Friday, 12 November 2010

भ्रष्टाचार का पेटेंट और कल्लन काका..!

सुबह-सुबह नहा-धोकर जब मोहन घर से निकला तो गाँव के मुखिया और उसके आका कल्लन काका चबूतरे पर बैठे दिखाई दिए। पिछले ४० सालो से गाँव के मुखिया रहे कल्लन काका इस बार विधायकी की कुर्सी पर नज़र गड़ाए हुए हैं. हमेशा भाषण की मुद्रा में दिखने वाले काका को चिंतित मुद्रा में देखकर मोहन से पूछे बिना रहा नहीं गया. काका ने अख़बार में छपी खबर पर नाराजगी जताते हुए कहा कि उन्होंने पूरी जिंदगी गाँव के विकास के लिए आने वाले धन को पचाने में लगा दी और इतने लम्बे अरसे के भ्रष्टाचारी जीवन और भ्रष्टाचार के क्षेत्र में उनकी सक्रिय भूमिका के बावजूद वे कभी पकडे नहीं गए और ये ना जाने आज के कैसे नेता हैं जो रोज पकडे जा रहे हैं? कल्लन काका को याद आने लगा॥न जाने कितनी सड़के, पुलिया, नलकूप, कुएं उन्होंने अपनी खद्दर की जेब में समां लिए, अब तो इसकी गिनती भी उन्हें याद नहीं है और आज तक कोई उनपर उंगली नहीं उठा सका. कल्लन काका को चिंता सताए जा रही थी कि दशकों तक जिस भ्रष्टाचार को उन्होंने अपनी मेहनत से सींचा उसका क्रेडिट कोई दिल्ली का नेता न उठा ले जाये..आज कल रोज-रोज नए नाम अख़बारों में छप रहे हैं. वफादार शागिर्द की तरह मोहन ने उन्हें सलाह दी कि काका क्यूँ न जल्द-से-जल्द भ्रष्टाचार शब्द का पेटेंट करा लिया जाये.
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जैसे भी हो कल्लन काका इतने लम्बे समय के राजनीतिक जीवन में अभी तक अपनी छवि को बेदाग रखने में सफल रहे थे। मजाल है कि गाँव में कोई उनके खिलाफ कुछ बोल सके. गाँव के युवाओं के सामने उनके खिलाफ बोलने का मतलब था अपने लिए मुसीबत मोल लेना. इतने लोकप्रिय थे काका उनके बीच. गाँव का शायद ही कोई युवा हो जो रोज शाम को हरिया की दुकान के पीछे के घेरे में लगने वाले काका के दरबार में न जाता हो. गाँव की नई पीढ़ी के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए काका इन युवाओं को कभी किसी चीज की कमी नहीं होने देते थे. काका के दरबार में आने वाले लोगों की इक्छाओं को ध्यान में रखते हुए हरिया कभी भी देशी दारु, गांजा, तम्बाकू, ताड़ी आदि का स्टॉक कम नहीं होने देता था. बदले में कल्लन काका की जेब में समाये सड़क, पूल, नलकूप आदि के कई टुकड़े उछलकर हरिया की जेब में पहुँचते रहते थे और उसने भी गाँव के विकास की राशि में से काफी कुछ अपना विकास कर लिया था.
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वैसे युवा पीढ़ी के विकास पर ध्यान देने के अलावा काका गाँव के जातिय समीकरण का भी बखूबी ध्यान रखते थे। अपने टोले के चिंटू को शिक्षा मित्र के रूप में भर्ती कर उन्होंने सबको खुश कर दिया था और कईयों के लिए उम्मीद भी जगा दी थी. तभी तो, कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है इस सिद्धांत का सम्मान करते हुए कल्लन काका को अपना खेत लिखते हुए चिंटू के पापा को थोडा सा भी मलाल नहीं हुआ था. हालाँकि चिंटू का पडोसी गब्बन भी इस पद के लिए दावेदार था लेकिन उसकी बीवी राधा को आंगनबारी में सेट कराकर काका ने ये कांटा भी दूर कर लिया. जो कुछ भी पाने में असफल रहे थे उन्होंने भविष्य में कुछ पाने की उम्मीद में चुप्पी का रास्ता अपनाना बेहतर समझा. सामने के महतो टोले के चबूतरे के पास नलकूप लगवाकर काका ने वहां भी सबका दिल जीत लिया था. देश की आजादी के ६० साल पूरे होने पर उन्हें नलकूप मिला था और कुएं से पानी खीचने से मुक्ति मिलने से वे ऐसे ही खुश थे. वैसे ये नलकूप सबसे ज्यादा चबूतरे पर दिन-भर ताश के पत्तो में उलझे टोले के मेहनतकश लोगों के काम आ रहा था. ताश के पत्तो में उलझे हुए जब भी उनका कंठ सूखने लगता, इसी नलकूप के पानी से अपना गला तर कर वे फिर से मैदान में उतरते. वैसे पासवान टोले में भी काका की इज्जत कम नहीं थी. यहाँ के सबसे गबरू नौजवान छेदी के पास हरिया की दुकान में दरबार के लिए ताड़ी भेजने का ठेका था और उसके यहाँ रहते भला कौन काका की शान में गुस्ताखी कर सकता था?
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कुल मिलाकर कहा जा सकता था कि फ़िलहाल काका के राजनीतिक अनुभव का कोई सानी नहीं था और सबको साथ लेकर चलने की अपनी नीति के कारण काका यहाँ के राजनीतिक इतिहास के सबसे बड़े या यूँ कहें की एकमात्र पुरोधा बने हुए थे. सत्ता को एकजूट रखने की अपनी नीति के तहत काका पुलिस-प्रशासन के साथ भी पूरे सामंजस्य से काम कर रहे थे. तभी तो उनके सामने कोई विपक्ष नहीं था. अभी ४ साल पहले की ही तो बात है जब शहर से पढाई पूरी कर लौटे रमेश ने गाँव में विकास के मामले पर उनके खिलाफ बोलने की हिम्मत की थी. तब अगले ही दिन पुलिस ने उसके घर से अवैध शराब की पेटियां बरामद करते हुए गाँव को एक बड़े खतरे से बचा लिया था और रमेश को अपना जीवन बचाने के लिए वापस शहर भागना पड़ा था. कल्लन काका अपनी इस कर्मभूमि में किसी ऐसे इन्सान को कैसे टिकने दे सकते थे जिससे गाँव की शांति भंग होने का अंदेशा हो. आखिर पूरी जिंदगी भर की मेहनत से उन्होंने यहाँ राम-राज्य स्थापित किया था जहाँ किसी को कोई दुःख नहीं था. जहाँ सब काका के विकासात्मक और कल्याणकारी नीतियों से खुश थे.

1 comment:

केवलकृष्ण said...

अच्छी भाषा। अच्छी शैली। अच्छी संभवनाएं। शुभकामनाएं।