Friday, 12 August 2011

क्यां नशा हमारे लिए आधुनिकता का प्रतीक बन चुका है?


रोहन की बर्थडे पार्टी थी और सभी दोस्तों की जिद पर उसने पार्टी का प्लान कर लिया. घर से अनुमति लेकर वह दोस्तों के साथ पार्टी के लिए निकला. उसने कभी कोई नशा नहीं किया था लेकिन दोस्तों के बार-बार ये कहने पर कि अरे बीयर में नशा थोड़े ही होता है उसने बीयर पी ली. उसके दोस्त अक्सर कहते थे कि अरे यार इन पुराने ख्यालों से बाहर निकल और जिंदगी के थोड़े मजे लिया कर. बार-बार ऐसा कहने पर उसने इसे आधुनिकता का प्रतीक मान लिया. इस बात के बीते अभी करीब एक साल हुए थे और इस एक साल में दोस्तों की संगत में रोहन ने शराब पीनी भी शुरू कर दी. पॉकेट खर्च के लिए घर से मिलने वाले थोड़े से पैसे से ये सारी जरूरते पूरी होनी संभव नहीं थी इसलिए रोहन और उसके दोस्तों ने स्नैचिंग की वारदातों को अंजाम देना भी शुरू कर दिया. उसके प्रतिभावान होने और हमेशा कालेज की पढ़ाई में व्यस्त रहने की ढोल पीटने वाले उसके घरवालों को इन सब बातों का पता तब लगा जब पुलिस ने दोस्तों समेत उसे स्नैचिंग के केस में धर दबोचा.

दिल्ली जैसे शहर में रोहन जैसी कहानी आपको हर गली-मोहल्ले में देखने को मिल जाएगी. सवाल यहाँ ये उठता है कि आखिर इन सब प्रवृतियों के बढ़ने का कारण क्या है? नशे की बढती लत पर रोक लगाने में हमारा समाज क्यूँ विफल रहा है? आधुनिकता के हमारे प्रतिमान ऐसे क्यूँ हैं? तमाम कानूनी रोक-थाम और पाबंदियों के बावजूद हम नशाखोरी को रोक क्यों नहीं पा रहें?

7 अगस्त को दिल्ली के एक स्‍कूल के परिसर में फ्रेंडशिप डे के नाम पर शराब पीते हुए 14 छात्राएं पकड़ी गईं। नागरिक उड्यन मंत्रालय के आंकड़ो पर अगर गौर करें तो पिछले तीन सालों में शराब पीकर उड़ान भरने की कोशिश करने वाले 67 पायलटों को परीक्षण के दौरान पकड़ा गया। सोचिये अगर ये पाईलट विमान उड़ाने में सफल रहते तो सैकड़ों लोग इनके भरोसे ही हवाई सफ़र पर होते. देश की राजधानी दिल्ली में ब्रह्मपुरी में हुआ शराब काण्ड या फिर देश के विभिन्न हिस्सों में अक्सर होने वाले शराब काण्ड जिनमे दर्जनों लोग अपनी जान गवाँते रहे हैं. या फिर हर बार नए साल के जश्न के पहले राजधानी दिल्ली में पुलिस द्वारा शराबियों और नशाखोरों पर शिकंजा कसने की प्रबल तैयारियां दर्शातीं हैं कि हम किस हद तक इन बुराइयों को अपने समाज की संरचना में बसा चुके हैं और ये बुराइयाँ ही अब हमें डरा रही हैं. जिनपर अब हम काबू नहीं पा सकते और जिनसे बचाने की गुहार लेकर अब हमें पुलिस प्रशासन की शरण में जाना पड़ रहा है.

आज ये बुराई केवल दिल्ली जैसी शहर की समस्या नहीं है बल्कि गाँव-देहात तक आज इसकी एक-समान पकड़ है. गांवों में शाम होते ही सड़क किनारे और ठेके के दुकानों पर ऐसे रेले उमड़ पड़ते हैं जैसे किसी स्कूल का नज़ारा हो और बिना अटेंडेंस वाला नुकसान उठाने को कोई भी तैयार न हो. खासकर होली जैसे त्यौहार और नए साल के जश्न को तो लोग शराब आदि चीजों के बिना मनाने की आज कल्पना भी न करें. आधुनिक होते हमारे समाज ने नशे को केवल शराब के दायरे तक ही सिमटे नहीं रहने दिया है. आज इसके तमाम आधुनिक प्रारूप हमारे सामने हैं- हेरोइन, स्मैक, गांजा, ब्राउन शुगर, चरस आदि के रूप में.

ऐसे में राजधानी दिल्ली में हाल में सामने आये कुछ मामलों पर नज़र डाल लेना जरूरी हो जाता है. 8 अगस्त २०११ को  दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने सवा करोड़ की हेरोइन के साथ तीन डीलरों को गिरफ्तार किया। ये लोग कानपुर के एक बड़े हेरोइन तस्कर से कोरियर के जरिए हेरोइन मंगवाते और दिल्ली के विभिन्न इलाकों में उसकी आपूर्ति करते थे। 4 जुलाई को क्राइम ब्रांच ने दो किलो हेरोइन जब्त कर दो अभियुक्तों को गिरफ्तार किया। पुलिस ने हेरोइन की कीमत दो करोड़ रुपये बताई। २८ जुलाई को स्पेशल सेल ने एक किलो हेरोइन के साथ एक धार्मिक शिक्षक को गुरु तेग बहादुर अस्पताल के पास से गिरफ्तार किया। सेल ने जुलाई के पहले हफ्ते में तीन को गिरफ्तार कर बवाना में ड्रग्स बनाने की फैक्टरी का पर्दाफाश किया था। यह गिरोह बदायूं, बाराबंकी व बरेली में अफीम की खेती करने वाले किसानों से अवैध रूप से अफीम खरीदकर अपने घर में हेरोइन तैयार करता था। पुलिस इनसे अब तक 9.622 किलो हेरोइन बरामद कर चुकी है। दिल्ली में करोडो के ड्रग्स के साथ तस्करों के पकड़े जाने के मामले हर दो-चार दिन में सामने आते रहता है.


देश की राजधानी में ड्रग्स जब्त होने के ये चंद मामले हैं और ये भी कोई छिपी हुई बात नहीं है कि जितना माल पकड़ा जाता है उसका कई-कई गुना यहाँ खप जाता होगा. वरना ये तस्कर कभी इस काम से नहीं जुड़ते. एक तरफ जहाँ पूरी दुनिया आर्थिक मंदी के प्रभाव से जूझ रही है वहीँ इनका कारोबार तेजी से फल-फूल रहा है. एक तरफ सरकार का अब भी यही नारा है कि नशा कोई भी हो वह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है वहीँ इससे प्राप्त होने वाला राजस्व सरकारें दोनों हाथों से बटोर रही हैं. दिल्ली में १ अप्रैल से १२ जुलाई तक शराब बिक्री से आबकारी विभाग ने 603.31 करोड़ रूपये का राजस्व प्राप्त किया जो कि पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 16.81 फीसदी अधिक है. यहां सवाल ये उठता है कि अगर आर्थिक लाभ को सामाजिक नफे-नुकसान से ऊपर उठकर देखा जाने लगा गया तो कैसे नशाखोरी जैसी समस्याओं पर काबू पाया जा सकेगा। ऐसे में ये बात जानना भी जरूरी हो जाता है कि राजधानी में आखिर इतनी बड़ी मात्रा में शराब और ड्रग्स कहाँ खप रहा है? और कौन इसका ग्राहक है? ये एक आर्थिक से बड़ा सामाजिक सवाल बन जाता है?

कई लोग तर्क देते हैं कि नशाखोरी के पीछे दर्द या गम को भुलाने की इंसानी मानसिकता काम करती है। कई लोग इन उत्पादों को शक्तिवर्द्धक करार देने का भी प्रयास करते हैं। इस बात में पड़ने से अच्छा है इसके मानसिक प्रभावों को देखा जाये। नशा इंसान की मानसिक स्थिति को बदल देता है। इंसान के काम करने की क्षमता कम हो जाती है। लोग नशे की लत में अपना घर-परिवार और करियर तक तबाह कर डालते हैं। ऐसे उदाहरण हमारे समाज में, आस-पास में ढेरो मिल जाएंगे जिसमें लोगों ने नशे की लत के चलते अपनी हंसती-खेलती जिंदगी तबाह कर डाली।

आज नशा शहरी संस्कृति का हिस्सा बनता जा रहा है। इसे करने वाले अपनी गलती छुपाने के लिए इसे आधुनिकता से जोड़ने की कोशिशें कर रहे हैं। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि समाज से इस मानसिकता के खिलाफ आवाज उठे। ताकि हमारे किशोर और आने वाली पीढ़िया अच्छे और बुरे का फर्क पहचान सके।

इन बातों के साथ अपनी बात खत्म करना चाहुंगा...
नशा कैसा भी हो, बुरा ही होता है। यह आदमी को बर्बाद कर देता है। इसलिए जरूरी है कि इंसान नशे से दूर रहे और अगर लत लग भी जाये तो पूरी कोशिश कर इसके चंगुल से आजाद हो जाये। यह मुश्किल जरूर है, मगर नामुमकिन नहीं।

1 comment:

गुस्ताख़ मंजीत said...

आखिरी पैराग्राफ तक उपदेश और प्रवचन के लिए शुक्रिया। तुमने प्यार के नशे के बारे में कुछ प्रकाश नहीं डाला है तात्..