कहते हैं भारत विविधताओं से भरा देश है, विविध लोग...विविध नज़ारे और विविध प्रकार की बातें.....हर बार जिंदगी का नया रूप और नई तस्वीर....लेकिन सब कुछ हमारी अपनी जिंदगी का हिस्सा...इसलिए बिल्कुल बिंदास...
Tuesday, 12 April 2011
भ्रष्टाचार का मुद्दा और सरपंच कल्लन काका की गुगली..!
Monday, 11 April 2011
ब्रांड अन्ना और युवा भारत की आजाद मंशा..!
Tuesday, 15 February 2011
इस कलयुग में ईमानदार होने का दर्द!
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बेटी जवान हो रही थी और चम्पकलाल को उसकी शादी की चिंता भी सताए जा रही थी. तभी उनके मन में विचार आया की पुश्तैनी जमीन कब काम आयेगी. खैर पुश्तैनी जमीन का एक अच्छा-खासा हिस्सा गवांकर वे इस समस्या से भी निजात पाने में सफल रहे. २१वी सदी शुरू हो चुकी थी और अब भी चम्पकलाल ईमानदारी भरी सोच के चंगुल से निकल नहीं पा रहे थे. इमानदारी से डाकखाने की फाइलों में खोये चम्पकलाल की जिंदगी में तब फिर तूफ़ान उठ खड़ा हुआ जब पडोसी विमला चाची के यहाँ एलपीजी गैस के सीलिंडर का आगमन हुआ. तब करीब दो दशकों से चूल्हा फूंक-फूंक कर थक चुकी चम्पकलाल की श्रीमती कमला देवी का रहा-सहा धैर्य भी जवाब दे गया और उन्होंने साफ़ शब्दों में कह दिया कि जबतक गैस नहीं आएगा घर में खाना नहीं बनेगा. उनका ये क्रांतिकारियों टाइप रौद्र रूप देखकर चम्पकलाल को अपनी जवानी वाली टी-शर्ट पर छपे चे-ग्वेरा की तस्वीर याद आ गयी. खैर इमानदार चम्पकलाल पूरे दस्तावेजों के साथ गैस सीलिंडर के कार्यालय पहुंचे. वहां काउन्टर पर बैठे क्लर्क ने साफ़ शब्दों में उन्हें बताया कि अभी साल-दो साल तक नया नंबर नहीं लगेगा, हजारों लोग नंबर में हैं. चम्पकलाल के सर पर जैसे घरों पानी पड़ गया हो. बाहर एक आदमी से पूछने पर उसने बताया कि किसी सांसद-विधायक से सिफारिश करवाओगे तो तुरंत मिल जायेगा. अब भला चम्पकलाल सांसद-विधायक की सिफारिश कहाँ से लाते. उन्हें तो बस नेताओं का वह रूप याद था जब वे समर्थकों और बैनर-पोस्टर के साथ हर पांच साल पर हाथ जोड़े वोट मांगने आया करते थे. सांसद-विधायक तो उन्होंने कभी देखे ही नहीं थे. खैर पूछने पर पता चला कि मार्केट में गैस की दुकान वाला ब्लैक में सीलिंडर दिलवा देगा. बीवी की आक्रामक मुद्रा से सहमें चम्पकलाल ने दुकानवाले को तीनगुना रकम अदा कर गैस हासिल किया और तब घर में उनकी एंट्री हो पाई हालाँकि इस दौरान उनपर १० हजार का कर्ज चस्पा हो गया. फिर भी वे अटल रहे और अपनी ईमानदारी को न छोड़ने का संकल्प दोहराकर फिर अपनी डाकखाने की फाइलों में खो गए.
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इधर उन्होंने अपना संकल्प दोहराया उधर इतिहास भी खुद को दोहराने की तैयारी में था. कॉलेज पास कर जूनियर चम्पकलाल ने नौकरी दिलाने की जिद शुरू कर दी. अब बेचारे चम्पकलाल इसका जुगाड़ कहाँ से करते. एक माह की भागदौड़ के बाद गाँव के छुटभैये नेता कल्लन काका ने उन्हें नौकरी दिलाने का वादा कर दिया बदले में एक लाख रूपये की मांग भी रख दी. अब चम्पकलाल क्या करते बेटे को बेरोजगार तो छोड़ नहीं सकते थे. जो पुश्तैनी जमीन बची थी उसे भी ठिकाने लगाकर जूनियर चम्पकलाल को जिला कार्यालय में बाबू बनवाने में सफल रहे. इतिहास खुद को दोहरा गया था लेकिन चम्पकलाल को अब भी संतोष था. उन्हें यायावर कवि नागार्जुन की पंक्ति याद आ गई-
"बापू को हीं बना रहें हैं तीनों बन्दर बापू के
बापू के भी ताऊ निकले तीनों बन्दर बापू के"
चम्पकलाल के चेहरे पर अचानक मुस्कान बिखर गया पर उन्हें एक बात का संतोष अब भी था कि उन्होंने अपनी ईमानदारी नहीं छोड़ी है.
Sunday, 9 January 2011
प्याज के साइड इफेक्ट..!
स्थान- संसद भवन परिसर।
पत्रकारों की भारी भीड़ श्री-श्री बाबा प्याजेश्वर की एक झलक को कैमरे में कैद करने की धींगामुश्ति में जुटी हुई है, बाहर देशभर से आई जनता भी बाबा की एक झलक पाने के लिए आतुर है। भारत सरकार के लंबे समय से जारी अनुरोध को मानते हुये पड़ोसी देश चीन से आये बाबा नव वर्ष के अवसर पर भारतीय संसद को संबोधित करने आए हैं। बाबा की लोकप्रियता की कहानी ४० साल पहले २०१० में भारत से ही शुरू हुई थी। तब भारतवर्ष प्याज संकट के दौर से गुजर रहा था। चारो तरफ हाहाकार मचा हुआ था। हुक्मरानों के तमाम प्रयासों के बावजूद देश को प्याज के संकट से नहीं निकाला जा सका। देश के विभिन्न हिस्सों में और यहां तक कि घरों के अंदर और छतों पर भी प्याज उगाने के तमाम प्रयास कभी किसानों का देश कहे जाने वाले महान भारतभूमि की कल्याणकारी सरकार और जनता द्वारा किये गये। आखिरकार ५ सालों के असफल प्रयास के बाद देश को प्याज के मामले में दिवालिया घोषित कर दिया गया।
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ऐसी स्थिति में दिल्ली के चांदनी चौक में प्याज के परांठे की दुकान पर काम करने वाले गोलू को तब अचानक एक आइडिया आया। गोलू ने अपने गुरू और दुकान के चीन निवासी मालिक चेन लिउ के कान में कुछ कहा। पड़ोसी देश चीन की सरकार देश का कारोबार बढ़ाने वाले सभी उपायों को ध्यान से सुनती थी यह बात चेन लिउ महोदय को मालूम थी। झट से अगले दिन वे गोलू महोदय के साथ चीनी दुतावास पहुंच गये और फिर जैसे उनकी तरक्की को पंख लग गये। चीन की सरकार की मदद से उन्होंने चांदनी चौक की अपनी दुकान को प्याज प्रसंस्करण केंद्र में बदल दिया और आइडिया देने वाले गोलू जी को अपना एडवाइजर बनाया। दोनों की जोड़ी एकदम अकबर-बीरबल स्टाइल में काम करने लगी। चीन के अपने पुस्तैनी जमीन पर इन्होंने कृत्रिम प्याज बनाने की एक फैक्टरी लगा ली और फिर भारत को उसका निर्यात करना शुरू कर दिया। देखते-देखते गोलू जी कब प्याज वाले बाबा के नाम से जाने जाने लगे किसी को भनक तक नहीं लगी। फिर प्याज प्रोसेसिंग, प्रिजर्विंग और एक्सपोर्ट जैसे अंग्रेजी टाइप नामों वाली कई कंपनियां चेन लिउ महोदय के नाम पर चलने लगी। इधर लिउ महोदय ने दुनिया छोड़ी ऊधर गोलू जी ने बाबा प्याजेश्वर का नाम धारण कर प्याज पर ग्लोबल कंसलटेंसी का काम शुरू कर दिया। कृत्रिम प्याज बनाने की तकनीक जानने वाले वे धरती पर अब अकेले जीव बच गये थे। बाबा की तरक्की देखकर पड़ोसी देश चीन ने उन्हें अपने देश की नागरिकता देकर बुला लिया। भारत और चीन दोनों देशों में प्याजेश्वर बाबा की समान इज्जत थी क्योंकि उन्होंने दुनिया से प्याज के अस्तित्व को खत्म होने से बचाकर इसे बहुमूल्य धरोहर के रूप में ही सही जिंदा तो रखा था।
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देश में प्याज की इतनी इज्जत बढ़ गई थी कि इसने डायमंड और गोल्ड की जगह ले ली। ऐसे वक्त में जब अपने घरों में प्याज को सजा कर रखना देश के कुछेक अमीरों को ही नसीब हो पाता था। जैसे लोग पहले अपने बच्चों के नाम सोनालाल, चांदीराम और हीरामल रखा करते थे वैसे ही अब लोग अपने बच्चों का नाम प्याज प्रसाद, प्याजीलाल और प्याज प्रताप सिंह रखने में गर्व महसूस करने लगे थे। बल्कि प्याज पर नामों की बहुतायत को देखते हुये सरकार ने इसमें सभी जातियों और धर्मों के लिए आरक्षण की घोषणा भी कर दी और ऐसा नाम रखने पर भारी-भरकम फीस लगाने का फैसला कर लिया। लेकिन इज्जत पाने की खातिर धन खर्चने की आदत हमारे देश में काफी पुरानी है। सो इसपर भी नाम रखने वालों की भीड़ कम नहीं हुई तो सरकार ने प्याज के ऊपर नाम रखने की राशनिंग पद्धति लागू कर दी। हां नेताओं तक अपनी पहुंच के कारण कुछ लोगों के लिए इसकी अनुमति पाना अब बी आसान था, भारत ने अभी भी जुगाड़ की अपनी पुरानी धरोहर को मिटने नहीं दिया था।
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हां, तो हम बात कर रहे थे प्याजेश्वर बाबा के संसद में संबोधन की। बाबा के आते हीं सभी सांसदगण बाबा के सत्कार के लिए उठ खड़े हुये। सत्कार लेकर बाबा जैसे ही बैठे सामने की पंक्ति में बैठे चार सदस्यों से उनका परिचय कराया गया। ये चारों जापान से उपहार में मिले रोबोट मानव थे। उपहार में इन्हें पाकर देश की जनता और हमारे हुक्मरान इतने आह्लादित हुये थे कि इन्हें संसद की सदस्यता से सम्मानित किया गया। तभी से ये सभी विशिष्टगण संसद में सामने की सीटों की शोभा बढ़ाते आ रहे थे। बाबा के साथ आये उनके अनुचरों(आधुनिक शब्द में कहें तो उनके एक्जेक्यूटिव्स) ने सभी सांसदगणों को प्याज से बना एक-एक चॉक्लेट उपहार में दिया। सबने बाबा का आभार व्यक्त किया। बाबा ने अपने भाषण में दुनिया के प्याज संकट पर प्रकाश डालते हुये इससे निपटने के लिए वैश्विक प्रयासों का आह्वान किया। उनके साथ आए चीन के कृषि मंत्री ने चीनी सरकार की ओर से हर साल भारत को १० किलो प्याज के निर्यात का भरोसा भी दिलाया। हमारे विशिष्ट गणों ने प्याज देने की अनुकंपा के लिए चीन को धन्यवाद दिया। धन्यवाद के इस सुर में पीछे बैठे विपक्षी सांसद जोखीलाल के विरोध की आवाज दब सी गई। प्याज से बने चॉकलेट पाकर उनके दल के साथियों ने उनका साथ देने से इंकार कर दिया और उन्होंने हाथ में रखा पर्चा भी संकोचवश अपने पास ही छुपा लिया जिसमें देश में प्याज की खेती को बर्बाद करने के लिए पड़ोसी देश पाकिस्तान और उसके खुफिया संगठन आईएसआई को जिम्मेदार ठहराया गया था और उन्हें मिल रही गुप्त चीनी मदद पर विरोध जताया गया था। संसद भवन में अपना कार्यक्रम खत्म कर प्याजेश्वर बाबा एक अन्य कार्यक्रम के लिए निकल पड़े जहां उन्हें प्याज रत्न पुरस्कार प्रदान करना था और भारत-चीन मित्रता को मजबूत करने के लिए प्याजमैत्री कारवां को हरी झंडी दिखाकर रवाना करना था। बाबा ने अपने इस कार्यक्रम में अपना संदेश देते हुये दुनिया में सबको प्याज मिले इसकी कामना की और फिर प्लेन पकड़ने निकल पड़े जहां से उन्हें प्राचीन शिकागो विश्वविद्यालय में प्याज के इतिहास पर व्याख्यान देने के लिए रवाना होना था।
Saturday, 8 January 2011
अंधेर नगरी-चौपट राजा...!
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जिस देश की करीब दो-तिहाई आबादी गरीबी रेखा से चीने जीवन-यापन करती हो वहां हजारों करोड़ रुप्ये फूंककर खेल-तमाशे कराये जाते हैं और हमारे हुक्मरानों को इसपर शर्म भी नहीं आती। सबसे बड़ी गलती देश की जनता की है जो इतनी सारी विसंगतियों के बावजूद राजनीतिक बिरादरी को सबक सिखाने की बजाय उनके तमाशे पर मौन धारण किये हुए है। भ्रष्ट, घोटालेबाज, दागी और अपराधी तत्वों को अपने समाज की बागडोर सौंप कर हम न जाने किस खुशहाली की उम्मीद पाले हुये हैं।
आज हमारा समाज वास्तविक रूप से अंधेर नगरी-चौपट राजा की कहावत को चरितार्थ करने में सक्षम दिख रहा है।
Friday, 7 January 2011
आने वाली पीढियों के लिए आज का इतिहास..!
"शुरूआत करते हैं १९९० के दशक की शुरुआत से जब देश ने वैश्विकरण और उदारीकरण का दामन थामकर सुपरपावर बनने का सपना नया-नया ही संजोया था। अभी कुछ साल पहले ही देश ने खुद की सुरक्षा के लिए विदेश से बोफोर्स नाम का आधुनिक प्रक्षेपास्त्र मंगाया था लेकिन इस सौदे ने देश को घोटाला नामक एक नया शब्द दिया जो कि आने वाले कई दशकों तक देश और दुनिया में भारत का नाम रौशन करता रहा। जिस भारत के नाम पर इससे पहले केवल एक जीरो की खोज का क्रेडिट था उसे इस नए शब्द ने एक बार फिर दुनिया में सर ऊंचा उठाने का हौसला दे दिया। जिस भारत को कभी पश्चिमी दुनिया सपेरों का देश कहा करती थी उन फिरंगियों को भारत के महान घोटालेबाज विभुतियों ने घोटाला नामक इसी हथियार से कुछ ही सालों में नतमस्तक कर दिया। देश में वैश्विकरण लाने वाले उस दौर के हमारे हुक्मरानों ने लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार को सुरक्षित रखने के लिए दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में लोकतांत्रिक भावना को और मजबूत करते हुये सांसद रिश्वत कांड की नई इबारत लिख डाली। अनाज उत्पादन के लिए किसानों को मिलने वाले यूरिया में घोटाला जैसी महत्वपूर्ण परियोजना को कार्यान्वित करने का श्रेय भी इसी दौर के हुक्मरानों को जाता है। फिर तो क्या कहने देश में घोटालों के विकास को जैसे पंख लग गये। शुरूआती कारनामों के नक्शेकदम पर चलते हुये हमारे शूरवीरों ने शेयर घोटाला, संचार और न जाने कितने घोटालों की कहानी लिख डाली। मलाईदार और रसूखदार पदों पर बैठे लोगों के यहां से छापों में बोरो में भर-भरकर नोट और सोने-चांदी के चप्पल-जूते मिलने लगे। जिस भारत की जनता अपने देश के बारे में ये सच्चाई भुलने लगी थी कि कभी भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था उन्हें हमारे इन शूरवीरों ने फिर से एहसास दिलाया कि भारत गरीब नहीं बल्कि अभी भी सोने की चिड़िया ही है।
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देश के लाल इतने से ही रूकने वाले नहीं थे उन्होंने प्रगति की रफ्तार थमने नहीं दी। इसी दौर में देश ने सही मायनों में समाजवाद को अपनाया। समाजवाद के नाम पर सत्ता में नये-नये शामिल हुक्मरानों ने भी प्रगति में योगदान देना शुरू किया। किसी ने पशुओं का चारा डकार लिया तो किसी ने सड़क बनने के लिए काम आने वाला अलकतरा तक अपने गले में उतार कर दुनिया को आसन्न संकट से वैसे ही बचा लिया जैसे भागवान शिव ने समुद्र मंथन में निकले विष को अपने गले में उतारकर ब्रहांड की रक्षा की थी। आखिर पशु चारा खाकर करते ही क्या और अलकतरे से बनने वाली सड़क ही कौन सी अनश्वर साबित होने वाली थी. कुछ ही सालों में उनमें गढ्ढे बन जाते और जनता को उन्ही गढ्ढों से होकर रोजाना दफ्तर और स्कूल जाना पड़ता। खैर हमारे हुक्मरानों ने वक्त से पहले ही अपनी जनता का दुख हर लिया।
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१९९० के इस गौरवमयी दशक के समापन के बाद भारत में सुपर पावर बनने का सपना(तब के कुछ सिरफिरे इसे महज वहम कहा करते थे) भी प्रबल हो चला था। इसी मजबूत इरादे के साथ देश ने २1वीं सदी का इस्तकबाल किया। देश के सबसे बड़े लोकतंत्र के हृदय कहे जाने वाले संसद भवन में नोटों की गड्डियां लहराई जाने लगी। इसी दौर में देश में प्रोफेशनलिज्म आया...और हमारे जनप्रतिनिधियों ने संसद में जनहित से जुडे सवाल पूछने के लिए भी फीस लेनी शुरू कर दी। युद्ध-भूमि में देश की रक्षा के लिए जान गंवाने वाले सैनिकों के लिए मंगाये गये ताबूत में से भी मुनाफा निकालकर तब के रसूखदार लोगों ने प्रगति की एक नई परिभाषा दुनिया को दी। ऐसे वक्त में जब शेष दुनिया अंतरिक्ष विज्ञान, चांद तक पहुंचने और विज्ञान-तकनीक के विकास जैसी छोटी-छोटी चीजों में उलझी हुई थी तब हमारे देश के शूरवीरों ने मनी-मंत्र नामक विचारधारा की खोज कर उसे आगे बढ़ाया। उस दौर के एक महान विचारक का कथन--- 'पैसा खुदा तो नहीं लेकिन खुदा से कम भी नहीं है' से उस दौर के उच्च विचारों का अंदाजा लगाया जा सकता है। इसी दौर में स्पेक्ट्रम आवंटन जैसी अलौकिक और अदृश्य घटनाएं भी घटी। तरक्की की मिसाल तो देखिए कि जिन ध्वनि तरंगों को आम इंसान देख भी नहीं सकता उन्हें बेचकर हमारे हुक्मरानों(समझे नहीं... मतलब तब के किंग-क्विन) और नौकरशाहों(मतलब देवदूत टाइप) ने करोड़ों-करोड़ का मुनाफा बनाया। देश में परिवार संस्था तब इतनी मजबूत हुआ करती थी कि हुक्मरान शहीद जवानों के परिवारजनों के लिए बने आवासों को भी अपने सगे-संबंधियों को दे देते थे। परिवार को लेकर ऐसा लगाव शायद की तब किसी और देश में पाया जाता हो। तब देश में हजारों हजार करोड़ खर्च कर खेल-तमाशे हुआ करते थे और उसमें भी रईसी ऐसी कि पूरी दुनिया ने दांतों तले उंगली दबा लिया। तब देश इतना अमीर हुआ करता था कि विदेशों से आने वाले मेहमानों के लिए हर बंदोबस्त राजशी ठाट-बाट वाले हुआ करते थे। मेहमानों को देश का कोई गरीब नहीं दिख जाये इसके लिए पहले ही उन्हें सड़क किनारे से हटा लिया गया था और कूड़े-कबाड़े के ढेरों को सुंदर-सुंदर बैनरों से ढक कर देश को सुंदरता प्रदान की घई थी। ऐसी भव्यता थी कभी अपने देश की। देश की जनता अपने लालों के कारनामों की मुरीद बन गई और जगह-जगह मांग होने लगी कि घोटाला नामक इस आविष्कार को कानूनी रूप देकर पेटेंट करा लिया जाये, कहीं विदेशी लोग इसे हड़प कर हमारी बराबरी न करने लगें। आम-आदमी की भी तब काफी इज्जत थी। उनके खाने-पीने की चीजें जैसे प्याज, टमाटर और दाल जैसी चीजे रोजाना टीवी पर दिखाई जाती थी और तब के कृषि मंत्री देश के प्राचीन ज्ञान ज्योतिष विज्ञान में खूब भरोसा रखते थे। तब आम आदमी की समस्याओं के समाधान के लिए हुक्मरान ज्योतिष विज्ञान का खूब इस्तेमाल करते थे और जनता-जनार्दन सरकार के इस कल्याणकारी रवैये से काफी खुश थी। लोग जिंदगी से इतने निश्चिंत थे कि तब की राजनीतिक रैलियों में हजारों और लाखों की संख्या में लोग पहुंचते थे और राजनेताओं द्वारा दिये गये उपदेश को सुनकर अपना जीवन धन्य करते थे।
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२१वी सदी शुरू होते ही देश ने दूध की नदी बहने जैसी प्राचीन कहावतों से पीछा छुड़ाते हुये अभिजात्य वर्ग का टॉनिक कहे जाने वाली शराब की नदी बहाने का लक्ष्य प्राप्त कर लिया था। देश का हर हिस्सा इस मामले में समान गति से विकास कर रहा था। इस नए प्रकार का दूध पीकर लोग अपना दुख-दर्द भूल जाया करते थे।
नारी सश्क्तिकरण को भी तब हमने खूब बढ़ावा दिया था। मुन्नी की बदनामी और शीला की जवानी देश के लोगों को तब उत्साह से लबरेज रखने के लिए टॉनिक का काम किया करती थी। पूरा देश इन स्वरलहरियों पर झूम उठता था और जो खुश नहीं थे उन्हें राखी सावंत जैसी उस दौर की महान न्यायवादी महिलाओं के इंसाफ से उनका हक मिलता था। पूरे भारत भर में राम राज्य जैसा माहौल था। सही मायनों में उस दौर को देश के लिए गोल्डेन एज कहा जा सकता है।
Sunday, 12 December 2010
इस बार बिहार ने भ्रष्टाचार पर एक रास्ता दिखाया है...
पहली घटना--
बिहार में भ्रष्टाचार में लिप्त पूर्व मोटरयान निरीक्षक (एमवीआई) की सम्पत्ति जब्त करने के न्यायालय के आदेश के बाद सरकार ने अब उस भवन में विद्यालय खोलने की तैयारी प्रारंभ कर दी है। समस्तीपुर जिले में स्थित एमवीआई रघुवंश कुंवर के पैतृक गांव चैरा में बने मकान में विद्यालय खोलने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। परिवहन विभाग के अधिकारी कुंवर के पास समस्तीपुर के अलावा पटना में आलीशान मकान और जमीन है। उनके मकानों और जमीन के अधिग्रहण के लिए संबंधित जिलाधिकारियों को एक माह के अंदर तमाम प्रक्रियायें पूरी कर लेने को कहा गया है। उल्लेखनीय है कि भ्रष्टाचारियों की अवैध सम्पत्ति जब्त करने संबंधी कानून के तहत कुंवर और उनकी पत्नी ललिता देवी के पास मिली लगभग 45 लाख रुपये की अवैध सम्पत्ति जब्त होगी। सतर्कता विभाग के विशेष लोक अभियोजक राजेश कुमार के अनुसार रघुवंश के पास मौजूद आय से अधिक 44,99,318 रुपये की चल और अचल सम्पत्ति को जब्त करने के लिए विभाग की विशेष अदालत में इस वर्ष 12
अगस्त को एक मामला दायर किया गया था। गौरतलब है कि शिकायत मिलने के बाद 24 सितंबर 2008 को सतर्कता विभाग के अधिकारियों ने कुंवर को 50 हजार रुपये रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़ा था। जांच के बाद विभाग ने उनके खिलाफ मई 2009 में आय से अधिक सम्पत्ति का मामला दर्ज कराया था।
दूसरी घटना--
दूसरी महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तहत बिहार में स्थानीय क्षेत्र विकास निधि पर लगे भ्रष्टाचार के दाग धोने के प्रयास के तहत राज्य सरकार ने इस कोष को समाप्त करने का ऐतिहासिक निर्णय किया है. बिहार में विधानसभा और विधान परिषद के सदस्यों को स्थानीय क्षेत्र विकास कोष से हर वर्ष एक एक करोड़ रुपये दिए जाते हैं। स्थानीय क्षेत्र विकास विधायक और विधानपार्षद निधि की बिहार में शुरुआत वर्ष 1984 में की गई थी। इस निधि के तहत शुरुआत में हर सदस्य को प्रतिवर्ष विकास कार्यो के लिए एक लाख रुपये दिए जाते थे। बिहार में विधायक और विधान पार्षद स्थानीय क्षेत्र के विकास निधि के 26साल पुराने इतिहास में एक लाख रुपये प्रतिवर्ष से शुरू होकर यह सफर एक करोड़ रुपये तक पहुंचा। वर्ष 1986 में इस राशि को बढ़ाकर प्रतिवर्ष पांच लाख रुपये कर दिया गया, जबकि इसके चार साल बाद यानि 1990 में यह राशि बढ़ाकर 10 लाख रुपये कर दी गई। वर्ष 1996 में स्थानीय क्षेत्र विकास निधि में एक बार फिर बढ़ोत्तरी की गई जो बढ़कर 50 लाख रुपये हो गई। 2003 में 50 लाख रुपये की राशि को बढ़ाकर एक करोड़ रुपये कर दिया।
अब आगे चलकर केंद्र सरकार को भी प्रतिवर्ष सांसदों को मिलने वाले दो करोड़ रुपए के सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास निधि [एमपीलैड] को समाप्त करने के लिए तत्परता दिखानी चाहिए.
बिहार की नयी सरकार द्वारा उठाया गया ये कदम आज देश भर में व्यवस्था में पैठ बना चुके घोटालेबाजों के लिए एक सबक बन सकता है बशर्ते कि हमारी राजनीतिक बिरादरी ऐसा करने की हिम्मत जुटाए और ऐसा कदम उठाये कि अपना काम करते वक्त घुस मांगते हुए किसी भी सरकारी कर्मचारी के सामने भविष्य की बर्बादी का मंजर घूम जाये. इतना ही नहीं जैसा कि हमारे सिविल सोसाइटी के लोग लगातार मांग करते आ रहे हैं कि एक ऐसी राष्ट्रीय एजेंसी बने जो करोडो-अरबो डकार जाने वाले राजनीतिज्ञों-कारोबारियों और नौकरशाहों के नेक्सस को बिना किसी दबाव के दण्डित कर सके.
बिहार में उठाया गया ये स्वागतयोग्य कदम भ्रष्टाचार उन्मूलन की दिशा में ऐतिहासिक शुरूआत होगी।
Tuesday, 23 November 2010
अतिथि देवो भवः और कल्लन काका का इनक्रेडिबल विलेज..!
Friday, 12 November 2010
भ्रष्टाचार का पेटेंट और कल्लन काका..!
Wednesday, 6 October 2010
मुगालतों का देश और सुपर पॉवर होने का सपना..!
हजारों करोड़ की लागत से राजधानी में बने आलिशान खेल गाँव और चंद स्टेडियम तथा कुछ वीआईपी इलाकों में चमकती सडकों और सड़क किनारे बनी आकर्षक आकृतियों से आगे बढ़कर अब चलते है शेष भारत के पास जिसको सुपर पॉवर का ये तमगा एक शूल की भांति चुभ रहा है. अजी पूरे देश की बात तो छोडिये जरा खेल गाँव और दक्षिण-मध्य दिल्ली से बहार निकलिए और दिल्ली के पूर्वी, पश्चिमी और उत्तरी इलाकों का नज़ारा कर लीजिये. टूटी-फूटी सड़कें, और कहीं गड्ढों में सड़क तो कहीं सड़क में गड्ढों पर सवारी करती वहां की जनता आपको सुपर पॉवर होने के एहसास की सच्चाई से जरूर रूबरू करा देगी.
देश की व्यवस्था की संवेदनहीनता की तो बात ही मत कीजिये. अभी करीब दो-तीन महीने ही हुए होंगे जब राजधानी दिल्ली के एक केन्द्रीय स्थान पर भीड़-भाड वाले एक सड़क के किनारे एक महिला ने एक बच्चे को जन्म दे दिया था और वही उसने दम तोड़ दिया था. व्यवस्था की संवेदनहीनता और सामाजिक सुरक्षा की कमी पर तब न्यायलय ने कड़ी नाराजगी जताई थी. ये कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती...सुपर पॉवर बनने का दम भरने वाला ये भारत अपने यहाँ के बच्चों के पोषण कुपोषण की क्या बात करे ये भारत अपने देश के भविष्य अपने नौनिहालों को स्कूलों तक लाने के लिए दोपहर के भोजन का लालच देता है. ये देश अपने लोगों को काम की गारंटी साल में १०० दिन की मजदूरी के काम को मुहैया कराकर देता है. मजदूरी की इस मामूली रकम में गबन और फर्जीवाड़े पर देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् की चेयरमैन तक चिंता जता चुकी हैं. खेल पर हजारों करोड़ रुपया लुटाने वाला ये देश वृधावस्था पेंशन के रूप में अपने बुजुर्गों को महीने भर के खर्च के लिए महज दो-ढाई सौ रूपये की रकम देता है. इस देश के पढ़े-लिखे लोगों को न तो रोजगार की गारंटी है और न ही अपनी वृहत आबादी के लिए इसके पास कोई सामाजिक सुरक्षा का व्यवस्थित ढांचा ही है. पारदर्शिता की तो बात ही मत कीजिये..आजादी के ६०-६५ सालो बाद अभी यही चर्चा चल रही है कि देश का सबकुछ जिस राजनीती के हाथों में है उस राजनीति में दागी-भ्रष्ट-घोटालेबाज और अपराधियों को आने से और धनबल और बाहुबल के प्रयोग को कैसे रोका जाये?
जो लोग भी अचानक से देश को सुपर पॉवर समझने लगे हैं उन्हें यह अहसास होना चाहिए कि राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार से लड़ने का जो मौका अभी देश ने गवां दिया उसकी भरपाई अगले कई दशकों तक उसे करनी पड़ेगी. ये एक ऐतिहासिक मौका था जब देश भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुट होकर व्यवस्था में हर स्तर पर शामिल ऐसे लोगों को सुधरने पर मजबूर कर सकता था...जो हमने गवां दिया और बदले में पाया--'सुपर पॉवर होने का मुगालता'..!
Monday, 4 October 2010
इंडिया सर ये चीज धुरंधर...

१) दिल्ली के जवाहरलाल नेहरु स्टेडियम के पुनरुद्धार के ऊपर ९६० करोड़ का खर्चा..
२) भारी बारिश-भूस्खलन और बाढ़ से तबाह हो गए उत्तराखंड राज्य को केंद्र की ओर से ५०० करोड़ की मदद..
खबरों से प्राप्त इन दो आकंड़ों पर गौर करें और किसानों का देश कहे जाने भारत और दिल्ली की चकाचौध से अपनी छवि बदलने को छटपटा रहे इंडिया की व्याकुलता के बीच भारत का किसान अपनी स्थिति का अंदाजा खुद लगा ले..
Tuesday, 16 February 2010
क्या पूरे भारत को मिल गया रोटी, कपड़ा और मकान?
हमारे यहाँ जनता और उसकी समस्याओं को देखने का चश्मा काफी अलग-अलग नंबर का होता है, इतना ही नहीं इसे देखने वाले भी अलग-अलग वेराईटी के होते हैं तभी हमारा देश विविधता में एकता के लिए दुनिया भर में मशहूर है. आज समाचार पत्र में देश की तकनीकी क्रांति के एक बड़े ही काबिल शख्शियत नंदन निलेकनी जी का एक बयान छपा था...उनकी काबिलियत से प्रसन्न होकर इधर भारत सरकार ने उन्हें देश में रह रहे सभी लोगों को एक एकीकृत पहचान नंबर दिए जाने के अपने अभियान का मुखिया बना दिया है इसलिए उनके बयान पर गौर करना बहुत जरूरी हो जाता है..उन्होंने कहा कि देश के लिए रोटी, कपड़ा और मकान का नारा ६० और ७० के दशक का है और अब पुराना पड़ गया है, इतना ही नहीं देश उसके बाद के दौर यानी कि बिजली, सड़क और पानी के नारे के दौर से भी आगे निकल रहा है और अब देश के लिए नया नारा है- यूआईडी नंबर, बैंक अकाउंट और मोबाइल फोन...जो इससे कदमताल मिलाकर चलेगा अवसर उसी के होंगे...!अब रही बात लोगों को यूआईडी नंबर, बैंक अकाउंट और मोबाइल फोन देने की तो शायद ये लाखों और करोड़ों लोगों के लिए अवसरों के द्वार खोलें लेकिन उससे भी ज्यादा लोग ऐसे हैं जिनके लिए अभी पुराने नारे बेमानी नहीं हुए हैं और उनके लिए आज भी इन नए नारों से पुराने नारे ज्यादा जरूरी हैं। देश की सबसे बड़ी बिडम्बना यही है कि देश को देखने और उसके विकास का काम शहरी और एलिट वर्ग के हाथों में है और गाँव का जो प्रतिनिधि राजधानी तक पहुँचता है वह या तो जनता की समस्याओं को उठा नहीं रहा है या वो भी इसी लूट-पाट में शामिल हो जा रहा है और सरकारी खाते और कागजों में हमारा देश, उसकी ग्रामीण आबादी और भूखे-नंगे लोग भी तेजी से तरक्की करते जा रहे हैं और देश को महाशक्ति बनाने के सपने( कई लोग इसे मुगालता भी मानते हैं) में जी रहे हैं.
Monday, 8 February 2010
लो पाकिस्तान ने दिखा दी अपनी जात, कर लो अब "अमन की आशा"
इधर अख़बार और टीवी में लगातार एक विज्ञापन दिखाई दे रहा है...अमन की आशा... जो भारत और पाकिस्तान के बीच अमन की आशा जगाने के लिए कुछ अति-उत्साही मीडिया संगठनों के द्वारा चलाया जा रहा है. हमारे देश की संस्कृति में एक खास सीख हमेशा दी जाती है कि सामने वाला चाहे कितना भी बुरा क्यूँ न हो आप उससे हमेशा अच्छे से पेश आओ. इसी रास्ते पर चलते हुए हमने बार-बार मार खाकर भी पाकिस्तान के आगे दोस्ती के हाथ बढ़ाये. संसद पर हमला हुआ तो कई माह तक सेना सरहद पर तैनात कर हम पाकिस्तान से उम्मीद करते रहे कि अब सुधरेगा तब सुधरेगा...फिर मुंबई में जब आतंकियों ने दिन-दहारे कत्लेआम किया तब भी कई माह तक हम पाकिस्तान पर दबाव बनाने की जुग्गत भीडाते रहे और फिर आख़िरकार थक-हारकर बातचीत का प्रस्ताव कर दिया। हमले के बाद के इस एक साल में पाकिस्तान आतंकियों पर अपनी ओर से लगाम लगाने के लिए कुछ करना तो दूर हमारे बातचीत के प्रस्ताव का मजाक ही उड़ाने लगा. आम लोग ऐसा करें तो कुछ बात भी हो लेकिन वहां का विदेश मंत्री तक इस तरह की गैरजिम्मेदारी दिखा रहा है. तो कैसे होगा अमन...क्या हमेशा मार खाकर हम शांति की उम्मीद करते रहेंगे और यूँही हमारी पीठ में छुरा घोंपा जाता रहेगा.Friday, 15 January 2010
लो नहा लिया गंगा में, कर आये उसे मैला...

गंगा में डुबकी,
धो लिया सबने अपना पाप
और भुला दिया
कल तक की सारी दुशवारियों को भी!
बनारस से लेकर हरिद्वार तक
और इलाहाबाद से लेकर गंगासागर तक
कई दिनों से लोग
कर रहे थे इसी नहान के लिए मश्श्क्कत!
लो हम सफल हुए
अपने इस होली डीप(पवित्र स्नान) में...
लेकिन कई-कई टन फूल-माला भी छोड़ आये हम
अपने पीछे इस गंगा में
जिसकी सफाई के नाम पर अबतक
सरकारें बहा चुकी हैं कई-कई करोड़ रूपये
और जो आज भी बाट जोह रही है
अपनी सफाई की...
वैसे सुना है कि अब सरकारे
फिर सजग होने लगी हैं इसके प्रति
अब होने लगी हैं कैबिनेट की बैठकें
गंगा की धारा पर
तो शायद अब तक हमारी गन्दगी धोती
इस गंगा के
दिन भी अब बदल जाएँ...!
Monday, 4 January 2010
क्या दोषी नेताओं का भी पद नहीं छिनना चाहिए...?
हरियाणा के पूर्व पुलिस कप्तान इन दिनों मीडिया की सुर्ख़ियों में हैं. छेड़छाड़ के आरोप में उन्हें महज ६ माह की सजा मिलने के बाद अचानक देश की जनता जाग पड़ी है...मीडिया जाग पड़ा है और इन सबके बाद अचानक सरकार भी जाग गई है. सब कड़ी से कड़ी सजा की मांग कर रहे हैं...अचानक सब न्याय व्यवस्था की सुस्ती पर सवाल उठाने लगे हैं. केंद्र सरकार जाग पड़ी है, राज्य सरकार जाग पड़ी है. सब ने मिलकर उस पुलिस अधिकारी को दिए गए मेडल छीनने की मुहीम शुरू कर दी है. देश के गृह सचिव ने कहा है कि सरकार ऐसी व्यवस्था बना रही है जिसमे दोषी साबित हुए अधिकारियों से उन्हें मिले मेडल आटोमेटिक तरीके से वापस ले लिए जाएँ...क्या यहाँ एक सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए कि जब दोषी पुलिस अधिकारी से उसका मेडल वापस लिया जा सकता है तो फिर दोषी राजनेता से उसका पद क्यूँ नहीं छीन लिया जाना चाहिए. चलिए मान भी लें कि दोषी और सजायाफ्ता लोगों के चुनाव लड़ने पर पाबन्दी है लेकिन क्या उन लोगों को चुनाव लड़ने से रोक नहीं देना चाहिए जो लम्बे समय से जेल की रोटी तोड़ रहे हैं या फिर जिनपर हत्या जैसे गंभीर अपराध के लिए मुकदमा चल रहा हो. या फिर जिनपर दर्जनों मुक़दमे चल रहे हों. या फिर जो चुनाव जैसे लोकतान्त्रिक कार्य के दौरान धन-बल की मदद लेते पाए गए हों..या फिर क्यूँ नहीं ऐसे राजनीतिक लोगों को समाज और देश के जिम्मेदार पद से अलग कर दिया जाये जिनपर भ्रस्टाचार जैसे मामले चल रहे हों.. ऐसे आदमी को कैसे किसी जिम्मेदार पद पर रहने दिया जा सकता है जो अपने अधिकार का गलत उपयोग करते हैं. क्या अधिकारियों को सुधारने के साथ-साथ राजनीतिक व्यवस्था में सुधार की भी पहल नहीं होनी चाहिए?Friday, 1 January 2010
स्वागतम २०१०...!
Sunday, 27 December 2009
अंधेर नगरी-चौपट राजा!
बात-बात में मीडिया को कोसने वाली जनता आज कहाँ है. जो काम उसे करना चाहिए था वह मीडिया कर रहा है. मीडिया ने साबित किया है कि जो गलत है उसे रोकने में वह एक सशक्त माध्यम बन सकता है, लेकिन साथ ही यह भी सच है कि इस काम में आखिरकार सबकुछ जनता के ऊपर ही टिकी हुई है. मीडिया के एक स्टिंग ऑपरेशन ने सेक्स स्कैंडल के आरोप में फंसे एक राज्य के गवर्नर को महज ३० घंटो के अन्दर राजभवन से बेदखल करवा दिया और राजनीतिक जमात को यह याद दिला दिया कि राजभवन की गरिमा क्या होती है. मीडिया के लगातार अभियान के कारण एक राज्य के एक रसूखदार पुलिस अधिकारी के ऊपर इन दिनों शामत आई हुई है. इन अधिकारी के ऊपर एक युवा महिला बैडमिन्टन खिलाड़ी के साथ छेड़-छाड़ और उसे आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप है. यह घटना १९ साल पुरानी है, मीडिया ने यहाँ देश के न्याय व्यवस्था पर भी सवाल उठाया है कि आम आदमी के लिए न्याय का पैमाना क्या है और रसूखदार लोग किस तरह से प्रशासन का इस्तेमाल कर न्याय प्रक्रिया को बाधित करते हैं और साथ ही यह सवाल भी कि न्याय व्यवस्था इसे रोकने के लिए क्या कर रही है? मीडिया के अभियान के बाद आज केंद्र से लेकर उस राज्य तक की सरकार इस मामले में जागी है और तमाम महिला संगठन भी न्याय दिलाने के लिए आगे आये हैं.
Thursday, 17 December 2009
सच भाई... जमाना कितना बदल गया न...
Tuesday, 15 December 2009
मुद्दे हम बनाते हैं...
जार-जार होकर जनता
बस इतना ही कह पाती है-
हमारी कोई नहीं सुनता
किसी को नहीं हमारी फिकर...
लेकिन क्या हम अपनी बदहाली के
खुद जिम्मेदार नहीं...
आज़ादी के ६ दशकों बाद भी
नहीं है हम
अपनी पेट भरने को आश्वस्त
और ना ही है हमें
रोजगार पाने की गारंटी।
हाँ, मजदूरी के लिए
है हमारे पास गारंटी स्कीम
लेकिन क्या सोचा है हमने कभी
देश का पढ़ा-लिखा वर्ग
कैसे पायेगा रोजगार।
क्या वो भी
सड़क निर्माण में
ईंट-पत्थर ढोकर रोजगार की गारंटी पाए
और कहे खुद को
महाशक्ति बनने को आतुर
२१वी सदी के इंडिया का .नागरिक
जहाँ कुछ सालों में ही
राजनेताओं की तिजोरियों में
आ जाते हैं हजारो-हज़ार करोड़ रूपये
और फिर सालो-साल चलने वाले
मुकदमों की दौड़ में
खो जाती हैं यादे देश को लूटने वाले लोगों की
और फिर हम चल पड़ते हैं अगली
चोट खाने को
लोकतंत्र के हाथों॥
हमारे यहाँ मुद्दे कभी नहीं चुकते
रोटी की बढ़ी हुई कीमते
हमें एकजुट नहीं करती,
नहीं करती हमें तोड़-फोड़ पर उतारू
बेरोजगारी की मार भी,
लेकिन जब राज्य बाटना होता है
तो हम उतर पड़ते हैं सडको पर,
जब करने होते हैं दंगे
हमारी मर्दानगी जाग उठती है
और फिर शान से सर उठाये
हम बन पड़ते हैं अपने समुदाय के पहरुए।
लेकिन अपने लोगों की दुर्दशा
हमें नहीं बिचलाती
क्यूंकि हमारे पेट को
मिल जा रहा है अनाज फ़िलहाल!


