Saturday, 5 November 2011

लाचार है तो ये सरकार क्यों है?


टीवी पर समाचार चल रहा था। स्क्रीन पर लिखित में खबरें चल रही थी-
{ 12 माह में 11वी बार पेट्रोल कीमतों में इजाफा़. महंगाई पर होगा इसका सीधा असर.
वित्त मंत्री ने कहा- कीमतें नियंत्रणमुक्त और इसमें कुछ भी कर पाने में सरकार है लाचार। }

अचानक पीछे से आई पत्नी की टिप्पणी से तंद्रा टूटी-
"लाचार है तो ये सरकार क्यों हैं?
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इस टिप्पणी ने सोचने को मजबूर कर दिया कि हम किस लोकतंत्र में रह रहे हैं। जिस राजनीतिक बिरादरी को चुनकर इसलिए दिल्ली के सत्ता प्रतिष्ठानों पर देश की जनता ने काबिज कराया है कि वे उनकी समस्याएं कम करेंगे, उनकी बेहतरी के लिए योजनाएं बनाएंगे और इसके एवज में जनता द्वारा दिये जा रहे कर में से बड़ी राशि इस जमात पर खर्च किया जाता है तो फिर उसी जनता का काम करने में ये जमात खुद को लाचार क्यों महसूस कर रहा है। पिछले तीन-चार सालों में महंगाई लगातार बढ़ रही है, सरकार कहती है ये प्रगति की निशानी है। वैसे भी अगर कागजी आंकड़ों को देखे तो हमारे राजनीतिक नेतृत्व, योजनाकारों और प्रशासनिक तंत्र ने आजादी के इन 64 सालों में देश की प्रगति के लिए बहुत कुछ किया है। लेकिन जमीनी हकीकत इससे कुछ अलग नज़र आती है।

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आज सफलता के तमाम आंकड़ों के बावजूद हम एक ऐसे देश में रह रहे हैं जहां के 26 करोड़ लोगों(लगभग अमरीका की आबादी के बराबर) को एक समय भूखे सोना पड़ता है, जहां के 42 फीसदी बच्चे गंभीर कुपोषण के शिकार हैं, जहां की आबादी में से 79 फीसदी लोग 20 रुपये प्रतिदिन से भी कम की आय पर गुजर-बसर करने को मजबूर हैं। खेती बर्बाद हो रही है, किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं। रख-रखाव भंडारण की पर्याप्त सुविधा होने से हरेक साल 50,000 करोड़ से ज्यादा का खाद्यान्न बर्बाद हो रहा है। दूसरी तरफ आलम ये है कि देश में कोई भी परियोजना भ्रष्टाचार की भेंट चढे बिना अगर पूरी हो जाये तो गनिमत ही है। बड़े-बड़े पदों पर जिन लोगों को बैठाया गया वे हजारो-लाखों करोड़ के घोटालों के साथ जेल जा रहे हैं ये अलग बात है कि जेल में रहकर भी वे महामहिम ही होते हैं। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जिस संसद को सर्वोच्च माना जाता है उसी संसद में 162 सांसद आपराधिक मामलों से सुसज्जित हैं इसे लेकर देश की सर्वोच्च न्यायपालिका चिंता भी जता चुकी है। फिर भी हमे अपने लोकतंत्र पर गर्व है। 
64 सालों से तिरंगा ढोते भारत की इस बदरंग होती तस्वीर को देखकर फैज की ये पंक्ति याद आती है-
वो 
इंतज़ार था जिसका, ये वो सहर  तो नहीं।"
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देश को भोजन देने वाले खेती की हालत ऐसी है कि खेती की परंपरागत व्यवस्थाएं खत्म होने के कगार पर हैं, और आधुनिक तकनीक की पहुंच इतनी महंगी है कि भारत का किसान उसके साथ चलकर अपना खर्चा भी नहीं निकाल सकता। ग्रामीण इलाकों से लोगों का पलायन रूकने का नाम नहीं ले रहा। सिंचाई के परंपरागत साधन सूख रहे हैं, पशुपालन खत्म होने के कगार पर है। वैसे परंपरागत व्यवस्था त्यागने की कीमत हमारे अन्नदाता किसान लगातार आत्महत्याओं के रूप में चुका रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक 1997 से लेकर पिछले साल के अंत तक के 13 सालों में दो लाख सोलह हजार पांच सौ किसानों ने आत्महत्या की। इस दौरान शहरी भारत में तरक्की के प्रतीक माने जाने वाला सेंसेक्स सफलता की नई ऊंचाईयां भरता रहा। ये अलग बात है कि इस सेंसेक्स की कुंलाचों का मतलब और उसका अर्थ देश के अधिकांश लोगों के लिए आज भी एक रहस्य ही हैं।
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फिर भी तरक्की के तमाम आंकड़ों को गिनाती ये सरकारें और योजनाकार हर बहस-मुबाहिसें में कहते हैं कि हम आम आदमी के लिए चिंतित हैं औऱ उन्हीं के लिए काम कर रहे हैं। शायद इसी मौके के लिए शायर दुष्यंत कुमार ने लिखा था-
भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ
,आजकल दिल्ली में है जेरे बहस ये मुद्दा।"
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अगर हम ये सोचे कि समस्याएं केवल ग्रामीण भारत में ही हैं तो ये सही नहीं होगा। शहरों में भी जीवन कम मुश्किल नहीं होता जा रहा है।  आबादी बढ़ रही है, शहर फैल रहे हैं। लोग गांवों से काम के लिए शहर की ओर भागते रहे हैं। पानी खत्म हो रहा है, जगह कम पड़ती जा रही है। नौकरियां खत्म हो रही हैं। वगैरह.वगैरह।
समस्या केवल दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की ही नहीं है सबसे पुराने और सबसे मजबूत लोकतंत्र की भी हालत कुछ अलग नहीं है। आर्थिक समृद्धि और पूंजीवादी कॉरपोरेट कल्चर का प्रतीक माने जाने वाले न्यूयॉर्क के वॉल स्ट्रीट से शुरू हुआ पूंजीवाद विरोधी प्रतिरोध आज ब्रिटेन और यूरोप के देशों समेत 82 देशों के 951 शहरों तक फैल चुका है। सत्ता के खिलाफ उपजे असंतोष में इस बीच अरब के कई देशों की सरकारें उखड़ चुकी हैं। इन सबका संदेश एक ही है कि अगर सरकारें लोगों की खुशहाली नहीं ला सकती, लोगों की समस्याएं दूर नहीं कर सकती, उनकी बेहतरी के लिए योजनाएं नहीं बना सकती और उसे जमीन पर लागू नहीं कर सकती तो फिर उनके होने का औचित्य क्या है? जिस आम आदमी के नाम पर आज तक लोकतांत्रिक देशों के सत्तानशीन राज करते रहे हैं उनकी जनता के मन में आज एक ही सवाल कौंध रहा है कि अगर वे अपने लोगों के लिए काम नहीं कर सकते तो फिर उन्हें जनता के पैसे पर क्यों होना चाहिए?
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आर्थिक मंदी के नाम पर अमेरिका समेत तमाम देशों में कई तरह की खर्च कटौतियों की बातें सरकारों की ओर से की जा रही है लेकिन कोई इन हुक्मरानों से ये पूछे कि कटौती केवल आम जनता की नौकरियों, उनकी जरूरी सुविधाओं, उनके कल्याण के कामों पर हो रहे खर्चों में ही क्यों होती हैं? राजनेताओं को दिये गये आलीशान बंगलों, गाड़ियों के काफिलों, जहाजी यात्राओं, उनको मिल रही भारी-भरकम सुविधाओं आदि में क्यों नहीं कटौती की जाती? आखिर वे देश के लिए बनाये गये हैं और अगर कटौती होनी चाहिए तो पहले ऊपर से होनी चाहिए।
कभी विश्वविजय का सपना देखने वाले सिकंदर के देश यूनान यानि ग्रीस के लोग आज इसी बात के लिए लड़ रहे हैं। उन्हें इसी बात की शिकायत है कि कोई एजेंला मार्केल और सारकोजी क्यों इस बात का फैसला करें कि उसके देश में कितनी नौकरियां कम होनी चाहिए, पेंशन में कितनी कटौती होनी चाहिए और नौकरीपेश लोगों के वेतन में कितने की कमी की जानी चाहिए। इसके बदले वहां की जनता ये  चाहती है कि इस सारे घाटे औऱ देश के आर्थिक दिवालियेपन के जिम्मेदार लोगों को सजा दी जा रही। अपनी इन मांगों को लोकतांत्रिक तरीके से रखने वाले लोगों के तरीके को ये तथाकथित सरकारें अंग्रेजी में -uprising- कहती हैं। पूंजीवाद के सामने खुद को असुरक्षित महसूस कर रही हर देश की जनता आज अगर अपनी आवाज उठा रही है तो सरकारें वाकई अब तक के इतिहास के सबसे असुविधाजनक स्थिति में है।
शायद इसी हालात के लिए जर्मन कवि बर्तोल्त ब्रेख्त ने लिखा था-
"
अखबार का हॉकर सड़क पर चिल्ला रहा था

कि सरकार ने जनता का विश्वास खो दिया है

अब कड़े परिश्रम, अनुशासन आदि दूरदर्शिता के अलावा

और कोई रास्ता नहीं बचा है

एक रास्ता और है कि

सरकार इस जनता को भंग कर दे

और अपने लिए नई जनता चुन ले।"

Saturday, 15 October 2011

आम आदमी की गौरव गाथा! (व्यंग्य)

((आपने सिंदबाद और गुलीवर की रोमांचकारी जीवनशैली और साहसिक यात्राओं की कहानियां अनेको बार पढ़ा होगा लेकिन आज आपके सामने प्रस्तुत है हमारे देश में हमेशा चर्चा के केंद्र में रहने वाले आम आदमी की एडवेंचरस जिंदगी की कहानी।))

मैं आम आदमी हूं। चेहरा 120 करोड़ में से..अरे नहीं..नहीं बीपीएल के 40 करोड़ चेहरों में से कोई भी एक चेहरा समझ लीजिए। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और कभी सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत भूमि में जन्मा आम आदमी। जिसकी गौरव गाथा आपको किसी भी बहस मुबाहिसे, राजनीतिक रैली, भाषणबाजी या टीवी पर हो रही चर्चाओं में अक्सर गुंजती हुई सुनाई पड़ सकती है। कई बार तो मुझे लेकर एसी सेमिनार हॉलों में चर्चा गर्मा भी जाती है। वैसे अगर लाइमलाइट(रील लाइफ) से निकलकर देखें तो मेरी रीयल लाइफ की कहानी भी काफी एडवेंचरस मिलेगी। जो जन्म से शुरू होकर अंतिम संस्कार या कई बार उसके बाद तक खींच जाती है, अगर उसपर राजनीति शुरू हो जाये या फिर टीवी चैनलों की पीपली लाइव टाइप कुछ मेहरबानी हो जाये।

हां, तो हम बात कर रहे थे अपने जन्म की।
तो हमारे जन्म की संभावनाएं दशकों से देश में चल रही तमाम परिवार नियोजनों की योजनाओं और तमाम आकलनों से कहीं ऊपर होती हैं। प्रसव की कहानी भी कम रोमांचकारी नहीं होती। गांव-घर की दाईयों की मदद से धरती पर अगर पांव रख दिया तो ठीक वरना सरकारी अस्पतालों की ओर गर्भ में रहते ही मेरी दौड़ शुरू हो जाती है। अस्पताल में दाखिल होने का नंबर मिला तो ठीक वरना अस्पताल के बाहर सड़क पर ही मैं अपना अवतरण पूरा कर लेता हूं। वैसे कई बार अस्पताल तक पहुंचने की नौबत भी नहीं आती और प्रसव प्रक्रिया को लाखों-करोड़ों की लागत वाली सड़कों में देवदूतों की तरह उभर आये गढ्ढे ही कई बार पूरा कर देते हैं।

चलिए ये तो रही मेरे पैदा होने के एडवेंचर की कहानी, अब थोड़ी शिक्षा-दीक्षा से जुड़ी हुई बातें भी कर ली जाये जिसका मुझे इस देश में अनिवार्य और मुफ्त प्राप्ति का अधिकार प्रदान किया गया है। हां, तो अगर मैं स्कूल जाने में सफल रहा तो वहां दोपहर के पहले का समय खिचड़ी के इंतजार में और उसके बाद का समय छुट्टी के वक्त में कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता। और अगर स्कूल नहीं जा सका तो किसी साहब के घर में घरेलू कामकाज या फिर किसी साइकिल पैंचर की दुकान पर या रेस्टूरेंट वगैरह में काम पाकर अल्पआयु में ही रोजगार हासिल करने वाले देश के कुछेक खुशकिस्मत बच्चों में शामिल होने का गौरव प्राप्त करता हूं। तब हर साल बाल मजदूर दिवस के अवसर पर अखबारों में छपे हमारे फोटो व उसके ईर्द-गीर्द छपे बड़े-बड़े नेताओं की तस्वीरों व हमारे कल्याण के नारों से हमें फिर साल भर जी-तोड़ मेहनत करने की ऊर्जा मिल जाती है।

खैर जवानी की दहलीज पर कदम रखते वक्त हम भी मन में कई सपने सजाते हैं जैसे सिने स्टार्स की तरह लकदक जिंदगी हो, धूंए के छल्ले उड़ाते हीरोज की तरह स्टाइल हो या फिर बाहों में हीरोइनों को देखने की तमन्ना आदि।

हालांकि, जवानी के दिनों में हमे रोजगार के लिए देश ने काफी अच्छी लोकतांत्रिक व्यवस्था दे रखी है। अगर पढ़ लिया तो घर की खेती-बाड़ी या मां-बाप की बची-खुची पूंजी लेकर कोई नौकरी दिलाने वाले बहुत सारे समाजसेवी मिल जाते हैं और अगर पढ़ लिख नहीं सके तो सरकार साल में सौ दिन के रोजगार की गारंटी तो देती ही है। इसी बहाने सड़क, पूल, तालाब आदि बनवाने के काम में जुटकर थोड़ी-बहुत देश की सेवा भी हो जाएगी। हां ये अलग बात है कि 100 दिन का काम पाने के लिए भी कई लोगों को चाय-पानी का प्रबंध तो करना ही पड़ता है लेकिन कहते हैं न कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है। सो हम तो भई संतुष्ट हैं। वैसे भी हमारी संस्कृति का संदेश भी यही है- संतोषः परम् सुखम्।

इधर एक संतोष की खबर और आई है हमारी जमात के लिए। कल सुना था रेडियों में कि सरकार ने फिर कहा है कि आम आदमी की तरक्की के लिए हम प्रतिबद्ध हैं। सुना है भूख हड़ताल वाले बुजुर्ग समाज सेवी भी हमे ही भ्रष्टाचार के चंगुल से निकालने के लिए अनशन पर बैठते हैं और जल्द ही इसपर कोई कानून भी बनने वाला है।

वैसे साल में 365 दिन होते हैं। 100 दिन की समाजसेवा से मुक्ति पाकर शेष दिनों में हमारे करने लायक बहुत कुछ होता है इस देश में। चुनावों के मौसम में राजनीतिक रैलियों में जनसमर्थन बनकर मैं ही अपार भीड़ के रूप में दिखता हूं। मैं न होऊं तो भला नेताजी लोगों का भाषण सुनेगा कौन... और कौन उनकी रैलियों को ऐतिहासिक व सफल बनाएगा। कौन उनके बैनर पोस्टर और झंडे ढोएगा। मैं ही सभी राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों में आश्वासनों और वादों का लक्ष्य होता हूं और मुझे ही लुभाने के लिए लोकलुभावन नारे भी दिये जाते हैं। अपने पसंदीदा उम्मीदवार को चुनाव जीताने के लिए हम ही लंबी लाइनों में लगते हैं और फिर जीतकर जाने के बाद जब वे पांच साल तक वापस लौट कर नहीं आते तो हम कोई शिकायत भी नहीं करते। सही मायनों में देश में लोकतंत्र के असल पहरूए हम ही हैं।

मैं आम आदमी हूं। मैं ही रोजाना सुबह टीवी पर आने वाले बाबा लोगों के प्रवचनों के दौरान भक्तों के अपार जनसमूह के रूप में अपनी समस्याएं सुना रहा होता हूं और उनके चमत्कारी समाधान के लिए बाबा लोगों के गुणगाण भी मैं हीं गाता हूं। अब सोचो अगर मैं ना रहूं तो कैसे रहेगा इस तरह के विज्ञानों और ऐसे विद्वानों का मान।

मेरे ही कल्याण के लिए दिल्ली के सत्ता प्रतिष्ठानों में पिछले 64 साल से तमाम योजनाएं बनती आ रही हैं और विदेशों से पढ़-लिखकर स्वदेश आयातित योजनाकार मेरे कल्याण के लिए ही इतने सालों से योजनाएं बना रहे हैं। उनका मान रहे इसके लिए उनके द्वारा तय किये 32 रुप्ये, 26 रुप्ये व 20 रुप्ये जैसी छोटी राशियों में भी हंसी-खुशी अपना जीवन हमी जीते हैं। ये अलग बात है कि इन योजनाओं के बदले वे लाखों-करोडो़ कमा ले जाते हैं।

यही है हमारी यानि इस महान भारत भूमि के आम आदमी की गौरव गाथा। तो कृप्या हर टीवी शो, राजनीतिक रैली व बहस-मुबाहिसों में हमारी लोकप्रियता से जलने वालों अब तो समझों हमारे त्याग को जिस कारण हम आज भी विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के केंद्र बिंदू बने हुए हैं।
भई... हम तो इस गौरव से खुश है और बस यही कहना चाहेंगे..
"अगले जनम मोहे आम आदमी ही कीजो..."

Wednesday, 21 September 2011

इन योजनाओं पर तरस आता है..32 रूपये में एक दिन जीकर दिखाएं ये नीति नियंता...

आज सुबह जब देश के लोग जगे तो मीडिया ने भारत देश के इस आम आदमी के सरकार का एक और ही रूप देश के सामने रखा। खबर थी कि सुप्रीम कोर्ट में एक एफिडेविट में देश के विकास की योजना बनाने के लिए जिम्मेदार योजना आयोग ने कहा है कि शहरी इलाके में जिंदगी जीने के लिए एक आदमी को रोजाना 32 रुपये और ग्रामीण इलाके में 26 रुपये की जरूरत है औऱ जो भी इतना खर्च करने की कुव्वत रखता है वह गरीब नहीं माना जाना चाहिए। अब आज महंगाई के हालात को देखते हुए ज्यादा आंकड़े देने की जरूरत नहीं है कि कैसे आज के हालात में एक आदमी दिल्ली और मुंबई जैसे शहर में 32 रुपये में खाना भी खा लेगा, रह भी लेगा, इलाज भी करा लेगा, ईएमआई भी भर लेगा, पढ़ाई भी कर लेगा, इलाज भी करा लेगा, आदि-आदि।

खैर इसमें दोष किसी का नहीं है। इस देश की जनता को सोचना होगा कि उनके विकास के लिए योजना कौन बनाए। ऐसे लोग जो विदेशों में पढ़-लिखकर और नौकरी कर आते हैं और सीधे ऊपर से योजना बनाने वाली एजेंसियों में बैठा दिए जाते हैं। उन्हें देश की जमीनी हकीकत का ना तो कोई अंदाजा है और ना ही वे समझने के लिए गांव की धूल कभी फाकेंगे। तो भई क्या कहा जाए ऐसे देश में जहां रईसी का जीवन जीने वाले लोग देश के आम आदमी को गरीबी रेखा से ऊपर उठने के लिए 32 रुपये वाला सर्टीफिकेट जारी करते हों। इस देश को सोचना होगा कि उन्हे अगर लोकतांत्रिक देश का हिस्सा बनकर रहना है तो इस व्यवस्था में उनका क्या स्थान होना चाहिए। किसानों के उत्पादों को मुफ्त में चाहने और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादों के लिए मुंहमांगी कीमत देने की मंशा पालकर पली-बढ़ी हमारी शहरी आबादी कभी भी देश के गांवों में बसे आम आदमी की असल स्थिति को नहीं समझ सकती। किसी को अगर फिर भी मुगालता हो तो एक दिन जरा इस सरकारी आंकड़े वाले 32 रुपये में शहर में और 26 रुपये में किसी गांव में बिताकर देख ले।

Monday, 12 September 2011

दुनिया की भीड़ में!

हम सब दुनिया की भीड़ में शामिल हैं जो सुबह से लेकर शाम तक कोई-न-कोई काम लेकर यहाँ से वहाँ दौड़ती रहती है। सड़क, गाडियाँ, रेड लाईट ये सब इस भीड़ की जिंदगी की रोजमर्रा में शामिल है। लेकिन क्या कभी आपने इस भीड़ से ख़ुद को अलग कर कहीं दूर बैठकर इस भीड़ को देखा है। लोगों को शायद ये अटपटा लगे लेकिन मुझे इस तरह के अनुभव लेने की आदत है। इस अनुभव पर मैं अपनी एक कविता के कुछ अंश नीचे दे रहा हूँ।

कभी देखिये
भीड़ से अलग होकर
दुनिया की भीड़ को
सड़क पर बेतहाशा
दौड़ती-भागती भीड़ को
सुबह से शाम तक
बस भागती हुई भीड़ को!

लेकिन ये भीड़ कभी रूकती नहीं है। दुनिया के हजारों-लाखों शहर और ग्रामीण इलाकों के सडकों और चौराहों पर पर यह भीड़ उतनी ही शिद्दत से दौड़ रही है। फर्क इतना है कि आज हम इस भीड़ का हिस्सा हैं, कल कोई और था और आने वाले कल में इस भीड़ में कोई और शामिल होगा...

आगे.........

कभी नहीं रूकती ये
बस थमती है
आधी रात को
केवल एक पहर के लिए
और फ़िर चल पड़ती है
सुबह होते ही।।

Friday, 19 August 2011

दीवालघड़ी की सूईंयां....मध्यवर्गीय जीवन पर आधारित हिंदी कहानी

दीवालघड़ी की सूईंयां

सोने का प्रयास करते-करते थक चुके रामजतन की निगाहें आखिरकार दिवार के सहारे टंगी घड़ी पर टिक गई। सुबह के चार बज रहे थे। आंखों से नींद गायब थी और दिल में सुकून नाम की कोई चीज नहीं थी। पिछले 18 घंटे से मन में एक ही सवाल कौंध रहा था कि सुबह 10 बजे तक नगरनिगम के अधिकारी को देने के लिए 3 लाख रुपये का जुगाड़ कहां से होगा? बेटे को आईआईएम में दाखिला दिलाकर कल हीं लौटे रामजतन ने अपनी पूरी सार्म्थ्य झोंककर फीस का जुगाड़ जैसे-तैसे किया था। पिछले साल बेटी की शादी के लिए घर और दूकान पर 7 लाख का कर्ज पहले ही ले रखा था। बेटे को एडमिशन दिलाकर घर लौटे तो दरवाजे पर नगरनिगम का नोटिस चस्पां देखा।

आनन-फानन में अपने परम मित्र परमानंद को लेकर निगम कार्यालय पहुंचे तो पता चला कि निगम की सर्वे टीम ने घर का नक्शा अवैध घोषित कर दिया है और 15 दिन में तोड़ने की कार्रवाई होगी। निगम का फरमान सुन रामजतन को अपने पांव के नीचे से जमीन खिसकती सी लगी। परमानंद जैसे-तैसे रिक्शे में उन्हें लादकर घर पहुंचे। उनकी श्रीमति कमला देवी ने सुना तो रो-रोकर पूरा मोहल्ला सर पर उठा लिया। खैर रोने-धोने से कुछ होने वाला तो था नहीं, सो परमानंद की सलाह पर रामजतन हर समस्या की तोड़ देने वाले मोहल्ले के छुटभैये नेता कल्लन काका के यहां पहुंचे और अपनी आपबीती सुनाई। उम्मीद के अनुरूप काका ने निराश नहीं किया और उन्हें लेकर इलाके के पार्षद के यहां पहुंचे। पार्षद महोदय ने उनकी बात सुनकर पहले तो व्यवस्था की खराबी और भ्रष्टतंत्र को खूब कोसा फिर फोन से निगम के एक वरिष्ठ अधिकारी से बात की। बात पूरी कर फोन रख पार्षद महोदय अपनी ओर उम्मीद भरी टकटकी लगाए रामजतन की ओर मुखातिब हुए और कहा कि अधिकारी अवैध मकान की सूचि से आपका नाम हटाने के लिए 4 लाख रुप्ये की मांग कर रहा है लेकिन मेरे कहने पर वह 3 लाख पर मान गया है। हां, लेकिन शर्त यह है कि पैसे कल सुबह 10 बजे देने होंगे वरना सूची वह ऊपर भेज देगा।

रामजतन की हालत ऐसी मानो काटो तो खून नहीं। नेता जी को ऊपरी मन से धन्यवाद देकर वहां से निकले। मन बेचैन हो गया। सूरसा के मुंह सा ये सवाल सामने तैर गया कि जिस घर को बनाने के लिए जिंदगी के 30 सालों की पूरी मेहनत की कमाई उन्होंने खपा दी उसी को बचाने के लिए अब 3 लाख रुप्ये कहां से लाएं? वे भी महज 24 घंटे के भीतर? हाथ वैसे ही आजकल खाली है। रास्ते में कल्लन काका ने हिसाब समझाया कि 30 लाख कीमत वाले घर को बचाने के लिए 3 लाख का सौदा महंगा नहीं है। इस बीच चार लाख से घटाकर तीन लाख कराने वाले नेता जी का अहसान गिनाने से भी वे नहीं चूके।

पूरे दिन भर हाथ-पांव मारने के बावजूद रामजतन को इन पैसों के बंदोबस्त होने की कोई संभावना दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रही थी। पूरी रात जगी आंखों में काट चुके रामजतन की निगाह फिर दीवालघड़ी पर जा टिकी। साढ़े चार बज गये थे और घड़ी की सूईंया अपनी गति में भागी जा रही थीं। मन हुआ कि उठकर दीवालघड़ी की सूईंयों को थाम लें ताकि इस रात की कभी सुबह न हो। रात ऐसे ही चलती रहे और किसी नगरनिगम का कोई कार्यलय फिर कभी न खुल सके। रामजतन को अपनी समस्या का यही एकमात्र हल अब दिख रहा था। लग रहा था जैसे काली स्याह रात और अनंत आकाश में उनके हाथ अपने-आप दीवालघड़ी की सूईयों की ओर बढ़े चले जा रहे हैं और सूईंयां उनसे दूर कहीं छिटकती जा रही हों।

Tuesday, 16 August 2011

हमारा नेतृत्व भूल गया है अपना काम...अन्ना जैसो को तो आगे आना ही पड़ेगा!

15 अगस्त 2011 को ऐसा पहली बार हुआ कि लाल किले के प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए माननीय प्रधानमंत्रीजी की हर एक बात ऐसी लग रही थी जैसे कोई झूठ का पुलिंदा पढ़ रहा हो। विकास और इमानदारी की एक-एक बात मन को ऐसे चुभ रही थी जैसे भुख से बिलखते किसी इंसान के सामने कोई आर्थिक तरक्की के अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों और परिभाषाओं का ज्ञान बघार रहा हो। हर साल स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के अवसर पर तरक्की और विकास के नारों से लबरेज भाषण को सुन-सुनकर पक चुकी देश की जनता अब ऐसे नारों को सुनना पसंद नहीं करती। ये बात हमारे हुक्मरानों को अब समझ जाना चाहिए।

{महंगाई रोकने के लिए हरसंभव कदम उठाए जा रहे हैं।
रोजगार के अवसर और समग्र विकास के लिए योजनाएं बनाई जा रही है।
भारत को शिक्षा का केंद्र बनाने के लिए तमाम प्रयास किए जा रहे हैं।
गांवों का विकास सरकार की प्राथमिकता है।
और
कृषि के विकास के लिए दूसरी हरित क्रांति की जरूरत है।
आदि-आदि जैसे भाषण रोज-रोज सुन-सुनकर लोग वाकई बोर हो गये हैं।}

क्योंकि रोज-रोज भाषण देने वाला हमारा नेतृत्व कभी ना तो कुछ ठोस करता हुआ दिखता है और ना ही उसकी ऐसी नियत दिखाई पड़ती है। आज ये सोच केवल मेरी नहीं है बल्कि देश में लगातार बेकाबू होती महंगाई, लूट-खसोट, बेइमान और भाई-भतीजावाद वाली इस व्यवस्था में जी रहे देश के हर आम आदमी की आज यही सोच बनती जा रही है। आज हमारे देश के नेतृत्व को इस बात पर विचार करने की जरूरत है कि आखिर क्या कारण है देश में ऐसी निराशावाद के बढ़ने की। क्यों अण्णा हजारे, अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी जैसे लोगों की अपील पर लोग अपने द्वारा चुनी हुई सरकारों के खिलाफ खड़े होते जा रहे हैं।

यहां असल सवाल उठ रहा है नेतृत्व के काम-काज और उसके द्वारा निभाई जा रही जिम्मेदारी को लेकर। आखिर किसी भी लोकतांत्रिक समाज में समाज या राष्ट्र के नेतृत्व का काम क्या है?
हमें ये बात अब साफ करना होगा कि कोई भी समाज कुछ लोगों को चुनकर सत्ता सौंपता है और नैतिकता और अनुशासन के सामुदायिक नियमों का इसलिए स्वेच्छा से पालन करता है ताकि ये चुने हुए लोग उनके सामूहिक उन्नति के लिए काम करे। सामूहिक तरक्की की योजनाएं बना सकें, उन्हें लागू कर सकें, वर्तमान जीवन की सामूहिक सुविधाओं जैसे अस्पताल, सड़क, स्कूल आदि का विकास कर सके। समाज के बेहतर भविष्य के लिए योजनाएं बना सके। ताकि वर्तमान के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी दुनिया को सुरक्षित और बेहतर बनाया जा सके। लेकिन क्या हमारे देश के हुक्मरानों में ऐसी कोई भावना, दूरदृष्टि या योजना दिखाई देती है या फिर ऐसा कुछ करने का नियत दिखाई देती है? बिल्कुल नहीं। बस उनके भाषणों में तरक्की और सबके उन्नयन की बातें होती हैं..एक तरफ देश भर में लोग भूखमरी के शिकार हो रहे हैं, बेरोजगारी और असुरक्षा बढ़ती जा रही है, किसान अपनी जमीनों से बेदखल किए जा रहे हैं, खेती की बदहाली बढ़ती जा रही है, देश कर्ज में डूबता जा रहा है और दूसरी ओर हमारी व्यवस्था के संचालक भ्रष्टाचार में लिप्त हुए पड़े हैं और इन्हें जनता की आवाज सुनाई ही पड़ती। सिविल सोसाइटी के सदस्य जनता की इसी पीड़ा की आवाज बनकर सामने आए हैं और अगर जल्द इसे नहीं सुना गया तो सत्ते के नशे में चूर ये राजनीतिक शक्तियां जनता के प्रत्यक्ष गुस्से का भी जल्द शिकार बनने लगेंगी। इसलिए जरूरत है कि वक्त रहते ये संभल जाएं और देश की तरक्की के लिए इमानदारी के साथ काम करना सिख जाएं।

Friday, 12 August 2011

क्यां नशा हमारे लिए आधुनिकता का प्रतीक बन चुका है?


रोहन की बर्थडे पार्टी थी और सभी दोस्तों की जिद पर उसने पार्टी का प्लान कर लिया. घर से अनुमति लेकर वह दोस्तों के साथ पार्टी के लिए निकला. उसने कभी कोई नशा नहीं किया था लेकिन दोस्तों के बार-बार ये कहने पर कि अरे बीयर में नशा थोड़े ही होता है उसने बीयर पी ली. उसके दोस्त अक्सर कहते थे कि अरे यार इन पुराने ख्यालों से बाहर निकल और जिंदगी के थोड़े मजे लिया कर. बार-बार ऐसा कहने पर उसने इसे आधुनिकता का प्रतीक मान लिया. इस बात के बीते अभी करीब एक साल हुए थे और इस एक साल में दोस्तों की संगत में रोहन ने शराब पीनी भी शुरू कर दी. पॉकेट खर्च के लिए घर से मिलने वाले थोड़े से पैसे से ये सारी जरूरते पूरी होनी संभव नहीं थी इसलिए रोहन और उसके दोस्तों ने स्नैचिंग की वारदातों को अंजाम देना भी शुरू कर दिया. उसके प्रतिभावान होने और हमेशा कालेज की पढ़ाई में व्यस्त रहने की ढोल पीटने वाले उसके घरवालों को इन सब बातों का पता तब लगा जब पुलिस ने दोस्तों समेत उसे स्नैचिंग के केस में धर दबोचा.

दिल्ली जैसे शहर में रोहन जैसी कहानी आपको हर गली-मोहल्ले में देखने को मिल जाएगी. सवाल यहाँ ये उठता है कि आखिर इन सब प्रवृतियों के बढ़ने का कारण क्या है? नशे की बढती लत पर रोक लगाने में हमारा समाज क्यूँ विफल रहा है? आधुनिकता के हमारे प्रतिमान ऐसे क्यूँ हैं? तमाम कानूनी रोक-थाम और पाबंदियों के बावजूद हम नशाखोरी को रोक क्यों नहीं पा रहें?

7 अगस्त को दिल्ली के एक स्‍कूल के परिसर में फ्रेंडशिप डे के नाम पर शराब पीते हुए 14 छात्राएं पकड़ी गईं। नागरिक उड्यन मंत्रालय के आंकड़ो पर अगर गौर करें तो पिछले तीन सालों में शराब पीकर उड़ान भरने की कोशिश करने वाले 67 पायलटों को परीक्षण के दौरान पकड़ा गया। सोचिये अगर ये पाईलट विमान उड़ाने में सफल रहते तो सैकड़ों लोग इनके भरोसे ही हवाई सफ़र पर होते. देश की राजधानी दिल्ली में ब्रह्मपुरी में हुआ शराब काण्ड या फिर देश के विभिन्न हिस्सों में अक्सर होने वाले शराब काण्ड जिनमे दर्जनों लोग अपनी जान गवाँते रहे हैं. या फिर हर बार नए साल के जश्न के पहले राजधानी दिल्ली में पुलिस द्वारा शराबियों और नशाखोरों पर शिकंजा कसने की प्रबल तैयारियां दर्शातीं हैं कि हम किस हद तक इन बुराइयों को अपने समाज की संरचना में बसा चुके हैं और ये बुराइयाँ ही अब हमें डरा रही हैं. जिनपर अब हम काबू नहीं पा सकते और जिनसे बचाने की गुहार लेकर अब हमें पुलिस प्रशासन की शरण में जाना पड़ रहा है.

आज ये बुराई केवल दिल्ली जैसी शहर की समस्या नहीं है बल्कि गाँव-देहात तक आज इसकी एक-समान पकड़ है. गांवों में शाम होते ही सड़क किनारे और ठेके के दुकानों पर ऐसे रेले उमड़ पड़ते हैं जैसे किसी स्कूल का नज़ारा हो और बिना अटेंडेंस वाला नुकसान उठाने को कोई भी तैयार न हो. खासकर होली जैसे त्यौहार और नए साल के जश्न को तो लोग शराब आदि चीजों के बिना मनाने की आज कल्पना भी न करें. आधुनिक होते हमारे समाज ने नशे को केवल शराब के दायरे तक ही सिमटे नहीं रहने दिया है. आज इसके तमाम आधुनिक प्रारूप हमारे सामने हैं- हेरोइन, स्मैक, गांजा, ब्राउन शुगर, चरस आदि के रूप में.

ऐसे में राजधानी दिल्ली में हाल में सामने आये कुछ मामलों पर नज़र डाल लेना जरूरी हो जाता है. 8 अगस्त २०११ को  दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने सवा करोड़ की हेरोइन के साथ तीन डीलरों को गिरफ्तार किया। ये लोग कानपुर के एक बड़े हेरोइन तस्कर से कोरियर के जरिए हेरोइन मंगवाते और दिल्ली के विभिन्न इलाकों में उसकी आपूर्ति करते थे। 4 जुलाई को क्राइम ब्रांच ने दो किलो हेरोइन जब्त कर दो अभियुक्तों को गिरफ्तार किया। पुलिस ने हेरोइन की कीमत दो करोड़ रुपये बताई। २८ जुलाई को स्पेशल सेल ने एक किलो हेरोइन के साथ एक धार्मिक शिक्षक को गुरु तेग बहादुर अस्पताल के पास से गिरफ्तार किया। सेल ने जुलाई के पहले हफ्ते में तीन को गिरफ्तार कर बवाना में ड्रग्स बनाने की फैक्टरी का पर्दाफाश किया था। यह गिरोह बदायूं, बाराबंकी व बरेली में अफीम की खेती करने वाले किसानों से अवैध रूप से अफीम खरीदकर अपने घर में हेरोइन तैयार करता था। पुलिस इनसे अब तक 9.622 किलो हेरोइन बरामद कर चुकी है। दिल्ली में करोडो के ड्रग्स के साथ तस्करों के पकड़े जाने के मामले हर दो-चार दिन में सामने आते रहता है.


देश की राजधानी में ड्रग्स जब्त होने के ये चंद मामले हैं और ये भी कोई छिपी हुई बात नहीं है कि जितना माल पकड़ा जाता है उसका कई-कई गुना यहाँ खप जाता होगा. वरना ये तस्कर कभी इस काम से नहीं जुड़ते. एक तरफ जहाँ पूरी दुनिया आर्थिक मंदी के प्रभाव से जूझ रही है वहीँ इनका कारोबार तेजी से फल-फूल रहा है. एक तरफ सरकार का अब भी यही नारा है कि नशा कोई भी हो वह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है वहीँ इससे प्राप्त होने वाला राजस्व सरकारें दोनों हाथों से बटोर रही हैं. दिल्ली में १ अप्रैल से १२ जुलाई तक शराब बिक्री से आबकारी विभाग ने 603.31 करोड़ रूपये का राजस्व प्राप्त किया जो कि पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 16.81 फीसदी अधिक है. यहां सवाल ये उठता है कि अगर आर्थिक लाभ को सामाजिक नफे-नुकसान से ऊपर उठकर देखा जाने लगा गया तो कैसे नशाखोरी जैसी समस्याओं पर काबू पाया जा सकेगा। ऐसे में ये बात जानना भी जरूरी हो जाता है कि राजधानी में आखिर इतनी बड़ी मात्रा में शराब और ड्रग्स कहाँ खप रहा है? और कौन इसका ग्राहक है? ये एक आर्थिक से बड़ा सामाजिक सवाल बन जाता है?

कई लोग तर्क देते हैं कि नशाखोरी के पीछे दर्द या गम को भुलाने की इंसानी मानसिकता काम करती है। कई लोग इन उत्पादों को शक्तिवर्द्धक करार देने का भी प्रयास करते हैं। इस बात में पड़ने से अच्छा है इसके मानसिक प्रभावों को देखा जाये। नशा इंसान की मानसिक स्थिति को बदल देता है। इंसान के काम करने की क्षमता कम हो जाती है। लोग नशे की लत में अपना घर-परिवार और करियर तक तबाह कर डालते हैं। ऐसे उदाहरण हमारे समाज में, आस-पास में ढेरो मिल जाएंगे जिसमें लोगों ने नशे की लत के चलते अपनी हंसती-खेलती जिंदगी तबाह कर डाली।

आज नशा शहरी संस्कृति का हिस्सा बनता जा रहा है। इसे करने वाले अपनी गलती छुपाने के लिए इसे आधुनिकता से जोड़ने की कोशिशें कर रहे हैं। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि समाज से इस मानसिकता के खिलाफ आवाज उठे। ताकि हमारे किशोर और आने वाली पीढ़िया अच्छे और बुरे का फर्क पहचान सके।

इन बातों के साथ अपनी बात खत्म करना चाहुंगा...
नशा कैसा भी हो, बुरा ही होता है। यह आदमी को बर्बाद कर देता है। इसलिए जरूरी है कि इंसान नशे से दूर रहे और अगर लत लग भी जाये तो पूरी कोशिश कर इसके चंगुल से आजाद हो जाये। यह मुश्किल जरूर है, मगर नामुमकिन नहीं।

Wednesday, 27 July 2011

ना जाने कब तक...


Two Faces of India
ना जाने क्या होगा...
नाउम्मीदियों-दुश्वारियों के इस देश में
ना जाने अभी और कितने इतिहास
लिखे जाएंगे तबाही और बरबादियों के.
ना जाने कितने  एवरेस्ट
अभी और तैयार होंगे
घोटालों, भ्रष्टाचार व आतंकी वारदातों के
इस महान भारत देश में।
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ना जाने कब तक
पाये जाते रहेंगे
इस देश में गरीब और पिछड़े
जिनके साथ फोटो खिंचवाकर
नेता साबित करते रहेंगे
खुद को महान।
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ना जाने कब तक
कालाहांडी और बुदेलखंड की सूखी-बंजर जमीन
सींचती रहेगी देश की राजनीति को।
कब तक सरकारी व्यवस्था की
अयोग्यता व अकर्मण्यता
ढकी जाती रहेगी
मुआवजों के लिहाफ से।
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गांधी के इस देश में
न जाने कब तक
नियम-कायदों और फाइलों के ढेर में
पीसती रहेंगी हमारी पीढियां
और जड़ होती व्यवस्था को ढोते रहेंगे हम।
.
और न जाने कब तक
ऐसे ही चलता रहेगा सबकुछ
और हम कहलवाते रहेंगे
खुद को
सभ्य, सुसंस्कृत और महान।