Tuesday, 16 February 2010

क्या पूरे भारत को मिल गया रोटी, कपड़ा और मकान?

हमारे यहाँ जनता और उसकी समस्याओं को देखने का चश्मा काफी अलग-अलग नंबर का होता है, इतना ही नहीं इसे देखने वाले भी अलग-अलग वेराईटी के होते हैं तभी हमारा देश विविधता में एकता के लिए दुनिया भर में मशहूर है. आज समाचार पत्र में देश की तकनीकी क्रांति के एक बड़े ही काबिल शख्शियत नंदन निलेकनी जी का एक बयान छपा था...उनकी काबिलियत से प्रसन्न होकर इधर भारत सरकार ने उन्हें देश में रह रहे सभी लोगों को एक एकीकृत पहचान नंबर दिए जाने के अपने अभियान का मुखिया बना दिया है इसलिए उनके बयान पर गौर करना बहुत जरूरी हो जाता है..उन्होंने कहा कि देश के लिए रोटी, कपड़ा और मकान का नारा ६० और ७० के दशक का है और अब पुराना पड़ गया है, इतना ही नहीं देश उसके बाद के दौर यानी कि बिजली, सड़क और पानी के नारे के दौर से भी आगे निकल रहा है और अब देश के लिए नया नारा है- यूआईडी नंबर, बैंक अकाउंट और मोबाइल फोन...जो इससे कदमताल मिलाकर चलेगा अवसर उसी के होंगे...!
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यहाँ ये समझना बहुत जरूरी है कि भारत केवल दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर और अहमदाबाद जैसे शहरों से नहीं पूरा होता बल्कि देश की करीब ७० फीसदी जनता आज भी ६०,००० गांवों में रहती है। इन गांवों का कितना विकास हुआ है ये भी किसी से छुपी नहीं है। देश के विकास के बारे में यहाँ ज्यादा कहने की जरूरत नहीं है आकड़े बनाने वाले उसकी सच्चाई से भी अच्छी तरह से परीचित हैं। भ्रष्टाचार रुक नहीं सका है, देश को पूरा साक्षर बनाने के लिए हम आज भी जूझ रहे हैं, बच्चों को खाना का लालच दिखा कर भी स्कूल जाने के लिए तैयार नहीं किया जा सका है, गाँव में सडकों की क्या स्थिति है सब जानते हैं, बिजली कभी-कभार ही वहां दर्शन देती है...स्वास्थ्य सुविधाए देने के नाम पर अप्रशिक्षित लोग गाँव के स्वास्थ्य केन्द्रों में तैनात हैं और कुर्सियां तोड़ रहे हैं, लोग अपनी जान जाने के डर से नीमहकीम के यहाँ से दवा लेना पसंद करते हैं लेकिन सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रों तक जाना उन्हें गवारा नहीं है. राजनीतिक लोकप्रियता को ध्यान में रखकर राज्य सरकारों ने शिक्षा के स्तर का सत्यानाश कर रखा है...बच्चों को पढ़ाने के लिए ऐसे लोगों को तैनात कर दिया जा रहा है जिन्हें शुद्ध रूप से शैक्षिक तकनीक का कोई पता भी नहीं है इसके बाद जो स्तर बचा भी था वो मिड डे मील के नाम पर बर्बाद कर दिया गया. बच्चों की तो छोडिये शिक्षकों तक का ध्यान स्कूल में बन रहे खाने पर ही लगा रहता हैं ऐसे में लोग पढेंगे और पढ़ाएंगे क्या ख़ाक. इसपर आप सोचते हैं कि बहुत बड़ा बदलाव ला रहे हैं।
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रोटी, कपड़ा और मकान जिन्हें निलेकनी जी ६०-७० के दशक का नारा बता रहे हैं वो आज भी देश की अधिकांश आबादी के लिए सबसे बड़ी चिंता है. रोजगार के लिए और सामाजिक सुरक्षा के लिए आपके पास कोई ढांचा नहीं है...अधिकांश आबादी को पता नहीं की अगले हफ्ते वो क्या खायेंगे. इसके बाद के नारे सड़क, बिजली और पानी की तो अभी बात ही छोड़ दीजिये. गाँव की क्या कहें देश की राजधानी दिल्ली में भी कई ऐसे इलाके हैं जहाँ लोग आधी रात को उठकर पीने के पानी के आने का इन्तेजार करते हैं और गर्मियों का मौसम आते हीं बिजली कटौती से लड़ने के लिए लोग रातभर सडकों पर नाईटवाक् करते हैं. ऐसे में सबको मकान कि तो बात ही छोड़ दीजिये...
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अब रही बात लोगों को यूआईडी नंबर, बैंक अकाउंट और मोबाइल फोन देने की तो शायद ये लाखों और करोड़ों लोगों के लिए अवसरों के द्वार खोलें लेकिन उससे भी ज्यादा लोग ऐसे हैं जिनके लिए अभी पुराने नारे बेमानी नहीं हुए हैं और उनके लिए आज भी इन नए नारों से पुराने नारे ज्यादा जरूरी हैं। देश की सबसे बड़ी बिडम्बना यही है कि देश को देखने और उसके विकास का काम शहरी और एलिट वर्ग के हाथों में है और गाँव का जो प्रतिनिधि राजधानी तक पहुँचता है वह या तो जनता की समस्याओं को उठा नहीं रहा है या वो भी इसी लूट-पाट में शामिल हो जा रहा है और सरकारी खाते और कागजों में हमारा देश, उसकी ग्रामीण आबादी और भूखे-नंगे लोग भी तेजी से तरक्की करते जा रहे हैं और देश को महाशक्ति बनाने के सपने( कई लोग इसे मुगालता भी मानते हैं) में जी रहे हैं.

Monday, 8 February 2010

लो पाकिस्तान ने दिखा दी अपनी जात, कर लो अब "अमन की आशा"

इधर अख़बार और टीवी में लगातार एक विज्ञापन दिखाई दे रहा है...अमन की आशा... जो भारत और पाकिस्तान के बीच अमन की आशा जगाने के लिए कुछ अति-उत्साही मीडिया संगठनों के द्वारा चलाया जा रहा है. हमारे देश की संस्कृति में एक खास सीख हमेशा दी जाती है कि सामने वाला चाहे कितना भी बुरा क्यूँ न हो आप उससे हमेशा अच्छे से पेश आओ. इसी रास्ते पर चलते हुए हमने बार-बार मार खाकर भी पाकिस्तान के आगे दोस्ती के हाथ बढ़ाये. संसद पर हमला हुआ तो कई माह तक सेना सरहद पर तैनात कर हम पाकिस्तान से उम्मीद करते रहे कि अब सुधरेगा तब सुधरेगा...फिर मुंबई में जब आतंकियों ने दिन-दहारे कत्लेआम किया तब भी कई माह तक हम पाकिस्तान पर दबाव बनाने की जुग्गत भीडाते रहे और फिर आख़िरकार थक-हारकर बातचीत का प्रस्ताव कर दिया। हमले के बाद के इस एक साल में पाकिस्तान आतंकियों पर अपनी ओर से लगाम लगाने के लिए कुछ करना तो दूर हमारे बातचीत के प्रस्ताव का मजाक ही उड़ाने लगा. आम लोग ऐसा करें तो कुछ बात भी हो लेकिन वहां का विदेश मंत्री तक इस तरह की गैरजिम्मेदारी दिखा रहा है. तो कैसे होगा अमन...क्या हमेशा मार खाकर हम शांति की उम्मीद करते रहेंगे और यूँही हमारी पीठ में छुरा घोंपा जाता रहेगा.

पूरी दुनिया ने देखा कैसे पाकिस्तान से आये आतंकवादियों ने मुंबई में उत्पात मचाया फिर भी आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। ९-११ के बाद जिस अमेरिका ने अपनी मन-मर्जी के अनुसार चुन-चुनकर दुनिया के कई देशों और वहां शरण पाए आतंकियों को निशाना बनाया वही अमेरिका लगातार बयानबाजी कर पाकिस्तान के लिए ढाल बने रहा. जो कुछ उससे बचा वह भारत के परंपरागत दुश्मन चीन लगातार पाकिस्तान की पीठ थपथपाकर पूरा करता रहा. हम अमन की उम्मीद लगाये बैठे रहें और उम्मीद करते रहें कि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देश जरूर कुछ करेंगे. अब भाई कोई और क्यूँ हमारे लिए कुछ करेगा अगर हम अपनी सुरक्षा में हथियार नहीं उठा सकते तो कोई और थोडे ही हमारे लिए लड़ने आयेगा? इतना ही नहीं जब पाकिस्तान के साथ सरकारी तौर पर हमने सारे ताल्लुकात रोक दिए और देश में होने वाले क्रिकेट सीरीज में पाकिस्तानी खिलाडी नहीं चुने गए तब भी अमन पसंद जमात ने हो-हल्ला मचाया और कहते रहे कि सरहद पार सभी लोग आतंकवादी नहीं है. अब जब पाकिस्तान की हुकूमत हमारे वार्ता के प्रस्ताव का मजाक उड़ा रही है तो बताएं हमारे अमन की आशा के सिपाही कि अब क्या करना चाहिए. क्या अमन के लिए सभी भारतीय पाकिस्तान के आगे सर झुका कर खड़े हो जाएँ कि भाई लो जितनो को मार कर शांति मिलती हो मार लो लेकिन अमन की हमारी आरजू जरूर पूरी कर दो...

Friday, 15 January 2010

लो नहा लिया गंगा में, कर आये उसे मैला...

लगा ली आज लाखों-करोड़ों ने
गंगा में डुबकी,
धो लिया सबने अपना पाप
और भुला दिया
कल तक की सारी दुशवारियों को भी!
बनारस से लेकर हरिद्वार तक
और इलाहाबाद से लेकर गंगासागर तक
कई दिनों से लोग
कर रहे थे इसी नहान के लिए मश्श्क्कत!
लो हम सफल हुए
अपने इस होली डीप(पवित्र स्नान) में...
लेकिन कई-कई टन फूल-माला भी छोड़ आये हम
अपने पीछे इस गंगा में
जिसकी सफाई के नाम पर अबतक
सरकारें बहा चुकी हैं कई-कई करोड़ रूपये
और जो आज भी बाट जोह रही है
अपनी सफाई की...
वैसे सुना है कि अब सरकारे
फिर सजग होने लगी हैं इसके प्रति
अब होने लगी हैं कैबिनेट की बैठकें
गंगा की धारा पर
तो शायद अब तक हमारी गन्दगी धोती
इस गंगा के
दिन भी अब बदल जाएँ...!

Monday, 4 January 2010

क्या दोषी नेताओं का भी पद नहीं छिनना चाहिए...?

हरियाणा के पूर्व पुलिस कप्तान इन दिनों मीडिया की सुर्ख़ियों में हैं. छेड़छाड़ के आरोप में उन्हें महज ६ माह की सजा मिलने के बाद अचानक देश की जनता जाग पड़ी है...मीडिया जाग पड़ा है और इन सबके बाद अचानक सरकार भी जाग गई है. सब कड़ी से कड़ी सजा की मांग कर रहे हैं...अचानक सब न्याय व्यवस्था की सुस्ती पर सवाल उठाने लगे हैं. केंद्र सरकार जाग पड़ी है, राज्य सरकार जाग पड़ी है. सब ने मिलकर उस पुलिस अधिकारी को दिए गए मेडल छीनने की मुहीम शुरू कर दी है. देश के गृह सचिव ने कहा है कि सरकार ऐसी व्यवस्था बना रही है जिसमे दोषी साबित हुए अधिकारियों से उन्हें मिले मेडल आटोमेटिक तरीके से वापस ले लिए जाएँ...क्या यहाँ एक सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए कि जब दोषी पुलिस अधिकारी से उसका मेडल वापस लिया जा सकता है तो फिर दोषी राजनेता से उसका पद क्यूँ नहीं छीन लिया जाना चाहिए. चलिए मान भी लें कि दोषी और सजायाफ्ता लोगों के चुनाव लड़ने पर पाबन्दी है लेकिन क्या उन लोगों को चुनाव लड़ने से रोक नहीं देना चाहिए जो लम्बे समय से जेल की रोटी तोड़ रहे हैं या फिर जिनपर हत्या जैसे गंभीर अपराध के लिए मुकदमा चल रहा हो. या फिर जिनपर दर्जनों मुक़दमे चल रहे हों. या फिर जो चुनाव जैसे लोकतान्त्रिक कार्य के दौरान धन-बल की मदद लेते पाए गए हों..या फिर क्यूँ नहीं ऐसे राजनीतिक लोगों को समाज और देश के जिम्मेदार पद से अलग कर दिया जाये जिनपर भ्रस्टाचार जैसे मामले चल रहे हों.. ऐसे आदमी को कैसे किसी जिम्मेदार पद पर रहने दिया जा सकता है जो अपने अधिकार का गलत उपयोग करते हैं. क्या अधिकारियों को सुधारने के साथ-साथ राजनीतिक व्यवस्था में सुधार की भी पहल नहीं होनी चाहिए?

Friday, 1 January 2010

स्वागतम २०१०...!


नयी उम्मीदों और नए अरमानों के साथ नए साल का स्वागत है...


नया साल आप सब की जिंदगी में खुशियों का रंग भरता रहे...यही हमारी कामना है

Sunday, 27 December 2009

अंधेर नगरी-चौपट राजा!

बात-बात में मीडिया को कोसने वाली जनता आज कहाँ है. जो काम उसे करना चाहिए था वह मीडिया कर रहा है. मीडिया ने साबित किया है कि जो गलत है उसे रोकने में वह एक सशक्त माध्यम बन सकता है, लेकिन साथ ही यह भी सच है कि इस काम में आखिरकार सबकुछ जनता के ऊपर ही टिकी हुई है. मीडिया के एक स्टिंग ऑपरेशन ने सेक्स स्कैंडल के आरोप में फंसे एक राज्य के गवर्नर को महज ३० घंटो के अन्दर राजभवन से बेदखल करवा दिया और राजनीतिक जमात को यह याद दिला दिया कि राजभवन की गरिमा क्या होती है. मीडिया के लगातार अभियान के कारण एक राज्य के एक रसूखदार पुलिस अधिकारी के ऊपर इन दिनों शामत आई हुई है. इन अधिकारी के ऊपर एक युवा महिला बैडमिन्टन खिलाड़ी के साथ छेड़-छाड़ और उसे आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप है. यह घटना १९ साल पुरानी है, मीडिया ने यहाँ देश के न्याय व्यवस्था पर भी सवाल उठाया है कि आम आदमी के लिए न्याय का पैमाना क्या है और रसूखदार लोग किस तरह से प्रशासन का इस्तेमाल कर न्याय प्रक्रिया को बाधित करते हैं और साथ ही यह सवाल भी कि न्याय व्यवस्था इसे रोकने के लिए क्या कर रही है? मीडिया के अभियान के बाद आज केंद्र से लेकर उस राज्य तक की सरकार इस मामले में जागी है और तमाम महिला संगठन भी न्याय दिलाने के लिए आगे आये हैं.

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सवाल यहाँ और भी कई हैं, जिसमे दोष आखिरकार जनता के ऊपर ही आता है. इसी देश की प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में महज २-३ सालों में एक मुख्यमंत्री हजारो करोड़ का गबन कर जाता है, न्याय व्यवस्था उसके साथ क्या करती है ये तो सवाल हमारे सामने मौजूद है हीं, लेकिन जनता ने ऐसे जनप्रतिनिधियों के साथ क्या किया ये भी सोचने वाली बात है. इस घटना के उजागर होने के कुछ महीनों के अन्दर ही जनता उस शख्स की पत्नी को चुनकर विधानसभा में भेज देती है. एक ऐसी जगह जहाँ जाकर उसे जनता के लिए नियम-कानून और नीतियाँ बनाना है. जब जनता खुद ही ऐसे लोगों के हाथों में अपनी तक़दीर सौंप रही है तो फिर किस अधिकार से देश की जनता राजनीतिक जमात पर ये आरोप लगाती है कि देश की आजादी के ६ दशकों बाद भी समुचित विकास नहीं हुआ और आज भी बेरोजगारी, गरीबी और अशिक्षा जैसी समस्याएं देश में मौजूद है. सच कहा जाये तो प्रशासन देश की जनता के विचारों और उसकी दृष्टि का आइना होती है और हम जैसे हैं वैसा ही हमें राजनीतक नेतृत्व मिला है. अगर हम इससे खुश हैं तो फिर कोई और तो आयेगा नहीं हमें बचाने...हम यूहीं पिसते रहेंगे...महंगाई और बेरोजगारी जैसी समस्याओं की चक्की में और राजनीतिक जमात हर साल लोकतंत्र और चुनाव के नाम पर हमारे सामने ही करोडो-अरबो रूपये उड़ाता रहेगा और उसमें से कुछ नोट हमारे सामने भी फेंक दिया करेगा हर बार- एक वोटर होने के नाते...शायद इसी वक्त के लिए कहा गया है--"अंधेर नगरी-चौपट राजा!"

Thursday, 17 December 2009

सच भाई... जमाना कितना बदल गया न...

जमाना कितना बदल गया। पहले शादी-ब्याह के मौके पर लड़के-लड़की ऐसे सकुचाये-सकुचाये घूमते थे जैसे जबरदस्ती उनकी शादी हो रही हो और उनके पास बचने का कोई उपाय नहीं है, इसलिए शरमा-शरमा कर काम चला रहे हों. हर बात शरमा-शरमा कर ऐसे बोलना ताकि कोई ये ना समझ ले कि ये खुद शादी करना चाहता है और काफी खुश है, इसलिए हर बात, हर अदा में शर्म दिखाना जरुरी होता था. लेकिन अब ऐसा नहीं रहा. अब तो मां-बाप अपनी जवान होती संतान को देखकर यही दुआ मांगते हैं कि भगवान इसे प्लीज नए ज़माने की हवा से बचाना. कहीं वो दिन नहीं देखना पड़े कि सुबह उठे तो पता चला- लड़का पड़ोसन की लड़की या फिर स्कूल की किसी सहेली के साथ फरार हो गया. चलो ऐसा कर भी ले तो सही लेकिन पता चला नए ज़माने की हवा में बहकर किसी दोस्त को ही जीवन साथी बनाकर घर मत चला आये. अगर ऐसा हो गया तो कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रह जायेंगे. हालाँकि मां-बाप का ये डर कोई यूँही नहीं है...समानता और मानवाधिकार के इस ज़माने ने इतनी तेज एंट्री मारी है कि सब देखते रह गए. आज सुबह अख़बार में एक तस्वीर पर नजर गयी. अख़बार में एक फोटो छपी थी जिसके नीचे लिखा था- विवाह के बाद माता-पिता आशीर्वाद देते हुए. बीच में मां-बाप बड़ी शान से अपने दोनों तरफ खड़े नवविवाहित जोड़े के सर पर हाथ रख आशीष दे रहे थे. मै तस्वीर में दुल्हन ढूंढता रह गया. मां-बाप के दोनों तरफ दो लड़के शेरवानी पहने खड़े शान से नए जीवन में प्रवेश के वक्त मां-बाप का आशीर्वाद ग्रहण कर रहे थे. फिर माजरा समझ में आया, बस मुंह से इतना ही निकल पाया- भाई नए ज़माने के प्यार का झोंका है.
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वैसे पहले की फिल्मों में शादी का नाम लेते हीं लड़कियां सकुचाकर-शरमाकर भाग जाती थी और ज्यादा पूछने पर बस इतना ही कहा करती थी- जैसा पापा चाहें. लेकिन फिर जमाना बदला. लड़कियों ने लडको को चुनना और रिजेक्ट करना शुरू कर दिया. देश के अनेक हिस्सों से ख़बरें आने लगीं कि लड़का पसंद ना होने पर लड़की ने बारात वापस भेजा. जो मां-बाप कल तक बिना पूछे शादियाँ तय कर दिया करते थे वे कुछ भी करने से पहले अपनी संतानों की राय लेना सीख गए. लेकिन जमाना उस दौर से भी आगे निकल रहा है. अब शादियाँ टीवी के परदे पर भी होने लगी हैं. हमेशा बोल्ड और बिंदास और कईयों के शब्दों में कहें तो अपनी भद्दी अदाओं से हमेशा लोकप्रियता बटोरते टीवी सितारे अचानक टीवी के परदे पर अपना जीवन साथी तलाशने निकल पड़े. अपने बदले हुए रूप में टीवी ने किसी की शादी कराना शुरू किया तो कोई टीवी के परदे पर बच्चा पालता नजर आया. दर्शकों ने भी इस नयी दुनिया का दिल खोलकर स्वागत किया और टीवी चैनलों को टीआरपी देने के अलावा एसएमएस भी खूब भेजे. घर-घर में चर्चा होने लगी और कयास लगाये जाने लगे कि कौन सी दावेदार शादी कर पाने में सफल होगी. टीवी के परदे पर ही परफेक्ट ब्राइड चुने जाने लगे. अपने रियल लाइफ में अपना वैवाहिक जीवन असफल साबित कर चुके लोग खुद को चमका-दमका कर फिर से कूद पड़े टीवी के परदे पर अपना जीवनसाथी चुनने के लिए. टीवी पर आकर ऐसी बातें करने लगे जैसे उनसे ज्यादा कोई मासूम नहीं हो. लेकिन टीवी की महिमा है लोगों को बदलने का मौका दे रही है, चलो बदल जाये तो अच्छा ही होगा. दुनिया बदल रही है और टीवी वाले इस बदलाव को तेज बना रहे हैं. सबकुछ यूँ बदल रहा है जैसे स्वप्न नगरी हो.

Tuesday, 15 December 2009

मुद्दे हम बनाते हैं...

महंगाई के इस दौर में
जार-जार होकर जनता
बस इतना ही कह पाती है-
हमारी कोई नहीं सुनता
किसी को नहीं हमारी फिकर...
लेकिन क्या हम अपनी बदहाली के
खुद जिम्मेदार नहीं...
आज़ादी के ६ दशकों बाद भी
नहीं है हम
अपनी पेट भरने को आश्वस्त
और ना ही है हमें
रोजगार पाने की गारंटी।

हाँ, मजदूरी के लिए
है हमारे पास गारंटी स्कीम
लेकिन क्या सोचा है हमने कभी
देश का पढ़ा-लिखा वर्ग
कैसे पायेगा रोजगार।
क्या वो भी
सड़क निर्माण में
ईंट-पत्थर ढोकर रोजगार की गारंटी पाए
और कहे खुद को
महाशक्ति बनने को आतुर
२१वी सदी के इंडिया का .नागरिक
जहाँ कुछ सालों में ही
राजनेताओं की तिजोरियों में
आ जाते हैं हजारो-हज़ार करोड़ रूपये
और फिर सालो-साल चलने वाले
मुकदमों की दौड़ में
खो जाती हैं यादे देश को लूटने वाले लोगों की
और फिर हम चल पड़ते हैं अगली
चोट खाने को
लोकतंत्र के हाथों॥

हमारे यहाँ मुद्दे कभी नहीं चुकते
रोटी की बढ़ी हुई कीमते
हमें एकजुट नहीं करती,
नहीं करती हमें तोड़-फोड़ पर उतारू
बेरोजगारी की मार भी,
लेकिन जब राज्य बाटना होता है
तो हम उतर पड़ते हैं सडको पर,
जब करने होते हैं दंगे
हमारी मर्दानगी जाग उठती है
और फिर शान से सर उठाये
हम बन पड़ते हैं अपने समुदाय के पहरुए।
लेकिन अपने लोगों की दुर्दशा
हमें नहीं बिचलाती
क्यूंकि हमारे पेट को
मिल जा रहा है अनाज फ़िलहाल!

Friday, 30 October 2009

बिहार में राजनीति के जरिये विकास की बयार!

अगर सीधे शब्दों में कहें कि आधा बिहार राजनीतिक हो गया है तो कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं होगी। हाल ही में अपने गाँव गया था। पिछले २० सालों से वहां के बदलाव को मैं देख रहा हूँ लेकिन इस बार जो देखा वाकई गौर करने लायक है. बदलाव की ये बयार पिछले ४-५ सालों में बहुत प्रबल हुई है और अब उसका असर गाँव-गाँव में दिखने लगा है. इसका श्रेय जाता है देश के शीर्ष नेतृत्व की सोच और लोकतान्त्रिक संस्थाओं की मजबूती को. हर जगह विकास का अपना अलग-अलग रास्ता होता है, बिहार में बदलाव और प्रगति का ये काम राजनीति के जरिये हो रहा है. वैसे भी बिहार को राजनीतिक पहचान वाली जमीन के रूप में बहुत पहले से जाना जाता है. मुझे याद है ५-६ साल पहले का वह वक्त... जब बिहार में ग्राम प्रधान का चुनाव हुआ था तब बिहार में गांवो के स्तर पर पहली बार राजनीतिक हलचल मचते दिखी थी, इसके पहले चुनावों में उतरने का काम कुछ खास लोगों तक ही सीमित था. तब गांवो के लोगों को पहली बार लगा था कि सत्ता में उनकी भी भागीदारी हो सकती है. उस बार कई स्तर पर चुनाव हुए थे. ग्राम प्रधान के लिए, वार्ड मेंबर के लिए, पंचायत समिति के लिए और प्रखंड स्तर की संस्थाओं के लिए भी. तब जाकर काफी संख्या में लोग चुनाव मैदान में दिखे थे. यूँ कहें तो राजनीति घर-घर के बीच शुरू हो गई और साथ ही वहां आगे बढ़ने की होड़ भी शुरू हुई, एक प्रतियोगिता का माहौल पैदा हुआ. देश के अन्य राज्यों में जाकर काम करने वाले कईयों ने गाँव वापस आकर राजनीति में अपनी किस्मत आजमाई और सफल भी रहे। इसके बाद बड़े पैमाने पर शिक्षक बहाली के सरकारी कदम ने गाँव में रह रहे शिक्षित युवा वर्ग के लिए रोजगार की एक उम्मीद पैदा कर दी। शिक्षामित्र, आंगनवाडी जैसे कार्यक्रमों ने स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा किये और करीब हर गाँव के ८-१० लोग इन कार्यक्रमों के जरिये रोजगार पाने में सफल रहे॥वहीँ स्थानीय राजनीति के उभाड़ ने कईयों को इस राजनीति में लगा दिया...इसके आलावा ग्रामीण रोजगार गारंटी के कार्यक्रम और सस्ते अनाज के कार्यक्रमों ने भी वहां बदलाव की उम्मीद जगाई है.
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ग्राम प्रधान के चुनाव के बाद सत्ता के विकेंद्रीकरण की दिशा में पैक्स का चुनाव अगला कदम साबित हुआ है. हाल में जब गाँव गया हुआ था तब वहां पैक्स के चुनाव की धूम थी. पैक्स ग्रामीण कृषि और सहकारी समिति है और पंचायत स्तर पर इनके सदस्यों का चुनाव होना था. इस बार हर जगह धूम थी... पैक्स अध्यक्ष और सदस्यों के पद पर कब्जा ज़माने के लिए लोगों ने पूरा जोर लगा रखा था. खैर इस कार्यक्रम के तहत भी काफी लोग राजनीति में शामिल कर लिए जायेंगे और कई अन्य लोग भी इनसे लाभान्वित होंगे. कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि वहां की ग्रामीण आबादी राजनीति की प्रक्रिया में शामिल होकर सशक्त हो रही है. हालाँकि अभी भी चुनावों में कई जगह बाहुबल का प्रयोग देखने को मिल रहा है और राजनीति में जातीय गोलबंदी भी जारी है..वैसे इसमें कुछ भी नया नहीं है और ऐसी स्थिति शुरूआती दौर में देखने को मिलती ही है. उम्मीद है कि आने वाले समय में बिहार इन कुछ नकारात्मक बातों को पीछे छोड़कर बदलाव की प्रक्रिया को आत्मसात कर लेगा.

Sunday, 4 October 2009

खगड़िया नरसंहार के सन्देश!

बिहार के खगड़िया जिले में नरसंहार हो गया...बाहर वालों के लिए ये एक नक्सली हमला भर है जैसा रोजाना छत्तीसगढ़, झारखण्ड और दक्षिण बिहार के कई इलाकों में होते रहता है। उनके लिए ये बस एक खबर भर है लेकिन जो लोग बिहार को समझते हैं. जिन्होंने बिहार को करीब से देखा है और जो पिछले कुछ सालों से बिहार में कोई नरसंहार न होने के कारण सुकून की सांस लेने लगे थे उनके लिए खगडिया वाली घटना कोई आम घटना नहीं है क्यूंकि वे जानते हैं कि यह आने वाले तबाही की एक झलक भर है और उन्हें ये भी मालूम है कि कहीं न कहीं इस आग को भड़काने में हमारे यहाँ की जातीय राजनीति जिम्मेदार है। बिहार में भूमि विवाद बहुत पुराना है और इसी का फायदा उठाकर रणवीर सेना और नक्सली वहां दशकों से अपना धंधा करते रहे और यह आज भी बदस्तूर जारी है।
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लेकिन कहा जाता है कि जब भी मामला संवेदनशील हो तो शासन सत्ता को गंभीरता के साथ पेश आना चाहिए...जिसका आज बिहार के राजनीतिक नेतृत्व में आभाव सा दिखने लगा है। जब नीतिश कुमार की सरकार बिहार में आई थी तब सबने उम्मीद की थी कि ये बिहार के लिए नई करवट होगी और जातीय राजनीति से ऊपर उठकर यह सरकार बिहार के लोगों को प्रगति के रास्ते पर ले जाने में कामयाब होगी. लेकिन हाल में जब पूर्व राजस्व और ग्रामीण विकास सचिव डी बंदोपाध्याय ने भूमि सुधारों पर अपनी रिपोर्ट सौंपी तो उम्मीद की जा रही थी कि सरकार का रुख बहुत सधा हुआ होगा और ऐसा कुछ नहीं किया जायेगा जिससे बिहार फिर जातीय और वर्गीय लड़ाई की आग में कूद पड़ेगा. लेकिन जब सरकार की इसपर प्रतिक्रिया सामने आई तो जमीन के मालिकों को बेचैन कर देने वाला था. बटाईदारों को जमीन का मालिक बना दिया जायेगा ऐसा सुनकर भला कैसे समाज में टकराव नहीं होगा? सरकार के इस रुख को देखते हुए जमीन के मालिक बटाईदारों से अपनी जमीन वापस लेने लगे और राजनीतिक दांव-पेंच में स्थानीय नेताओं ने इस आग को हवा दी. नक्सलियों को फिर से मजबूत होने का मौका मिल गया. इसी की परिणति थी खगडिया में हुआ नरसंहार.
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लेकिन अगर दूरदर्शी नजरिये से देखा जाये तो इसमें नुकसान बटाईदारो का ही ज्यादा है. अबतक जमीन पर खेती की एक परिपाटी होती थी..जो जमीन का मालिक है अगर वह अपनी जमीन पर खेती नहीं कर कोई और काम कर रहा हो तो वह खेती के काम में लगे लोगों को अपनी जमीन बटाई पर दे देता था और उसके बदले एक निश्चित रकम या फिर उगे हुए अनाज का निश्चित हिस्सा उसे मिलता था. खेती करने वाला शख्स मेहनत करके अपना हिस्सा पाता था.. सच कहें तो इसमें बटाईदार को आधे से भी ज्यादा हिस्सा मिलता था. लेकिन जब यह कहा जायेगा कि जो बटाईदार है जमीन उसी की हो जायेगी तो फिर मुश्किलें बढेंगी ही न.. मालिक अपना जमीन ले लेगा और अपना जमीन भले ही खाली रखेगा लेकिन बटाई पर नहीं देगा. इससे बटाईदार के घर जो अनाज जाता था वह रुक जायेगा और देश के हिस्से में जो उत्पादन हो रहा था वह भी रुक जायेगा...ये तो विकास ठप्प करने वाला और सामाजिक संघर्ष बढ़ने वाला कदम ही साबित होगा. ये बिलकुल वैसे ही होगा कि कोई अपनी मेहनत की कमाई से घर बनाये और उसे किसी को किराये पर रहने को दे और सरकार कहे कि जो रह रहा है वही घर का मालिक होगा..फिर कोई क्यूँ अपना घर किसी को किराये पर देगा. खगडिया में हुई घटना तो एक शुरुआत है और अगर बिहार की सरकार व्यावहारिक नजरिया नहीं अपनाती तो जमीन की लड़ाई की ये आग पूरे बिहार में फ़ैल जायेगी और खेती प्रधान बिहार राज्य उत्पादकता भूलकर तबाही के काम में लग जायेगा.

Saturday, 26 September 2009

अब तमीज़ सीखेंगे दिल्ली वाले!

सुना है सरकार अब दिल्ली वालों को तमीज सिखाएगी। अगले साल बहुत सारे मेहमान आने वाले हैं इसलिए दिल्ली सरकार ने फैसला किया है कि उनके आने से पहले सबको सड़क पर चलना, कायदे-कानून से लेकर थूक फेंकना तक सिखाना है। इसके लिए जो भी सजा देना हो दिया जायेगा. केवल दिल्ली की सरकार के लिए उनके बिगड़े हुए ये बच्चे चिंता का विषय नहीं हैं बल्कि बात अब हाईकमान तक पहुच गई है. अभी कल ही की बात है केंद्र सरकार के एक आला मंत्री महोदय दिल्ली वालों को तमीज सीखने की सलाह दे गए. उन्होंने दिल्लीवासियों को हिदायत दी है कि खेलों की शुरुआत से पहले उन्हें अपनी आदतें बदल एक बड़े अंतरराष्ट्रीय शहर के निवासियों की तरह बर्ताव करना सीख लेना चाहिए। बकौल उनके यहां कानून उल्लंघन के बढ़ते मामलों ने सरकार को चिंता में डाल रखा है। उन्होंने कहा कि दिल्ली में आज भी वाहन खुलेआम रेड लाइट का उल्लंघन कर रहे हैं। ढेरों गाड़ियां बिना रजिस्ट्रेशन के चल रही हैं। कुछ वाहन मनमाने ढंग से कहीं भी सड़क क्रास कर लेते हैं। लोग ओवरब्रिज व अंडर ग्राउंड रास्तों का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। अब जाहिर सी बात है कि अगर लोग इतने बदतमीज है तो सरकार का बिगड़ना लाजिमी है. अरे भाई सुधरो और अगर नहीं सुधरोगे तो बाहर से आये लोगों के बीच कितनी बदनामी होगी.
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तमीज सिखने का जहाँ तक सवाल है उसपे तो दिल्ली वाले बैकफूट पर हैं लेकिन साथ ही अधिकांश लोगों को ये भी लगता है कि सरकार को उनकी फ़िक्र नहीं है बल्कि बाहर से आने वाले मेहमानों की फिकर है वरना अगर पहले से ही सुविधाए बढाई गयी होती तो फिर तमीज यहाँ के लोगों की आदत में शुमार हो चुका होता। अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ बरसात की उन रातों के बीते...जब थोडी सी बरसात के बाद दिल्ली की सड़के थम गयी थी और लोगों ने घिसट-घिसट कर कार्यालय से अपने घर की दूरी घंटों में तय की थी. तब इसी सरकार ने हाथ उठाते हुए कहा था कि बरसात होगा तो जाम लगेगा ही और इसका कोई उपाय नहीं है. अब आप ही बताइए जब सरकार अपना काम नहीं कर सकती तो जनता से कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वो अपनी जिम्मेदारियां सही तरीके से निभाए. अभी गर्मी का मौसम भी पूरी तरह से नहीं बिता है...लोगों को अभी पानी और बिजली के लिए तड़पते ज्यादा दिन नहीं हुए. बिजली कटौती के कारण रात-रात भर घर से बाहर टहलने को मजबूर दिल्ली वालों ने तब भी बदतमीजी की थी और कई जगहों पर बिजली विभाग के कार्यालयों पर तोड़-फोड़ किये थे. नलों के सूखे टोंटे और पानी के लिए टैंकरों के आगे लम्बी-लम्बी लाइने देखकर भी दिल्ली वालों का तमीज गडबडा गया था. इसके अलावा लगातार बढती महंगाई देखकर भी अगर दिल्ली वाले बदतमीजी कर दें तो कोई हैरानी नहीं होगी...
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लेकिन ये रही उनकी बात. ये उनकी अपनी समस्या है. सरकार को उस बात से ज्यादा चिंता है कि अगले साल मेहमान आने वाले हैं और उनके सामने नाक नीची नहीं होनी चाहिए. इसके लिए सरकार करोडो-करोड़ फूंक रही है और हर चीज उनके लिए चकमक तैयार हो रहा है. चमचम सड़के, चमचम होटल, अच्छे-अच्छे क्लब, बड़े-बड़े स्टेडियम, मस्त चमचमाती बसें..मेट्रो भी उनके आने तक उस इलाके में एकदम फिट हो जायेगी...बस अब जनता भी अपनी जिम्मेदारी निभाए..उनके सामने थोडा तमीज से रहे..बस अब इसी की फिकर है. ये देखकर बचपन के वे दिन याद आ जाते हैं जब घर में कोई मेहमान आने वाला होता था तो घर वाले सुबह-सुबह नहलाकर और नए कपडे पहनकर बैठा देते थे और साथ में ये नसीहत भी चिपका देते थे कि देखो उनके सामने कोई शरारत मत करना और अगर वे मिठाई लायें तो उनके सामने मत मांगना.

Wednesday, 23 September 2009

मिलावट का ये जमाना...आम आदमी और टीवी!

लोकतंत्र में सबको अपनी बात रखने का अधिकार है॥टीवी वालों को भी। सो उन्हें जो मन में आ रहा है दिखा रहे हैं ...हमें भी अधिकार है अपनी बात कहने का इसलिए कह रहा हूँ. यहाँ बस स्वस्थ लोकतान्त्रिक परम्परा काम कर रही है और कुछ नहीं. यूँ कहें तो हम टीवी की बुराई भी नहीं कर सकते क्यूंकि उसे देखे बिना काम भी नहीं चलता.. मेरे जैसे न जाने कितने लोगों के लिए टीवी की पत्रकारिता ने उम्दा काम किया है. मिलावटी तेल, घी, ब्रेड छुडाने के बाद जब नवरात्र शुरू होने वाला था कि अचानक एक दिन रिमोट से फिर टीवी को वो चैनल लग गया. फिर क्या था घर में इलाइचिदाना और बताशा आना भी बंद हो गया. इन चीजों के बनने की मिलावटी और करुण कहानी देखकर घर में सीधा फरमान जारी हो गया कि आज के बाद ये चीजे नहीं खरीद कर आएँगी...इतना ही नहीं पूजा के सीजन में मिलावटी खोये की कहानी देखकर मिठाई की खरीददारी भी १ महीने के लिए रोक दी गयी. अब रोजाना घर में पूजा के बाद मिठाई खाने की वो पुरानी यादें मन में ही बस के रह जायेगी. बचपन में घर में जब भी पूजा होती थी उसके बाद प्रसाद के रूप में हाथों में इलाईचिदाने के कुछ दाने डाल दिए जाते थे..वो चंद दाने इतने मूल्यवान थे कि जल्दी ख़त्म न हो जाये इसके लिए कई घंटों तक एक-एक दाने मुंह में डाल कर संभालकर रखते थे ताकि उसका स्वाद लम्बे समय तक मुंह में बना रहे. लेकिन अब वो स्वाद नहीं मिलेगा. नए बच्चे तो उसका स्वाद भी नहीं जान पाएंगे।
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ये कहानी केवल मेरी नहीं है इस मिलावटी युग में हर इन्सान की यहीं करुण कहानी है. दिनभर ऑफिस में काम करके थका हारा इन्सान जब हाथों में चाय की प्याली लेकर टीवी के सामने बैठता है और फिर टीवी पर दूध में मिलावट की दिल दहला देने वाली कहानी देखकर हाथ में रखे चाय पर बार-बार उसकी नजर जाती है और वो सोचता है इसमें पड़ी दूध भी तो मिलावटी होगी...और इस तरह चाय कब ठंडी हो जाती है पता ही नहीं चलता. नाश्ते में, खाने में और न जाने कब-कब उसे मिलावट की ये कहानी कुछ भी खाने से रोक देती है. अगर ऐसे ही चलता रहा तो इन्सान क्या खायेगा और क्या छोडेगा ये तय करना उसके लिए काफी मुश्किल हो जायेगा. इस दुविधा की घडी में टीवी वाले रोजाना उसे नए-नए मिलावटी उत्पाद दिखाकर और भी मुश्किल में डाल रहे हैं. अब भगवान ही भला करे आम आदमी का...जहाँ सब कुछ धीरे-धीरे मिलावटी होता जा रहा है.

Friday, 18 September 2009

इकोनामी क्लास और भेड़-बकरी बनी जनता...?

इलीट क्लास से आने वाले हमारे एक मंत्री जी ने जब से विमान के इकोनोमी क्लास को भेड़-बकरी क्लास की संज्ञा दी है तब से हर जगह लोगों ने हाय-तौबा मचा रखी है। लोगों ने ऐसी प्रतिक्रिया दी है जैसे उन्होंने कोई ऐतिहासिक गलती कर दिया है, और पहली बार उन्हें भेड़-बकरी समझा गया है. जबकि ऐसा नहीं है. रोजाना की जिंदगी में उन्हें हमेशा यही संज्ञा मिलती है और देश में इससे ज्यादा उनकी कोई औकात भी नहीं है. ऐसे में अगर इलीट क्लास से आने वाले हमारे मंत्री महोदय ने उन्हें भेड़-बकरी समझ ही लिया तो इसे उस वर्ग की मानसिकता के रूप में देखना चाहिए. मतलब हमारे देश का उच्च वर्ग अपने से नीचे वाले वर्ग को कैसे देखता है इसे उस रूप में देखा जाना चाहिए. ये भेदभाव केवल उसी स्तर पर नहीं है हमारे यहाँ न्यायपालिका द्वारा इन्सान को देखने का नजरिया भी अलग-अलग है. तभी तो कई लोगों को अपनी गाड़ी से कुचलने वाले एक एलिट क्लास के नवयुवक को इसलिए जमानत पर छोड़ दिया जाता है कि उसके दादा देश के बहुत बड़े अधिकारी रह चुके हैं और उनकी इक्षा है उसे देखने की...इस दौरान इस तथ्य को भी नजरंदाज कर दिया जाता है कि उसी नैजवान के पिता पर देश की रक्षा सौदे में दलाली का मुकदमा चल रहा है. तभी तो हत्या के आरोप में जेल में बंद एक प्रसिद्ध आईपीएस अधिकारी को इसलिए जमानत दे दी जाती है ताकि वो अपनी बेटी की शादी में शरीक हो सके...क्या न्याय की ऐसी उदारता देश के आम आदमी के लिए देखने को मिल सकती है?
दूसरी बात ये भी कि इकोनोमी क्लास में चलने वाले लोग अपने से निम्न आयवर्ग के लोगों को किस रूप में देखते है. आखिर कौन चलता है इकोनोमी क्लास में. २५ रूपये में महीने भर का रेल पास जुगाड़ होने की ख़ुशी में झुमने वाले इस देश की कितनी आबादी प्लेन के इकोनोमी क्लास में चलने के काबिल है. बसों और रेल में ठूस-ठूसकर यात्रा करने वाली हमारी जनता को मंत्री महोदय के मुंह से भेड़-बकरी शब्द सुनना इसलिए भी अच्छा नहीं लगा क्योंकि जनता को मालूम है कि अगर हमारे मंत्रीजी आज एलिट हैं तो वो उसी की बदौलत. आज हमारे देश की नेता बिरादरी बिजनेस क्लास से नीचे उतर कर इकोनोमी क्लास में चलने में दिक्कत महसूस करने की आदत डाल चुकी है तो उसकी जिम्मेदार यही जनता है...वरना अगर जनता ने अपने नेता को ये बता कर रखा होता कि आपकी तक़दीर उतनी ही है जितना आप अपनी जनता को खुशहाल बना सकते हो और अगर आप ऐसा नहीं कर सकते तो फिर आपके लिए व्यवस्था में कोई जगह नहीं है...अगर जनता अपने नेतृत्व को ये बताने में सक्षम होती तो फिर किसी की हिम्मत नहीं होती जनता को भेड़-बकरी समझने की...

Friday, 11 September 2009

...अपने-अपने भगवान!

चलो हम भी गढ़ लें
अपने भगवान और अपना अलग धर्म
हम भी ढूंढ़ लें...
खुद में कोई खूबी और गढ़ लें
अपनी अलग दुनिया!
लेकिन इसके लिए चाहिए
करोड़ों रूपये, ढेर सारा संगमरमर
और कई कोस धरती
और ऊपर से जनता का धन
खर्च करने का माद्दा भी...
चलो इसके लिए खड़ा करें
कोई सामाजिक आन्दोलन
और फिर उसका चोगा ओढ़ कर
हम भी कर सकेंगे
जनता की खून-पसीने की कमाई पर राज
और बना सकेंगे खुद को भगवान...
तो आओ मिलकर हम भी गढे
अपने-अपने धर्म, अपना-अपना भगवान!

Saturday, 29 August 2009

कलयुग जाने वाला है, सतयुग आने वाला है...

कल दिवार पर लगी एक पोस्टर देखी। उसपर यही लिखा हुआ था. प्रचार था किसी बाबा का. जो सतयुग आने का सपना दिखा रहे थे. जैसे सबकुछ बदलने वाला ही हो, बस. अब राम राज्य आने ही वाला हो. ऐसे न जाने कितने सपने बेचने वाले बाबा लोग रोजाना टीवी पर दिखते रहते हैं. जिन बाबा लोगों का बाज़ार बन चुका है उन्होंने अपना खुद का टीवी चैनल खोल लिया है और जिनका उतना बाज़ार नहीं बन पाया है वे किसी और के चैनल पर दिखकर अपना काम चला ले रहे हैं. रोजाना सुबह-सुबह टीवी के इन चैनलों पर बाबा लोग और झूमते-गाते आनंदित से दिखते उनके भक्त लोग आकर आसन जमा लेते हैं और फिर चलता है धर्म का एक लम्बा सिलसिला. अब इस धर्मवाद के साथ बाज़ार भी जुड़ चुका है और इसी का नतीजा है दीवारों, बसों और जगह-जगह लगे बाबा लोगों के पोस्टर.
कल इसी से जुडी हुई एक और घटना आँखें खोलने वाली थी. मेरे एक परिचित के यहाँ बच्चा हुआ था. किसी ने उन्हें एक पंडित जी का फोन नंबर दिया. फोन पर उन बाबा से बात हुई और पूजा का मामला फिट हो गया. तय हुआ कि बाबा पूजा का सारा सामान लायेंगे और पूजा संपन्न कराएँगे और जजमान केवल तैयार होकर आ जाये. बाबा आये, उनके साथ एक अस्सिस्टेंट भी थे. बाबा अपने साथ पूजा की पूरी सामग्री लाये थे. यहाँ तक कि चलता फिरता हवनकुंड भी. बाबा ने पूजा निपटाया..अपनी फीस ली और जजमान भी इस झंझट से मुक्त हुए. दोनों ने अपनी धार्मिक जिम्मेदारी निभाई और फिर चल पड़े अपने-अपने रस्ते.

Saturday, 15 August 2009

लो मन गया फिर आज़ादी का जश्न!

लो मना लिया मैंने भी अपनी आज़ादी का जश्न
हाथों में तिरंगा थामे
झूमते-गाते और नारे लगाते
बच्चों, बूढों और नौजवानों को
टीवी चैनलों पर देखकर,
राष्ट्रभक्ति के गानों को सुनकर
कर लिया मैंने भी अपना मन हल्का
और निभा ली मैंने भी अपनी जिम्मेदारी
देश और देशभक्ति की!

इस आजाद देश के
हर आजाद नागरिक की तरह
मुझे भी छू गया
मेरे सामने परोसा गया
भाषणों का पुलिंदा,
जिसमे करीने से सजाये गए थे
न जाने कितने सपने
जो मेरा देश
पिछले ६२ सालों से देखता आ रहा है
और जिन सपनों के पूरा होने की बाट जोहते
खप गयी कई पीढियां...

आज भी मेरे गाँव की नई पौध
नहीं पहुच सकी है
तकनिकी क्रांति के उजाले तक।
मिटटी की तेल के दीये की
मद्धिम रौशनी में
न्यूटन, आइंस्टाइन और गैलिलियो को
पता नहीं कबसे पढ़ती आ रही है ये पौध...


आज भी हमारे गाँव के किसान
बदहाल हैं...
दिनभर धूप और बरसात में
मरने-खपने के बाद भी...
भर-पेट भोजन
और पूरा कपड़ा आज भी चुनौती है
उनके लिए...
और उन्ही की खेती का आंकडा बेच
न जाने कितने लोग
हो गए करोड़पति
सच में यही है "इंडिया शाइनिंग"...

टीवी पर दिखने वाले
चमकते-दमकते
भारत से अलग है मेरा भारत
रोटी-कपडा और मकान के लिए
मरता-खपता भारत...
मेरा भारत... मेरा महान भारत!

Tuesday, 4 August 2009

बोल तेरे पास प्लास्टिक के और कितने थैले हैं...?

खबर में तो पढ़ा था लेकिन प्रत्यक्ष में कल पहली मर्तबा दर्शन हुआ। मिठाई की दुकान पर जब मिठाई वाले ने हाथ में मिठाई का डब्बा पकडा दिया तो ख्याल आया की थैली लाना तो अपनी आदत में शुमार ही नहीं है और अब तो दिल्ली में सरकार ने प्लास्टिक की थैलियों पर प्रतिबन्ध भी लगा दिया है सो युहीं हाथ में टांगकर ले जाना होगा। लेकिन तभी देखा दुकानदार काउंटर के बगल से धीरे से हाथ बढाकर कुछ दे रहा था...मुट्ठी में दबाये हुए था...अचानक इस तरह का व्यव्हार देखकर थोडी घबराहट हुई फिर अपनेआप को संभलकर मैंने पूछा॥ क्या है...उसने धीरे से कहा- पालीथीन...दुकान के बाहर जाकर डब्बा इसमें रख लीजियेगा...मैंने देखा थैले पर उस दुकान की पूरी पहचान लिखी हुई थी फिर उसे छुपाकर देने का क्या फायदा. इतना ही जिस दुकान में प्लास्टिक का थैला इस तरह छुपाकर दिया जा रहा था उसी दुकान में कई ऐसे उत्पाद थे जो मोटे और ज्यादा मजबूत थैलों में खुलेआम रखे और बेचे जा रहे थे...तुर्रा यह कि सरकार ने केवल प्लास्टिक के थैलों पर ही प्रतिबन्ध लगाया है.

चारो ओर ताकते जैसे-तैसे सहमे हुए घर पहुचे कि कहीं रस्ते में जांच करने वाले न मिल जाए और मुफ्त में फंस न जायें। खैर ऐसा कुछ नहीं हुआ और सड़क पर सैकडों लोग हाथों में प्लास्टिक की थैलियाँ टाँगे इधर से उधर जाते-आते दिखायी दे रहे थे। उन्हें देखकर थोडी हिम्मत बंधी...इस डर ने घर आकर भी पीछा नहीं छोड़ा...रात को बिस्तर पर पड़े कब सपनो में खो गए पता भी नहीं चला...सपने में कल सुबह की तस्वीर दिखने लगी..सुबह दफ्तर जाते वक्त प्लास्टिक के थैले में खाना पैक कर बीवी हाथ में थमाती है.. बोझिल कदम आगे बढ़ने को तैयार नहीं होते...घर और बाहर के बीच आकर पैर थम जाते हैं..अगर घर में वापस जाकर बताये कि बाहर प्लास्टिक की थैली लेकर जाने में डर लग रहा है तो फिर बीवी को हसने से रोकना संभव न होगा और अगर इसे लेकर बाहर गए तो पता नहीं क्या होगा. कहीं प्लास्टिक के थैले लेकर चलने के अपराध में पुलिस पकड़ कर न ले जाये और वह आतंकवादियों और अपराधियों की तरह थर्ड डिग्री का इस्तेमाल न करने लगे..कहीं प्लास्टिक के थैलों के जखीरे की तलाश में घर पर छापा पड़ गया तो २-४ पौलिथिन तो उनके हाथ लग ही जायेगा..फिर कौन बचायेगा इस बला से...पुलिसिया मार खाकर बताना ही पड़ेगा कि घर में कितने और थैले छुपा कर रखे हैं...

Thursday, 23 July 2009

कौन सोचेगा देश के आम आदमी के बारे में?

आज दोपहर में टीवी न्यूज़ चैनलों पर हमारे सांसद छाये हुए थे। टीवी पर चल रहे एक कार्यक्रम सच का सामना को लेकर वे अपना विरोध जता रहे थे। उनके अनुसार इस कार्यक्रम में निहायत ही निजी सवाल पूछे जाते हैं और यह देश के सांस्कृतिक माहौल के लिए ठीक नहीं है। इतना ही नहीं इस मामले पर संसद के सभी सदस्य एकमत थे॥भले ही वे किसी भी दल के क्यूँ न हों॥जाहीर है हमारे सांसदों को देश की बड़ी फ़िक्र है...इसके कुछ ही दिन पहले देश में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमते बढ़ाई गयी. ये मसला कोई आम मसला नहीं था. इसका सीधा असर देश के हर परिवार पर होने वाला था. एक बार नहीं बल्कि रोजाना दिन भर में कई-कई बार लोगों से ये बढ़ी कीमते वसूली जानी थी. जो गाड़ियों पर चलता है उसे डीजल-पेट्रोल की बढ़ी कीमते चुकानी थी॥जो नहीं चलता उसे साग-सब्जी की ढुलाई के नाम पे ये बढ़ी हुई कीमत चुकानी थी. और भी न जाने कहाँ-कहाँ इस कीमत बढोतरी का असर हुआ ये तय कर पाना मुश्किल है...लेकिन उस मसले पर देश में विरोध का स्वर कहीं सुनाई नहीं दिया.
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इस बढोतरी ने लोगों की थालियों को दाल से महरूम कर दिया॥चावल के साथ खाया जाने वाला दाल ९० रूपये किलो बिकने लगा। इसी बीच देश का बजट आया और पता नहीं किन-किन विभागों के नाम पर करोडों-करोड़ बाँट दिया गया..लेकिन जो लोग सब्जियां लाने बाजार जाते थे उनके लिए बजट संभालना मुश्किल हो गया. लौकी, टमाटर ३० रूपये किलो बिकने लगे...कोई भी सब्जी खरीदो १० रूपये में पाव भर से ज्यादा मिलना बंद हो गया. इसके बाद भी कोई विरोध के लिए सड़क पर नहीं उतरा...अभी चंद महिनो पहले हुए चुनाव के दौरान जनता का हितैषी बनने को बेचैन दिखने वाले हजारो चेहरे इस विपरीत समय में जनता की नज़र से ओझल थे. जनता उन्हें ढूंढ भी नहीं रही थी..अपने देश की जनता हर ५ साल पर अपने हितैषियों को देखने की आदि हो चुकी है. पेट्रोल-डीजल के दाम बढे तो देश की रीढ़ माने जाने वाले किसानों की भी शामत आ गयी. इन्द्र भगवान के भरोसे हर साल अपनी नैया पार लगाने वाले किसानों से इस बार इन्द्र भगवान ने बेवफाई क्या की...उनके तो जैसे होश फाख्ता हो गए...लेकिन राजनेता यहाँ भी चुप्प नहीं बैठे. राज्यों की सत्ता पर काबिज दलों के नेता राज्य की जनता की सहानुभूति पाने के लिए केंद्र सरकार पर बरस पड़े और केंद्र ने पल्ला झारते हुए गेंद फिर राज्यों के ऊपर फेंक दिया. बीच में असहाय जनता क्या करती...टक-टक देखते रहना ही उसके बूते की बात थी सो उसने अपना कर्तव्य पूरी शिद्दत से निभाया।
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देश के हित में सोचने के लिए बने संसद के सदस्य रोजाना बहसों में उलझे रहे. देश-विदेश से और इन्टरनेट से जुटाए गए आंकडे रोजाना संसद में देश के आम लोगों की बदहाली का रोना रोते रहे...देशी-विदेशी मीडिया बदहाल भारत के गाँव और पानी और बिजली के लिए जूझते महानगरों की कहानी को रंगीन परदे पर दिखाती रही. संसद में कभी किसी नेता के किसी और के बारे में दिए गए विवादस्पद बयान के बारे में हंगामा हुआ तो कभी टीवी पर आ रहे कार्यक्रम के बारे में. तो कभी नेता अपनी सुरक्षा घटाने पर बवाल काटते रहे...आम जनता को भी फुर्सत कहा थी...जो शहरों में था वो अपनी नौकरी बचाने और रोज सडकों पर गुत्थम-गुत्था कर कार्यालय पहुचने की लड़ाई में लगा रहा और जो गाँव में था वो किसी भी तरह अपने खेतो में अनाज बोने के लिए धुप-बरसात में मरता-खपत रहा...

Saturday, 11 July 2009

कल्लन काका, उनकी बकरी और गाँव में उनकी मूर्तियाँ!

गाँव में चौपाल सजी थी। बीच में सरपंच कल्लन काका पलथी मारे बैठे थे। अगल-बगल में मंगरू चाचा, खेदन, मंगल, श्याम समेत गाँव के सभी बड़े-बुजुर्ग और महिलाएं और बच्चे अपनी-अपनी जगह पकड़े हुए थे। कल्लन काका ने जब से सुना था कि राज्य की मुख्यमंत्री साहिबा पूरे प्रदेश भर में धडाधड अपनी और अपने प्यारे हाथी की मूर्तियाँ लगवा रही हैं तब से कल्लन काका को चैन से नींद भी नहीं आ रही थी। कल ही सपने में कल्लन काका ने देखा था ख़ुद को मंच पर बैठे हुए। फ़िर उनके नाम का अन्नाउंस होता है और कल्लन काका धीरे-धीरे मूर्ती की ओर बढ़ते हैं और फ़िर अपने ही हाथों अपनी मूर्ती का उदघाटन करते हैं। अपनी ही मूर्ती को सामने लगा देखकर और पूरे गाँव को उसे निहारते हुए देखकर कल्लन काका की आँखे भर आई. पता नहीं कब खो गए काका सपनो में और जब नींद खुली तो काकी उन्हें झकझोड़ कर उठा रही थीं। खेत में मवेशी घुस गए थे और काकी चाहती थी कि काका जाकर मवेशी भगाएं. काका क्या कहते-- कहाँ गाँव में अपनी मूर्तियाँ लगवाने की सोच रहे हैं और इधर काकी को खेतो की चिंता हुई जा रही है. काका को गुस्सा तो बहुत आया लेकिन काका ने भी सोच लिया था कि अब तो पूरे गाँव में उनकी और उनकी प्यारी बकरी की मूर्ती लगकर ही रहेगी। लेकिन इसके लिए पैसा कहाँ से आयेगा? काका इससे तनिक भी बिचलित नहीं हुए और काका ने तय कर लिया गाँव के विकास के नाम पर जो फंड आता है मूर्तियाँ उसी से लगेगी। रही बात गाँव वालों को मनाने की तो उसी के लिए काका ने आज की मीटिंग बुलाई थी।
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कल्लन काका ने पूरी गंभीरता के साथ गांववालों को संबोधित करना शुरू किया--- देखिये भाइयो और बहनों। आप लोग जानते हैं दुनिया कहाँ से कहाँ बढ़ गयी, लोग कितने माडर्न हो गए लेकिन हम वहीँ के वहीँ हैं। लेकिन अब ये ज्यादा दिनों तक बरक़रार नहीं रहेगा और अब जल्द ही हमें गाँव की तस्वीर बदलनी होगी. इसके लिए हमने रोड मैप तैयार किया है॥हाँ॥रोडमैप! भाइयो हमने फैसला किया है कि गाँव को टूरिज्म हब बनायेंगे. गाँव भर में मूर्तियाँ लगाई जाएँगी और उसे देखने के लिए लोग यहाँ आएंगे. बाहर वाले यहाँ आयेंगे और यहाँ आकर तरह-तरह की चीजों की खरीददारी करेंगे और इससे हमारी आमदनी बढेगी. अगर विदेशी लोग घुमने आने लगें तो रूपये की बात छोडो डॉलर में पैसे आने लगेंगे और हमारा गाँव मालामाल हो जायेगा।
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काका के सामने बैठा बबलू खुद को नहीं रोक पाया और झट से सवाल कर दी-- लेकिन काका पहले से ही हमारे गाँव में इतनी मूर्तियाँ हैं अब किनकी मूर्तियाँ लगवाई जाएँगी? काका ने पूरे धैर्य का परिचय देते हुए उसका सवाल पूरा होने तक इंतजार किया और फिर बोल उठे- देख बेटा भगवान लोगों की मूर्तियाँ तो हर जगह हैं और अब राजनेताओं ने भी शहरों में अपनी मूर्तियाँ लगवानी शुरू कर दी है। लेकिन अभी गाँव के सरपंचो और मुखियाओं ने ये काम शुरू नहीं किया है। इससे पहले कि उनके दिमाग में ये आईडिया आये हमें इसकी शुरुआत अपने गाँव में कर देनी चाहिए और सबसे आगे रहते हुए अपने गाँव को टूरिज्म हब बना लेना चाहिए. गाँव के बाकी लोगों को काका की ये अंग्रेजी बात समझ में आ नहीं रही थी इसलिए सब केवल सर हिलाकर हाँ में हाँ मिलाये जा रहे थे. काका ने कहा- इसलिए मैंने फैसला किया है कि गाँव की भलाई के लिए मैं अपने ऊपर ये जिम्मेदारी लेता हूँ. मैं तैयार होता हूँ अपनी मूर्तियाँ लगवाने के लिए और तुम तैयार हो जाओ मालामाल होने के लिए. कल्लन काका का विरोधी जगतार बोलने को खडा हुआ लेकिन किसी ने उसे बोलने ही नहीं दिया. सब पर कल्लन काका के आईडिया का जादू चल चूका था।
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अगले दिन से काम शुरू हो गया। कल्लन काका ने सुबह नाई को बुलवा भेजा। नाई भी गाँव के विकास में योगदान देने से पीछे नहीं रहना चाहता था. दोपहर तक कल्लन काका को एकदम चमकाकर विजयी भाव में घर की ओर लौटा. कल्लन काका ने उसे भी समझा दिया था कि जब गाँव में विदेशी आने लगेंगे तो उसकी कमाई भी डॉलर में होने लगेगी। वैसे सपना केवल नाई ही नहीं देख रहा था कल की मीटिंग से लौटने के बाद खेदन भी अपने किराने की दूकान के विस्तार के बारे में अपनी बीवी राधा से गहन विचार-विमर्श में जुटा था. वो सोच रहा था जब विदेशी गाँव में आने लगेंगे तब वह चावल-आटा बेचना छोड़कर पिज्जा वगैरह की दुकान खोल लेगा. बबलू भी अब काका से खूब प्रभावित लग रहा था और सोच रहा था कि जब उनका गाँव विदेशियों के घुमने लायक बन जायेगा तब वो पेप्सी की दुकान खोल लेगा और साथ में सिम कार्ड और मोबाइल रिचार्ज का काम भी शुरू कर देगा. इन सब चीजों के बिना भला यहाँ आने वाले सैलानी कैसे रह पाएंगे. बबलू ने तो दुकान का नाम भी सोच रखा था अपनी गर्लफ्रेंड के नाम पर-- "चंपा टेलिकॉम एंड ठंडा सेंटर"... साहूकार चम्पकलाल की बांछे भी खिली हुई थी. इन सब लोगों को अपना व्यापार शुरू करना होगा तो पैसा कहाँ से आयेगा. तब अंगूठा लगवाने के लिए चम्पक साहूकार के दर पर हीं सबको आना होगा न. तब बढा देंगे ब्याज का दर. खुद सब कमाएंगे डॉलर में और मुझे कुछ भी नहीं मिलेगा ऐसा कैसे हो सकता है भाई॥
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खुद नहा-धोकर कल्लन काका ने अपनी बकरी को भी नहला दिया. आखिर काका के साथ गाँव भर में उसकी भी तो मूर्ती लगनी थी. नहा-धोकर जब काका गाँव में निकले तब उन्हें आभास हुआ कि टूरिज्म हब वाला उनका आईडिया वाकई हिट हो चूका है. काका जिधर से निकलते उधर ही लोग सलाम ठोकना शुरू कर देते. यहाँ तक कि उनके दुश्मन भी आज काका को इग्नोर नहीं कर पा रहे थे. अचानक काका के मन में एक प्रश्न उभर आया कि जब मूर्तियाँ लगने के बाद सैलानी नहीं आयेंगे तब ये गांववाले उन्हें जीने देंगे क्या. लेकिन काका इस सवाल से भी बिचलित नहीं हुए. उन्होंने तय कर लिया कि जब वक्त आयेगा तब देखा जायेगा. कह देंगे कि भाई आईडिया है फ़ैल हो गया, अब आईडिया के अन्दर घुसे थोड़े ही थे. जब बड़े नेता लोग अपनी और अपने हाथियों की मूर्तियाँ लगवाने के लिए करोडों खर्च कर सकते हैं तो काका अपनी और अपनी बकरी की मूर्तियाँ लगवाने के लिए लाखों रुपया भी खर्च नहीं कर सकते क्या...जय श्री राम की... देखा जायेगा..जो होगा. पहले मूर्तियाँ लगवाने का जुगाड़ तो किया जाये...

Wednesday, 8 July 2009

प्यासा देश और पानी में डूबते उसके लोगों की कहानी..!

हमारा देश कितना बड़ा है और आबादी तो इतनी बड़ी कि मत पूछिए। एक अरब से ज्यादा तो हम सरकारी आंकडे के अनुसार ही हैं। अनाज भी हम अपने खाने के लायक उगा ही लेते हैं. रह गयी बात पानी की तो वो भी हमारे देश में कम नहीं है. अब देखिये न मुंबई नगरिया को... पूरा शहर पानी में तैर रहा है. मानसून ने दस्तक दे दी है और पूरा शहर पैंट को निचे से मोड़े और हाथ में छतरी थामे अपनी रफ्तार में दौरे जा रहा है. लेकिन इस कहानी का दूसरा पहलू भी है. मुंबई के पास डूबने के लिए पानी जरूर है लेकिन पीने के पानी की जुगाड़ करने में मुंबई वालों को नानी याद आ रही है. गली-गली और घर-घर में पानी भरी पड़ी है लेकिन पीने के लिए सरकार जो पानी देती थी उसमें ३० फीसदी की कटौती कर दी गई है। ऐसा इसलिए हुआ है क्यूंकि मुंबई को जिस झील से पानी दिया जाता था उसका जलस्तर घट चुका है. अधिकारियों का कहना है कि उनके पास सिर्फ़ अगले दो महीनों के लिए पानी बचा हुआ है और अगर मानसून अपने पूरे ज़ोर से समय पर नहीं आता तो मुंबई के लोगों के लिए पानी ही नहीं होगा. क़रीब दो करोड़ लोगों को अपनी प्यास में से ३० फीसदी कटौती करने को कहा गया है बल्कि कहा नहीं गया है कटौती कर दिया गया है. और जो सरकार करती है वही सच है क्यूंकि भारतीय शहरों के लोगों ने पहले इतना ज्यादा पानी बहा दिया है कि अब वे बूँद-बूँद के लिए सरकार पर निर्भर हैं. सरकार कहीं से भी लाये लेकिन अगर पानी लाकर पिलाती नहीं है तो फिर लोगों के पास कोई और उपाय नहीं है. मिनरल वाटर के बोतल खरीदकर पीना लोगों के लिए एक विकल्प जरूर है लेकिन उसकी भी अपनी कीमत है और सब उस पानी की कीमत नहीं अदा कर सकते.

इससे कुछ अलग कहानी है देश की राजधानी दिल्ली की. देश की राजधानी होने के नाते देशभर से यहाँ लोग आते रहे और अब इसकी आबादी भी अच्छी-खासी हो चुकी है. रहने के लिए घर का तो जुगाड़ जैसे-तैसे हो जाता है खाने का जुगाड़ भी पैसे के बल पर हो ही जाता है लेकिन पानी का क्या हो. जबतक जमीन के नीचे पानी था लोगों ने छककर इसका मजा लिया. गर्मी के मौसम में गला तर करने के साथ-साथ लोगों ने जमकर स्नान भी किया. बड़ी-बड़ी इमारतों के आगे बने फव्वारों से खूब पानी भी बहाया गया. लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. अब इस शहर के अधिकांश इलाकों का पानी सूख चुका है या फिर है भी तो नमकीन पानी है जो पीने की बात तो छोडिये नहाने और कपडे धोने के काम भी नहीं आ सकता. शहर में कई इलाकों में पानी की आपूर्ति पाईप के जरिये होती है. जिन इलाकों में ऐसा नहीं होता वहां सप्ताह में १ या २ दिन पानी के टैंकर जाते हैं. ये दिन इन कालोनियों के लोगों के लिए किसी युद्ध के दिन से कम नहीं होता. टैंकर के आते ही डब्बे लेकर लोग घरों से ऐसे दौर लगा लेते हैं जैसे पहले किसी दुश्मन के आने की खबर सुनकर कबीले वाले लगाते थे. जिसने जितना ज्यादा पानी झटका उसका सीना उतना ज्यादा चौडा. यहाँ भी जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत काम करती है. अगर आप घर-परिवार से मजबूत हैं तो फिर आपको ज्यादा पानी लेने से कोई नहीं रोक सकता और अगर रोक ले तो फिर उसका सर फूटना पक्का.

इसी देश में बिहार जैसे राज्य भी हैं। जहाँ की अधिकांश आबादी ग्रामीण है. यहाँ पानी की कोई कमी नहीं है. हर साल राज्य के अधिकांश जिले बरसात के मौसम में बाढ़ में डूब जाते हैं. पडोसी देश नेपाल से आने वाली नदिया पानी का समंदर अपने साथ लाती है और बिहार की किस्मत पर हाथ साफ़ कर जाती है. लेकिन बिहार की इस कहानी का एक दूसरा पहलू भी है. कई इलाकों में लोग बड़ी मुश्किल से पीने का पानी जुगाड़ कर पाते हैं. सिचाई के लिए पानी का जुगाड़ करना भी यहाँ के किसानों के लिए आसान काम नहीं है. राज्य के आधे जिले अपने यहाँ आने वाले पानी को रोकने के लिए लड़ते हैं तो आधे जिलों की प्यास बुझाने का कोई जरिया नहीं है और सब कुछ इन्द्र भगवान के भरोसे चलता है. अगर उन्होंने आँखे फेर ली तो फिर इन किसानों का कोई माई-बाप नहीं होता.

पानी की बहुलता के बावजूद देश के अधिकांश शहरों में पीने के पानी की हालत ऐसी ही है। लेकिन सब कुछ भगवान भरोसे ही चल रहा है. इतने तकनिकी विकास के बाद भी हमने इस बुनियादी समस्या के हल के लिए कुछ ठोस नहीं किया है. अगर हमने अपने देश की नदियों को ही आपस में जोड़ लिया होता तो देश के किसी भी इलाके में हमें पानी की कमी का सामना नहीं करना पड़ता और जिन इलाकों में पानी ज्यादा होता वहां से पानी निकाल पाने में भी हम सफल होते. तभी तो सब कुछ होते हुए भी पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्य के किसान मानसूनी बारिश का इंतज़ार कर रहे है. हम अपने लिए जब कोई नीति ही नहीं बना सकते तो फिर हमारी प्यास बुझाने विश्व बैंक और अईएमेफ़ तो नहीं आयेंगे. प्रकृति की ओर से मिली इस अनमोल धरोहर को अगर हम सहेज कर इस्तेमाल नहीं कर सकते तो फिर हमारी प्यास ऐसे ही बनी रहेगी और हम ऐसे ही आसमान में पानी की बूंदों के लिए टकटकी लगाये दिखाई देंगे.