Thursday, 7 August 2008

अमरनाथ मामला श्रद्धा से आगे भी कुछ है!

जम्मू जल रहा है...ख़बर लिखने के लिहाज से ये लाइन बिल्कुल ठीक है, राजनीति करने वाले और इसकी दूकान चलाने वालों के लिए भी ये काफ़ी मजेदार कहानी है लेकिन जम्मू के लोग इसे किस रूप में लें। क्या इस ख़बर को सुनकर उनके चेहरे पर मुस्कान उभर आती होगी। दिल्ली में बैठकर इसका अनुमान शायद नहीं लगाया जा सकता और ना ही हिंसा के माहौल में जी रहे इन लोगों की पीडा को समझा जा सकता है। एक और बात ध्यान देने लायक है कि क्यूँ जम्मू के लोग अपने ही प्रशासन और अपने सैनिकों के ख़िलाफ़ लड़ने को खड़े हुए है। इससे बड़ी बात ये भी है कि क्यूँ इन लोगों को राज्य के बाहर के लोगों का भी समर्थन मिल रहा है। और इन सब से बड़ी बात की शासन में बैठे लोग इसे रोकने और अपने लोगों को बचाने के लिए क्या कर पाये और समय रहते इसे क्यूँ नहीं रोका जा सका...

सप्ताह भर से ज्यादा हो गया, जम्मू में अपने ही राज्य के बड़े हिस्से कश्मीर के प्रति गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा है। सारा विवाद हिंदू धर्म के पवित्र तीर्थ अमरनाथ धाम जाने वाले यात्रियों की सुविधा बढ़ाने के लिए ४० एकड़ जमीन देने के फैसले से पैदा हुआ। इस विवाद का सम्बन्ध कश्मीर के इतिहास से भी है और भारत की राजनीति से भी- जिसमें छेत्रवाद और सम्प्रदायवाद हमेशा से हावी रहा है। राज्य सरकार ने तीर्थयात्रियों के लिए जमीन अलोट की और राजनीति के लिए उसका विरोध शुरू हुआ। सरकार दबाव में आई और उसपर राजनीति हावी हो गई। सरकार गिर गई। राज्यपाल ने फ़ैसला बदल दिया। इसका विरोध करने वालों ने कहा की केन्द्र के दबाव में आ गए।

अब शुरू हुई असल राजनीति। कश्मीर के लोगों का कहना था शेष भारत से यहाँ आने वाले लोगों के लिए हमारी जमीन क्यूँ दी जाए। जमू के बहुसंख्यक हिंदू इससे कुछ अलग सोचते थे। उनका कहना था ये जमीन हमारी भी है और इसे हमारे धर्मस्थल को देना ही होगा। लोग सड़कों पर आए, पुलिस ने उन्हें रोकना चाहा। लोग अपने धर्म के लिए सड़कों पर आए थे सो हटने वाले कहाँ थे और यहीं कारण है की कर्फु लगाकर भी प्रशासन उन्हें घर के अन्दर नहीं भेज पा रहा है। इस लड़ाई की आग दिल्ली तक भी पहुची, पहुचनी भी थी। मामला देश के दो बड़े सम्प्रदायों से सम्बंधित था। सरकार के लिए दुविधा थी-किधर जाए। किसी एक पक्ष का साथ दिया तो दुसरे की नाराजगी झेलनी पड़ेगी। मामला संविधान से भी संबध था इसलिए भी छेड़-छाड़ सम्भव नहीं था....

इस सारी रस्सा-कस्सी के बावजूद मामले का कोई हल निकलता नजर नहीं आता। कश्मीर के लोग इस बात के लिए लड़ रहे हैं की उनकी जमीन कैसे बाहर के लोगों के दी जायेगी। जम्मू के लोगों के लिए मसला ये है की कैसे कश्मीर के सामने राज्य में वे अपनी बात सामने रख पाएंगे। शेष भारत के लोगोंके लिए मसला राष्ट्रवाद का भी है। अपने देश में अपने धर्मस्थल की सुविधा बढ़ाने के लिए अगर जमीन नहीं दी जायेगी तो इसका असर आगे चलकर रास्ट्रीय हो सकता है....कई पेंच हैं इस मामले में...जम्मू और देश के बाकी हिस्सों के लोग ये भी तर्क दे रहे है की अगर कश्मीर का जमीन बाकी देश इस्मेताल नहीं कर सकता तो बाकी देश का पैसा कश्मीर के विकास में क्यूँ लग्न चाहिए। अगर ये मसला हिन्दुओं और मुसलमानों का है तो लोगों का ये तर्क है की अगर अमरनाथ धाम को जमीन देना ग़लत है तो हज यात्रा के लिए सब्सिडी कहाँ तक उचित है.......न तो ये सवाल ख़त्म होने वाले हैं और न ही इसे उठाने वाले...ये ऐसा ही चलता रहेगा.

1 comment:

विनय प्रजापति 'नज़र' said...

हम समझ सकते है किन्तु राजनीति को हविस है सत्ता की!