
खैर इसमें दोष किसी का नहीं है। इस देश की जनता को सोचना होगा कि उनके विकास के लिए योजना कौन बनाए। ऐसे लोग जो विदेशों में पढ़-लिखकर और नौकरी कर आते हैं और सीधे ऊपर से योजना बनाने वाली एजेंसियों में बैठा दिए जाते हैं। उन्हें देश की जमीनी हकीकत का ना तो कोई अंदाजा है और ना ही वे समझने के लिए गांव की धूल कभी फाकेंगे। तो भई क्या कहा जाए ऐसे देश में जहां रईसी का जीवन जीने वाले लोग देश के आम आदमी को गरीबी रेखा से ऊपर उठने के लिए 32 रुपये वाला सर्टीफिकेट जारी करते हों। इस देश को सोचना होगा कि उन्हे अगर लोकतांत्रिक देश का हिस्सा बनकर रहना है तो इस व्यवस्था में उनका क्या स्थान होना चाहिए। किसानों के उत्पादों को मुफ्त में चाहने और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादों के लिए मुंहमांगी कीमत देने की मंशा पालकर पली-बढ़ी हमारी शहरी आबादी कभी भी देश के गांवों में बसे आम आदमी की असल स्थिति को नहीं समझ सकती। किसी को अगर फिर भी मुगालता हो तो एक दिन जरा इस सरकारी आंकड़े वाले 32 रुपये में शहर में और 26 रुपये में किसी गांव में बिताकर देख ले।