लिए बेताब रहते थे। सुंदर ने गांव के पूरब टोले में सुबह के हंगामे का पूरा विवरण सुनाया कि कैसे झबरू ने ताड़ी चुराते बब्बन को पीट डाला था और फिर इस झगड़े में कैसे दोनों के परिवार वाले भी शामिल हो गये और फिर घंटों टोले में लाठियां पटकाती रही। मनोहर ने बताया कि शहर से आते हुये उसने पास के गांव में शराब के अड्डे पर पुलिस की रेड पड़ती देखी थी। उसकी इस बात को काका ने ऐसे इग्नोर कर दिया जैसे संसद में विपक्ष के हो-हल्ले को अध्यक्ष द्वारा अक्सर कर दिया जाता है। काका जानते थे उनका मैनेजमेंट इतना तगड़ा है कि उनके गांव में पुलिस कभी आएगी ही नहीं। वैसे भी काका के लिए शराब कोई बुरी चीज नहीं थी बल्कि ऐसा जरिया था जो गांव के सभी टोले के युवाओं को एक सूत्र में पिरोये हुये था। काका की नजर में ये वो लिटमस पेपर था जो गांव के दबंग युवाओं को दब्बू युवाओं से अलग करता था। उनके अनुसार असली युवा और गांव का भविष्य वहीं युवा हैं जो रोज शाम को काका के दरबार में आते और प्रसाद ग्रहण करते।
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गांव की कहानियां भले ही काका को खूब रास आती हो लेकिन दिनभर गांव की खाक छानते मोहन को यहां की कहानियों में कोई रूचि नहीं थी। वो हमेशा इंटरनेशनल मुद्दों पर बात करने को बेताब रहता था। हुक्के में तम्बाकू भरते मोहन की बातों को इग्नोर करने की आदत काका को नहीं थी बिल्कुल वैसे जैसे सत्ता पक्ष की स्थिति संसद में होती है। काका की ओर हुक्का बढ़ाते मोहन ने बड़े ही बेलाग अंदाज में कहा- लो काका आज तो हुक्के का मजा दोगुना हो गया, आज तो ओबामा ने भी कह दिया कि अपना देश काफी विकास कर चुका है। अमेरिका से आकर वो हमारे गांव-गांव में टेली-कानफेरेन्सिंग से बाते कर रहे हैं। काका को याद आ गया कुछ साल पहले का वो समय जब अमेरिका के राष्ट्रपति क्लिंटन साहब भारत दौरे पर आए थे और गांव की गोरियों के साथ जमकर नाच-गाना किया था। काका तब मन मसोस कर रह गये थे कि काश उनके गांव ऐसा कोई मेहमान आये और वे भी गोरी मेमो के साथ डांस कर सकें। काका ने एक ट्रायल लिया भी था। अगले साल न्यू ईयर पर उन्होंने पड़ोसी गांव के सरपंच नत्था को न्यौता भिजवाकर बुलवा लिया। लेकिन मेहमान सरपंच जी के साथ आये उनके पियक्कड़ अनुयायियों ने ऐसी धमा-चौकड़ी मचाई कि काका ने उसी वक्त फिर किसी को भी अपने गांव नहीं बुलाने का फैसला कर लिया।
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हां, तो हम फिर लौट आते हैं चौपाल पर! मोहन ने ओबामा की बात छेड़ी तो सबकी निगाहें काका की ओर टिक गई। आखिर गांव में काका ही अकेले अखबार मंगाते हैं और उनसे ज्यादा देश-दुनिया के बारे में जानकारी किसके पास है। सुंदर और मनोहर फुसफुसा रहे थे कि भला इतने बड़े देश का आदमी हमारे यहां क्यूं आया है। अब काका से रहा नहीं गया। चौपाल की इच्छा पर सुओ मोटो लेते हुये काका ने अपनी ज्ञान की पोटली खोली। काका- ऊ, का है न कि उनके यहां मंदी आई हुई है और उनके लोग बेरोजगार होये रहे हैं ना...सो उ इयां नौकरी लेवे के वास्ते आये रहै हैं।
मनोहर से रहा नहीं गया वो बोल पड़ा- यहां की सरकार तो अपने लोगों को रोजगार देने के लिए कुछ करती नहीं, तो उनके लिए का करेगी।
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काका- धत बुरबक, तुम लोग का जानत हो, अतिथि सेवा का होत है? ये ऐसी चीज है जिसके सामने सब फीकी पड़ जाती है। भाई अपने यहां तो संस्कृति रही है कि खुद भले हीं पानी पीकर रह लो लेकिन अतिथि के सत्कार में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए। आखिर अतिथि देवता के समान होता है। काका को बरबस याद आ गया...अपनी सरपंची के १० साल पूरे होने पर उन्होंने कैसे आस-पास के गांवों के सभी सरपंचों को न्यौता भेजा था और तब कई दिनों तक गांव में जश्न का माहौल बना रहा था। तब उन्होंने अतिथियों के लिए मुर्गे और दारू की कोई कमी नहीं रहने दी थी और आखिरी दिन विदाई के वक्त उन्होंने सभी अतिथियों को अपने पेड़ से तुड़वाये महूये की ताजी-ताजी शराब की बोतलें गिफ्ट दी थी ताकि अपने गांव वापस लौटकर भी उनपर यहां के आतिथ्य का नशा कुछ दिनों तक बना रहे। गांव के लोग भी जश्न के उन अनमोल दिनों को अबकत नहीं भूल पाये हैं। हफ्ते भर तक गांव में आये देवता रूपी अतिथियों ने अपने धमाल से उनका कितना मनोरंजन किया था। उनके हाथियों और घोड़ों ने कितनों के खेत और बगीचे उजाड़ दिये थे और मनोहर के दो मुर्गे भी तो उन्ही दिनों गायब हुये थे। लेकिन कुछ तो काका के दबदबे और कुछ अतिथि देवो भवः के ऐतिहासिक कहावत ने सबकी जुबान पर ताला लगा दिया था, तभी तो जाते-जाते गांव वालों के आतिथ्य सत्कार की दुहाई देते नहीं थक रहे थे। आज भी तारीफ के उन लफ्जों को सुनकर गांव वालों का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।
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अचानक काका ख्यालों ने निकले- हां तो हम बात कर रहे थे ओबामा के भारत दौरे की। देख भई हमारी सरकार ने उनकी इच्छा को देखते हुये ५०,००० नौकरियों का उपहार उन्हें देने में पूरी तन्मयता दिखाई है। भई अतिथि है कुछ लेकर जाएगा तो नाम ही लेगा। वैसे भी अतिथि देवता के समान होता है। काका के मन में आया कि क्यूं न वे भी इसी तरह का कोई उपहार अपने पड़ोसी गांव के सरपंच को दें। काका के मन के भाव मोहन से छूप न सकें, आखिर वो काका का सबसे ख़ास शागिर्द ऐसे ही नहीं था। मोहन ने तुरंत ही कहा कि क्यों न काका इस साल वेलेंटाइन डे पर मिस्टर औऱ मिस विलेज प्रतियोगिता का आयोजन करवा लिया जाये। इसी में एक पुरस्कार लाइफटाइम अचीवमेंच का रख लेंगे और उसे आस-पास के किसी सरपंच को दे दिया जाएगा। सब खुश रहेंगे। मोहन का ये प्रस्ताव काका को भी खूब यूनिक लगा। इसी बहाने शायद टीवी वाले भी गांव का रूख़ करें और टीवी पर आने का बचपन का उनका सपना शायद इस बार सच हो ही जाये। वैसे इस प्रस्ताव को सुनकर गांव के युवा भी काफी रोमांचित हुये। चौपाल के कोने में बैठा सुरेश तो ख्यालों में ही खो गया। उसे लगने लगा कि भईया की शादी में उनके ससुराल से मिले रेशम के कपड़े को सिलाने का वक्त आ गया है। यह सोचकर वो काफी रोमांचित था कि प्रतियोगिता के दौरान आगे की सीट पर बैठकर मिस विलेज देखने का मजा इस बार मिलेगा। लेकिन उसे याद आया कि आगे बैठने के लिए पास का जुगाड़ कैसे होगा। तभी उसे याद आया कि ताड़ी के दुकान वाले हरिया से उसकी दोस्ती कब काम आएगी, काका का प्रिय मोहन तो रोजाना उसके दुकान पर आता ही हैं।
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चौपाल पूरे शबाब पर थी लेकिन हूक्के की ताव ठंढी होती जा रही थी। काका ने कहा तो भाई आज की चौपाल यहीं अगले दिन तक के लिए एडजर्न की जाती है। कल फिर मिलेंगे, इसी वक्त पर और फिर उठाएंगे गांव और समाज के हित से जुड़े अहम मुद्दों को...जनहित में।

Friday, 12 November 2010

भ्रष्टाचार का पेटेंट और कल्लन काका..!

सुबह-सुबह नहा-धोकर जब मोहन घर से निकला तो गाँव के मुखिया और उसके आका कल्लन काका चबूतरे पर बैठे दिखाई दिए। पिछले ४० सालो से गाँव के मुखिया रहे कल्लन काका इस बार विधायकी की कुर्सी पर नज़र गड़ाए हुए हैं. हमेशा भाषण की मुद्रा में दिखने वाले काका को चिंतित मुद्रा में देखकर मोहन से पूछे बिना रहा नहीं गया. काका ने अख़बार में छपी खबर पर नाराजगी जताते हुए कहा कि उन्होंने पूरी जिंदगी गाँव के विकास के लिए आने वाले धन को पचाने में लगा दी और इतने लम्बे अरसे के भ्रष्टाचारी जीवन और भ्रष्टाचार के क्षेत्र में उनकी सक्रिय भूमिका के बावजूद वे कभी पकडे नहीं गए और ये ना जाने आज के कैसे नेता हैं जो रोज पकडे जा रहे हैं? कल्लन काका को याद आने लगा॥न जाने कितनी सड़के, पुलिया, नलकूप, कुएं उन्होंने अपनी खद्दर की जेब में समां लिए, अब तो इसकी गिनती भी उन्हें याद नहीं है और आज तक कोई उनपर उंगली नहीं उठा सका. कल्लन काका को चिंता सताए जा रही थी कि दशकों तक जिस भ्रष्टाचार को उन्होंने अपनी मेहनत से सींचा उसका क्रेडिट कोई दिल्ली का नेता न उठा ले जाये..आज कल रोज-रोज नए नाम अख़बारों में छप रहे हैं. वफादार शागिर्द की तरह मोहन ने उन्हें सलाह दी कि काका क्यूँ न जल्द-से-जल्द भ्रष्टाचार शब्द का पेटेंट करा लिया जाये.
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जैसे भी हो कल्लन काका इतने लम्बे समय के राजनीतिक जीवन में अभी तक अपनी छवि को बेदाग रखने में सफल रहे थे। मजाल है कि गाँव में कोई उनके खिलाफ कुछ बोल सके. गाँव के युवाओं के सामने उनके खिलाफ बोलने का मतलब था अपने लिए मुसीबत मोल लेना. इतने लोकप्रिय थे काका उनके बीच. गाँव का शायद ही कोई युवा हो जो रोज शाम को हरिया की दुकान के पीछे के घेरे में लगने वाले काका के दरबार में न जाता हो. गाँव की नई पीढ़ी के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए काका इन युवाओं को कभी किसी चीज की कमी नहीं होने देते थे. काका के दरबार में आने वाले लोगों की इक्छाओं को ध्यान में रखते हुए हरिया कभी भी देशी दारु, गांजा, तम्बाकू, ताड़ी आदि का स्टॉक कम नहीं होने देता था. बदले में कल्लन काका की जेब में समाये सड़क, पूल, नलकूप आदि के कई टुकड़े उछलकर हरिया की जेब में पहुँचते रहते थे और उसने भी गाँव के विकास की राशि में से काफी कुछ अपना विकास कर लिया था.
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वैसे युवा पीढ़ी के विकास पर ध्यान देने के अलावा काका गाँव के जातिय समीकरण का भी बखूबी ध्यान रखते थे। अपने टोले के चिंटू को शिक्षा मित्र के रूप में भर्ती कर उन्होंने सबको खुश कर दिया था और कईयों के लिए उम्मीद भी जगा दी थी. तभी तो, कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है इस सिद्धांत का सम्मान करते हुए कल्लन काका को अपना खेत लिखते हुए चिंटू के पापा को थोडा सा भी मलाल नहीं हुआ था. हालाँकि चिंटू का पडोसी गब्बन भी इस पद के लिए दावेदार था लेकिन उसकी बीवी राधा को आंगनबारी में सेट कराकर काका ने ये कांटा भी दूर कर लिया. जो कुछ भी पाने में असफल रहे थे उन्होंने भविष्य में कुछ पाने की उम्मीद में चुप्पी का रास्ता अपनाना बेहतर समझा. सामने के महतो टोले के चबूतरे के पास नलकूप लगवाकर काका ने वहां भी सबका दिल जीत लिया था. देश की आजादी के ६० साल पूरे होने पर उन्हें नलकूप मिला था और कुएं से पानी खीचने से मुक्ति मिलने से वे ऐसे ही खुश थे. वैसे ये नलकूप सबसे ज्यादा चबूतरे पर दिन-भर ताश के पत्तो में उलझे टोले के मेहनतकश लोगों के काम आ रहा था. ताश के पत्तो में उलझे हुए जब भी उनका कंठ सूखने लगता, इसी नलकूप के पानी से अपना गला तर कर वे फिर से मैदान में उतरते. वैसे पासवान टोले में भी काका की इज्जत कम नहीं थी. यहाँ के सबसे गबरू नौजवान छेदी के पास हरिया की दुकान में दरबार के लिए ताड़ी भेजने का ठेका था और उसके यहाँ रहते भला कौन काका की शान में गुस्ताखी कर सकता था?
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कुल मिलाकर कहा जा सकता था कि फ़िलहाल काका के राजनीतिक अनुभव का कोई सानी नहीं था और सबको साथ लेकर चलने की अपनी नीति के कारण काका यहाँ के राजनीतिक इतिहास के सबसे बड़े या यूँ कहें की एकमात्र पुरोधा बने हुए थे. सत्ता को एकजूट रखने की अपनी नीति के तहत काका पुलिस-प्रशासन के साथ भी पूरे सामंजस्य से काम कर रहे थे. तभी तो उनके सामने कोई विपक्ष नहीं था. अभी ४ साल पहले की ही तो बात है जब शहर से पढाई पूरी कर लौटे रमेश ने गाँव में विकास के मामले पर उनके खिलाफ बोलने की हिम्मत की थी. तब अगले ही दिन पुलिस ने उसके घर से अवैध शराब की पेटियां बरामद करते हुए गाँव को एक बड़े खतरे से बचा लिया था और रमेश को अपना जीवन बचाने के लिए वापस शहर भागना पड़ा था. कल्लन काका अपनी इस कर्मभूमि में किसी ऐसे इन्सान को कैसे टिकने दे सकते थे जिससे गाँव की शांति भंग होने का अंदेशा हो. आखिर पूरी जिंदगी भर की मेहनत से उन्होंने यहाँ राम-राज्य स्थापित किया था जहाँ किसी को कोई दुःख नहीं था. जहाँ सब काका के विकासात्मक और कल्याणकारी नीतियों से खुश थे.

Wednesday, 6 October 2010

मुगालतों का देश और सुपर पॉवर होने का सपना..!

कॉमनवेल्थ खेलों की रंगारंग ओपनिंग सेरेमनी के बाद देश का दम और दुनिया में भारत की दबंगई का ढोल पीटने वाले लोग इधर काफी मुगालते में जीने लगे हैं. अचानक से देश-दुनिया के तथाकथित सेलेब्रिटी लोगों के बयान अख़बारों में नज़र आने लगे हैं जिनमे कॉमनवेल्थ खेलों की चमक-दमक को भारत की चमक-दमक से जोड़कर राष्ट्रीय गर्व का एहसास कराया जा रहा है. अगर इनपे भरोसा किया जाये तो जो भारत पिछले हफ्ते तक बदइन्तेजामी, भ्रष्टाचार और व्यवस्थागत कमियों के लिए दुनिया भर में आलोचना का शिकार हो रहा था अचानक से सुपर पॉवर जैसा दिखने लगा है. इतना त्वरित चमत्कार कैसे हो गया समझ में नहीं आ रहा?

हजारों करोड़ की लागत से राजधानी में बने आलिशान खेल गाँव और चंद स्टेडियम तथा कुछ वीआईपी इलाकों में चमकती सडकों और सड़क किनारे बनी आकर्षक आकृतियों से आगे बढ़कर अब चलते है शेष भारत के पास जिसको सुपर पॉवर का ये तमगा एक शूल की भांति चुभ रहा है. अजी पूरे देश की बात तो छोडिये जरा खेल गाँव और दक्षिण-मध्य दिल्ली से बहार निकलिए और दिल्ली के पूर्वी, पश्चिमी और उत्तरी इलाकों का नज़ारा कर लीजिये. टूटी-फूटी सड़कें, और कहीं गड्ढों में सड़क तो कहीं सड़क में गड्ढों पर सवारी करती वहां की जनता आपको सुपर पॉवर होने के एहसास की सच्चाई से जरूर रूबरू करा देगी.

देश की व्यवस्था की संवेदनहीनता की तो बात ही मत कीजिये. अभी करीब दो-तीन महीने ही हुए होंगे जब राजधानी दिल्ली के एक केन्द्रीय स्थान पर भीड़-भाड वाले एक सड़क के किनारे एक महिला ने एक बच्चे को जन्म दे दिया था और वही उसने दम तोड़ दिया था. व्यवस्था की संवेदनहीनता और सामाजिक सुरक्षा की कमी पर तब न्यायलय ने कड़ी नाराजगी जताई थी. ये कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती...सुपर पॉवर बनने का दम भरने वाला ये भारत अपने यहाँ के बच्चों के पोषण कुपोषण की क्या बात करे ये भारत अपने देश के भविष्य अपने नौनिहालों को स्कूलों तक लाने के लिए दोपहर के भोजन का लालच देता है. ये देश अपने लोगों को काम की गारंटी साल में १०० दिन की मजदूरी के काम को मुहैया कराकर देता है. मजदूरी की इस मामूली रकम में गबन और फर्जीवाड़े पर देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् की चेयरमैन तक चिंता जता चुकी हैं. खेल पर हजारों करोड़ रुपया लुटाने वाला ये देश वृधावस्था पेंशन के रूप में अपने बुजुर्गों को महीने भर के खर्च के लिए महज दो-ढाई सौ रूपये की रकम देता है. इस देश के पढ़े-लिखे लोगों को न तो रोजगार की गारंटी है और न ही अपनी वृहत आबादी के लिए इसके पास कोई सामाजिक सुरक्षा का व्यवस्थित ढांचा ही है. पारदर्शिता की तो बात ही मत कीजिये..आजादी के ६०-६५ सालो बाद अभी यही चर्चा चल रही है कि देश का सबकुछ जिस राजनीती के हाथों में है उस राजनीति में दागी-भ्रष्ट-घोटालेबाज और अपराधियों को आने से और धनबल और बाहुबल के प्रयोग को कैसे रोका जाये?

जो लोग भी अचानक से देश को सुपर पॉवर समझने लगे हैं उन्हें यह अहसास होना चाहिए कि राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार से लड़ने का जो मौका अभी देश ने गवां दिया उसकी भरपाई अगले कई दशकों तक उसे करनी पड़ेगी. ये एक ऐतिहासिक मौका था जब देश भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुट होकर व्यवस्था में हर स्तर पर शामिल ऐसे लोगों को सुधरने पर मजबूर कर सकता था...जो हमने गवां दिया और बदले में पाया--'सुपर पॉवर होने का मुगालता'..!