Tuesday, 12 April 2011

भ्रष्टाचार का मुद्दा और सरपंच कल्लन काका की गुगली..!


गांव के सरपंच कल्लन काका  ने सुबह से जब से अखबार में भ्रष्टाचार के खिलाफ देश की राजधानी दिल्ली में किसी अन्ना हजारे नाम के बुजुर्ग समाजसेवी की भूख हड़ताल की कहानी को पढ़ा था तभी से उनके चेहरे की चमक उड़ी हुई थी। कहीं ये आग देर-सबेर उनके गांव में भी न पहुंच जाये और गांधीजी के नाम की माला जपने वाले उनके विरोधी मास्टर रामनगीना कहीं इसी हथियार को अपनाकर उनके खिलाफ गांव के लोगों की सहानुभूति न बटोर ले जाये। इसी चिंता में काका सुबह से घुले जा रहे थे। अपने सिपहसलार मोहन को आते देख काका ने तुरंत अपनी चिंता उसे बताई और कहा कि इस आंधी से खुद को बचाने के लिए क्या उपाय किये जायें बताओ?
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काका को पता था कि भ्रष्टाचार के क्षेत्र में उनके लंबे कैरियर को भले ही अबतक वे गोपनियता और विशेषाधिकार के नाम पर बचाते आ रहे हों लेकिन अगर ये अन्ना हजारे वाली आंधी गांव में पहुंच गई तो रामनगीना मास्टर उनके खिलाफ मोर्चा खोलने का कोई मौका गंवाएंगे नहीं। काका ने मोहन से पूछ डाला कि अरे भाई ये  लोकपाल आखिर क्या बला है जिसके ऊपर ये अन्ना हजारे साहब दिल्ली में बैठे हुक्मरानों की नाक में दम किये हुये हैं। कहां मिलेगी ये? हम भी लाकर गांव में इसे स्थापित करवा दें ताकि रामनगीना मास्टर को मौका न मिले हमारे खिलाफ मोर्चा खोलने की। मोहन ने काफी कुछ सोचा और कहा कि आज शाम को इस मामले पर अपने कोर ग्रूप की बैठक बुला ली जाए ताकि जल्द से जल्द लोकपाल की मूर्ति की स्थापना कर गांव के लोगों को कल्लन काका की भलमनसाहत का परिचय दिया जा सके। शाम को बैठक हुई और सर्वसम्मति से रणनीति बना ली गई और कार्यक्रम के लिए 1 अप्रैल का दिन मुकर्रर किया गया। काका और उनकी टीम ने इस दिन की तैयारी के लिए पूरी ताकत झोंक दी आखिर अगले साल होने वाले सरपंची के चुनाव में जीत भी तो पक्की करनी थी।
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खैर यह दिन भी आ गया। पूरे गांव को फूल-माला से सजाया गया, एक-दम मेले जैसा मंजर था। खद्दर के कुर्ते में काका खूब फब रहे थे, पॉकेट में भाषण की तैयार की गई कॉपी रख काका मंच पर बिराजे। मंच पर काका की कुर्सी के पीछे गांधीजी की तस्वीर लगा दी गई और बगल में भारत माता का चित्र। काका ने जमकर भाषण दिया और भ्रष्टाचार के मामले पर जीरो टॉलेरेंस की अपनी प्रतिबद्धता पूरे जोश के साथ दोहराया। काका ने यहां तक कहा कि जबतक उनके शरीर में प्राण रहेगा गांव में भ्रष्टाचार को पनपने नहीं देंगे और इसी के लिए चौपाल पर लोकपाल की मूर्ति स्थापित करवा रहे हैं ताकि भ्रष्टाचार से लड़ने की उन्हें निरंतर प्रेरणा मिलती रहे। खैर मंच का कार्य़क्रम खत्म हुआ और गांव की जनता के लिए काका द्वारा व्यवस्थित सांस्कृतिक कार्यक्रम का दौर शुरू हुआ। गांव के युवाओं की विशेष इच्छा को देखते हुये काका ने पड़ोस के जिले से मशहूर बिजली रानी का ऑरकेस्ट्रा बुला रखा था। भ्रष्टाचार के ऊपर काका के जोशिले भाषण के बाद मुन्नी की बदनामी और शीला की जवानी की स्वरलहरियों पर बिजली के डांस ने  गांव के युवाओं को झूमा कर रख दिया। कार्यक्रम के समापन पर जहां गांव के सारे लोग काका के समारोह से खुशी में आकंठ डूबे लौटे वहीं भ्रष्टाचार पर उनकी प्रतिबद्धता और लोकपाल मामले पर उनकी पहल की भी कम सराहना नहीं हुई। अपनी योजना सफल होते देख काका की खुशी का भी ठिकाना नहीं था उन्हें पूरा भरोसा था कि अगले साल सरपंची के चुनाव में अब उनकी जीत को कोई नहीं रोक सकता।  उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे उनकी  उम्र १० साल घट गई हो। पर काका से ज्यादा खुशी उनके पीछे खड़े बब्बन को हो रही थी आखिर वहीं इस पूरे कार्यक्रम का फाइनेंसर था और अब काका की सफलता से उसे भरोसा दो गया था कि गांव में शराब के ठेके पर अगले पांच साल तक उसके कब्जे को कोई और चुनौती नहीं दे पाएगा। आखिर काका का हाथ उसके साथ जो है।

Monday, 11 April 2011

ब्रांड अन्ना और युवा भारत की आजाद मंशा..!


पिछला हफ्ता काफी गहमा-गहमी वाला रहा. भारत के राजनीतिक क्षितिज पर तमाम पुराने घाघ राजनेताओं की मौजूदगी और उनकी अनिक्क्षा के बावजूद ७२ साल के एक बुजुर्ग अन्ना हजारे का नाम इस तरह नमूदार हुआ कि सब भौचक देखते रह गए. इस पूरी लड़ाई में बुजुर्ग अन्ना और उनके पीछे खड़ा देश का युवा, कामगार वर्ग(सरकारी तंत्र से जुड़े लोगों को छोड़कर) और प्रौढ़ आबादी सीन में था और बाकी सब राजनीतिक चेहरे इस दौरान गौण हो गए. आखिर ऐसा क्या हुआ कि भारत के जिस युवा आबादी के बारे में कहा जा रहा था उसे क्रिकेट और मौज-मस्ती से फुर्सत ही नहीं है वह अचानक उठकर हाथों में तिरंगा थामकर अन्ना के पीछे खड़ा हो गया?
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मोटे तौर पर इसके दो कारण दिख रहे हैं.
पहला तो ये कि पिछले साल-दो साल में देश में जिस तरह से करोडो-अरबो के घोटाले लगातार सामने आते जा रहे थे और राजनीतिक नेतृत्व उसपर अपनी उदासीनता और बेशर्मी दिखाए जा रहा था उसे लेकर लोगों के मन में खासकर युवाओं के मन में काफी गुस्सा पनप रहा था. उसी गुस्से को अन्ना हजारे ने एक आवाज दी. लोगों को एक ऐसा मंच मिल गया जहाँ से उन्ही के मन की बात कोई कह रहा था. लोगों ने देर नहीं की और आन्दोलन के साथ हो लिए.
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दूसरा जो कारण दिख रहा है वह है कि आजाद भारत में पहली बार एक बड़े मंच से किसी ने राजनीतिक बिरादरी को यह बताने की जुर्रत की है कि सरकार का काम क्या है. अन्ना हजारे ने बार-बार जोर देकर कहा कि लोकतान्त्रिक भारत में जनता देश की मालिक है और हुक्मरान केवल सेवक. जिन्हें जनता की प्रगति और विकास के काम के लिए लगाया गया है. उसी काम के बदले देश के खजाने से उन्हें वेतन आदि दिया जाता है और इसी से उनके घर-परिवार की रोजी-रोटी चलती है. अत उन्हें अपने काम और कर्तव्य को समझना होगा.
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हुक्मरान बुरा माने या अच्छा... अन्ना हजारे ने अपने आन्दोलन के जरिये उन्हें एक मौका दिया है.. आगाह किया है कि इससे पहले कि देश की जनता अपना आपा खो दे हुक्मरानों को इस अंधेरगर्दी के दौर को ख़त्म कर ईमानदारी और जवाबदेही का रास्ता अख्तियार कर लेना चाहिए. २१वी सदी में दुनिया से कदम मिलाकर चलने को आटूर हिंदुस्तान की युवा आबादी नहीं चाहती कि कुछ चंद बेईमानो के कारण उनके देश को कोई भ्रष्ट और करप्ट देश कहे. ना ही यहाँ का कामगार वर्ग टैक्स चुकाने के बावजूद आपनी अगली पीढ़ी को एक भ्रष्ट व्यवस्था सौपना चाहता है.
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अन्ना हजारे के इस आन्दोलन ने एक और काम जो किया है वह यह कि ईमानदारी की बात करने वाले जिन लोगों को कल तक लोग पुराने ज़माने का आदमी और आज के भ्रष्ट व्यवस्था के लायक नहीं समझते थे अचानक से उनका मनोबल बढ़ गया है और वे अब अपनी ईमानदारी भरी बात एक बार फिर से बुलंद होकर करने लगे हैं और बेईमानों का स्वर हल्का पड़ गया है. यही है ब्रांड अन्ना का कमाल जो कि पिछले एक हफ्ते में मार्केट में आया है और अपनी अमिट छाप छोड़ गया है.

Tuesday, 15 February 2011

इस कलयुग में ईमानदार होने का दर्द!

कहानी भारतभूमि पर आज से ५० साल पूर्व जन्मे दीनानाथ चम्पकलाल की है जिन्होंने गांधीजी और शास्त्रीजी की शिक्षाप्रद कहानियों और उपदेशों से ओत-प्रोत होकर अपनी पूरी जवानी इमानदार बनने और उसका डंका पीटने में काट दी. युवा चम्पकलाल जब अपने किशोरकाल में अपने सीने पर चे-ग्वेरा की तस्वीर वाला टी-शर्ट चिपकाये घूमते थे तो उन्हें मोहल्ले में हीरो जैसी फीलिंग होती थी. हाँ. घर पहुचने पर उन्हें पिताजी की नसीहत जरूर सुनने को मिलती थी कि कुछ काम-धंधा सिख लो या पढ़ाई वगैरह कर लो. समय बड़ा ख़राब आ रहा है. तब चम्पकलाल मन ही मन सोचते- देश आजाद हो गया है, गाँधी-नेहरु का युग आ गया है, गोरे लोग चले गए अब काहे का डर, अब सब कुछ अच्छा ही होगा. इमानदारी की गठरी मन में दबाये चम्पकलाल मन ही मन अपने पिता की नासमझी पर तरस खाते और फिर चे-ग्वेरा की टी-शर्ट छाती पर चिपका घर से निकल पड़ते. असलियत से उनका सामना पहली बार तब हुआ जब वे देश सेवा का जज्बा दिल में लिए पुलिस में भर्ती होने के लिए जिला मैदान पहुंचे. भर्ती स्थल के बाहर खड़े दलाल ने उनकी ईमानदारी से भरी बातें सुनकर पहले ही उनका भविष्य बता दिया जो कि बाद में सच भी साबित हुआ. खैर अगले साल पुस्तैनी जमीन में से एक बीघा गवां कर उनके पिताजी उन्हें डाक खाने में बाबू बनवाने में सफल रहे. वहां भी ईमानदारी ने चम्पकलाल का साथ नहीं छोड़ा और करीब बीस सालों तक वे डाकखाने की फाइलों में उलझे रहे. फिर उनको होश तब आया जब उनके सुपुत्र जूनियर चम्पकलाल किशोरवय को प्राप्त हुए और उनका दाखिला कॉलेज में हो गया. फर्स्ट डे कॉलेज से वापस आते ही जूनियर ने पल्सर बाइक की डिमांड रख दी और तब ही माने जब सीनियर चम्पकलाल का पीएफ अकाउंट खाली होकर पल्सर बाईक की शक्ल में दरवाजे पर नमूदार हो गया।
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बेटी जवान हो रही थी और चम्पकलाल को उसकी शादी की चिंता भी सताए जा रही थी. तभी उनके मन में विचार आया की पुश्तैनी जमीन कब काम आयेगी. खैर पुश्तैनी जमीन का एक अच्छा-खासा हिस्सा गवांकर वे इस समस्या से भी निजात पाने में सफल रहे. २१वी सदी शुरू हो चुकी थी और अब भी चम्पकलाल ईमानदारी भरी सोच के चंगुल से निकल नहीं पा रहे थे. इमानदारी से डाकखाने की फाइलों में खोये चम्पकलाल की जिंदगी में तब फिर तूफ़ान उठ खड़ा हुआ जब पडोसी विमला चाची के यहाँ एलपीजी गैस के सीलिंडर का आगमन हुआ. तब करीब दो दशकों से चूल्हा फूंक-फूंक कर थक चुकी चम्पकलाल की श्रीमती कमला देवी का रहा-सहा धैर्य भी जवाब दे गया और उन्होंने साफ़ शब्दों में कह दिया कि जबतक गैस नहीं आएगा घर में खाना नहीं बनेगा. उनका ये क्रांतिकारियों टाइप रौद्र रूप देखकर चम्पकलाल को अपनी जवानी वाली टी-शर्ट पर छपे चे-ग्वेरा की तस्वीर याद आ गयी. खैर इमानदार चम्पकलाल पूरे दस्तावेजों के साथ गैस सीलिंडर के कार्यालय पहुंचे. वहां काउन्टर पर बैठे क्लर्क ने साफ़ शब्दों में उन्हें बताया कि अभी साल-दो साल तक नया नंबर नहीं लगेगा, हजारों लोग नंबर में हैं. चम्पकलाल के सर पर जैसे घरों पानी पड़ गया हो. बाहर एक आदमी से पूछने पर उसने बताया कि किसी सांसद-विधायक से सिफारिश करवाओगे तो तुरंत मिल जायेगा. अब भला चम्पकलाल सांसद-विधायक की सिफारिश कहाँ से लाते. उन्हें तो बस नेताओं का वह रूप याद था जब वे समर्थकों और बैनर-पोस्टर के साथ हर पांच साल पर हाथ जोड़े वोट मांगने आया करते थे. सांसद-विधायक तो उन्होंने कभी देखे ही नहीं थे. खैर पूछने पर पता चला कि मार्केट में गैस की दुकान वाला ब्लैक में सीलिंडर दिलवा देगा. बीवी की आक्रामक मुद्रा से सहमें चम्पकलाल ने दुकानवाले को तीनगुना रकम अदा कर गैस हासिल किया और तब घर में उनकी एंट्री हो पाई हालाँकि इस दौरान उनपर १० हजार का कर्ज चस्पा हो गया. फिर भी वे अटल रहे और अपनी ईमानदारी को न छोड़ने का संकल्प दोहराकर फिर अपनी डाकखाने की फाइलों में खो गए.
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इधर उन्होंने अपना संकल्प दोहराया उधर इतिहास भी खुद को दोहराने की तैयारी में था. कॉलेज पास कर जूनियर चम्पकलाल ने नौकरी दिलाने की जिद शुरू कर दी. अब बेचारे चम्पकलाल इसका जुगाड़ कहाँ से करते. एक माह की भागदौड़ के बाद गाँव के छुटभैये नेता कल्लन काका ने उन्हें नौकरी दिलाने का वादा कर दिया बदले में एक लाख रूपये की मांग भी रख दी. अब चम्पकलाल क्या करते बेटे को बेरोजगार तो छोड़ नहीं सकते थे. जो पुश्तैनी जमीन बची थी उसे भी ठिकाने लगाकर जूनियर चम्पकलाल को जिला कार्यालय में बाबू बनवाने में सफल रहे. इतिहास खुद को दोहरा गया था लेकिन चम्पकलाल को अब भी संतोष था. उन्हें यायावर कवि नागार्जुन की पंक्ति याद आ गई-
"बापू को हीं बना रहें हैं तीनों बन्दर बापू के
बापू के भी ताऊ निकले तीनों बन्दर बापू के"
चम्पकलाल के चेहरे पर अचानक मुस्कान बिखर गया पर उन्हें एक बात का संतोष अब भी था कि उन्होंने अपनी ईमानदारी नहीं छोड़ी है.

Sunday, 9 January 2011

प्याज के साइड इफेक्ट..!

तारीख १ जनवरी २०५०...की सुबह। देश नया साल मनाने को तैयार है।
स्थान- संसद भवन परिसर।
पत्रकारों की भारी भीड़ श्री-श्री बाबा प्याजेश्वर की एक झलक को कैमरे में कैद करने की धींगामुश्ति में जुटी हुई है, बाहर देशभर से आई जनता भी बाबा की एक झलक पाने के लिए आतुर है। भारत सरकार के लंबे समय से जारी अनुरोध को मानते हुये पड़ोसी देश चीन से आये बाबा नव वर्ष के अवसर पर भारतीय संसद को संबोधित करने आए हैं। बाबा की लोकप्रियता की कहानी ४० साल पहले २०१० में भारत से ही शुरू हुई थी। तब भारतवर्ष प्याज संकट के दौर से गुजर रहा था। चारो तरफ हाहाकार मचा हुआ था। हुक्मरानों के तमाम प्रयासों के बावजूद देश को प्याज के संकट से नहीं निकाला जा सका। देश के विभिन्न हिस्सों में और यहां तक कि घरों के अंदर और छतों पर भी प्याज उगाने के तमाम प्रयास कभी किसानों का देश कहे जाने वाले महान भारतभूमि की कल्याणकारी सरकार और जनता द्वारा किये गये। आखिरकार ५ सालों के असफल प्रयास के बाद देश को प्याज के मामले में दिवालिया घोषित कर दिया गया।
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ऐसी स्थिति में दिल्ली के चांदनी चौक में प्याज के परांठे की दुकान पर काम करने वाले गोलू को तब अचानक एक आइडिया आया। गोलू ने अपने गुरू और दुकान के चीन निवासी मालिक चेन लिउ के कान में कुछ कहा। पड़ोसी देश चीन की सरकार देश का कारोबार बढ़ाने वाले सभी उपायों को ध्यान से सुनती थी यह बात चेन लिउ महोदय को मालूम थी। झट से अगले दिन वे गोलू महोदय के साथ चीनी दुतावास पहुंच गये और फिर जैसे उनकी तरक्की को पंख लग गये। चीन की सरकार की मदद से उन्होंने चांदनी चौक की अपनी दुकान को प्याज प्रसंस्करण केंद्र में बदल दिया और आइडिया देने वाले गोलू जी को अपना एडवाइजर बनाया। दोनों की जोड़ी एकदम अकबर-बीरबल स्टाइल में काम करने लगी। चीन के अपने पुस्तैनी जमीन पर इन्होंने कृत्रिम प्याज बनाने की एक फैक्टरी लगा ली और फिर भारत को उसका निर्यात करना शुरू कर दिया। देखते-देखते गोलू जी कब प्याज वाले बाबा के नाम से जाने जाने लगे किसी को भनक तक नहीं लगी। फिर प्याज प्रोसेसिंग, प्रिजर्विंग और एक्सपोर्ट जैसे अंग्रेजी टाइप नामों वाली कई कंपनियां चेन लिउ महोदय के नाम पर चलने लगी। इधर लिउ महोदय ने दुनिया छोड़ी ऊधर गोलू जी ने बाबा प्याजेश्वर का नाम धारण कर प्याज पर ग्लोबल कंसलटेंसी का काम शुरू कर दिया। कृत्रिम प्याज बनाने की तकनीक जानने वाले वे धरती पर अब अकेले जीव बच गये थे। बाबा की तरक्की देखकर पड़ोसी देश चीन ने उन्हें अपने देश की नागरिकता देकर बुला लिया। भारत और चीन दोनों देशों में प्याजेश्वर बाबा की समान इज्जत थी क्योंकि उन्होंने दुनिया से प्याज के अस्तित्व को खत्म होने से बचाकर इसे बहुमूल्य धरोहर के रूप में ही सही जिंदा तो रखा था।
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देश में प्याज की इतनी इज्जत बढ़ गई थी कि इसने डायमंड और गोल्ड की जगह ले ली। ऐसे वक्त में जब अपने घरों में प्याज को सजा कर रखना देश के कुछेक अमीरों को ही नसीब हो पाता था। जैसे लोग पहले अपने बच्चों के नाम सोनालाल, चांदीराम और हीरामल रखा करते थे वैसे ही अब लोग अपने बच्चों का नाम प्याज प्रसाद, प्याजीलाल और प्याज प्रताप सिंह रखने में गर्व महसूस करने लगे थे। बल्कि प्याज पर नामों की बहुतायत को देखते हुये सरकार ने इसमें सभी जातियों और धर्मों के लिए आरक्षण की घोषणा भी कर दी और ऐसा नाम रखने पर भारी-भरकम फीस लगाने का फैसला कर लिया। लेकिन इज्जत पाने की खातिर धन खर्चने की आदत हमारे देश में काफी पुरानी है। सो इसपर भी नाम रखने वालों की भीड़ कम नहीं हुई तो सरकार ने प्याज के ऊपर नाम रखने की राशनिंग पद्धति लागू कर दी। हां नेताओं तक अपनी पहुंच के कारण कुछ लोगों के लिए इसकी अनुमति पाना अब बी आसान था, भारत ने अभी भी जुगाड़ की अपनी पुरानी धरोहर को मिटने नहीं दिया था।
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हां, तो हम बात कर रहे थे प्याजेश्वर बाबा के संसद में संबोधन की। बाबा के आते हीं सभी सांसदगण बाबा के सत्कार के लिए उठ खड़े हुये। सत्कार लेकर बाबा जैसे ही बैठे सामने की पंक्ति में बैठे चार सदस्यों से उनका परिचय कराया गया। ये चारों जापान से उपहार में मिले रोबोट मानव थे। उपहार में इन्हें पाकर देश की जनता और हमारे हुक्मरान इतने आह्लादित हुये थे कि इन्हें संसद की सदस्यता से सम्मानित किया गया। तभी से ये सभी विशिष्टगण संसद में सामने की सीटों की शोभा बढ़ाते आ रहे थे। बाबा के साथ आये उनके अनुचरों(आधुनिक शब्द में कहें तो उनके एक्जेक्यूटिव्स) ने सभी सांसदगणों को प्याज से बना एक-एक चॉक्लेट उपहार में दिया। सबने बाबा का आभार व्यक्त किया। बाबा ने अपने भाषण में दुनिया के प्याज संकट पर प्रकाश डालते हुये इससे निपटने के लिए वैश्विक प्रयासों का आह्वान किया। उनके साथ आए चीन के कृषि मंत्री ने चीनी सरकार की ओर से हर साल भारत को १० किलो प्याज के निर्यात का भरोसा भी दिलाया। हमारे विशिष्ट गणों ने प्याज देने की अनुकंपा के लिए चीन को धन्यवाद दिया। धन्यवाद के इस सुर में पीछे बैठे विपक्षी सांसद जोखीलाल के विरोध की आवाज दब सी गई। प्याज से बने चॉकलेट पाकर उनके दल के साथियों ने उनका साथ देने से इंकार कर दिया और उन्होंने हाथ में रखा पर्चा भी संकोचवश अपने पास ही छुपा लिया जिसमें देश में प्याज की खेती को बर्बाद करने के लिए पड़ोसी देश पाकिस्तान और उसके खुफिया संगठन आईएसआई को जिम्मेदार ठहराया गया था और उन्हें मिल रही गुप्त चीनी मदद पर विरोध जताया गया था। संसद भवन में अपना कार्यक्रम खत्म कर प्याजेश्वर बाबा एक अन्य कार्यक्रम के लिए निकल पड़े जहां उन्हें प्याज रत्न पुरस्कार प्रदान करना था और भारत-चीन मित्रता को मजबूत करने के लिए प्याजमैत्री कारवां को हरी झंडी दिखाकर रवाना करना था। बाबा ने अपने इस कार्यक्रम में अपना संदेश देते हुये दुनिया में सबको प्याज मिले इसकी कामना की और फिर प्लेन पकड़ने निकल पड़े जहां से उन्हें प्राचीन शिकागो विश्वविद्यालय में प्याज के इतिहास पर व्याख्यान देने के लिए रवाना होना था।

Saturday, 8 January 2011

अंधेर नगरी-चौपट राजा...!

आजादी के ६३ सालों बाद आज हमारा महान देश भारत अपने साहित्यकार भारतेंदू हरिश्चंद्र के इस उक्ति को सार्थक करने योग्य परिपक्वता हासिल कर चुका है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने बारे में हम चाहे जो भी कह लें लेकिन हमारी वास्तविकता क्या है हमे इसका पूरा आभास है। किसी भी देश के राजनीतिक नेतृत्व का काम होता है ऐसी चीजों को बढ़ावा देना जिससे देश और समाज अन्य समाजों की तुलना में टिकने योग्य बन सके और भविष्य की चुनौतियों का सामना करने लायक बन सके। लेकिन हमारे यहां आज हालात ऐसा बन गया है कि जिसे जिस पद पर बैठा दिया जाये वह वहीं से दोनो हाथों से राष्ट्र की संपत्ति के संचय में जुट जाता है। अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए तो हम कुछ करते नहीं उल्टे बुनियादी चीजों से हमारा ध्यान हटाये रखने के लिए हमारे हुक्मरान हमे सुपरपावर बनाने का वहम दिखाते रहते हैं। एक तरफ जहां हमारा पड़ोसी देश चीन रोज कामयाबी की नई कहानी लिख रहा है वहीं हम रक्षा, तकनीक, हथियारो और विमान आदि सभी चीजों के लिए आज भी दूसरे देशों पर ही निर्भर हैं और उसपर भी बेशर्मी इतनी कि हर साल राजपथ पर इन उधार की चीजों की प्रदर्शनी निकालकर गर्वान्वित होते रहते हैं। हम ५०-६० किलोमीटर की रफ्तार से चलने वाली मेट्रो ट्रेन जापान से लेकर इतने खुश हो रहे हैं जैसे कोई अद्भुत अविष्कार कर डाला हो, वहीं दूसरी ओर चीन जैसा पड़ोसी दुनिया की सबसे तेज रफ्तार ट्रेन खूद के बुते बनाकर नई मिसाल कायम करता जा रहा है। एक तरफ जहां हमारे अंतरिक्ष मिशन विफल हो रहे हैं वहीं चीन चांद पर जाने की तैयारियों को मुक्कमल बनाने में जुटा हुआ है।
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जिस देश की करीब दो-तिहाई आबादी गरीबी रेखा से चीने जीवन-यापन करती हो वहां हजारों करोड़ रुप्ये फूंककर खेल-तमाशे कराये जाते हैं और हमारे हुक्मरानों को इसपर शर्म भी नहीं आती। सबसे बड़ी गलती देश की जनता की है जो इतनी सारी विसंगतियों के बावजूद राजनीतिक बिरादरी को सबक सिखाने की बजाय उनके तमाशे पर मौन धारण किये हुए है। भ्रष्ट, घोटालेबाज, दागी और अपराधी तत्वों को अपने समाज की बागडोर सौंप कर हम न जाने किस खुशहाली की उम्मीद पाले हुये हैं।
आज हमारा समाज वास्तविक रूप से अंधेर नगरी-चौपट राजा की कहावत को चरितार्थ करने में सक्षम दिख रहा है।

Friday, 7 January 2011

आने वाली पीढियों के लिए आज का इतिहास..!

फर्ज करिए २०५० की एक सर्द सुबह में जब भारत का कोई बच्चा स्कूल जायेगा और उसके हाथों में भारतीय इतिहास के कालखंड १९९०-२०१० के बीच के गौरवमय इतिहास की पुस्तक की विषय सामग्री कुछ इस तरह की होगी.
"शुरूआत करते हैं १९९० के दशक की शुरुआत से जब देश ने वैश्विकरण और उदारीकरण का दामन थामकर सुपरपावर बनने का सपना नया-नया ही संजोया था। अभी कुछ साल पहले ही देश ने खुद की सुरक्षा के लिए विदेश से बोफोर्स नाम का आधुनिक प्रक्षेपास्त्र मंगाया था लेकिन इस सौदे ने देश को घोटाला नामक एक नया शब्द दिया जो कि आने वाले कई दशकों तक देश और दुनिया में भारत का नाम रौशन करता रहा। जिस भारत के नाम पर इससे पहले केवल एक जीरो की खोज का क्रेडिट था उसे इस नए शब्द ने एक बार फिर दुनिया में सर ऊंचा उठाने का हौसला दे दिया। जिस भारत को कभी पश्चिमी दुनिया सपेरों का देश कहा करती थी उन फिरंगियों को भारत के महान घोटालेबाज विभुतियों ने घोटाला नामक इसी हथियार से कुछ ही सालों में नतमस्तक कर दिया। देश में वैश्विकरण लाने वाले उस दौर के हमारे हुक्मरानों ने लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार को सुरक्षित रखने के लिए दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में लोकतांत्रिक भावना को और मजबूत करते हुये सांसद रिश्वत कांड की नई इबारत लिख डाली। अनाज उत्पादन के लिए किसानों को मिलने वाले यूरिया में घोटाला जैसी महत्वपूर्ण परियोजना को कार्यान्वित करने का श्रेय भी इसी दौर के हुक्मरानों को जाता है। फिर तो क्या कहने देश में घोटालों के विकास को जैसे पंख लग गये। शुरूआती कारनामों के नक्शेकदम पर चलते हुये हमारे शूरवीरों ने शेयर घोटाला, संचार और न जाने कितने घोटालों की कहानी लिख डाली। मलाईदार और रसूखदार पदों पर बैठे लोगों के यहां से छापों में बोरो में भर-भरकर नोट और सोने-चांदी के चप्पल-जूते मिलने लगे। जिस भारत की जनता अपने देश के बारे में ये सच्चाई भुलने लगी थी कि कभी भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था उन्हें हमारे इन शूरवीरों ने फिर से एहसास दिलाया कि भारत गरीब नहीं बल्कि अभी भी सोने की चिड़िया ही है।
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देश के लाल इतने से ही रूकने वाले नहीं थे उन्होंने प्रगति की रफ्तार थमने नहीं दी। इसी दौर में देश ने सही मायनों में समाजवाद को अपनाया। समाजवाद के नाम पर सत्ता में नये-नये शामिल हुक्मरानों ने भी प्रगति में योगदान देना शुरू किया। किसी ने पशुओं का चारा डकार लिया तो किसी ने सड़क बनने के लिए काम आने वाला अलकतरा तक अपने गले में उतार कर दुनिया को आसन्न संकट से वैसे ही बचा लिया जैसे भागवान शिव ने समुद्र मंथन में निकले विष को अपने गले में उतारकर ब्रहांड की रक्षा की थी। आखिर पशु चारा खाकर करते ही क्या और अलकतरे से बनने वाली सड़क ही कौन सी अनश्वर साबित होने वाली थी. कुछ ही सालों में उनमें गढ्ढे बन जाते और जनता को उन्ही गढ्ढों से होकर रोजाना दफ्तर और स्कूल जाना पड़ता। खैर हमारे हुक्मरानों ने वक्त से पहले ही अपनी जनता का दुख हर लिया।
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१९९० के इस गौरवमयी दशक के समापन के बाद भारत में सुपर पावर बनने का सपना(तब के कुछ सिरफिरे इसे महज वहम कहा करते थे) भी प्रबल हो चला था। इसी मजबूत इरादे के साथ देश ने २1वीं सदी का इस्तकबाल किया। देश के सबसे बड़े लोकतंत्र के हृदय कहे जाने वाले संसद भवन में नोटों की गड्डियां लहराई जाने लगी। इसी दौर में देश में प्रोफेशनलिज्म आया...और हमारे जनप्रतिनिधियों ने संसद में जनहित से जुडे सवाल पूछने के लिए भी फीस लेनी शुरू कर दी। युद्ध-भूमि में देश की रक्षा के लिए जान गंवाने वाले सैनिकों के लिए मंगाये गये ताबूत में से भी मुनाफा निकालकर तब के रसूखदार लोगों ने प्रगति की एक नई परिभाषा दुनिया को दी। ऐसे वक्त में जब शेष दुनिया अंतरिक्ष विज्ञान, चांद तक पहुंचने और विज्ञान-तकनीक के विकास जैसी छोटी-छोटी चीजों में उलझी हुई थी तब हमारे देश के शूरवीरों ने मनी-मंत्र नामक विचारधारा की खोज कर उसे आगे बढ़ाया। उस दौर के एक महान विचारक का कथन--- 'पैसा खुदा तो नहीं लेकिन खुदा से कम भी नहीं है' से उस दौर के उच्च विचारों का अंदाजा लगाया जा सकता है। इसी दौर में स्पेक्ट्रम आवंटन जैसी अलौकिक और अदृश्य घटनाएं भी घटी। तरक्की की मिसाल तो देखिए कि जिन ध्वनि तरंगों को आम इंसान देख भी नहीं सकता उन्हें बेचकर हमारे हुक्मरानों(समझे नहीं... मतलब तब के किंग-क्विन) और नौकरशाहों(मतलब देवदूत टाइप) ने करोड़ों-करोड़ का मुनाफा बनाया। देश में परिवार संस्था तब इतनी मजबूत हुआ करती थी कि हुक्मरान शहीद जवानों के परिवारजनों के लिए बने आवासों को भी अपने सगे-संबंधियों को दे देते थे। परिवार को लेकर ऐसा लगाव शायद की तब किसी और देश में पाया जाता हो। तब देश में हजारों हजार करोड़ खर्च कर खेल-तमाशे हुआ करते थे और उसमें भी रईसी ऐसी कि पूरी दुनिया ने दांतों तले उंगली दबा लिया। तब देश इतना अमीर हुआ करता था कि विदेशों से आने वाले मेहमानों के लिए हर बंदोबस्त राजशी ठाट-बाट वाले हुआ करते थे। मेहमानों को देश का कोई गरीब नहीं दिख जाये इसके लिए पहले ही उन्हें सड़क किनारे से हटा लिया गया था और कूड़े-कबाड़े के ढेरों को सुंदर-सुंदर बैनरों से ढक कर देश को सुंदरता प्रदान की घई थी। ऐसी भव्यता थी कभी अपने देश की। देश की जनता अपने लालों के कारनामों की मुरीद बन गई और जगह-जगह मांग होने लगी कि घोटाला नामक इस आविष्कार को कानूनी रूप देकर पेटेंट करा लिया जाये, कहीं विदेशी लोग इसे हड़प कर हमारी बराबरी न करने लगें। आम-आदमी की भी तब काफी इज्जत थी। उनके खाने-पीने की चीजें जैसे प्याज, टमाटर और दाल जैसी चीजे रोजाना टीवी पर दिखाई जाती थी और तब के कृषि मंत्री देश के प्राचीन ज्ञान ज्योतिष विज्ञान में खूब भरोसा रखते थे। तब आम आदमी की समस्याओं के समाधान के लिए हुक्मरान ज्योतिष विज्ञान का खूब इस्तेमाल करते थे और जनता-जनार्दन सरकार के इस कल्याणकारी रवैये से काफी खुश थी। लोग जिंदगी से इतने निश्चिंत थे कि तब की राजनीतिक रैलियों में हजारों और लाखों की संख्या में लोग पहुंचते थे और राजनेताओं द्वारा दिये गये उपदेश को सुनकर अपना जीवन धन्य करते थे।
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२१वी सदी शुरू होते ही देश ने दूध की नदी बहने जैसी प्राचीन कहावतों से पीछा छुड़ाते हुये अभिजात्य वर्ग का टॉनिक कहे जाने वाली शराब की नदी बहाने का लक्ष्य प्राप्त कर लिया था। देश का हर हिस्सा इस मामले में समान गति से विकास कर रहा था। इस नए प्रकार का दूध पीकर लोग अपना दुख-दर्द भूल जाया करते थे।
नारी सश्क्तिकरण को भी तब हमने खूब बढ़ावा दिया था। मुन्नी की बदनामी और शीला की जवानी देश के लोगों को तब उत्साह से लबरेज रखने के लिए टॉनिक का काम किया करती थी। पूरा देश इन स्वरलहरियों पर झूम उठता था और जो खुश नहीं थे उन्हें राखी सावंत जैसी उस दौर की महान न्यायवादी महिलाओं के इंसाफ से उनका हक मिलता था। पूरे भारत भर में राम राज्य जैसा माहौल था। सही मायनों में उस दौर को देश के लिए गोल्डेन एज कहा जा सकता है।

Sunday, 12 December 2010

इस बार बिहार ने भ्रष्टाचार पर एक रास्ता दिखाया है...

ऐसे वक्त में जब देश हर स्तर पर पैठ बना चुके भ्रष्टाचारी रुपी महारथियों से पार पाने के लिए त्राहिमाम कर रहा है और राजनीतिक नेतृत्व इस पर कुछ भी ठोस कर पाने में खुद को असहाय महसूस कर रहा है ऐसे वक्त में एक बार फिर बिहार एक नए जोश के साथ हमारी व्यवस्था में पैठ बना चुकी इस बीमारी के निदान के लिए आगे आया है. आज वहां की सरकार द्वारा उठाये गए दो कदमों का जिक्र करना जरुरी है.

पहली घटना--
बिहार में भ्रष्टाचार में लिप्त पूर्व मोटरयान निरीक्षक (एमवीआई) की सम्पत्ति जब्त करने के न्यायालय के आदेश के बाद सरकार ने अब उस भवन में विद्यालय खोलने की तैयारी प्रारंभ कर दी है। समस्तीपुर जिले में स्थित एमवीआई रघुवंश कुंवर के पैतृक गांव चैरा में बने मकान में विद्यालय खोलने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। परिवहन विभाग के अधिकारी कुंवर के पास समस्तीपुर के अलावा पटना में आलीशान मकान और जमीन है। उनके मकानों और जमीन के अधिग्रहण के लिए संबंधित जिलाधिकारियों को एक माह के अंदर तमाम प्रक्रियायें पूरी कर लेने को कहा गया है। उल्लेखनीय है कि भ्रष्टाचारियों की अवैध सम्पत्ति जब्त करने संबंधी कानून के तहत कुंवर और उनकी पत्नी ललिता देवी के पास मिली लगभग 45 लाख रुपये की अवैध सम्पत्ति जब्त होगी। सतर्कता विभाग के विशेष लोक अभियोजक राजेश कुमार के अनुसार रघुवंश के पास मौजूद आय से अधिक 44,99,318 रुपये की चल और अचल सम्पत्ति को जब्त करने के लिए विभाग की विशेष अदालत में इस वर्ष 12

अगस्त को एक मामला दायर किया गया था। गौरतलब है कि शिकायत मिलने के बाद 24 सितंबर 2008 को सतर्कता विभाग के अधिकारियों ने कुंवर को 50 हजार रुपये रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़ा था। जांच के बाद विभाग ने उनके खिलाफ मई 2009 में आय से अधिक सम्पत्ति का मामला दर्ज कराया था।

दूसरी घटना--
दूसरी महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तहत बिहार में स्थानीय क्षेत्र विकास निधि पर लगे भ्रष्टाचार के दाग धोने के प्रयास के तहत राज्य सरकार ने इस कोष को समाप्त करने का ऐतिहासिक निर्णय किया है. बिहार में विधानसभा और विधान परिषद के सदस्यों को स्थानीय क्षेत्र विकास कोष से हर वर्ष एक एक करोड़ रुपये दिए जाते हैं। स्थानीय क्षेत्र विकास विधायक और विधानपार्षद निधि की बिहार में शुरुआत वर्ष 1984 में की गई थी। इस निधि के तहत शुरुआत में हर सदस्य को प्रतिवर्ष विकास कार्यो के लिए एक लाख रुपये दिए जाते थे। बिहार में विधायक और विधान पार्षद स्थानीय क्षेत्र के विकास निधि के 26साल पुराने इतिहास में एक लाख रुपये प्रतिवर्ष से शुरू होकर यह सफर एक करोड़ रुपये तक पहुंचा। वर्ष 1986 में इस राशि को बढ़ाकर प्रतिवर्ष पांच लाख रुपये कर दिया गया, जबकि इसके चार साल बाद यानि 1990 में यह राशि बढ़ाकर 10 लाख रुपये कर दी गई। वर्ष 1996 में स्थानीय क्षेत्र विकास निधि में एक बार फिर बढ़ोत्तरी की गई जो बढ़कर 50 लाख रुपये हो गई। 2003 में 50 लाख रुपये की राशि को बढ़ाकर एक करोड़ रुपये कर दिया।

अब आगे चलकर केंद्र सरकार को भी प्रतिवर्ष सांसदों को मिलने वाले दो करोड़ रुपए के सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास निधि [एमपीलैड] को समाप्त करने के लिए तत्परता दिखानी चाहिए.

बिहार की नयी सरकार द्वारा उठाया गया ये कदम आज देश भर में व्यवस्था में पैठ बना चुके घोटालेबाजों के लिए एक सबक बन सकता है बशर्ते कि हमारी राजनीतिक बिरादरी ऐसा करने की हिम्मत जुटाए और ऐसा कदम उठाये कि अपना काम करते वक्त घुस मांगते हुए किसी भी सरकारी कर्मचारी के सामने भविष्य की बर्बादी का मंजर घूम जाये. इतना ही नहीं जैसा कि हमारे सिविल सोसाइटी के लोग लगातार मांग करते आ रहे हैं कि एक ऐसी राष्ट्रीय एजेंसी बने जो करोडो-अरबो डकार जाने वाले राजनीतिज्ञों-कारोबारियों और नौकरशाहों के नेक्सस को बिना किसी दबाव के दण्डित कर सके.
बिहार में उठाया गया ये स्वागतयोग्य कदम भ्रष्टाचार उन्मूलन की दिशा में ऐतिहासिक शुरूआत होगी।

Tuesday, 23 November 2010

अतिथि देवो भवः और कल्लन काका का इनक्रेडिबल विलेज..!

सब लोग खेतों से लौट कर घर पहुंचे ही थें कि चौपाल की घंटी बज गई। चाय-चबेना लेकर लोगों ने चौपाल की राह पकड़ी। सरपंच कल्लन काका पहले हीं वहां आसन जमाये हुये थे। मोहन उनके दायें तरफ अपनी जगह पर काबिज था तो जगन ने भी उनके बायें तरफ अपनी जगह संभाल रखी थी। मनोहर, सुंदर और श्याम ने आकर अपनी जगह पकड़ी तो हुक्का सुलगाने की कार्रवाई शुरू हो गई। इसके साथ ही छिड़ गया दिनभर की आपबीतियों को सुनाने का सिलसिला, जिसे सुनने के लिए काका दिनभर बेचैन रहा करते थे। दिनभर अखबार पढ़कर थक चुके और खटिया तोड़कर बोर हो चुके कल्लन काका लोगों से दिनभर गांव में हुये रोचक किस्से सुनने के लिए बेताब रहते थे। सुंदर ने गांव के पूरब टोले में सुबह के हंगामे का पूरा विवरण सुनाया कि कैसे झबरू ने ताड़ी चुराते बब्बन को पीट डाला था और फिर इस झगड़े में कैसे दोनों के परिवार वाले भी शामिल हो गये और फिर घंटों टोले में लाठियां पटकाती रही। मनोहर ने बताया कि शहर से आते हुये उसने पास के गांव में शराब के अड्डे पर पुलिस की रेड पड़ती देखी थी। उसकी इस बात को काका ने ऐसे इग्नोर कर दिया जैसे संसद में विपक्ष के हो-हल्ले को अध्यक्ष द्वारा अक्सर कर दिया जाता है। काका जानते थे उनका मैनेजमेंट इतना तगड़ा है कि उनके गांव में पुलिस कभी आएगी ही नहीं। वैसे भी काका के लिए शराब कोई बुरी चीज नहीं थी बल्कि ऐसा जरिया था जो गांव के सभी टोले के युवाओं को एक सूत्र में पिरोये हुये था। काका की नजर में ये वो लिटमस पेपर था जो गांव के दबंग युवाओं को दब्बू युवाओं से अलग करता था। उनके अनुसार असली युवा और गांव का भविष्य वहीं युवा हैं जो रोज शाम को काका के दरबार में आते और प्रसाद ग्रहण करते।
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गांव की कहानियां भले ही काका को खूब रास आती हो लेकिन दिनभर गांव की खाक छानते मोहन को यहां की कहानियों में कोई रूचि नहीं थी। वो हमेशा इंटरनेशनल मुद्दों पर बात करने को बेताब रहता था। हुक्के में तम्बाकू भरते मोहन की बातों को इग्नोर करने की आदत काका को नहीं थी बिल्कुल वैसे जैसे सत्ता पक्ष की स्थिति संसद में होती है। काका की ओर हुक्का बढ़ाते मोहन ने बड़े ही बेलाग अंदाज में कहा- लो काका आज तो हुक्के का मजा दोगुना हो गया, आज तो ओबामा ने भी कह दिया कि अपना देश काफी विकास कर चुका है। अमेरिका से आकर वो हमारे गांव-गांव में टेली-कानफेरेन्सिंग से बाते कर रहे हैं। काका को याद आ गया कुछ साल पहले का वो समय जब अमेरिका के राष्ट्रपति क्लिंटन साहब भारत दौरे पर आए थे और गांव की गोरियों के साथ जमकर नाच-गाना किया था। काका तब मन मसोस कर रह गये थे कि काश उनके गांव ऐसा कोई मेहमान आये और वे भी गोरी मेमो के साथ डांस कर सकें। काका ने एक ट्रायल लिया भी था। अगले साल न्यू ईयर पर उन्होंने पड़ोसी गांव के सरपंच नत्था को न्यौता भिजवाकर बुलवा लिया। लेकिन मेहमान सरपंच जी के साथ आये उनके पियक्कड़ अनुयायियों ने ऐसी धमा-चौकड़ी मचाई कि काका ने उसी वक्त फिर किसी को भी अपने गांव नहीं बुलाने का फैसला कर लिया।
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हां, तो हम फिर लौट आते हैं चौपाल पर! मोहन ने ओबामा की बात छेड़ी तो सबकी निगाहें काका की ओर टिक गई। आखिर गांव में काका ही अकेले अखबार मंगाते हैं और उनसे ज्यादा देश-दुनिया के बारे में जानकारी किसके पास है। सुंदर और मनोहर फुसफुसा रहे थे कि भला इतने बड़े देश का आदमी हमारे यहां क्यूं आया है। अब काका से रहा नहीं गया। चौपाल की इच्छा पर सुओ मोटो लेते हुये काका ने अपनी ज्ञान की पोटली खोली। काका- ऊ, का है न कि उनके यहां मंदी आई हुई है और उनके लोग बेरोजगार होये रहे हैं ना...सो उ इयां नौकरी लेवे के वास्ते आये रहै हैं।
मनोहर से रहा नहीं गया वो बोल पड़ा- यहां की सरकार तो अपने लोगों को रोजगार देने के लिए कुछ करती नहीं, तो उनके लिए का करेगी।
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काका- धत बुरबक, तुम लोग का जानत हो, अतिथि सेवा का होत है? ये ऐसी चीज है जिसके सामने सब फीकी पड़ जाती है। भाई अपने यहां तो संस्कृति रही है कि खुद भले हीं पानी पीकर रह लो लेकिन अतिथि के सत्कार में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए। आखिर अतिथि देवता के समान होता है। काका को बरबस याद आ गया...अपनी सरपंची के १० साल पूरे होने पर उन्होंने कैसे आस-पास के गांवों के सभी सरपंचों को न्यौता भेजा था और तब कई दिनों तक गांव में जश्न का माहौल बना रहा था। तब उन्होंने अतिथियों के लिए मुर्गे और दारू की कोई कमी नहीं रहने दी थी और आखिरी दिन विदाई के वक्त उन्होंने सभी अतिथियों को अपने पेड़ से तुड़वाये महूये की ताजी-ताजी शराब की बोतलें गिफ्ट दी थी ताकि अपने गांव वापस लौटकर भी उनपर यहां के आतिथ्य का नशा कुछ दिनों तक बना रहे। गांव के लोग भी जश्न के उन अनमोल दिनों को अबकत नहीं भूल पाये हैं। हफ्ते भर तक गांव में आये देवता रूपी अतिथियों ने अपने धमाल से उनका कितना मनोरंजन किया था। उनके हाथियों और घोड़ों ने कितनों के खेत और बगीचे उजाड़ दिये थे और मनोहर के दो मुर्गे भी तो उन्ही दिनों गायब हुये थे। लेकिन कुछ तो काका के दबदबे और कुछ अतिथि देवो भवः के ऐतिहासिक कहावत ने सबकी जुबान पर ताला लगा दिया था, तभी तो जाते-जाते गांव वालों के आतिथ्य सत्कार की दुहाई देते नहीं थक रहे थे। आज भी तारीफ के उन लफ्जों को सुनकर गांव वालों का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।
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अचानक काका ख्यालों ने निकले- हां तो हम बात कर रहे थे ओबामा के भारत दौरे की। देख भई हमारी सरकार ने उनकी इच्छा को देखते हुये ५०,००० नौकरियों का उपहार उन्हें देने में पूरी तन्मयता दिखाई है। भई अतिथि है कुछ लेकर जाएगा तो नाम ही लेगा। वैसे भी अतिथि देवता के समान होता है। काका के मन में आया कि क्यूं न वे भी इसी तरह का कोई उपहार अपने पड़ोसी गांव के सरपंच को दें। काका के मन के भाव मोहन से छूप न सकें, आखिर वो काका का सबसे ख़ास शागिर्द ऐसे ही नहीं था। मोहन ने तुरंत ही कहा कि क्यों न काका इस साल वेलेंटाइन डे पर मिस्टर औऱ मिस विलेज प्रतियोगिता का आयोजन करवा लिया जाये। इसी में एक पुरस्कार लाइफटाइम अचीवमेंच का रख लेंगे और उसे आस-पास के किसी सरपंच को दे दिया जाएगा। सब खुश रहेंगे। मोहन का ये प्रस्ताव काका को भी खूब यूनिक लगा। इसी बहाने शायद टीवी वाले भी गांव का रूख़ करें और टीवी पर आने का बचपन का उनका सपना शायद इस बार सच हो ही जाये। वैसे इस प्रस्ताव को सुनकर गांव के युवा भी काफी रोमांचित हुये। चौपाल के कोने में बैठा सुरेश तो ख्यालों में ही खो गया। उसे लगने लगा कि भईया की शादी में उनके ससुराल से मिले रेशम के कपड़े को सिलाने का वक्त आ गया है। यह सोचकर वो काफी रोमांचित था कि प्रतियोगिता के दौरान आगे की सीट पर बैठकर मिस विलेज देखने का मजा इस बार मिलेगा। लेकिन उसे याद आया कि आगे बैठने के लिए पास का जुगाड़ कैसे होगा। तभी उसे याद आया कि ताड़ी के दुकान वाले हरिया से उसकी दोस्ती कब काम आएगी, काका का प्रिय मोहन तो रोजाना उसके दुकान पर आता ही हैं।
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चौपाल पूरे शबाब पर थी लेकिन हूक्के की ताव ठंढी होती जा रही थी। काका ने कहा तो भाई आज की चौपाल यहीं अगले दिन तक के लिए एडजर्न की जाती है। कल फिर मिलेंगे, इसी वक्त पर और फिर उठाएंगे गांव और समाज के हित से जुड़े अहम मुद्दों को...जनहित में।

Friday, 12 November 2010

भ्रष्टाचार का पेटेंट और कल्लन काका..!

सुबह-सुबह नहा-धोकर जब मोहन घर से निकला तो गाँव के मुखिया और उसके आका कल्लन काका चबूतरे पर बैठे दिखाई दिए। पिछले ४० सालो से गाँव के मुखिया रहे कल्लन काका इस बार विधायकी की कुर्सी पर नज़र गड़ाए हुए हैं. हमेशा भाषण की मुद्रा में दिखने वाले काका को चिंतित मुद्रा में देखकर मोहन से पूछे बिना रहा नहीं गया. काका ने अख़बार में छपी खबर पर नाराजगी जताते हुए कहा कि उन्होंने पूरी जिंदगी गाँव के विकास के लिए आने वाले धन को पचाने में लगा दी और इतने लम्बे अरसे के भ्रष्टाचारी जीवन और भ्रष्टाचार के क्षेत्र में उनकी सक्रिय भूमिका के बावजूद वे कभी पकडे नहीं गए और ये ना जाने आज के कैसे नेता हैं जो रोज पकडे जा रहे हैं? कल्लन काका को याद आने लगा॥न जाने कितनी सड़के, पुलिया, नलकूप, कुएं उन्होंने अपनी खद्दर की जेब में समां लिए, अब तो इसकी गिनती भी उन्हें याद नहीं है और आज तक कोई उनपर उंगली नहीं उठा सका. कल्लन काका को चिंता सताए जा रही थी कि दशकों तक जिस भ्रष्टाचार को उन्होंने अपनी मेहनत से सींचा उसका क्रेडिट कोई दिल्ली का नेता न उठा ले जाये..आज कल रोज-रोज नए नाम अख़बारों में छप रहे हैं. वफादार शागिर्द की तरह मोहन ने उन्हें सलाह दी कि काका क्यूँ न जल्द-से-जल्द भ्रष्टाचार शब्द का पेटेंट करा लिया जाये.
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जैसे भी हो कल्लन काका इतने लम्बे समय के राजनीतिक जीवन में अभी तक अपनी छवि को बेदाग रखने में सफल रहे थे। मजाल है कि गाँव में कोई उनके खिलाफ कुछ बोल सके. गाँव के युवाओं के सामने उनके खिलाफ बोलने का मतलब था अपने लिए मुसीबत मोल लेना. इतने लोकप्रिय थे काका उनके बीच. गाँव का शायद ही कोई युवा हो जो रोज शाम को हरिया की दुकान के पीछे के घेरे में लगने वाले काका के दरबार में न जाता हो. गाँव की नई पीढ़ी के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए काका इन युवाओं को कभी किसी चीज की कमी नहीं होने देते थे. काका के दरबार में आने वाले लोगों की इक्छाओं को ध्यान में रखते हुए हरिया कभी भी देशी दारु, गांजा, तम्बाकू, ताड़ी आदि का स्टॉक कम नहीं होने देता था. बदले में कल्लन काका की जेब में समाये सड़क, पूल, नलकूप आदि के कई टुकड़े उछलकर हरिया की जेब में पहुँचते रहते थे और उसने भी गाँव के विकास की राशि में से काफी कुछ अपना विकास कर लिया था.
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वैसे युवा पीढ़ी के विकास पर ध्यान देने के अलावा काका गाँव के जातिय समीकरण का भी बखूबी ध्यान रखते थे। अपने टोले के चिंटू को शिक्षा मित्र के रूप में भर्ती कर उन्होंने सबको खुश कर दिया था और कईयों के लिए उम्मीद भी जगा दी थी. तभी तो, कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है इस सिद्धांत का सम्मान करते हुए कल्लन काका को अपना खेत लिखते हुए चिंटू के पापा को थोडा सा भी मलाल नहीं हुआ था. हालाँकि चिंटू का पडोसी गब्बन भी इस पद के लिए दावेदार था लेकिन उसकी बीवी राधा को आंगनबारी में सेट कराकर काका ने ये कांटा भी दूर कर लिया. जो कुछ भी पाने में असफल रहे थे उन्होंने भविष्य में कुछ पाने की उम्मीद में चुप्पी का रास्ता अपनाना बेहतर समझा. सामने के महतो टोले के चबूतरे के पास नलकूप लगवाकर काका ने वहां भी सबका दिल जीत लिया था. देश की आजादी के ६० साल पूरे होने पर उन्हें नलकूप मिला था और कुएं से पानी खीचने से मुक्ति मिलने से वे ऐसे ही खुश थे. वैसे ये नलकूप सबसे ज्यादा चबूतरे पर दिन-भर ताश के पत्तो में उलझे टोले के मेहनतकश लोगों के काम आ रहा था. ताश के पत्तो में उलझे हुए जब भी उनका कंठ सूखने लगता, इसी नलकूप के पानी से अपना गला तर कर वे फिर से मैदान में उतरते. वैसे पासवान टोले में भी काका की इज्जत कम नहीं थी. यहाँ के सबसे गबरू नौजवान छेदी के पास हरिया की दुकान में दरबार के लिए ताड़ी भेजने का ठेका था और उसके यहाँ रहते भला कौन काका की शान में गुस्ताखी कर सकता था?
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कुल मिलाकर कहा जा सकता था कि फ़िलहाल काका के राजनीतिक अनुभव का कोई सानी नहीं था और सबको साथ लेकर चलने की अपनी नीति के कारण काका यहाँ के राजनीतिक इतिहास के सबसे बड़े या यूँ कहें की एकमात्र पुरोधा बने हुए थे. सत्ता को एकजूट रखने की अपनी नीति के तहत काका पुलिस-प्रशासन के साथ भी पूरे सामंजस्य से काम कर रहे थे. तभी तो उनके सामने कोई विपक्ष नहीं था. अभी ४ साल पहले की ही तो बात है जब शहर से पढाई पूरी कर लौटे रमेश ने गाँव में विकास के मामले पर उनके खिलाफ बोलने की हिम्मत की थी. तब अगले ही दिन पुलिस ने उसके घर से अवैध शराब की पेटियां बरामद करते हुए गाँव को एक बड़े खतरे से बचा लिया था और रमेश को अपना जीवन बचाने के लिए वापस शहर भागना पड़ा था. कल्लन काका अपनी इस कर्मभूमि में किसी ऐसे इन्सान को कैसे टिकने दे सकते थे जिससे गाँव की शांति भंग होने का अंदेशा हो. आखिर पूरी जिंदगी भर की मेहनत से उन्होंने यहाँ राम-राज्य स्थापित किया था जहाँ किसी को कोई दुःख नहीं था. जहाँ सब काका के विकासात्मक और कल्याणकारी नीतियों से खुश थे.

Wednesday, 6 October 2010

मुगालतों का देश और सुपर पॉवर होने का सपना..!

कॉमनवेल्थ खेलों की रंगारंग ओपनिंग सेरेमनी के बाद देश का दम और दुनिया में भारत की दबंगई का ढोल पीटने वाले लोग इधर काफी मुगालते में जीने लगे हैं. अचानक से देश-दुनिया के तथाकथित सेलेब्रिटी लोगों के बयान अख़बारों में नज़र आने लगे हैं जिनमे कॉमनवेल्थ खेलों की चमक-दमक को भारत की चमक-दमक से जोड़कर राष्ट्रीय गर्व का एहसास कराया जा रहा है. अगर इनपे भरोसा किया जाये तो जो भारत पिछले हफ्ते तक बदइन्तेजामी, भ्रष्टाचार और व्यवस्थागत कमियों के लिए दुनिया भर में आलोचना का शिकार हो रहा था अचानक से सुपर पॉवर जैसा दिखने लगा है. इतना त्वरित चमत्कार कैसे हो गया समझ में नहीं आ रहा?

हजारों करोड़ की लागत से राजधानी में बने आलिशान खेल गाँव और चंद स्टेडियम तथा कुछ वीआईपी इलाकों में चमकती सडकों और सड़क किनारे बनी आकर्षक आकृतियों से आगे बढ़कर अब चलते है शेष भारत के पास जिसको सुपर पॉवर का ये तमगा एक शूल की भांति चुभ रहा है. अजी पूरे देश की बात तो छोडिये जरा खेल गाँव और दक्षिण-मध्य दिल्ली से बहार निकलिए और दिल्ली के पूर्वी, पश्चिमी और उत्तरी इलाकों का नज़ारा कर लीजिये. टूटी-फूटी सड़कें, और कहीं गड्ढों में सड़क तो कहीं सड़क में गड्ढों पर सवारी करती वहां की जनता आपको सुपर पॉवर होने के एहसास की सच्चाई से जरूर रूबरू करा देगी.

देश की व्यवस्था की संवेदनहीनता की तो बात ही मत कीजिये. अभी करीब दो-तीन महीने ही हुए होंगे जब राजधानी दिल्ली के एक केन्द्रीय स्थान पर भीड़-भाड वाले एक सड़क के किनारे एक महिला ने एक बच्चे को जन्म दे दिया था और वही उसने दम तोड़ दिया था. व्यवस्था की संवेदनहीनता और सामाजिक सुरक्षा की कमी पर तब न्यायलय ने कड़ी नाराजगी जताई थी. ये कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती...सुपर पॉवर बनने का दम भरने वाला ये भारत अपने यहाँ के बच्चों के पोषण कुपोषण की क्या बात करे ये भारत अपने देश के भविष्य अपने नौनिहालों को स्कूलों तक लाने के लिए दोपहर के भोजन का लालच देता है. ये देश अपने लोगों को काम की गारंटी साल में १०० दिन की मजदूरी के काम को मुहैया कराकर देता है. मजदूरी की इस मामूली रकम में गबन और फर्जीवाड़े पर देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् की चेयरमैन तक चिंता जता चुकी हैं. खेल पर हजारों करोड़ रुपया लुटाने वाला ये देश वृधावस्था पेंशन के रूप में अपने बुजुर्गों को महीने भर के खर्च के लिए महज दो-ढाई सौ रूपये की रकम देता है. इस देश के पढ़े-लिखे लोगों को न तो रोजगार की गारंटी है और न ही अपनी वृहत आबादी के लिए इसके पास कोई सामाजिक सुरक्षा का व्यवस्थित ढांचा ही है. पारदर्शिता की तो बात ही मत कीजिये..आजादी के ६०-६५ सालो बाद अभी यही चर्चा चल रही है कि देश का सबकुछ जिस राजनीती के हाथों में है उस राजनीति में दागी-भ्रष्ट-घोटालेबाज और अपराधियों को आने से और धनबल और बाहुबल के प्रयोग को कैसे रोका जाये?

जो लोग भी अचानक से देश को सुपर पॉवर समझने लगे हैं उन्हें यह अहसास होना चाहिए कि राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार से लड़ने का जो मौका अभी देश ने गवां दिया उसकी भरपाई अगले कई दशकों तक उसे करनी पड़ेगी. ये एक ऐतिहासिक मौका था जब देश भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुट होकर व्यवस्था में हर स्तर पर शामिल ऐसे लोगों को सुधरने पर मजबूर कर सकता था...जो हमने गवां दिया और बदले में पाया--'सुपर पॉवर होने का मुगालता'..!

Monday, 4 October 2010

इंडिया सर ये चीज धुरंधर...

हाल ही में आई फिल्मी पीपली लाइव के गाने की एक लाइन है--
"इंडिया सर ये चीज धुरंधर.."
अब देखिये देश की ये दो तस्वीरें--

पहली तस्वीर-
देश का करोडो-अरबो रुपया फूंककर कामनवेल्थ खेलों का रंगारंग शुभारम्भ कर लिया गया। समाचार चैनलों के हिसाब से देखें तो भारत ने दुनिया को अपना दम दिखा दिया और भी पता नहीं क्या-क्या दिखा दिया है इंडिया ने रंगारंग शुरुआत करके. ।


लेकिन इससे पहले की आप किसी मुगालते में पड़ जाएँ एकबार जरा नीचे की तस्वीर पर भी गौर कर लें।




आसमान की ओर टकटकी लगाये इस किसान की ये कहानी किसी एक किसान की नहीं है बल्कि देश के हजारों-लाखों किसानों की यही कहानी है.
अब खबरों से प्राप्त दो आकड़ों को गौर से पढ़े--
१) दिल्ली के जवाहरलाल नेहरु स्टेडियम के पुनरुद्धार के ऊपर ९६० करोड़ का खर्चा..
२) भारी बारिश-भूस्खलन और बाढ़ से तबाह हो गए उत्तराखंड राज्य को केंद्र की ओर से ५०० करोड़ की मदद..

खबरों से प्राप्त इन दो आकंड़ों पर गौर करें और किसानों का देश कहे जाने भारत और दिल्ली की चकाचौध से अपनी छवि बदलने को छटपटा रहे इंडिया की व्याकुलता के बीच भारत का किसान अपनी स्थिति का अंदाजा खुद लगा ले..

Tuesday, 16 February 2010

क्या पूरे भारत को मिल गया रोटी, कपड़ा और मकान?

हमारे यहाँ जनता और उसकी समस्याओं को देखने का चश्मा काफी अलग-अलग नंबर का होता है, इतना ही नहीं इसे देखने वाले भी अलग-अलग वेराईटी के होते हैं तभी हमारा देश विविधता में एकता के लिए दुनिया भर में मशहूर है. आज समाचार पत्र में देश की तकनीकी क्रांति के एक बड़े ही काबिल शख्शियत नंदन निलेकनी जी का एक बयान छपा था...उनकी काबिलियत से प्रसन्न होकर इधर भारत सरकार ने उन्हें देश में रह रहे सभी लोगों को एक एकीकृत पहचान नंबर दिए जाने के अपने अभियान का मुखिया बना दिया है इसलिए उनके बयान पर गौर करना बहुत जरूरी हो जाता है..उन्होंने कहा कि देश के लिए रोटी, कपड़ा और मकान का नारा ६० और ७० के दशक का है और अब पुराना पड़ गया है, इतना ही नहीं देश उसके बाद के दौर यानी कि बिजली, सड़क और पानी के नारे के दौर से भी आगे निकल रहा है और अब देश के लिए नया नारा है- यूआईडी नंबर, बैंक अकाउंट और मोबाइल फोन...जो इससे कदमताल मिलाकर चलेगा अवसर उसी के होंगे...!
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यहाँ ये समझना बहुत जरूरी है कि भारत केवल दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर और अहमदाबाद जैसे शहरों से नहीं पूरा होता बल्कि देश की करीब ७० फीसदी जनता आज भी ६०,००० गांवों में रहती है। इन गांवों का कितना विकास हुआ है ये भी किसी से छुपी नहीं है। देश के विकास के बारे में यहाँ ज्यादा कहने की जरूरत नहीं है आकड़े बनाने वाले उसकी सच्चाई से भी अच्छी तरह से परीचित हैं। भ्रष्टाचार रुक नहीं सका है, देश को पूरा साक्षर बनाने के लिए हम आज भी जूझ रहे हैं, बच्चों को खाना का लालच दिखा कर भी स्कूल जाने के लिए तैयार नहीं किया जा सका है, गाँव में सडकों की क्या स्थिति है सब जानते हैं, बिजली कभी-कभार ही वहां दर्शन देती है...स्वास्थ्य सुविधाए देने के नाम पर अप्रशिक्षित लोग गाँव के स्वास्थ्य केन्द्रों में तैनात हैं और कुर्सियां तोड़ रहे हैं, लोग अपनी जान जाने के डर से नीमहकीम के यहाँ से दवा लेना पसंद करते हैं लेकिन सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रों तक जाना उन्हें गवारा नहीं है. राजनीतिक लोकप्रियता को ध्यान में रखकर राज्य सरकारों ने शिक्षा के स्तर का सत्यानाश कर रखा है...बच्चों को पढ़ाने के लिए ऐसे लोगों को तैनात कर दिया जा रहा है जिन्हें शुद्ध रूप से शैक्षिक तकनीक का कोई पता भी नहीं है इसके बाद जो स्तर बचा भी था वो मिड डे मील के नाम पर बर्बाद कर दिया गया. बच्चों की तो छोडिये शिक्षकों तक का ध्यान स्कूल में बन रहे खाने पर ही लगा रहता हैं ऐसे में लोग पढेंगे और पढ़ाएंगे क्या ख़ाक. इसपर आप सोचते हैं कि बहुत बड़ा बदलाव ला रहे हैं।
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रोटी, कपड़ा और मकान जिन्हें निलेकनी जी ६०-७० के दशक का नारा बता रहे हैं वो आज भी देश की अधिकांश आबादी के लिए सबसे बड़ी चिंता है. रोजगार के लिए और सामाजिक सुरक्षा के लिए आपके पास कोई ढांचा नहीं है...अधिकांश आबादी को पता नहीं की अगले हफ्ते वो क्या खायेंगे. इसके बाद के नारे सड़क, बिजली और पानी की तो अभी बात ही छोड़ दीजिये. गाँव की क्या कहें देश की राजधानी दिल्ली में भी कई ऐसे इलाके हैं जहाँ लोग आधी रात को उठकर पीने के पानी के आने का इन्तेजार करते हैं और गर्मियों का मौसम आते हीं बिजली कटौती से लड़ने के लिए लोग रातभर सडकों पर नाईटवाक् करते हैं. ऐसे में सबको मकान कि तो बात ही छोड़ दीजिये...
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अब रही बात लोगों को यूआईडी नंबर, बैंक अकाउंट और मोबाइल फोन देने की तो शायद ये लाखों और करोड़ों लोगों के लिए अवसरों के द्वार खोलें लेकिन उससे भी ज्यादा लोग ऐसे हैं जिनके लिए अभी पुराने नारे बेमानी नहीं हुए हैं और उनके लिए आज भी इन नए नारों से पुराने नारे ज्यादा जरूरी हैं। देश की सबसे बड़ी बिडम्बना यही है कि देश को देखने और उसके विकास का काम शहरी और एलिट वर्ग के हाथों में है और गाँव का जो प्रतिनिधि राजधानी तक पहुँचता है वह या तो जनता की समस्याओं को उठा नहीं रहा है या वो भी इसी लूट-पाट में शामिल हो जा रहा है और सरकारी खाते और कागजों में हमारा देश, उसकी ग्रामीण आबादी और भूखे-नंगे लोग भी तेजी से तरक्की करते जा रहे हैं और देश को महाशक्ति बनाने के सपने( कई लोग इसे मुगालता भी मानते हैं) में जी रहे हैं.

Monday, 8 February 2010

लो पाकिस्तान ने दिखा दी अपनी जात, कर लो अब "अमन की आशा"

इधर अख़बार और टीवी में लगातार एक विज्ञापन दिखाई दे रहा है...अमन की आशा... जो भारत और पाकिस्तान के बीच अमन की आशा जगाने के लिए कुछ अति-उत्साही मीडिया संगठनों के द्वारा चलाया जा रहा है. हमारे देश की संस्कृति में एक खास सीख हमेशा दी जाती है कि सामने वाला चाहे कितना भी बुरा क्यूँ न हो आप उससे हमेशा अच्छे से पेश आओ. इसी रास्ते पर चलते हुए हमने बार-बार मार खाकर भी पाकिस्तान के आगे दोस्ती के हाथ बढ़ाये. संसद पर हमला हुआ तो कई माह तक सेना सरहद पर तैनात कर हम पाकिस्तान से उम्मीद करते रहे कि अब सुधरेगा तब सुधरेगा...फिर मुंबई में जब आतंकियों ने दिन-दहारे कत्लेआम किया तब भी कई माह तक हम पाकिस्तान पर दबाव बनाने की जुग्गत भीडाते रहे और फिर आख़िरकार थक-हारकर बातचीत का प्रस्ताव कर दिया। हमले के बाद के इस एक साल में पाकिस्तान आतंकियों पर अपनी ओर से लगाम लगाने के लिए कुछ करना तो दूर हमारे बातचीत के प्रस्ताव का मजाक ही उड़ाने लगा. आम लोग ऐसा करें तो कुछ बात भी हो लेकिन वहां का विदेश मंत्री तक इस तरह की गैरजिम्मेदारी दिखा रहा है. तो कैसे होगा अमन...क्या हमेशा मार खाकर हम शांति की उम्मीद करते रहेंगे और यूँही हमारी पीठ में छुरा घोंपा जाता रहेगा.

पूरी दुनिया ने देखा कैसे पाकिस्तान से आये आतंकवादियों ने मुंबई में उत्पात मचाया फिर भी आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। ९-११ के बाद जिस अमेरिका ने अपनी मन-मर्जी के अनुसार चुन-चुनकर दुनिया के कई देशों और वहां शरण पाए आतंकियों को निशाना बनाया वही अमेरिका लगातार बयानबाजी कर पाकिस्तान के लिए ढाल बने रहा. जो कुछ उससे बचा वह भारत के परंपरागत दुश्मन चीन लगातार पाकिस्तान की पीठ थपथपाकर पूरा करता रहा. हम अमन की उम्मीद लगाये बैठे रहें और उम्मीद करते रहें कि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देश जरूर कुछ करेंगे. अब भाई कोई और क्यूँ हमारे लिए कुछ करेगा अगर हम अपनी सुरक्षा में हथियार नहीं उठा सकते तो कोई और थोडे ही हमारे लिए लड़ने आयेगा? इतना ही नहीं जब पाकिस्तान के साथ सरकारी तौर पर हमने सारे ताल्लुकात रोक दिए और देश में होने वाले क्रिकेट सीरीज में पाकिस्तानी खिलाडी नहीं चुने गए तब भी अमन पसंद जमात ने हो-हल्ला मचाया और कहते रहे कि सरहद पार सभी लोग आतंकवादी नहीं है. अब जब पाकिस्तान की हुकूमत हमारे वार्ता के प्रस्ताव का मजाक उड़ा रही है तो बताएं हमारे अमन की आशा के सिपाही कि अब क्या करना चाहिए. क्या अमन के लिए सभी भारतीय पाकिस्तान के आगे सर झुका कर खड़े हो जाएँ कि भाई लो जितनो को मार कर शांति मिलती हो मार लो लेकिन अमन की हमारी आरजू जरूर पूरी कर दो...

Friday, 15 January 2010

लो नहा लिया गंगा में, कर आये उसे मैला...

लगा ली आज लाखों-करोड़ों ने
गंगा में डुबकी,
धो लिया सबने अपना पाप
और भुला दिया
कल तक की सारी दुशवारियों को भी!
बनारस से लेकर हरिद्वार तक
और इलाहाबाद से लेकर गंगासागर तक
कई दिनों से लोग
कर रहे थे इसी नहान के लिए मश्श्क्कत!
लो हम सफल हुए
अपने इस होली डीप(पवित्र स्नान) में...
लेकिन कई-कई टन फूल-माला भी छोड़ आये हम
अपने पीछे इस गंगा में
जिसकी सफाई के नाम पर अबतक
सरकारें बहा चुकी हैं कई-कई करोड़ रूपये
और जो आज भी बाट जोह रही है
अपनी सफाई की...
वैसे सुना है कि अब सरकारे
फिर सजग होने लगी हैं इसके प्रति
अब होने लगी हैं कैबिनेट की बैठकें
गंगा की धारा पर
तो शायद अब तक हमारी गन्दगी धोती
इस गंगा के
दिन भी अब बदल जाएँ...!

Monday, 4 January 2010

क्या दोषी नेताओं का भी पद नहीं छिनना चाहिए...?

हरियाणा के पूर्व पुलिस कप्तान इन दिनों मीडिया की सुर्ख़ियों में हैं. छेड़छाड़ के आरोप में उन्हें महज ६ माह की सजा मिलने के बाद अचानक देश की जनता जाग पड़ी है...मीडिया जाग पड़ा है और इन सबके बाद अचानक सरकार भी जाग गई है. सब कड़ी से कड़ी सजा की मांग कर रहे हैं...अचानक सब न्याय व्यवस्था की सुस्ती पर सवाल उठाने लगे हैं. केंद्र सरकार जाग पड़ी है, राज्य सरकार जाग पड़ी है. सब ने मिलकर उस पुलिस अधिकारी को दिए गए मेडल छीनने की मुहीम शुरू कर दी है. देश के गृह सचिव ने कहा है कि सरकार ऐसी व्यवस्था बना रही है जिसमे दोषी साबित हुए अधिकारियों से उन्हें मिले मेडल आटोमेटिक तरीके से वापस ले लिए जाएँ...क्या यहाँ एक सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए कि जब दोषी पुलिस अधिकारी से उसका मेडल वापस लिया जा सकता है तो फिर दोषी राजनेता से उसका पद क्यूँ नहीं छीन लिया जाना चाहिए. चलिए मान भी लें कि दोषी और सजायाफ्ता लोगों के चुनाव लड़ने पर पाबन्दी है लेकिन क्या उन लोगों को चुनाव लड़ने से रोक नहीं देना चाहिए जो लम्बे समय से जेल की रोटी तोड़ रहे हैं या फिर जिनपर हत्या जैसे गंभीर अपराध के लिए मुकदमा चल रहा हो. या फिर जिनपर दर्जनों मुक़दमे चल रहे हों. या फिर जो चुनाव जैसे लोकतान्त्रिक कार्य के दौरान धन-बल की मदद लेते पाए गए हों..या फिर क्यूँ नहीं ऐसे राजनीतिक लोगों को समाज और देश के जिम्मेदार पद से अलग कर दिया जाये जिनपर भ्रस्टाचार जैसे मामले चल रहे हों.. ऐसे आदमी को कैसे किसी जिम्मेदार पद पर रहने दिया जा सकता है जो अपने अधिकार का गलत उपयोग करते हैं. क्या अधिकारियों को सुधारने के साथ-साथ राजनीतिक व्यवस्था में सुधार की भी पहल नहीं होनी चाहिए?

Friday, 1 January 2010

स्वागतम २०१०...!


नयी उम्मीदों और नए अरमानों के साथ नए साल का स्वागत है...


नया साल आप सब की जिंदगी में खुशियों का रंग भरता रहे...यही हमारी कामना है

Sunday, 27 December 2009

अंधेर नगरी-चौपट राजा!

बात-बात में मीडिया को कोसने वाली जनता आज कहाँ है. जो काम उसे करना चाहिए था वह मीडिया कर रहा है. मीडिया ने साबित किया है कि जो गलत है उसे रोकने में वह एक सशक्त माध्यम बन सकता है, लेकिन साथ ही यह भी सच है कि इस काम में आखिरकार सबकुछ जनता के ऊपर ही टिकी हुई है. मीडिया के एक स्टिंग ऑपरेशन ने सेक्स स्कैंडल के आरोप में फंसे एक राज्य के गवर्नर को महज ३० घंटो के अन्दर राजभवन से बेदखल करवा दिया और राजनीतिक जमात को यह याद दिला दिया कि राजभवन की गरिमा क्या होती है. मीडिया के लगातार अभियान के कारण एक राज्य के एक रसूखदार पुलिस अधिकारी के ऊपर इन दिनों शामत आई हुई है. इन अधिकारी के ऊपर एक युवा महिला बैडमिन्टन खिलाड़ी के साथ छेड़-छाड़ और उसे आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप है. यह घटना १९ साल पुरानी है, मीडिया ने यहाँ देश के न्याय व्यवस्था पर भी सवाल उठाया है कि आम आदमी के लिए न्याय का पैमाना क्या है और रसूखदार लोग किस तरह से प्रशासन का इस्तेमाल कर न्याय प्रक्रिया को बाधित करते हैं और साथ ही यह सवाल भी कि न्याय व्यवस्था इसे रोकने के लिए क्या कर रही है? मीडिया के अभियान के बाद आज केंद्र से लेकर उस राज्य तक की सरकार इस मामले में जागी है और तमाम महिला संगठन भी न्याय दिलाने के लिए आगे आये हैं.

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सवाल यहाँ और भी कई हैं, जिसमे दोष आखिरकार जनता के ऊपर ही आता है. इसी देश की प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में महज २-३ सालों में एक मुख्यमंत्री हजारो करोड़ का गबन कर जाता है, न्याय व्यवस्था उसके साथ क्या करती है ये तो सवाल हमारे सामने मौजूद है हीं, लेकिन जनता ने ऐसे जनप्रतिनिधियों के साथ क्या किया ये भी सोचने वाली बात है. इस घटना के उजागर होने के कुछ महीनों के अन्दर ही जनता उस शख्स की पत्नी को चुनकर विधानसभा में भेज देती है. एक ऐसी जगह जहाँ जाकर उसे जनता के लिए नियम-कानून और नीतियाँ बनाना है. जब जनता खुद ही ऐसे लोगों के हाथों में अपनी तक़दीर सौंप रही है तो फिर किस अधिकार से देश की जनता राजनीतिक जमात पर ये आरोप लगाती है कि देश की आजादी के ६ दशकों बाद भी समुचित विकास नहीं हुआ और आज भी बेरोजगारी, गरीबी और अशिक्षा जैसी समस्याएं देश में मौजूद है. सच कहा जाये तो प्रशासन देश की जनता के विचारों और उसकी दृष्टि का आइना होती है और हम जैसे हैं वैसा ही हमें राजनीतक नेतृत्व मिला है. अगर हम इससे खुश हैं तो फिर कोई और तो आयेगा नहीं हमें बचाने...हम यूहीं पिसते रहेंगे...महंगाई और बेरोजगारी जैसी समस्याओं की चक्की में और राजनीतिक जमात हर साल लोकतंत्र और चुनाव के नाम पर हमारे सामने ही करोडो-अरबो रूपये उड़ाता रहेगा और उसमें से कुछ नोट हमारे सामने भी फेंक दिया करेगा हर बार- एक वोटर होने के नाते...शायद इसी वक्त के लिए कहा गया है--"अंधेर नगरी-चौपट राजा!"

Thursday, 17 December 2009

सच भाई... जमाना कितना बदल गया न...

जमाना कितना बदल गया। पहले शादी-ब्याह के मौके पर लड़के-लड़की ऐसे सकुचाये-सकुचाये घूमते थे जैसे जबरदस्ती उनकी शादी हो रही हो और उनके पास बचने का कोई उपाय नहीं है, इसलिए शरमा-शरमा कर काम चला रहे हों. हर बात शरमा-शरमा कर ऐसे बोलना ताकि कोई ये ना समझ ले कि ये खुद शादी करना चाहता है और काफी खुश है, इसलिए हर बात, हर अदा में शर्म दिखाना जरुरी होता था. लेकिन अब ऐसा नहीं रहा. अब तो मां-बाप अपनी जवान होती संतान को देखकर यही दुआ मांगते हैं कि भगवान इसे प्लीज नए ज़माने की हवा से बचाना. कहीं वो दिन नहीं देखना पड़े कि सुबह उठे तो पता चला- लड़का पड़ोसन की लड़की या फिर स्कूल की किसी सहेली के साथ फरार हो गया. चलो ऐसा कर भी ले तो सही लेकिन पता चला नए ज़माने की हवा में बहकर किसी दोस्त को ही जीवन साथी बनाकर घर मत चला आये. अगर ऐसा हो गया तो कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रह जायेंगे. हालाँकि मां-बाप का ये डर कोई यूँही नहीं है...समानता और मानवाधिकार के इस ज़माने ने इतनी तेज एंट्री मारी है कि सब देखते रह गए. आज सुबह अख़बार में एक तस्वीर पर नजर गयी. अख़बार में एक फोटो छपी थी जिसके नीचे लिखा था- विवाह के बाद माता-पिता आशीर्वाद देते हुए. बीच में मां-बाप बड़ी शान से अपने दोनों तरफ खड़े नवविवाहित जोड़े के सर पर हाथ रख आशीष दे रहे थे. मै तस्वीर में दुल्हन ढूंढता रह गया. मां-बाप के दोनों तरफ दो लड़के शेरवानी पहने खड़े शान से नए जीवन में प्रवेश के वक्त मां-बाप का आशीर्वाद ग्रहण कर रहे थे. फिर माजरा समझ में आया, बस मुंह से इतना ही निकल पाया- भाई नए ज़माने के प्यार का झोंका है.
...
वैसे पहले की फिल्मों में शादी का नाम लेते हीं लड़कियां सकुचाकर-शरमाकर भाग जाती थी और ज्यादा पूछने पर बस इतना ही कहा करती थी- जैसा पापा चाहें. लेकिन फिर जमाना बदला. लड़कियों ने लडको को चुनना और रिजेक्ट करना शुरू कर दिया. देश के अनेक हिस्सों से ख़बरें आने लगीं कि लड़का पसंद ना होने पर लड़की ने बारात वापस भेजा. जो मां-बाप कल तक बिना पूछे शादियाँ तय कर दिया करते थे वे कुछ भी करने से पहले अपनी संतानों की राय लेना सीख गए. लेकिन जमाना उस दौर से भी आगे निकल रहा है. अब शादियाँ टीवी के परदे पर भी होने लगी हैं. हमेशा बोल्ड और बिंदास और कईयों के शब्दों में कहें तो अपनी भद्दी अदाओं से हमेशा लोकप्रियता बटोरते टीवी सितारे अचानक टीवी के परदे पर अपना जीवन साथी तलाशने निकल पड़े. अपने बदले हुए रूप में टीवी ने किसी की शादी कराना शुरू किया तो कोई टीवी के परदे पर बच्चा पालता नजर आया. दर्शकों ने भी इस नयी दुनिया का दिल खोलकर स्वागत किया और टीवी चैनलों को टीआरपी देने के अलावा एसएमएस भी खूब भेजे. घर-घर में चर्चा होने लगी और कयास लगाये जाने लगे कि कौन सी दावेदार शादी कर पाने में सफल होगी. टीवी के परदे पर ही परफेक्ट ब्राइड चुने जाने लगे. अपने रियल लाइफ में अपना वैवाहिक जीवन असफल साबित कर चुके लोग खुद को चमका-दमका कर फिर से कूद पड़े टीवी के परदे पर अपना जीवनसाथी चुनने के लिए. टीवी पर आकर ऐसी बातें करने लगे जैसे उनसे ज्यादा कोई मासूम नहीं हो. लेकिन टीवी की महिमा है लोगों को बदलने का मौका दे रही है, चलो बदल जाये तो अच्छा ही होगा. दुनिया बदल रही है और टीवी वाले इस बदलाव को तेज बना रहे हैं. सबकुछ यूँ बदल रहा है जैसे स्वप्न नगरी हो.

Tuesday, 15 December 2009

मुद्दे हम बनाते हैं...

महंगाई के इस दौर में
जार-जार होकर जनता
बस इतना ही कह पाती है-
हमारी कोई नहीं सुनता
किसी को नहीं हमारी फिकर...
लेकिन क्या हम अपनी बदहाली के
खुद जिम्मेदार नहीं...
आज़ादी के ६ दशकों बाद भी
नहीं है हम
अपनी पेट भरने को आश्वस्त
और ना ही है हमें
रोजगार पाने की गारंटी।

हाँ, मजदूरी के लिए
है हमारे पास गारंटी स्कीम
लेकिन क्या सोचा है हमने कभी
देश का पढ़ा-लिखा वर्ग
कैसे पायेगा रोजगार।
क्या वो भी
सड़क निर्माण में
ईंट-पत्थर ढोकर रोजगार की गारंटी पाए
और कहे खुद को
महाशक्ति बनने को आतुर
२१वी सदी के इंडिया का .नागरिक
जहाँ कुछ सालों में ही
राजनेताओं की तिजोरियों में
आ जाते हैं हजारो-हज़ार करोड़ रूपये
और फिर सालो-साल चलने वाले
मुकदमों की दौड़ में
खो जाती हैं यादे देश को लूटने वाले लोगों की
और फिर हम चल पड़ते हैं अगली
चोट खाने को
लोकतंत्र के हाथों॥

हमारे यहाँ मुद्दे कभी नहीं चुकते
रोटी की बढ़ी हुई कीमते
हमें एकजुट नहीं करती,
नहीं करती हमें तोड़-फोड़ पर उतारू
बेरोजगारी की मार भी,
लेकिन जब राज्य बाटना होता है
तो हम उतर पड़ते हैं सडको पर,
जब करने होते हैं दंगे
हमारी मर्दानगी जाग उठती है
और फिर शान से सर उठाये
हम बन पड़ते हैं अपने समुदाय के पहरुए।
लेकिन अपने लोगों की दुर्दशा
हमें नहीं बिचलाती
क्यूंकि हमारे पेट को
मिल जा रहा है अनाज फ़िलहाल!

Friday, 30 October 2009

बिहार में राजनीति के जरिये विकास की बयार!

अगर सीधे शब्दों में कहें कि आधा बिहार राजनीतिक हो गया है तो कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं होगी। हाल ही में अपने गाँव गया था। पिछले २० सालों से वहां के बदलाव को मैं देख रहा हूँ लेकिन इस बार जो देखा वाकई गौर करने लायक है. बदलाव की ये बयार पिछले ४-५ सालों में बहुत प्रबल हुई है और अब उसका असर गाँव-गाँव में दिखने लगा है. इसका श्रेय जाता है देश के शीर्ष नेतृत्व की सोच और लोकतान्त्रिक संस्थाओं की मजबूती को. हर जगह विकास का अपना अलग-अलग रास्ता होता है, बिहार में बदलाव और प्रगति का ये काम राजनीति के जरिये हो रहा है. वैसे भी बिहार को राजनीतिक पहचान वाली जमीन के रूप में बहुत पहले से जाना जाता है. मुझे याद है ५-६ साल पहले का वह वक्त... जब बिहार में ग्राम प्रधान का चुनाव हुआ था तब बिहार में गांवो के स्तर पर पहली बार राजनीतिक हलचल मचते दिखी थी, इसके पहले चुनावों में उतरने का काम कुछ खास लोगों तक ही सीमित था. तब गांवो के लोगों को पहली बार लगा था कि सत्ता में उनकी भी भागीदारी हो सकती है. उस बार कई स्तर पर चुनाव हुए थे. ग्राम प्रधान के लिए, वार्ड मेंबर के लिए, पंचायत समिति के लिए और प्रखंड स्तर की संस्थाओं के लिए भी. तब जाकर काफी संख्या में लोग चुनाव मैदान में दिखे थे. यूँ कहें तो राजनीति घर-घर के बीच शुरू हो गई और साथ ही वहां आगे बढ़ने की होड़ भी शुरू हुई, एक प्रतियोगिता का माहौल पैदा हुआ. देश के अन्य राज्यों में जाकर काम करने वाले कईयों ने गाँव वापस आकर राजनीति में अपनी किस्मत आजमाई और सफल भी रहे। इसके बाद बड़े पैमाने पर शिक्षक बहाली के सरकारी कदम ने गाँव में रह रहे शिक्षित युवा वर्ग के लिए रोजगार की एक उम्मीद पैदा कर दी। शिक्षामित्र, आंगनवाडी जैसे कार्यक्रमों ने स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा किये और करीब हर गाँव के ८-१० लोग इन कार्यक्रमों के जरिये रोजगार पाने में सफल रहे॥वहीँ स्थानीय राजनीति के उभाड़ ने कईयों को इस राजनीति में लगा दिया...इसके आलावा ग्रामीण रोजगार गारंटी के कार्यक्रम और सस्ते अनाज के कार्यक्रमों ने भी वहां बदलाव की उम्मीद जगाई है.
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ग्राम प्रधान के चुनाव के बाद सत्ता के विकेंद्रीकरण की दिशा में पैक्स का चुनाव अगला कदम साबित हुआ है. हाल में जब गाँव गया हुआ था तब वहां पैक्स के चुनाव की धूम थी. पैक्स ग्रामीण कृषि और सहकारी समिति है और पंचायत स्तर पर इनके सदस्यों का चुनाव होना था. इस बार हर जगह धूम थी... पैक्स अध्यक्ष और सदस्यों के पद पर कब्जा ज़माने के लिए लोगों ने पूरा जोर लगा रखा था. खैर इस कार्यक्रम के तहत भी काफी लोग राजनीति में शामिल कर लिए जायेंगे और कई अन्य लोग भी इनसे लाभान्वित होंगे. कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि वहां की ग्रामीण आबादी राजनीति की प्रक्रिया में शामिल होकर सशक्त हो रही है. हालाँकि अभी भी चुनावों में कई जगह बाहुबल का प्रयोग देखने को मिल रहा है और राजनीति में जातीय गोलबंदी भी जारी है..वैसे इसमें कुछ भी नया नहीं है और ऐसी स्थिति शुरूआती दौर में देखने को मिलती ही है. उम्मीद है कि आने वाले समय में बिहार इन कुछ नकारात्मक बातों को पीछे छोड़कर बदलाव की प्रक्रिया को आत्मसात कर लेगा.