Thursday, 25 June 2009

ऐसे तो नहीं मिटेगी गरीबी...हाँ जब तक बिके बेच लो!

ये कोई नयी बात थोड़े ही है, गरीबी तो हमेशा ही बिकती है। राजनीति और फिल्म वाले इसे सबसे सही तरीके से बेचते हैं। एक जमाने में इंदिरा जी ने जमकर गरीबी बेची थी। उन्होंने बस इतना ही कहा था -गरीबी हटाओ और लोगों ने तुरंत विपक्ष को हटा दिया और इंदिरा जी को जीता दिया। चलो वो तो पुरानी बात है। इधर गरीबी की कद्र समझी फिल्मकारों ने. एक ब्रितानी फिल्मकार ने झुग्गी-झोपडी की गरीबी को सजा-धजा कर बाज़ार में उतर दिया और इसके कद्रदानों ने डॉलर में इसकी कमाई कराइ और कमाई को बिलियन में पंहुचा दिया. वैसे अपने यहाँ राजनीती में इस आइटम की खूब डिमांड है. चुनाव लड़ने वाला बंदा भले ही कितना अमीर हो, पर वह यह कभी नहीं कहता कि मैं अमीरों के लिए यह करूंगा और वह करूंगा। वह कहता है कि मैं तो सब कुछ गरीबों के लिए ही करूंगा जी। क्योंकि चुनाव में अमीरी नहीं गरीबी बिकती है। सरकारें देशी-विदेशी हर तरह के सेठों के लिए पता नहीं क्या-क्या करती हैं। पर वह कहती यही है कि हमने तो सब कुछ गरीबों के लिए ही किया। यह योजना भी गरीबों के लिए है और वह योजना भी गरीबों के लिए है।
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पार्टियों के घोषणापत्रों में अमीरी का जिक्र तक नहीं होता। यहाँ भी गरीबी को ही बेचा जाता है। गरीबों के लिए शिक्षा होगी, रोजगार होगा, गरीबों के लिए मकान होंगे, प्लॉट होंगे। लेकिन क्या देश के गरीब को ये सब मिला है। अजी नहीं॥क्यूंकि ये सिर्फ बिकाऊ आइटम है और बिकने वाली चीज सिर्फ बाज़ार में ही अच्छी लगती है.
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कवि दीपक भारतदीप की एक कविता के कुछ अंश आपके लिए रख रहा हूँ---
"शायद बनाने वाले ने गरीब
बनाये इसलिए कि
अमीरों के काम आ सकें
और उनकी गरीबी पर
दिखाई हमदर्दी पर
बुद्धिमान अपना बाजार सजा सकें
इसलिए गरीबी हटाओ के नारे से
गूंजता है धरती और आकाश
गरीब होता दर-ब-दर
पर वह अपना वजूद नहीं खोती!"
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ये कविता हमारे आज की एक सच्चाई है। एक आंकड़े के अनुसार आज भी हमारे देश की करीब ७० फीसदी जनता रोजाना ५० रूपये से भी कम कमाती है. हालाँकि जिन लोगों ने भारत के गाँव और वहां के लोगों की असल जिंदगी को देखा है उन्हें इस आंकड़े पर कभी भरोसा नहीं होगा. क्यूंकि गरीबों को घर देने के तमाम योजनाओं और दावों के बाद भी मेरे गाँव की गरीब बस्ती के अधिकांश घर अब भी घास-फूस के ही हैं. रोजगार देने के तमाम दावो के बीच आज भी ग्रामीण इलाकों से आने वाली रेल गाडियाँ वैसे ही भर-भर कर शहरों की ओर आ रही हैं. शहर से चलकर रोजगार गारंटी योजना गाँव में तो पहुँच गयी लेकिन लोगों को गाँव से शहर आने से रोकने में कामयाब नहीं हो सकी. इस योजना के तहत जो काम बांटे गए वे या तो सड़क निर्माण में मजदूरी करनी थी या फिर इसी तरह का कोई काम. गाँव के पढ़े-लिखे लोगों के लिए शिक्षा मित्र जैसी योजनाये शुरू की गई लेकिन इसे बाटने के काम में लगे लोगों ने इसकी बोली लगानी शुरू कर दी. जिन्हें नौकरी मिली भी उन्हें सरकारी चपरासी से भी कम वेतन पर रखा गया. अगर शिक्षा का अलख जगाने वाले लोग खुद को चपरासी से भी गया-गुजरा समझेंगे तो किस मनोबल से वे अगली पीढी को साक्षर बनाने के लिए काम कर सकेंगे इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं.
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हमारे यहाँ एक राज्य है उत्तर प्रदेश। आज़ादी के बाद से लेकर अब तक देश में जो भी सरकार बनी है उसमें इस प्रदेश का हमेशा दबदबा रहा है. कई प्रधानमंत्री और असंख्य मंत्री दिए इस प्रदेश ने देश को. लेकिन अब भी इस प्रदेश के एक इलाके बुंदेलखंड से गरीबी और भूख से हुई मौतों की करुण कहानी सामने आती रहती है. हमारे देश की मीडिया ने गरीबी के लिए कालाहांडी को एक प्रतिक के रूप में सामने रखा. करीब १० साल पहले की बात है जब कालाहांडी में भूख हुई मौत ने पूरी दुनिया की मीडिया में अपनी जगह बनाई. लेकिन क्या इन दस सालों में इस व्यवस्था ने कालाहांडी की तस्वीर बदलने के लिए कुछ किया. उल्टे इस देश में रोज नए-नए कालाहांडी पैदा हो रहे हैं.
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हम बात कर रहे थे उत्तर प्रदेश की। वहां की स्थानीय सरकार से जुड़ी एक खबर आज एक अख़बार में छपी हुई थी. गरीबो और पिछडों के कल्याण के नाम पर सत्ता में आई यहाँ की सरकार और इसकी सुप्रीमो ने राज्य की राजधानी में जमकर मूर्तियाँ लगवाया. पार्टी के संस्थापक, वर्तमान अध्यक्ष या पार्टी सुप्रीमो कहें और पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी की मूर्तियाँ लगाने के नाम पर इस राज्य में करोडों रुपया खर्च किया गया. पहले वर्णित दो महानुभावों की मूर्तियाँ लगवाने में करीब 6.68 करोड़ रुपये का खर्च आया. तीसरे महानुभाव यानि की पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी जी की संगमरमर की ६० मूर्तियों पर भी करीब ५२ करोड़ रुपया खर्च किया गया. विकास के प्रति संवेदनशीलता के साथ लगे हुए इस प्रदेश ने पूरी म्हणत से काम किया है. प्रदेश के सांस्कृतिक विभाग का साल 2009-10 का बजट बताता है कि 2008-09 में विभाग ने 'महान नेताओं' की प्रतिमाओं को बनवाने के लिए 194 करोड़ रुपये से भी ज्यादा आवंटित किए हैं। और ये सब पैसा खर्च किया जा चुका है।
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वैसे ये पैसा गरीबी ख़तम करने पर भी खर्च हो सकता था. क्यूंकि शासन सत्ता का पहला काम ही होना चाहिए कि अपने हर नागरिक को बेसिक सुविधाएँ दे. लेकिन ये कहाँ हो पाया है. मूर्तियाँ नहीं लगेंगी तो गरीब पूजा किसकी करेगा और अगर गरीब ही ख़तम हो गए तो बिकेगा क्या.

Wednesday, 24 June 2009

लो भई, फिर आ गया स्वयंवर का जमाना!

किसी महान आदमी ने कहा था कि इतिहास खुद को दोहराता है। हिंदुस्तान की सरजमीं पर इतिहास एक बार फिर पूरा एक चक्कर लगाकर वहीँ पहुँचने वाला है जहाँ से उसने प्राचीन काल में अपनी यात्रा शुरू की थी. हम बात कर रहे हैं स्वयंवर प्रथा की जिसे आर्यों ने शुरू किया था और जिसके बल पर महिलावादी लोग आर्य संस्कृति को महिला अधिकारों के मामले में स्वर्णकाल ठहराते नहीं थकते. चलिए इससे पहले कि हम मुद्दे से भटके... आ जाते हैं अपने मूल मुद्दे "स्वयंवर" पर.
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जहाँ तक मुझे याद है तो हमने कभी स्वयंवर नाम की किसी वस्तु को नहीं देखा। वो तो बचपन में रामायण और महाभारत सीरियल में देखकर जानकारी मिली थी कि स्वयंवर एक प्रकार की विवाह की विधि है जिसमें लड़की अपने लिए दुल्हे का चयन लाइन में खड़े असंख्य लड़कों (लड़के भी कोई ऐरे-गैरे नहीं बल्कि सर्वगुन्संपन्न हुआ करते थे) में से करती है. प्राचीन काल में ऐसा करने का मौका केवल बड़े राजा-महाराजाओं की बेटियों को ही मिलता था. फिर जैसा कि टीवी सीरियल्स के माध्यम से जान सका हूँ- कि मध्ययुग में राजकुमारी संयोगिता के लिए भी स्वयंवर रचा गया. आगे चलकर विवाह के लिए तमाम तरह के नए तरीके प्रचलन में आ गए और फिर स्वयंवर नामक सिस्टम आउट ऑफ़ फैशन हो गया.

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फिर आजाद भारत में विवाह नामक पध्द्ध्ती ने नया रूप लिया। उस दौर की फिल्मों से पता चलता है कि शादियों के लिए लड़के के घर वाले लड़की देखने जाते थे और लड़की की तो बात ही छोड़िये लड़का तक अपनी शादी की बात पर शरमा जाता था. तब के मां-बाप बड़े शान से कहा करते थे अजी लड़के-लड़की से क्या पूछना जब हमने हाँ कर दी तो वे ना थोड़े ही कहेंगे. लेकिन आगे के दशकों में मां-बाप की यही स्थिति नहीं रही. लड़के बोल्ड हुए और उन्होंने शादी के लिए लड़की देखने का बोझ मां-बाप के कंधो से उतारकर खुद अपने ऊपर ले लिया. कुछ समय तक मां-बाप निर्णय लेने की अपनी शक्ति छीन जाने की बात ये कहकर छुपाते रहे की भई पढ़ा-लिखा लड़का है लड़की के मामले में एक बार उसकी भी राय ले ली जाये. लड़कों के बाद बोल्ड होने की बारी थी लड़कियों की. शहरी लड़कियों ने इस मामले में अग्रदूत की भूमिका निभाई और आत्मनिर्भरता के साथ ही लड़कियों ने शादी के मामले में अपनी राय को दबाना छोड़ दिया. इसका असर टीवी के माध्यम से आम घरों में भी पहुंचा. वहां भी अब लड़कियों से उनके होने वाले रिश्तों के बारे में राय ली जाने लगी. २१वी सदी शुरू होते-होते समाज के एलिट वर्ग ने शादी-व्याह के मामले में काफी हद तक पश्चिमी समाज के तौर-तरीको को आत्मसात कर लिया था. इस समाज के लिए शादी-व्याह और तलाक़ तक एक ही सिक्के के दो पहलू बन चुके थे. लेकिन जैसा की प्राचीन काल में स्वयंवर जैसी बोल्ड प्रथा केवल उच्च यानि की एलिट वर्ग तक ही सिमित थी उसी तरह अब भी मध्य वर्ग शादी-व्याह को लेकर काफी प्राचीन मान्यताओं को जारी रखे हुए था. शादी-व्याह उसके लिए अब भी एक धार्मिक रीति-रिवाज से जुडी हुई एक प्रथा थी और उसे जीवन भर निबाहना उसकी जिम्मेदारी थी.

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वक्त अपना कदम आगे बढ़ता है और इतिहास एक करवट लेता है. एक बड़े स्वयंवर की तैयारी शुरू होती है. हमेशा ख़बरों में रहने वाली एक टीवी अदाकारा इसकी जिम्मेदारी लेकर आगे आती है. स्वयंवर में उसके हाथों अपना वरन करवाने को उत्सुक लोग सामने आने लगते हैं. लेकिन अब का समय प्राचीन काल जैसा नहीं है और बदले हुए समय के अनुसार लोग इसे व्यावसायिक नज़रिए से देखते हैं. वैसे ये गलत भी नहीं है. ऐसे समय में जब एलिट समाज के कुछ लोग बच्चे के जन्म से लेकर मौत तक को ऑनकैमरा करना पसंद करने लगे हैं तो स्वयंवर जैसी अद्भूत चीज को लेकर ऐसा प्रयोग क्यूँ नहीं किया जाये. जल्द ही ये स्वयंवर टीवी के परदे के माध्यम से लोगों के ड्राइंगरूम तक पहुँचने वाला है और लोग उत्सुकता में इसे देखेंगे जरूर. लेकिन ये भी सच है कि लोग अभी भी इस असमंजस में हैं कि क्या ये सच्ची में होने वाला है. अब कल क्या होने वाला है ये तो कोई नहीं बता सकता लेकिन इतिहास की इस करवट को देखने के लिए कुछ इंतजार करना होगा...दिल थाम के रहिये और देखिये-- नयी बोतल में प्रस्तुत पुरानी शराब को...

Tuesday, 23 June 2009

लो देख लो नटवरलालजी की अगली पीढी को!

अब आप ये मत पूछिये कि ये नटवरलालजी कौन थे। नटवरलालजी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. नटवरलालजी की गिनती हमारे देश के प्रमुख ठगों में होती है। बिहार के सीवान जिले के जीरादेई गाँव में जन्में नटवरलालजी ने अपने करिश्माई दिमाग की बदौलत से वर्षों तक बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और दिल्ली की सरकारों को परेशान रखा। अब इनके किस्से सुनाने लगूंगा तो बहुत समय लग जायेगा. इनके बारे में बस इतना जान लीजिये कि इन्होने कभी हथियार नहीं उठाया और अहिंसा के रस्ते पर चलते हुए इन्होने ठगी के बड़े-बड़े रिकॉर्ड बनाये. छोटे-छोटे सौदों से लेकर इन्होने कइयो को ताजमहल तक बेचा. कुल मिलाकर कह सकते हैं कि वे देश के एक ऐसे रतन थे जिनकी काबिलियत को कभी देश ने पहचाना नहीं वरना आज उनका नाम देश के महान लोगों में शुमार होता. नटवरलालजी ने भी कभी मोह-माया को गले नहीं लगाया नहीं तो आज उनका नाम देश के चमकते हुए राजनीतिक सितारों में जरूर शामिल होता. अब नटवरलालजी हमारे बीच नहीं हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि उनकी सोच मर गई है. नई पीढी ने अपना काम संभाल लिया है और उनके पदचिन्हों पर चलकर देश और समाज में अपना नाम कर रही है.
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अजी अब भी नहीं समझे। यही तो कमी है अपने देश में. महान लोगों को समझने में देर करते हैं हम अक्सर. हालाँकि देश में ऐसे लोगों की कमी भी नहीं है जिन्होंने इन महानुभावों की कदर पहले ही समझ ली थी लेकिन ये अलग बात है कि उन्होंने सबको इनके बारे में बताया नहीं था. अब देखो न हमें अब जाकर पता चल रहा है कि अपने देश में अशोक जडेजा जी, सुभाष अगरवाल जी, रणवीर सिंह खर्ब जी, बालकिशन मलिक जी, गुरमीत सिंह जी और नवीन शर्मा जी जैसे लोग भी रहते हैं. जिन्होंने देश को विकसित बनाने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. इन्होने नटवरलालजी के नक्शेकदम पर चलते हुए अहिंसा का दामन कभी नहीं छोडा और पूर्व राष्ट्रपति कलाम साहब के कहे अनुसार लोगों के सपने की उड़ान को पंख देने के लिए अपना भेजा खपाया. अब आप ही बताओ अपने देश में है कोई सिस्टम जो लोगों को उनकी राशि चंद महीनों में दुगुना और तिगुना करने की जहमत उठता. लेकिन इन लोगों ने अपना फर्ज पूरा किया और ऐसे-ऐसे स्कीम बनाये जिनमे लोगों ने जमकर पैसे लगाये और वो भी ऐसे कि पड़ोसी तक को कानो-कान खबर न हो. देश में बेरोजगारी की समस्या को ख़त्म करने के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते हुए इन महान लोगों ने अपने एजेंट भर्ती किये ताकि देश के लोगों को रोजगार मिल सके. इन एजेंटों ने भी इन्हें निराश नहीं किया. एक-एक महाठग भाई लोगों ने कुछ ही महीनो के अन्दर ३००-४०० करोड़ तक के स्कीम बेच डाले.
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लेकिन इसे कहते हैं देश की ख़राब किस्मत. अब इनपर भरोसा करने वाले लोग थोडी जल्दबाजी कर गए वरना इन लोगों ने देश के लिए काफी कुछ सोच रखा था. जिस रफ्तार से ये देश का पैसा दो-गुना--चौगुना कर रहे थे उस हिसाब से २०२० तो बहुत देर था अगले कुछ सालों में ही देश महाशक्ति बन जाता और ये जो आमिर बने घूमते हैं न पश्चिमी देश वहां के आर्थिक विशेषग्य भारत भ्रमण पर आने लगते यहाँ के ठग बिरादरी की आर्थिक नीतियों के अध्ययन के लिए. हम थोडी सी हड़बड़ी के कारण विकसित बनने के इस मौके से चूक गए...

Tuesday, 16 June 2009

मिशन काहिरा और ओबामा का नज़रिया...!

लीजिये इस्राइल ने अमेरिका के अश्वेत राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा द्वारा फलिस्तीन-इस्राइल विवाद के हल के लिए तैयार किये गए रोड मैप का जवाब दे दिया। इस्राइल ने दुनिया के सामने एकतरफा ऐलान कर दिया कि फलिस्तीन राष्ट्र का गठन स्वीकार किया जा सकता है बशर्ते कि उसके साथ सेना न हो, उसका अपने वायुक्षेत्र पर नियंत्रण न हो, किसी तरह की हथियारों की तस्करी संभव न हो. यरुसलम हर हाल में इस्राइल की राजधानी होगी और बस्तियों में कोई बदलाव नहीं होगा तथा शरणार्थियों के मुद्दे पर कोई बात नहीं होगी.
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उधर एक हफ्ते पहले काहिरा में मुसलमानों और अमेरिका के बीच दशकों से परवान चढ़ चुकी नफरत की दिवार गिराने की कोशिश में मानवता, कुरान, सभ्यता और न जाने किन-किन चीजों की दुहाई देने वाले अश्वेत राष्ट्रपति को इस्राइल के इस बयान में इतनी सच्ची नजर आई कि उन्होंने इस्राइल के इस रुख को आगे बढ़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बता डाला। उन्होंने कहा कि ये समाधान इस्राइल की सुरक्षा और फलिस्तीन की एक राष्ट्र की जायज आकांक्षा को सुनिश्चित करता है. इस बयान के बाद अश्वेत बहादुर का असली चेहरा भी सामने आ गया और अंकारा से शुरू की गई उनकी ये मुहीम काहिरा में अपना रंग दिखा दी. उन्होंने यहूदियों को ये साफ़ सन्देश दिया कि वो मुसलमानों को लाख पुचकारते रहे लेकिन वो खाटी सोच वाले ही हैं जिससे अमेरिका और यहूदियों को अलग नहीं किया जा सकता. चाहे अमेरिकी यहूदी एक बार नहीं सौ सौ बार अमेरिका को आर्थिक मंदी के दलदल में धकेल दें.
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बदलाव कि सीढ़ी पर चढ़कर सत्ता के सिंहासन पर पहुँचने वाले ओबामा ने आते ही संकेत दे दिया कि वह परिवर्तन सिर्फ देसी मामलों में ही नहीं विदेशी नीति में भी चाहते हैं। उन्होंने मुस्लिम दुनिया में बदलाव लाने को प्राथमिकता देते हुए इसलामपरस्त और धर्मनिरपेक्षवाद का अखाडा बने तुर्की की संसद को संबोधित किया. उन्होंने तुर्की के राष्ट्रपति, जनता, तुर्की की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की भूरी-भूरी प्रशंसा की और साथ हीं दुनिया से जुड़े कई अहम् मुद्दे पर बेबाकी से अपने विचार रखे. जाहीर है कि यहाँ तुर्की की सीमा से लगे दुनिया के सबसे पुराने और गंभीर फलिस्तीन-इस्राइल विवाद को कैसे भूल सकते हैं. उन्होंने इस मसले के हल के लिए बुश द्वारा तैयार किये गए रोडमैप अनापोलिस को पुरजोर तरीके से लागू करने कि वकालत की.
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बदलाव के इस झंडे को दूसरी बार उन्होंने काहिरा विश्वविद्यालय में गाड़ना बेहतर समझा। क्यूंकि फलिस्तीन-इस्राइल विवादित मुद्दे की सीमा काहिरा को भी छूती हैं. जहाँ दुनिया को सन्देश देने के साथ साथ इस्राइल को धमाकेदार आवाज़ में अपने रोड मैप की जानकारी दी जा सकती थी. अपने इस ऐतिहासिक भाषण में उन्होंने ६ बिन्दुओं पर प्रकाश डाला जो अमेरिका और मुसलमानों के बीच खाई का कारण बने हुए हैं. उन्होंने इस मसले को हल करने के लिए एक-दूसरे को समझने तथा अपनी गलतियों को अहसास करने पर बल दिया. उन्होंने दोद्नो समुदायों से पुरानी बातें भूल कर नया अध्याय लिखने का आह्वान किया. हालांकि नया अध्याय लिखने और बदलाव जानकारी बात करने वाले ओबामा ने दुनिया के सबसे गंभीर मुद्दे को पौराणिक परिवेश को सामने रखकर संबोधित किया. उन्होंने कहा कि इस जमीन पर यहूदी राष्ट्र की स्थापना जानकारी बुनियाद इतिहास में छुपी है इसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता. लेकिन ओबामा बहादुर को फलिस्तीनी अरब(जो मुस्लमान नहीं हैं) के इतिहास के बारे में या तो पता नहीं है या तो यहूदी दोस्ती में सच्चाई कहने से भाग रहे हैं. उन्होंने फलिस्तीनी शरणार्थियों की रोजमर्रा की परेशानियों के लिए इस्राइल को जिम्मेदार तो ठहराया लेकिन इसका हल क्या है इसपर कुछ भी कहने से परहेज किया. उन्होंने हमास जिसको वहां जानकारी जनता का पूरा समर्थन हासिल है लेकिन अमेरिका उसे आतंकवादी संगठन के आलावा कुछ मानने को तैयार नहीं है. उसे भी ये सन्देश देना नहीं भूले कि हमास जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझे?ओबामा ने इस्राइल और फलिस्तीन के लिए अलग-अलग राष्ट्र की स्थापना की जोरदार ढंग से वकालत की लेकिन यह कैसे संभव है कि इसपे चुप्पी साधे रहे. अंकारा में अनापोलिस की दुहाई देने वाले ओबामा ने काहिरा में इसका जिक्र भी करना उचित भी समझा.
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ओबामा ने अपने ऐतिहासिक भाषण में इरान के परमाणु कार्यक्रम पर चिंता जताई और कहा कि अगर इसे रोका नहीं गया तो क्षेत्र में परमाणु हथियार बनाने की होड़ लग जायेगी। कुछ हफ्ते पहले इस्राइल के पास २०० परमाणु बम है का खुलासा करके पूरी दुनिया को चौंका देने वाले ओबामा प्रशासन ने यहाँ इस्राइल को नसीहत देना तो दूर की बात उसपर मुंह खोलना भी मुनासिब नहीं समझा.
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इन बातों से साबित होता है कि मुसलं दुनिया और अमेरिका के बीच दोस्ती बढ़ने के इस अभियान की आड़ में ओबामा महाराज यहूदी राज्य स्थापित करने की मुहीम छेड़ राखी है वर्ना कोई भी इमानदार आदमी नेतान्याहू के एकतरफा बयान को इतने जोरदार ढंग से स्वागत नहीं करता। परिवर्तन का नारा देने वाले इस नेता भी मानवाधिकार के इस मुद्दे को धार्मिक चश्मे से ही देखने की कोशिश की. पूरी दुनिया को मानवधिकार का सबक सिखाने वाला अमेरिका जिस तरह से अबतक इस मुद्दे को धार्मिक दृष्टिकोण से देखता रहा है ठीक उसी अंदाज से ओबामा भी देख रहे हैं. लिहाजा उनकी ईमानदारी पर सवालिया निशान उठाना स्वाभाविक है और ये सही है कि मुस्लिम देशों में आज भारत, अमेरिका जैसी धार्मिक आज़ादी है और न ही विचार व्यक्त करने कि अनुमति. इसपर ओबामा द्वारा सुझाई गई बातों पर मुसलीम शासकों को संजीदगी से गौर करना होगा. आखिर दूसरों से अधिकार मांगने वाले मुस्लिम देश अपने देश के दूसरे मजहब के लोगों के साथ वो व्यवहार क्यूँ नहीं करते हैं जैसा इसलाम में बताया गया है.-----यहाँ ओबामा साहब आपको याद दिलाना चाहता हूँ कि आपने कहा था कि ताली एक हाथ से नहीं बजती लेकिन आपने नेतान्याहू के बयान को बेसमझे समर्थन देकर जिस पहल की शुरुआत की थी शायद उसका गला ही घोंट दिया.
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लेखक: अजवर सिद्दीकी
(लेखक युवा पत्रकार हैं और मुस्लिम जगत में हो रहे परिवर्तन पर पैनी निगाह रखते हैं)
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Monday, 15 June 2009

मीडिया और चाँद-फिजा के तराने..!

मीडिया की बांछे खिल गई है खासकर टीवी चैनल वालों की... पता है क्यूँ... चाँद मोहम्मद फिर सामने आ गए हैं। फिर उन्हें फिजा से किये गए प्यार के वादे याद आ गए हैं और आँखों में आंसू और होंठों पे प्यार का तराना लेकर फिर से वे फिजा के दरबार में हाजिरी लगाने पहुँच चुके हैं. कहानी कुछ ऐसी है कि एक हुआ करते थे चंद्रमोहन. वे कभी हरियाणा जैसे संपन्न राज्य के उपमुख्यमंत्री हुआ करते थे. राज्य के एक बड़े रसूख वाले परिवार के जिम्मेदार मेंबर भी. बीवी-बच्चों वाले एक जिम्मेदार इन्सान भी. फिर उन्हें प्यार हो गया. अचानक वे गायब हो गए और फिर जब प्रकट हुए तो वे चन्द्रमोहन से चाँद मोहम्मद हो चुके थे. धर्म तो उन्होंने बदल ही लिया उपमुख्यमंत्री की कुर्सी भी उन्हें गंवानी पड़ी.
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मीडिया ने उन्हें खूब बेचा। जब चन्द्रमोहन से चाँद मोहम्मद बनकर सामने प्रकट हुए थे तब उन्होंने देश की राजधानी दिल्ली में एक प्रेस कांफ्रेंस भी बुलवाया था. तब चाँद मोहम्मद और उनके प्यार में अनुराधा बाली से फिजा बनने वाली उनकी प्रेमिका दोनों ने देश के सामने प्यार पर एक अच्छा-खासा लेक्चर भी दिया था. अख़बारों में उनके खूब फोटो छपे और टीवी चैनल वालों ने तो पूरे सप्ताह भर उन्हें बेचा. उन्हें एकदम फ्रेश लव गुरु जो मिल गया था.
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फिर चाँद मोह्हमद की आंखे खुल गयी और उन्होंने अपने परिवार में लौट कर फिजा को मोबाइल पर तलाक दे दिया। मीडिया ने फिर उन्हें बेचा. टीवी पर चल-चल कर उनके तराने लोगों को ड्राइंग रूम में गुदगुदाते रहे, लोगों ने खूब इनपर चर्चा की. मामला ख़त्म हो गया. चाँद मोहम्मद ने फिर परिवार में वापसी कर ली और फिजा ने भी जिंदगी को फिर से नई शुरुआत देने की कोशिशे शुरू कर दी. लेकिन ये कहानी यही ख़त्म नहीं होनी थी.
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लेकिन इस दौरान बहुत कुछ बदल चुका था. जिस फिजा को कल तक कोई नहीं जानता था वो फिजा एक अंतर्राष्ट्रीय रियलिटी शो में भाग लेने की तैयारिओं में लगी थी. सावन आने में अभी वक्त था लेकिन बरसात के पानी ने इसी दौरान अपना रंग दिखाया. चाँद मोह्हमद के दिल में फिर से प्यार के तराने बजने लगे. अचानक एक दिन सुबह-सुबह उठकर चाँद मोह्हमद पहुँच गए फिजा के घर. बार-बार माफ़ी मांगने के बाद भी फिजा का दिल नहीं पसीझा. चाँद मोह्हमद को मीडिया वालों को खबर करनी पड़ी. मीडिया के सामने उन्हें कहना पड़ा कि भाई माफ़ कर दो अब नहीं होगी ऐसी गलती. लेकिन प्यार में धोखा खाई फिजा ने नहीं माना. दिखा दिया अंगूठा और कहा कि सोचकर बताउंगी...मीडिया को मसाला मिल गया था. फिर दोनों छा गए ख़बरों में...अभी ये कहानी आगे जारी रहेगी...ख़बरों का ये सिलसिला अभी थमने वाला नहीं है...मीडिया को अभी ना जाने कितने मटुकनाथ और चाँद मोहम्मद मिलते रहेंगे और दुकानदारी चलती रहेगी...भारत विविधताओं का देश है यहाँ ऐसे सपूत हमेशा जन्म लेते रहेंगे...यहाँ कि मीडिया के लिए ख़बरों का अकाल कभी नहीं हो सकता...अगर हुआ भी तो ये बेमौसम बिकने वाले खबरिया आइटम हैं...मीडिया के वीडियो लाइब्रेरी में इन्हें खूब संजो के रखा गया है...जब ख़बरों जा अकाल होगा तब इन्हें निकाल कर मिर्च-मसाले के साथ बेच लिया जायेगा.

Sunday, 14 June 2009

सिस्टम की चील-पों और चाय वाला छोटू...

पूरी दुनिया ने शुक्रवार को बाल मजदूर निषेध दिवस मनाया। मीडिया में दिन-भर नूरा-कुश्ती चलती रही. देश भर से बाल-दिवस मनाने के लिए सज-धज कर घर से निकले समाजसेवी लोग और इस मौके पर जगह-जगह आयोजित समारोहों में भाषण देने वाले नेताजी लोग खूब दिखे. इनके फूटेज और बाईट स्पेशल इफेक्ट और म्यूजिक के साथ-साथ सजाकर दिन भर टीवी के परदे पर दीखते रहे. इस दिन की तैयारी में सबको अपना हिस्सा देना था इसलिए एनजीओ वालों ने अपना कर्तव्य निभाते हुए कई जगहों पर काम करने वाले बाल मजदूरों की खबर पुलिस को दे दी और पुलिस वालों ने भी इस दिन अपना कर्तव्य निभाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. कई जगह छापा मारा गया और बाल मजदूर निषेध के नाम पर कई बच्चो को मुक्त करा लिया गया. मीडिया ने इस दिन के लिए कई विशेष स्टोरी बनाके रखी थी. बेबसी-दर्द-मजबूरी-दास्ताँ जैसे कई भारी-भरकम शब्दों और बेबस चेहरों के साथ टीवी चैनलों ने भी इस दिन को खूब सलीके से मनाया. अखबार वालों ने काम करने वाले बच्चों की तस्वीर एक दिन पहले ही खींचकर रख दिया था ताकि इस दिन उनके अख़बार के पहले पन्ने किसी अच्छे से कैप्शन के साथ ब्लैक एंड व्हाइट स्टाइल में ये तस्वीर छप सके. सब मुस्तैद थे और सबने बाल मजदूर दिवस मनाने के लिए अपना-अपना कोटा ठीक तरीके से पूरा किया।
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बच्चों को काम करने से रोकने की इस मुहीम में पूरा सिस्टम एकजूट था। इसका असर मेरे पड़ोस की चाय की दुकान पर भी दिखा. एक दिन पहले जब शाम को मैं चाय की दुकान पर गया तो वहां छोटू को न देखकर मैंने उसके बारे में पूछ डाला. दुकान मालिक ने धीरे से कहा सर जी जहाँ-तहां छापे पड़ें हैं और कई बच्चों को ले गए वे लोग. मैंने बेचारे को २ दिनों की छुट्टी दे रखी है. बेचारा गरीब परिवार से है और इसी काम के सहारे अपना व अपनी माँ का पेट पालता है अब कौन उसे भी और खुद को समस्या में डाले इसलिए मैंने उसे २ दिन के लिए छुट्टी ही दे दी. करीब १०-११ साल के छोटू का चेहरा मेरे जेहन में अचानक उभर आया. रोज आते-जाते न जाने कई बार दिख जाता था. टीवी और अख़बारों में बाल मजदूरी रोकने के विज्ञापन देख कर कई बार मेरे मन में भी आया कि इसकी शिकायत कर दूँ और इसे काम करने से रोकने की वाहवाही ले लूँ. लेकिन आज छोटू की सच्चाई जानकर मुझे अपने फैसले पर ख़ुशी हुई कि अच्छा किया मैंने किसी को नहीं बताया. मुझे नहीं मालूम था कि इतनी नन्ही उम्र में छोटू इतना ज्यादा जिम्मेदार हो चुका है वो. उसे पकड़वाकर मैं अपनी वाहवाही तो करवा लेता लेकिन क्या उसके परिवार का पेट मैं पालता या फिर सरकार उसकी जिम्मेदारियां अपने ऊपर ले लेती?
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हाँ तो उस दिन टीवी पर दिन भर इस मामले पर बहस-मुबाहिसा चलता रहा. इन मामलों के कई विशेषग्य दिन-भर इस मामले पर बोलते रहे और इस दौरान चेहरे पर विजयी मुस्कान लिए देश के कई हिस्सों से बाल मजदूरों को पकड़वाने वाले समाजसेवियों के चेहरे भी टीवी पर दीखते रहे. नन्हीं उम्र में बच्चों को काम करने से रोकने के प्रबल समर्थक तो हम भी हैं लेकिन इन सब के बीच किसी ने भी ये नहीं बताया कि अगर इन्हें काम से रोक दिया गया तो ये बच्चे कहाँ जायेंगे और इनकी जिम्मेदारियां कौन पूरा करेगा. अगर ये खुद इतने सक्षम होते तो इन्हें काम ही क्यूँ करना पड़ता. क्या देश ने सामाजिक सुरक्षा के लिए कोई तंत्र विकसित किया है जिसकी दुहाई दे कर हम इन बच्चो को कह सकें कि भई तुम इतनी नन्ही उम्र में काम क्यूँ करते हो. तुम पहले अपनी पढाई पूरी करो और फिर काम में लगना...जिस दिन हम ऐसा कह सकने की स्थिति में होंगे तब हम बाल मजदूर दिवस मनाने के सही हक़दार होंगे और फिर उस दिन छोटू को चाय की दुकान से निकलने की इस मुहीम में हम भी पूरे मन से शामिल हो सकेंगे.

Wednesday, 10 June 2009

नक्सलबाड़ी से आगे...ब्रांड नक्सलवाद!

नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ नक्सलवादी आन्दोलन अब बंगाल तक ही सीमित न होकर एक देशव्यापी समस्या बन चुका है। नक्सलवाद को एक वाद के तौर पर और किसानों और गरीबों की लड़ाई के तौर पर पेश करने वालों के लिए इस सप्ताह में इस विषय से जुडी चंद ख़बरों के शीर्षक यहाँ पेश कर रहा हूँ-
१) उडीसा में नक्सलियों ने २ थानों और एक पुलिस चौकी उडाई।
२) झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम में नक्सली हमले में दस पुलिसकर्मी शहीद।
३) छत्तीसगढ़ के बीजापुर में नक्सलियों के हमले में सीआरपीएफ के असिस्टंट कमांडंट शहीद तथा पांच अन्य जवान घायल।
४) महाराष्ट्र के औरंगाबाद में पुलिस मुठभेड़ में दो नक्सली ढेर।
ऐसे ही न जाने कितनी ख़बरों के साथ आये दिन नक्सली ख़बरों में छाये रहते हैं। नक्सलवाद शब्द और उसके वर्तमान स्वरुप को लेकर तमाम तर्क रखे जा सकते हैं. उन्हें देखने का लोगों को नजरिया भी अलग-अलग हो सकता है. लेकिन देश का वो हिस्सा जो इससे पूरी तरह अनजान है वो नक्सलवाद को एक बड़े खतरे के रूप में देखता है. कल ही किसी समाचार पत्र में खबर छपी थी कि नक्सलवाद अब एक आन्दोलन नहीं बल्कि संगठित रंगदारी व्यवसाय बन चुका है और देशभर में इसका बाज़ार १५०० करोड़ का हो चुका है. देश के अधिकांश राज्य में अपराधी इस खोल को ओढ़कर अपना व्यवसाय चला रहे हैं.
१९६० के दशक में नक्सलबाड़ी आन्दोलन किसानों के हक़ की लडाई का पर्याय बन कर उभडा था तब किसी ने नहीं सोचा होगा कि एक दिन ये आन्दोलन एक व्यापार का रूप ले लेगा। चारू मजुमदार और कानू सान्याल ने इस आन्दोलन को इसलिए शुरू किया था ताकि किसानों का संगठन तैयार हो सके और उन्हें जमींदारो और साहूकारों के खिलाफ एक मंच मिल सके, उनकी आवाज सुनी जा सके. वो न हो सका. एक दशक तक सबकुछ ठीक-ठाक चलता रहा लेकिन फिर ये आन्दोलन अपने रास्ते से भटक गया. स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि इसे पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार ने ही ७० के दशक में दबा दिया. विभिन्न प्रदेशों के जो युवा वहां सक्रीय थे सरकारी दमन के कारण एनी राज्यों की ओरे चल पड़े और नक्सलवाद का बीज कई राज्यों में फ़ैल गया. हर जगह इस आन्दोलन के फैलने के कई कारण थे. कहीं क्षेत्रीय असमानता तो कहीं गरीबी की चाशनी में लपेट कर इसे पेश किया गया. पुरानी पीढी जबतक रही ये आन्दोलन कमोबेश अपने रास्ते पर चलता रहा. लेकिन कहते हैं न कि जब भी ताकत सिस्टम पर हावी होने लगता है तो फिर निरंकुशता अपना रास्ता बनाने लगती है. यही इस आन्दोलन के साथ भी हुआ.
शुरुआत में आन्दोलन को जिन्दा रखने के नाम पर और जमींदारों और साहूकारों से रक्षा के नाम पर किसानों से वसूली होनी शुरू हुई और फिर धीरे-धीरे ये प्रोटेक्शन मनी का रूप लेता गया। नक्सलबारी से निकल कर इस वाद ने पहले उन क्षेत्रों में अपनी जड़े जमानी शुरू कि जहाँ शासनतंत्र की पहुँच कम थी. बंगाल से निकलकर जब ये आन्दोलन बिहार पहुंचा तब इसके खिलाफ भी कई संगठन तैयार हुए. बिहार में आकर इस लड़ाई ने पहले तो जातीय रूप धरा और फिर इसे कई विरोधी संगठनों के विरोध का सामना भी करना पड़ा. इस लड़ाई की आग में बिहार करीब दो दशकों तक जलता रहा. उडीसा, आंध्र और महारष्ट्र में इसे फलने-फूलने का खूब मौका मिला. कहीं कोई संगठन नहीं, कहीं कोई विचारधारा नहीं. एक वाद का मुखौटा पहने नक्सलवाद अपराध को जायज ठहराने का एक जरिया बन गया.
(( देश के एक लोकप्रिय समाचार पत्र में नक्सलवाद पर एक स्टोरी छपी थी जिसके अनुसार ब्रांड नक्सलवाद रंगदारी और वसूली जैसे संगठित अपराध को छुपाने का एक जरिया बन चुका है। आप भी इस खबर को पढ़ सकते हैं...

रंगदारी व्यवसाय बना नक्सलवाद, 1500 करोड़ का साम्राज्य

जन आंदोलन से शुरू हुआ नक्सलवाद अब लेवी के रूप में 1500 करोड़ का संगठित रंगदारी व्यवसाय बन गया है। पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा अधिकारियों ने कहा कि भाकपा (माओवादी) खासकर इससे जुड़े समूह रंगदारी से जो रकम हासिल करते हैं उसका इस्तेमाल वे आंदोलन चलाने के लिए नहीं, बल्कि अपने नेताओं की ऐशो-आराम वाली जीवनशैली को बरकरार रखने के लिए करते हैं।
विभिन्न अभियानों के दौरान केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों और राज्य पुलिस द्वारा जब्त किए गए नक्सल साहित्य और दस्तावेज से नक्सली समूहों द्वारा वसूली जाने वाली लेवी के बारे में विस्तृत खुलासा हुआ है जिसका हर साल का आंकड़ा करोड़ों रुपये का है। भाकपा (माओवादी) हालांकि झारखंड में अब भी प्रमुख नक्सली समूह है लेकिन अन्य भी बहुत से छिटपुट समूह हैं जिन्होंने अपहरण, लूटपाट और मादक पदाथरें की तस्करी के अलावा लेवी लगाने का काम शुरू कर दिया है। इसके तहत राज्य से सालाना लगभग तीन अरब रुपये की वसूली होती है। यदि नक्सलवाद से सर्वाधिक प्रभावित सात राज्यों तथा लाल गलियारे के रूप में जाना जाने वाले झारखंड, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, बिहार, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र से लेवी के जरिये हासिल होने वाली रकम के बारे में सुरक्षा एजेंसियों के आंकड़ों पर भरोसा किया जाए तो सालाना लगभग 1500 करोड़ रुपये की आमदनी बैठती है।
सुरक्षा बलों द्वारा बरामद किए गए दस्तावेज से नक्सलियों की आय के बारे में खुलासा हुआ है जिनमें ठेकेदारों, पेट्रोल पंप मालिकों तथा भूस्वामियों से वसूली जाने वाली लेवी राशि के सही आंकड़े स्पष्ट दिखाई देते हैं। सड़कें बनाने की परियोजना में जहां आम तौर पर 10 फीसदी लेवी वसूली जाती है वहीं छोटे पुलों और अन्य परियोजनाओं के मामले में पांच प्रतिशत लेवी वसूल की जाती है। तय लेवी के अलावा वाम विचारधारा वाले चरमपंथी समूह क्षेत्र में काम करने वाले उद्योगपतियों से भी धन की मांग करते हैं। इतना ही नहीं, वे वसूले गए धन के लिए रसीद भी जारी करते हैं। सीआरपीएफ के उप महानिरीक्षक (झारखंड) आलोक राज ने बताया कि राज्य में वाम विचारधारा से जुड़े छह चरमपंथी समूह काम कर रहे हैं जिनमें से पीपुल्स लिबरेशन फंट्र ऑफ इंडिया ज्यादातर अपराधियों से बना है। इस समूह को पहले झारखंड लिबरेशन टाइगर्स कहा जाता था। उन्होंने कहा कि ये समूह लंबे समय तक विचारधारा के लिए नहीं बल्कि रंगदारी के लिए काम करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि धन के लिए सिर्फ नक्सली ही ठेकेदारों से संपर्क नहीं करते बल्कि कुछ मामलों में ठेकदार खुद धन के साथ नक्सलियों से संपर्क साधते हैं।
झारखंड के पुलिस महानिदेशक वीडी राम ने कहा कि कुछ मामलों में देखने में आया है कि ठेकेदारों ने अपने द्वारा बनाई गई सड़कों को विस्फोट से उड़वाने के लिए नक्सलियों से खुद संपर्क किया क्योंकि उन्होंने सड़क बनाने में घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया था। ऐसे ठेकेदारों का मानना होता है कि यदि उनके द्वारा बनाई गई सड़कों को नक्सली उड़ा देंगे तो उनमें लगाई गई सामग्री की गुणवत्ता की कोई जांच नहीं हो पाएगी। अधिकारियों ने कहा कि माओवादी नेता सभी तरह की आधुनिक सुख-सुविधाओं के साथ ऐशो-आराम की जिंदगी बिताते हैं। हालांकि वे अपने संगठन में दूसरों के बच्चों की जबरन भर्ती करते हैं लेकिन उनमें खुद के बच्चे अच्छे पब्लिक स्कूलों में पढ़ते हैं। माओवादी पूवरेत्तर राज्यों के विद्रोहियों की तरह ग्रामीणों को अफीम की खेती करने के लिए भी उकसाते हैं।))

Monday, 8 June 2009

वाकई बहुत संजीदा हो गए हैं हम!

हमारे यहाँ कोई न कोई दिवस मनाने का चलन बहुत तेजी से बढ़ता जा रहा है। अभी-अभी दुनिया ने विश्व पर्यावरण दिवस मनाया है. इस दिन अपने एक मित्र की पर्यावरण के प्रति चिंता देखकर लगा कि दुनिया वाकई बहुत ही संजीदा हो गयी है. सुबह ऑफिस में अपने एक मित्र को लाइट और कंप्यूटर ऑफ करते देखा तो मुझे कुछ अजीब सा लगा. मेरे पूछने पर उनका जवाब था कि भाई कम से कम आज तो बिजली बचा लिया जाये. मेरे लिए ये थोडी नई बात थी. इससे पहले कभी नहीं देखा था मैंने उन्हें इस तरह संजीदा होते हुए. रोज मजे में रौशनी और कंप्यूटर की रंगीनियत का फायदा उठाने वाले मेरे मित्र को अचानक क्या हो गया यही सोचते हुए मैंने ऑफिस से बाहर नज़र डाली तो एक दूसरे मित्र पर नज़र गयी. हमेशा बाइक से ऑफिस पधारने वाले मेरे एक ये मित्र को पैदल चले आ रहे थे. मैंने पूछ डाला- क्या हुआ भाई बाइक ख़राब हो गयी क्या. उन्होंने कहा भाई आज विश्व पर्यावरण दिवस है और इसलिए मैं बस से आया हूँ.

ये बस एक दिन के लिए था और अगले दिन से फिर मेरे दोनों मित्र अपने पुराने अंदाज में आ गए. मैं फिर इंतजार में हूँ कब अगले साल ये दिन आये और इन्हें फिर से पर्यावरण की चिंता हो...

Friday, 5 June 2009

अब माउस-माउस में विधमान है ईश्वर...

(इन्टरनेट पर खबरों की ख़ाक छानते एक खबर हाथ लगी- सैकडों किलोमीटर दूर स्थित भगवान के दर्शन अब इन्टरनेट पर सुलभ। इसके लिए बस पैसा पे करिए और हो जायेगी आपके नाम की पूजा. मतलब दाम चुकाईये और भगवान की कृपा के हक़दार बनिए. इसके लिए अब तीर्थयात्रा के तमाम कष्ट भी नहीं उठाने होंगे... इस खबर पर कुछ पंक्तियाँ लिखने से खुद को नहीं रोक सका।)
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कण-कण में हैं विधमान इश्वर
ऐसा सुना था हमने
अपने पुरखो से...
लेकिन आज इन्टरनेट की खाक छानते
कुछ एक्सक्लूसिव जानकारियां हाथ लगी
कि अब
अतिआधुनिक युग आ गया है
और भगवान ने भी
मिला लिया है समय से कदम
भक्तो तक पहुँच बनाने के लिए
मंदिर से निकल पड़े हैं भगवान
और
आ गए हैं कंप्यूटर में
बस एक माउस दबाने की जरूरत है
और हो जायेगी उनकी पूजा
इसके लिए अब नहीं करनी होगी
हजारो किलोमीटर की यात्रायें और
अब सच होने वाली है
ये कहावत कि
कण-कण में है भगवान
(वैसे आप ऐसे कह सकते हैं-माउस-माउस में हैं भगवान)!
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धनकुबेरों और वीआइपीज के पीछे
मंदिरों की लाइनों में लगकर
थक चुका भक्त भी
अब जागरूक हो चुका है
उसने भी थाम लिया है
इन्टरनेट का दामन
सीधे पहुँच बना ली है उसने
अपने भगवान तक
और घर बैठे अब उसके पास
पहुँचने लगे हैं प्रसाद
अब तीर्थयात्राओं के लिए
उसे नहीं जोड़ने पड़ते एक-एक पाई
अब भगवान आपके हैं और
आप भगवान के!

Tuesday, 26 May 2009

राजनीति की बहती गंगा और पत्रकार हीथर ब्रुक!

कौन है ये हीथर ब्रुक! एक ब्रिटिश पत्रकार! मैंने आज पहली बार ये नाम सुना। अब आप पूछियेगा कि क्या किया है इस पत्रकार ने जो मैं इसके बारे में इतना ज्यादा बात कर रहा हुं...तो इसका जवाब है कि आज के जमाने में जब राजनीति और पत्रकारिता को लोग एक ही थैली के चट्टे-बट्टे मानने लगे हैं...ऐसे समय में इस पत्रकार ने राजनीति के गलियारों में लाभ की बहती गंगा और उसमें हाथ धोते राजनीतिक लोगों की सच्चाई सामने लाने की हिम्मत की है...और ऐसा करने के लिए उसने कोई चमत्कार नहीं किया है...
इस पत्रकार ने संसद के तमाम दस्तावेजों को खंगाल कर कई सारे खुलासे किये हैं। मसलन वहां के सांसद अपने भत्ते बटोरने के लिए क्या-क्या हथकंडे अपनाते हैं। जो तथ्य मिले, वे चौंकाने वाले हैं। अपने भत्ते लेने के लिए किसी ने हेलिपैड मरम्मत का खर्च दिखाया है, तो किसी ने टेनिस कोर्ट या स्विमिंग पूल के रखरखाव का। अनेक सांसदों ने दो-दो मकानों के किराए की रसीद पेश की है, इस तर्क के साथ कि दो मकान रखना उनकी मजबूरी है- एक अपने चुनाव क्षेत्र में और दूसरा राजधानी लंदन में। हीथर ब्रुक के इस रहस्योद्घाटन ने ब्रिटेन के नागरिकों को बेचैन कर दिया है। लोगों ने सवाल उठाना शुरू कर दिया है कि आर्थिक मंदी के इस दौर में जब सामान्य नागरिक अपने परिवार के लिए एक छोटी सी रिहायश का इंतजाम नहीं कर पा रहे हैं, सांसदों की इस फिजूलखर्ची का क्या मतलब है? आखिर वे पैसे आम नागरिकों द्वारा दिए जाने वाले टैक्स से ही खर्च किए जा रहे हैं। क्या वे सचमुच तंगहाल जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं? कुछ सांसदों ने अपने खर्चों में एलसीडी टीवी या झाड़-फानूस जैसी सजावटी चीजों का भी बिल भरा है, तो कुछ ने पॉर्न फिल्मों की सीडी और घोड़े की लीद उठाने वाले थैलों तक की खरीद की रसीद लगा रखी है। इतने सारे ऐशो-आराम, जाहीर है वहां के जनप्रतिनिधि भी खुद को राजा-महाराजा, आम लोगों से श्रेष्ठ, सुपर सिटिजन समझते हैं।
क्या हमारे यहाँ भी यही माहौल नहीं है। आम नागरिकों को इसकी जानकारी नहीं होती, दुनिया में कहीं भी नहीं. हीथर ब्रुक को भी ये जानकारी प्राप्त करने के लिए ५ साल तक गोपनीयता कानून के खिलाफ लड़ाई लड़नी पड़ी. सांसदों और मंत्रियों के खर्चों के बारे में जनता को जानकारी नहीं दी जाती, वहीँ नहीं कहीं भी नहीं. वहां अब इस मामले पर आवाज उठने लगी है, लोग इन खर्चों पर बहस करने लगे हैं, विभिन्न सामाजिक संगठन अभियान चला रहे हैं। हीथर ब्रुक के प्रयासों ने राजनीतिक लूट के प्रति जनता को जागरूक कर दिया है. हमारे यहाँ भी सरकार ने जनता को सूचना का अधिकार दिया है. जनता आज नहीं तो कल इसका इस्तेमाल करेगी और ये तो बस एक शुरुआत है.
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एक जानकारी जो हमें ख़बरों कि तलाश के दौरान इन्टरनेट पर मिली...{{राजनीति शास्त्र के एक यूरोपियन प्रोफेसर पीयरे लेम्फिक्स कहते हैं कि राजनीतिज्ञों और वेश्याओं के बारे में पुरानी कहावत अब बदल चुकी है, क्योंकि वेश्याएं आज भी वही बेचती हैं, जो उनका है, पर राजनीतिज्ञ उसका सौदा करते हैं, जो उनका नहीं है।}}

Monday, 25 May 2009

इन तीस हज़ार लोगों का पेट क्या प्रभाकरण भरेगा!

श्रीलंका में लड़ाई ख़त्म हो गई है। लिट्टे का मुखिया मारा गया. श्रीलंका की सरकार ने राहत की सांस ली. दशकों से जारी खूनी लड़ाई का अंत हो गया. पूरी दुनिया ने श्रीलंका में सैनिकों का फ्लैगमार्च देखा, मौत बरसाती बंदूकों की गड़गडाहट और तोपों से बरसते शोले टीवी पर देखे. इस माहौल में जान बचाने के लिए घर-बार छोड़कर इधर-उधर छुपते शरणार्थी रुपी जीवों को भी पूरी दुनिया सहानुभूति से देखती रही. मैं खुद श्रीलंका की लड़ाई के फुटेज टीवी पर देखते हुए बड़ा हुआ हुं और हर दिन की लड़ाई में मारे गए लोगों(सैनिक, श्रीलंका के सिंहली और तमिल समुदाय के लोग सभी) की संख्या को गिनकर अपने मूड के अनुसार खुश और दुखी होता रहा हुं. लड़ाई शुरू हुई, चलती रही और अब ख़त्म हो गई--मेरे लिए ये बस एक खबर भर है और इसका मेरे सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा. लेकिन॥लेकिन अब जब लड़ाई ख़त्म हो गई तो इस दौरान आई एक खबर दुनिया भर में जारी लड़ाई --चाहे वो किसी भी नाम पर हो-- की कलई खोलती है. खबर ये है कि जब लिट्टे का सफाया करने के लिए श्रीलंकाई फौज निर्णायक लड़ाई लड़ रही थी तब बमों की बारिश से बचने के लिए लाखों लोग अपना घर-बार छोड़कर भागे थे. इसमें कई मारे गए और कई अपनी जान बचने में सफल रहे. लेकिन इन दोनों प्रकार के इंसानों के बीच ३० हज़ार लोग ऐसे भी हैं जो जिन्दा तो रह गए लेकिन अपंग हो गए. राहत एजेंसियों के मुताबिक तब क्षेत्र से भागे दो लाख 80 हजार लोगों में हर दस में से एक व्यक्ति अपंग हो गया है। ऐसे लोगों की संख्या 25 से 30 हजार है।


लड़ाई ख़त्म हो गयी है और दुनिया भर की राहत एजेंसियों ने इस इलाके में काम शुरू कर दिया है। शायद कइयो की जिंदगी फिर पटरी पर आ भी जाये लेकिन ये सब इतना आसान नहीं है. ये ३०,००० लोग हमेशा अपंग रहेंगे और बहुत होगा तो इन्हें प्लास्टिक के हाथ-पैर दे दिए जायेंगे. जिससे ये घसीट-घसीट कर अपनी जिंदगी काट सकें. तमिल समुदाय को आज़ादी दिलाने के नाम लड़ाई लड़ रहा प्रभाकरण मारा गया और लड़ाई ख़त्म होने के बाद फौजी भी अपना बोरिया-बिस्तर बाँध कर वापस लौट जायेंगे लेकिन इन लोगों की जिंदगी में जो तूफ़ान आ चुका है उसकी भरपाई कौन करेगा. कौन इनकी रोजाना की जिंदगी में आने वाली समस्याओं को हल करेगा.


ऐसा नहीं है कि ऐसे अभागे लोग केवल श्रीलंका में ही हैं. इतिहास हमेशा इस तरह के घाव छोड़ता रहता है. राजा-महाराजाओं के काल से लडाइयां होती रही है. राजा-महाराजा अपनी नाक के लिए बड़ी-बड़ी लडाइयां लड़ते रहे हैं. टीवी पर रामायण-महाभारत में हमने गाज़र-मूली की तरह लोगों को कटते-मरते हुए देखा. आधुनिक काल में हथियार बदले और हमने परमाणु बमों की जद में आये जापान के लोगों को चीखते-कराहते सुना.हजारों-लाखों लोग दशकों तक इस घाव को लिए इस दुनिया से चले गए. विएतनाम, युगोस्लाविया, अफगानिस्तान, इराक जैसे देशों के आधुनिक शासकों ने भी बड़ी-बड़ी लडाइयां लड़ी. आज भी अफगानिस्तान, इराक, सोमालिया, कांगो, रवांडा, पाकिस्तान और अन्य देशों के लोग टीवी के परदे पर दिखते रहते हैं. कभी बम और मिसाइलों से उडे हुए चिथरों के रूप में तो कभी उनसे बचने के लिए दौड़ते-भागते शरणार्थियों के रूप में. कई बार शरणार्थी दिवस के दिन अपने शरणार्थी शिविरों में बेठौर जिंदगी जीते हुए भी ये कैमरे से सामने दिख जाते हैं. शासक आये और गए, कबीले कब के ख़त्म हो गए लेकिन मरने का कबीलाई अंदाज अभी भी हमने जिन्दा रखा है. तभी तो हजारों-लाखों लोगों को खोने के बाद भी मानव सभ्यता आपस की लड़ाई का कोई तोड़ नहीं निकाल सकी. सदियों से हम ऐसे ही लड़ते आये हैं और लड़ते रहेंगे. ये एक अनथक कहानी है और यु हीं जारी रहेगी ये लड़ाई...दिमाग पर ज्यादा जोर मत डालिए...बस देश-दुनिया के नजारे देखते रहिये और गिनते जाइये लाशों को...

Sunday, 24 May 2009

चलो अब पार्टी को धो-पोछ कर चमका लें...

चुनाव ख़त्म हो गया। जनता ने दगा दे दिया और किस्मत ने भी साथ नहीं दिया। हमें क्या मालूम था इस तरह से बिसरा देगी जनता हमारे काम को। क्या-क्या नहीं किया इस कृतघ्न जनता के लिए. जिस जनता के हाथों में एक अदद ग्लास तक नहीं थी उसे कमंडल वगैरह बटवाए... मस्जिद-मंदिर की लड़ाई खड़ी की... रथ यात्रायें की...इस दौरान न तो धूप देखा और न बरसात का भय अपने ऊपर हावी होने दिया. बस एक गलती तो की थी. इतनी छोटी सी बात की इतनी बड़ी सजा. अरे जबान है फिसल गई... ये समझना चाहिए था न. हमने तो अपनी इमेज चमकाने के लिए पडोसी देश के कायदे आजम की तारीफ कर दी थी ताकि जब वापस अपने देश लौटूं तो सेकुलर नेता के रूप में स्वागत के लिए लोग तैयार दिखे. लेकिन बेवकूफ जनता ने न जाने क्या समझ लिया. उल्टे पीछे पड़ गए सब. पार्टी अध्यक्ष का पद तक छीन लिया।

फिर बड़ी मेहनत से हमने खुद को झाड़-पोछ कर नए प्रोडक्ट के रूप में बाज़ार में उतारा। इस बार इन सबसे ऊपर उठकर हमने खुद को पीएम-इन-वेटिंग के रूप में लोगों के सामने रखा। इसके लिए कितनी मेहनत करके अपने ऊपर किताब लिखा। देश के विभिन्न शहरों में उसके विमोचन के लिए कार्यक्रम कराये. लोगों तक अपने किताब की खबर पहुँचाने के लिए मीडिया वालों पर न जाने कितने खर्च करने पड़े. अपनी छवि चमकाने के बाद उतरे थे हम चुनाव के मैदान में. कितना खर्च करना पड़ा था इस जनता को लुभाने के लिए. देश भर में न जाने कितनी रैली, कितनी चुनावी सभाओं में बोलते-बोलते गला ख़राब हो गया. वादों और आश्वासनों को गढ़ते-गढ़ते बचपन से याद किये गए सारे शब्द ख़तम हो गए. इतना सारा कुछ कोई करता है क्या किसी गैर के लिए. अरे हमने तो इस देश की जनता को अपना माना था मुझे क्या मालूम इस जनता का दिल मोम का नहीं पत्थर का है. लगा था मेरे इन कामों को देखते हुए देश की जनता जरूर मेरी इज्ज़त का ख्याल रखेगी. जिस जनता के लिए इतना कुछ किया वो मेरे जुमले पीएम-इन-वेटिंग को मेरे लिए गाली थोडी ही बनने देगी. लेकिन इस अवसरवादी जनता ने ऐसा नहीं किया और गच्चा दे दिया. इस हार से हम इतने शर्मिंदा हैं कि अब घर से बाहर निकलने का जी नहीं करता है मेरा. मैंने तो सोच रखा था सब छोड़ कर चला जाऊंगा कैलाश पर्वत पर मंथन करने. लेकिन पार्टी ...पीछा छोडे तब न. मेरे हटने की खबर सुनते ही पार्टी के नेताओं में मेरी खाली जगह भरने के लिए जैसे होड़ मच गई. इस माथा-फुटौवल से पीछा छुडाने के लिए सबने फिर मुझे जाने ही नहीं दिया और हम फिर से वहीँ के वहीँ रह गए. लेकिन कोई बात नहीं हमने एक बैठक की है और आगे के लिए अपना एजेंडा तय किया है।

हमने तय किया है कि हम अब पार्टी को संसद से सड़क तक चाक-चौबंद करेंगे. संसद में हम जहाँ मजबूत विपक्ष के रूप में नजर आने का प्रयास करेंगे वहीँ बाहर संगठन चुनावों के जरिए भावी चुनौतियों के लिए अपने को चाक-चौबंद करेंगे. भाई इस बार चूक गए तो क्या... अगली बार तो नहीं छोडेंगे. यहाँ तक कि हमने तो संगठन को चुस्त दुरुस्त करने की तैयारी भी शुरू कर दी है। हमने पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक अगले महीने रखी है और पहले इसमें इस चुनाव में अपनी हार के कारणों की समीक्षा करेंगे फिर आगे की रणनीति पर विचार करेंगे. इसके साथ ही हम चिंतन बैठक भी करेंगे. फिर पार्टी को खूब धो-पोछ कर बाज़ार में नए ब्रांड के कवर में लपेट कर लायेंगे. इसके प्रचार पर भी खूब ध्यान देना होगा. किसी अच्छे से विज्ञापन राइटर से स्क्रिप्ट लिखवाकर जनता के सामने टीवी, रेडियो और अख़बार के जरिये परोसेंगे। उस समय के किसी मशहूर और धासु गाने के अधिकार खरीद कर उसे अपने नारे की चाशनी में लपेटकर जनता के सामने परोस देंगे. फिर देखेंगे कैसे हमारी बातों में नहीं आती है जनता. इतनी ओवर हौलिंग के बार हम एकदम नए दिखेंगे...एक दम चकाचक--- एकदम ब्रांड न्यू...

Monday, 18 May 2009

ई का हो गवा रे...नेताजी का सब खेले गड़बड़ा गवा...

हाँ तो हम बात कर रहे थे अपने नेताजी की। रात में अलार्म लगाकर सोये थे कि सुबह चुनाव परिणाम आने वाला है और रामफल पंडित की बात सच निकली तो उनकी किस्मत का दरवाजा आज खुलने वाला है. सुबह हुई, अलार्म बजी और नेताजी जल्दी-जल्दी तैयार हो मतगणना केंद्र की ओर चल पड़े. निकलते वक्त उनकी पत्नी ने टीका लगाया ये सोचकर कि शायद आज पति महोदय की किस्मत साथ दे ही दे. हाँ तो नेताजी समय पर मतगणना केंद्र पहुँच गए. नेताजी काफी कांफिडेंट थे आखिर रामफल पंडित का कहा सच काहे न होगा. नेताजी की नज़र मतगणना कक्ष से बाहर आ रहे हर आदमी पर थी. बाहर बोर्ड पर लिखे जा रहे हर अपडेट को नेताजी अपनी किस्मत की ओर बढ़ता कदम मान कर चल रहे थे. लेकिन वैसा नहीं हो पाया जैसे नेताजी ने सोच रखा था.

धूप चढ़ती गई और चुनाव का परिणाम आ गया। नेताजी दौड़ में बहुत पीछे रह गए थे. सामने से जब विजयी उम्मीदवार का जुलूस चला तो नेताजी भी घर की ओर रुख किये. एक-एक कदम ऐसे भारी लग रहा था जैसे किसी ने सैकड़ों टन वजन पैरों में बाँध दिया हो. घर जाने की हिम्मत नहीं हुई और गाँव के पहले चौराहे से ही नेताजी ने रामलाल के चाय की दुकान की ओर रुख किया. लेकिन वहां जाना भी उनके लिए ठीक साबित नहीं हुआ. इलाके के कई लोग वहां बैठे थे और जमानत जब्त करवाकर लौटे नेताजी की खिल्ली उडाने से कोई चूकना नहीं चाहता था. नेताजी को आज महसूस हो रहा था कि अच्छा होता रामफल पंडित की बातों में नहीं आता. इस तरह इलाके के लोग खिल्ली तो नहीं उडाते. वहा से हटकर नेताजी पास के बगीचे में बने चबूतरे पर बैठ गए. कई सप्ताह बाद नेताजी को अकेले बैठने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था. वरना जबतक चुनाव चला लोग उनको घेरे रहते थे. आज सुबह भी माधव, पूरण, चंदर वगैरह उनके साथ ही आये थे मतगणना केंद्र तक. लेकिन हारने के बाद धीरे-धीरे बहाना बनाकर कट लिए. बाद में नेताजी ने उन्हें विजयी उम्मीदवार के जुलूस में झूमते हुए देखा था. लेकिन अब कर भी क्या सकते थे. अब नेताजी को इस सब लोगों पर खर्च किये का अफ़सोस हो रहा था.

नेताजी जैसे अतीत की गहराइयों में डूब गए। कहाँ कल तक देखा करते थे संसद में पहुचने के सपने. आज संसद तो क्या घर में घुसने की भी हिम्मत नहीं हो रही है. नेताजी को मालूम था क्या होने वाला है घर पहुचने पर. पत्नी जो सुबह आरती लेकर बिदाई दे रही थी. घर पहुचते हीं हल्ला मचा देगी. मोहल्ले के लोग सुने तो सुने लेकिन वो कहाँ बख्शने वाली है आज. कल नेताजी ने प्लान बनाया था सरकार को समर्थन देने तक पार्टी उन्हें किसी पहाडी इलाके में छुपा कर रखेगी और वे अपने परिवार के साथ घूमने का मजा ले सकेंगे. अभी ये योजना उन्होंने मन में ही रखी थी आज जीतने के बाद बताने वाले थे. लेकिन उनकी बीवी को इससे क्या. इलाके के वोटरों ने उनके सारे सपने की वाट लगा दी. घर के अलमारी में धुलकर रखवाई सिल्क का कुरता-पजामा और चमकदार जूता जो उन्होंने जीतने के बाद पहनने के लिए बनवाया था उन्हें गाली देते हुए प्रतीत हो रहे थे. हल्का अँधेरा घिरने के बाद वे सर झुकाए घर की ओर निकले. सोचा अब कोई नहीं टोकेगा और मजाक नहीं उडाएगा. एक बार घर पहुँच जाये तो कुछ दिन बाहर नहीं निकलेंगे. जब सब लोग शांत हो जायेंगे तब ही निकलेंगे मोह्हल्ले में.

अभी नेताजी अपनी गली में मुड़े ही थे कि पता नहीं कहाँ से खेदन धोबी की नजर उनपर पड़ गई. . नेताजी ने लाख बचना चाहा लेकिन उस कमबख्त ने टोक ही दिया. अरे नेताजी अपना कुरता और को़ट तो लेते जाइये. ये कहते हुए उसने नेताजी का रेशमी कुरता, गरम को़ट और गमछा पकडा दिया. अब नेताजी उस बेवकूफ को क्या कहते, हाथ में टांगे घर की ओर बढे. नेताजी ने को़ट धुलने को ये सोचकर दे दिया था कि जीतने के बाद अगर पार्टी की ओर से उन्हें किसी बर्फिले इलाके या किसी ठंडे इलाके में स्थित हील स्टेशन में छुपाया जायेगा तो ये कोट काम आएगा. लेकिन आज नेताजी को हाथ में टंगा को़ट उनके सपनो की लाश के समान लग रहा था. घर के सामने आकर नेताजी ने दरवाजे पर निगाह डाली. काफी हिम्मत बटोर कर नेताजी ने दरवाजे की ओर कदम बढाया. लेकिन आज उनके कदम उनका साथ नहीं दे रहे थे और घर किसी अँधेरी गुफा के समान लग रहा था. उन्हें लग रहा था कि आज जो अन्दर गए तो फिर कभी बाहर नहीं निकल सकेंगे...

Saturday, 16 May 2009

वोटर युग का अवसान अब बस होने ही वाला है!

भारतीय लोकतंत्र का मैं भी एक वोटर हूँ। अब यानी कि १५ मई की आधी रात को मुझे लगाम अपने हाथ से छूटती हुई दिख रही है. वैसे तो १३ मई से ही हम जैसे वोटर रुपी जीव खुद को असहाय महसूस करने लगे थे. लेकिन अब जाकर लगाम अपने हाथ से पूरी तरह बाहर जाती हुई दिख रही है. वैसे तो लोकतंत्र के बारे में कहा जाता है कि ये जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा चलाया जाने वाला शासन है लेकिन सच कहें तो अब अगले 5 सालों तक हम वैसे ही होंगे जैसे चिडियाघर के पिजरे में बंद शेर होता है. हम फुफकारते तो रहेंगे लेकिन कुछ कर नहीं सकेंगे. अब हमारा वक्त ख़त्म हो रहा है और हमारे नेताजी का युग शुरू हो रहा है.

हो भी क्यूँ न इसी दिन के लिए न जाने कब से मन्नत मांगते आ रहे थे हमारे नेताजी। उनकी अम्मा तो उनके सफल होने की बाट जोहते कब की इस दुनिया से रुखसत हो गईं। इतना ही नहीं नेताजी घर से बाहर रहने के कारण हमेशा अपने घर के लोगों की आलोचना के शिकार होते रहे हैं। प्रेमचंद के उपन्यास शतरंज के खिलाडी के पात्र नवाब साहब की तरह उनकी बीवी जब चाहे तब उनपर बरस उठती हैं- "आपको घर से क्या लेना-देना, हमेशा पता नहीं क्या भाषणबाजी चलती रहती है। पता नहीं कब काम के आदमी बनोगे। पूरी उम्र बीत गई इसी फालतूबाजी में." नेताजी ने इस बार देवी मां के यहाँ मन्नत मांग रखी है जीत कर आयेंगे तब जवाब देंगे इनको. तब हम भी दुनिया में सीना तानकर चल सकेंगे. तब हम देश के विशेषाधिकार प्राप्त नागरिक होंगे और जो चाहे कर सकेंगे. तब कोई दिखाए हमारी गाड़ियों के काफिले के रस्ते में आकर. ऐसे रौदेंगे कि पता भी नहीं चलेगा. एक एक चीज के लिए तरसे हैं लेकिन अब आ रहा है हमारा वक्त. देश के विकास में सहभागी बनने का, परियोजनाएं आगे बढ़ाने का, ठेकेदारी पास कराने का, देश पर हुकुम चलाने का...तब लेंगे अपने इलाके के अधिकारीयों की क्लास और लेंगे अपने साथ हुए हर बदतमीजी का बदला.

वैसे इन सब से पहले नेताजी को चुनाव में किये गए अथाह खर्च की वापसी की चिंता भी सता रही है। इसके लिए भी उन्होंने रोड मैप बना रखी है. भाई गठबंधन की राजीनीति के ज़माने में नेताजी को एकला चलने की नीति की ताकत और अपनी अहमियत अच्छी तरह मालूम है. इसलिए नेताजी अभी अपने पत्ते नहीं खोल रहे हैं और संसद में पहुँच कर किसे समर्थन देंगे इसका फैसला सामने वालों की थैली का अंदाजा लगने के बाद ही करेंगे. इस मौके का इस्तेमाल नेताजी परिवार के संग किसी महँगी और सुंदर जगह की मुफ्त यात्रा के लिए भी करने वाले हैं. जिस दल से नेताजी का टाका भिडेगा वो बहुमत साबित होने तक किसी गुप्त जगह पर नेताजी को रखेगी ही. तब नेताजी कोई रमणीय स्थल का चुनाव करेंगे और अपने परिवार के साथ खूब मौज-मस्ती करेंगे.

वैसे नेताजी नए ज़माने के उसूलों से अनजान नहीं हैं। अपने लम्बे राजनीतिक जीवन में उन्होंने ज़माने को खूब जांचा-परखा है. इसलिए उन्होंने संसद में पहुँचने के बाद---"बी प्रोफेशनल" शब्द को अपना मूलमंत्र बनाने का फैसला किया है-- वो भली-भांति जानते हैं कि उनके जीतने के बाद कैसे उनके रिश्तेदार जो कल तक उनको घास भी नहीं डालते थे अब उनको डोरे डालेंगे. इसलिए नेताजी ने प्रोफेशनल अंदाज अपना कर केवल उन्हीं लोगों का काम करने का फैसला किया है जो उनके आर्थिक विकास में सहायक सिद्ध हो सके और खुद के साथ-साथ नेताजी की आर्थिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त कर सके.

आज का दिन नेताजी के ऊपर बहुत भारी गुजरा। दिनभर नेताजी रामफल पंडित के साथ बाहर के कमरे में बैठकर कुंडली में न जाने क्या तलाशते रहे. माफ़ करिएगा मैं नेताजी पर कोई आरोप नहीं लगा सकता, क्या पता नेताजी और पंडित रामफल मिलकर कुंडली और पंचांग में से देश का कुछ भला तलाश कर निकाल रहे हों. वैसे पंडित जी के कहने पर ही नेताजी ने राजनीति में दांव आजमाने का फैसला किया था. जब पंडितजी ने उन्हें कहा था कि आपकी कुंडली में तो राजयोग है और आपकी पांचों अंगुलियाँ मरते दम तक घी में डूबी रहेगी. काफी सोचने-विचारने के बाद नेताजी ने राजनीति में उतरने का फैसला किया था क्योंकि उनके अनुसार यही वो जगह थी जहाँ रहकर वे राज भोग सकते हैं और उनकी पांचों अंगुलियाँ घी में डूब सकती है वरना आज के आम आदमी को घी तो क्या दूध तक नसीब होना मुश्किल हो गया है...रात में सोते वक्त नेताजी ने घड़ी में अलार्म लगा लिया है कल सुबह जल्दी उठना है. पंडित रामफल की माने तो कल ही शुभ मुहूर्त है नेताजी के कुंडली में लिखे राजयोग के पूर्ण होने का...

Friday, 15 May 2009

'स्लमडॉग' अजहरुद्दीन और मिलिनेअर फ्रीडा पिंटो!

हाल ही में एक फिल्म आई थी 'स्लमडॉग मिलिनेअर'। एक चाय वाले के करोड़पति बनने की अविश्वश्नीय लेकिन दर्दभरी दास्ताँ। फिल्म में देशी-विदेशी क्रियेटिव महारथियों का जमावाडा था. ब्रिटिश डायरेक्टर, भारतीय संगीत निर्देशक और फ्रेंच डीजे के तडके के बीच गरीबी की ऐसी जबरदस्त मार्केटिंग की गई कि फिल्म ने दुनिया भर में अपना डंका बजा दिया. फिल्म ने ८ ऑस्कर जीते और चमचमाते भारतीय सिनेमा जगत ने इसे अपनी सफलता के रूप में प्रचारित किया. फिल्म ने जबरदस्त कारोबार किया॥एक रिपोर्ट के अनुसार फिल्म अब तक 32 करोड़ डॉलर से ज्यादा की कमाई कर चुकी है।

इस फिल्म से जुडी दो खबरें आज पढने को मिली। दोनों खबरें इस फिल्म से जुड़े कलाकारों से जुडी हैं। पहली खबर फिल्म की हीरोइन फ्रीडा पिंटो से जुड़ी हुई है. इस फिल्म की अपार सफलता ने फ्रीडा को अचानक लाइम लाईट में ला दिया. फ्रीडा आज के वक्त में हॉलीवुड के मंहगे सितारों में शामिल हो चुकी है. फ्रीडा के खाते में आज एक और सफलता जुड़ गई. मशहूर फैशन पत्रिका 'मैक्सिम' की दुनिया के १०० हॉट स्टार्स की लिस्ट आई है और फ्रीडा ने ४९वे स्थान पर जगह बनाई है. इतना ही नहीं मैक्सिम के मार्च के इंडियन संस्करण के कवर पर भी फ्रीडा दिखेंगी. मतलब सफलता आज फ्रीडा के कदम चूम रही है।

इसी फिल्म में एक बाल कलाकार अजहरुद्दीन इस्माइल एम। शेख ने भी काम किया था। झुग्गी का रहने वाला अजहरुद्दीन आज भी वही रहता है उसकी लाइफ स्लम से शुरू हुई थी और आज भी वही पल रही है. स्टारडम ने उसे झुग्गी से नहीं निकाला. फिल्म की अब तक की कमाई अरबो डॉलर भले ही हो लेकिन इससे अजहरुद्दीन की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता. इतना ही नहीं आज हुई एक घटना ने अजहरुद्दीन को झुग्गी से भी निकाल बाहर कर दिया. मुंबई में गुरुवार सुबह वृहन मुंबई नगर निगम (एमसीजीएम)द्वारा करीब 50 झोपड़ियां ढहा दिए गए. इसमें अजहरुद्दीन की झुग्गी भी थी. मीडिया को जैसे ही भनक मिली दौड़ पड़े टूटी हुई झुग्गी की ओर. मीडिया को मसाला मिल गया था. अजहर ने जो मीडिया को बताया वो गौर करने वाली बात है, अजहर ने बताया---"उसके पास रहने को अब कोई ठिकाना नहीं। हम चिलचिलाती धूप में सड़क पर बैठे हैं। हमारा सारा सामान या तो फेंक दिया गया है या फिर नष्ट हो गया है। हम नहीं जानते आज हमारा पेट कैसे भरेगा। नहीं मालूम कि शाम को मैं क्या खाऊँगा और कहाँ सोऊँगा." फिल्म की सफलता के बाद इन बाल कलाकारों को घर देने की घोषणा की गई थी जाहिर है अगर घर मिल गया होता तो ये झुग्गी में क्या करते...

फ़िल्मी स्लमडॉग को मिलिनेअर बनाकर 'स्लमडॉग मिलिनेअर' जरूर बिलिनेयर बन गया लेकिन इससे स्लम की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा. हाँ पुलिस ने जरूर स्लम ख़त्म कर गरीबी मिटाओ, नहीं-नहीं सॉरी "गरीबों को मिटाओ" का अपना वादा पूरा किया है...

Thursday, 14 May 2009

सर्वे, सुराही और लोकतंत्र का फ्रॉड!

१३ मई २००९। शाम के ५ बजते हैं. देश का आखिरी वोटर अपने मताधिकार का प्रयोग कर ईवीएम से दूर होता है और अचानक समाचार चैनलों के परदे पर हलचल मच उठती है. अचानक हर समाचार चैनल पर एक्जिट पोल और सर्वे का संसार जगमगा उठता है. चुनाव के संभावित परिणामों को लेकर हर चैनल का अपना राग, हर चैनल पर अलग-अलग आंकडे और हर चैनल के लिए आंकडे जुटाने वाले अलग-अलग नाम. हर आंकडे का विश्लेषण करने के लिए हर चैनल पर अलग-अलग चेहरा. ये है लोकतंत्र का बाज़ार और दुनिया की सबसे बड़ी लोकतंत्र में बाजारवाद की पहुँच.

हर चैनल अपने एक्जिट पोल के नतीजे को अगर-मगर की चाशनी में लपेट कर पेश किये जा रहा था। इसके साथ ही एसएमएस का खेल भी शुरू हो गया. एक मशहूर चैनल ने एक मोबाइल कम्पनी के विज्ञापन के साथ सही-सही सीट का आकलन करने की प्रतियोगिता शुरू कर दी और विजेता के लिए इनाम की घोषणा भी कर दी. हमारे गाँव में इसे बुज्झ्वल कहा जाता है. मुझे बचपन में अपने पड़ोस के एक बुजुर्ग के इस तरह के बुज्झ्वालों का लगातार सामना करना पड़ता था. वैसे इसमें कोई ज्यादा झमेला नहीं है. अगर आपका तुक्का सही बैठा तो आपकी बल्ले-बल्ले और अगर तुक्का फुस्स हो गया तो बात बदल डालिए. एक्जिट पोल को लेकर अपने देश में अब तक ऐसा ही होता रहा है. हर चुनाव के वक्त तुक्का खूब लगाए जाते हैं और चुनाव परिणाम आने के बाद जब सच्चाई सामने आती है तबतक टीवी चैनल वाले अच्छी-खासी कमाई निकाल चुके होते हैं और तब जनता इन्हें कोसते फिरती है. लेकिन तब किया ही क्या जा सकता है. यहाँ दर्शको की स्थिति बिलकुल देश के वोटर की तरह है जो नेताओं को जीताने के बाद अगला ५ साल असहाय की तरह काटती है. वोट की शक्ति इस्तेमाल कर लेने के बाद फिर ५ साल नेताओं को कोसने में बीता देती है.

एक्जिट पोल और सर्वे के इस फ्रॉड की सबसे अच्छी खिंचाई आज एक टीवी चैनल पर आये एक वरिष्ठ पत्रकार ने की। एक मशहूर टीवी चैनल का लाइव प्रोग्राम चल रहा था. न्यूज़ रूम में माइक लेकर घूम रहे एक जाने-माने एंकर ने जब उनसे एक्जिट पोल के बारे में पूछा तो उन्होंने हाथ में एक सुराही लेकर इसका जमकर मजाक उड़ाया. सुराही में जहाँ-तहां पानी डालकर वे और फिर उसे उडेलने का प्रयास कर वे कुछ देर तक उसमें देश की सबसे बड़ी पार्टी तलाशते रहे. उस समय टीवी देखने वाले जरूर सोच रहे होंगे कि कुछ जरूर हो रहा है लेकिन कुछ देर तक सुराही वाला तमशा करने के बाद उन्होंने कहा कि ये कोई तरकीब नहीं बल्कि एक फ्रॉड है और एक्जिट पोल जैसी चीजे इसी तरह का प्रयास है. कुछ भी हो कुछ पल के लिए टीवी के परदे पर चल रहा ये तमाशा मेरी जिज्ञासा का केंद्र-बिंदु बना रहा.

लेकिन फिल्म अभी बाकी है मेरे दोस्त... लोकतंत्र के तमाशे का ये तो सेमीफाइनल है. फाइनल तो १६ मई को होगा जब ईवीएम के द्वार खुलेंगे और देश के वोटरों की करतूत सबके सामने आयेगी. फिर बनेगी देश की लोकप्रिय सरकार. किसी महान आदमी ने कहा था- "किसी भी समाज का नेतृत्व उसकी जनता और उसकी सोच का आइना होती है"...हम भी इस इन्तेजार में है कि १६ तारीख आये और जनता और उसकी सोच ईवीएम से बहार निकल कर सबको दिखाई दे...जय लोकतंत्र...

Wednesday, 13 May 2009

पैसा खुदा तो नहीं लेकिन खुदा से कम भी नहीं है!

"पैसा खुदा तो नहीं लेकिन खुदा से कम भी नहीं है"-- पता नहीं किस महान आत्मा ने ये बात कही थी, लेकिन कुछ भी हो बात है बड़ी पत्ते की। पैसे की महिमा कौन नहीं जानता. आप सब जानते हैं कि यहाँ बिना पैसे के एक पत्ता भी नहीं हिल सकता. बिना पैसे के आज के जमाने में किया ही क्या जा सकता है. करने की तो छोडिये अगर आपके पास अथाह धन नहीं है तो फिर ये दुनिया आपको जीने भी नहीं देगी. अगर आप सपनों के देश भारत के नागरिक हैं और आपकी आय रोजाना ६० रूपये से कम है तो फिर ये दुनिया आपको गरीबों की सूचि में डाल देगी. उस महान आदमी द्वारा कही गई महान बात को अपने जीवन में नहीं उतार सकने वाले भारत में करीब एक तिहाई लोग हैं. वर्ल्ड बैंक की ग्लोबल इकनॉमिक प्रॉस्पेक्टस फॉर 2009 शीर्षक से जारी रिपोर्ट के अनुसार गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली आबादी के प्रतिशत के लिहाज से भारत की स्थिति केवल अफ्रीका के सब-सहारा देशों से ही बेहतर है। बैंक ने अनुमान जताया है कि 2015 तक भारत की एक तिहाई आबादी बेहद गरीबी (1.25 डॉलर, यानी करीब 60 रुपये प्रति दिन से कम आय) में अपना गुजारा कर रही होगी। हमारे पडोसी देश चीन के लिए यह आंकड़ा 6.1 प्रतिशत और दुनिया के सबसे गरीब सब-सहारा अफ्रीकी क्षेत्र के लिए 37.1 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है।

((कहां तो तय था चिरागां हरेक घर के लिए, यहां तो रोशनी नहीं है शहर के लिए))

तेजी से संपन्न हो रहे हमारे देश के ऐसे बदकिस्मत लोगों के लिए पिछले ६ दशकों में चुनावों के वक्त न जाने कितने नारे दिए गए, कितने आश्वासन दिए गए. इतने सालों में देश में विकास के नाम पर करोडों-अरबो रूपये खर्च हुए. हालत ऐसी है कि देश की राजनीति आजकल करोडों में पहुँच गयी है. मसलन अगर आपको चुनाव के मैदान में उतरना है तो करोडों की औकात बनानी पड़ेगी. लेकिन आज भी देश में करीब ४०-४५ करोड़ लोग ऐसे है जो रोजाना ६० रुपया कमा पाने में भी सक्षम नहीं हैं. अभी भी देश में चुनाव चल रहे हैं और लोगों को गरीबी से मुक्ति दिलाने के नाम पर न जाने कितने सपने दिखाए जा रहे हैं लेकिन देश जानता है कि जब इतने सालों में किस्मत यहीं पर बनी हुई है तो आज कौन सा अलादीन का चिराग हाथ लग गया है कि आज देश के बदकिस्मत लोगों की किस्मत चमक जायेगी.

Tuesday, 12 May 2009

पता नहीं कब छुटकारा मिलेगा इन वोटरों से...

अजी निराश मत होइए अब शुभ मुहूर्त आने ही वाला है। जी मैं १3 मई की बात कर रहा हूँ. जब शाम ५ बजे आखिरी वोटर अपनी ताकत दिखा लेगा और फिर हमारे देश की राजनीतिक बिरादरी जनता-जनार्दन के चंगुल से अगले ५ सालों के लिए(?) आजाद होकर अपने मन की कर सकेगी. अभी तो देश की जनता राजनितिक बिरादरी के लोगों की सारी मनोकामनाओं और इच्छाओं पर कुंडली मारे बैठी है और ऐसे नखरे दिखा रही है कि कुछ भी हमारे मन का गलत किया तो अपने वोट की ताकत दिखाकर ऐसे बटन दबायेंगे की कहीं के नहीं रहोगे. अब ज्यादा दिन की बात नहीं है इसलिए राजनीतिक बिरादरी के लोग इन्हें झेले जा रहे हैं. भाई जितना फुफकारना है १३ मई तक फुफकार लो... फिर हर काम के लिए हमारे घर के चक्कर ही लगाओगे न. फिर दिखायेंगे हम भी अपनी जात. फिर बताएँगे हम अपनी ताकत. एक-एक मुलाकात के लिए नाको चने न चबवा दिए तो फिर नेता नाम नहीं.

मौज-मस्ती से लेकर सब कुछ इस जनता-जनार्दन के बच्चे ने रोक रखा है। लेकिन बेटा कब तक रोकोगे...१३ तक ही न. फिर ५ साल करेंगे हम अपनी मौज-मस्ती. तब देखेंगे कहाँ-कहाँ रोकते हो. तब सिस्टम अपनी होगी, पुलिस-प्रशासन अपना होगा और फिर सरकारी खजाना भी अपना होगा. फिर टांग अड़ा कर देखना- तब बताऊंगा.

अब देखिये नेता जी लोगों ने अपने कितने अरमान चुनाव ख़त्म होने तक के लिए रोक रखे हैं। एक किस्सा चुनाव के दौरान सबसे मशहूर हो गया. देश के एक मशहूर प्रान्त के एक मशहूर सेकुलर नेता और वर्तमान मुख्यमंत्री जी जी जो अबतक सिर्फ और सिर्फ सेकुलर कहलाना पसंद करते थे...उन्होंने अपने राज्य में चुनाव ख़त्म होने के अगले दिन सेकुलरवाद के सबसे बड़े विरोधी के साथ मंच संभाल लिया और सेकुलरवाद की हवा निकाल दी.इसी तरह अपने रामपुर के शोले इतने तेज भड़क रहे हैं कि हालात बेकाबू हो रहे हैं. ठाकुर और जय की दादागिरी से आहत होकर अपने वीरू भैया ने १३ मई के बाद सक्रिय राजनीति से सन्यास लेने की घोषणा कर दी है.इतना ही नहीं लाल बादशाह ने भी अपने पत्ते १६ मई के बाद खोलने की घोषणा कर दी है. ऐसे ही न जाने कितने सपने १३ मई तक के लिए रोक राखी है राजनीतिक लोगों ने जब उन्हें आज़ादी मिलेगी.

सभी दलों के लोग १३ मई को राहत की साँस ले सकेंगे और जनता के चंगुल से बाहर निकल सकेंगे. तब देखना मनाएंगे आज़ादी का जश्न. सड़कों पर ढोल-नगाडे बजेंगे. चहक-कर मजे करेंगे. फिर न तो वोट का डर होगा और न ही चुनाव आयोग जैसे मौसमी समस्याओं का भय. फिर तुम भी आना हमारे जश्न में शामिल होने. भाई भीड़ बढाने के लिए कुछ तो चाहिए ही. हमारी चुनावी सभाओं में भी तुम ही भीड़ बढाने आते थे और अब हमारे जश्न का रंग फीका मत करो और अगर नहीं आये तो याद रखना जब हमसे काम पड़ेगा फिर बताएँगे...

Tuesday, 5 May 2009

चुनावी मैदान से सकुशल पीछे हटने की कला...

टीवी पर एक उम्मीदवार के चुनावी मैदान से पीछे हटने की खबर देखकर आज अचानक मुझे अपने एक मित्र की याद आ गयी। उन्हें राजनीतिक व्यक्ति कहना तो नहीं चाहता लेकिन उनकी और कोई पहचान भी नहीं है।वे पिछले २५ सालों से राजनीतिक गलियारों में वैसे ही टहलते रहे हैं जैसे उनका घर हो, उनका बगीचा हो. अपने हर बात में पूरे जोश के साथ वे कहते हैं कि भाई हमने सर के बाल ऐसे ही नहीं सफ़ेद किये हैं इस गलियारे में ढाई दशक बिताये हैं और सबकी रग-रग से वाकिफ हैं. हालाँकि इस दौरान उन्हें किसी ने सीरियसली नहीं लिया. मेरे बार-बार सीरियसली नहीं लेने के बावजूद भी वो अक्सर मेरे करीबी बन बैठते हैं. हर महीने उनके किसी नए प्रस्ताव के लिए मैं तैयार रहता हूँ. हर बार वे किसी नए आईडिया के साथ उपस्थित होते हैं और उस आईडिया के फ़ेल होने तक मुझे उन्हें झेलना होता है. हर बार उनका कहना होता है कि ये फ्लॉप होने वाला आईडिया नहीं है और दुनिया में उन्होंने केवल मुझे ही इस बारे में बताया है. मुझे उनसे कोई दिक्कत नहीं होती क्यूंकि मैं पहले दिन से ही उनके आईडिया के फ्लॉप होने को लेकर आश्वस्त रहता हूँ. और इस भावना के साथ मैं उन्हें हर बार झेल जाता हूँ. पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव के ६ माह पहले एक दिन अचानक मेरे उन मित्र का फोन आया. चौंका देने वाले अंदाज में उन्होंने मुझे एक बहुत जरूरी बात का वास्ता देकर शाम में मिलने के लिए मना लिया. शाम में मिलने पर उनके चेहरे की चमक बता रही थी कि इस बार भाई साहब फिर किसी धांसू आईडिया के साथ हाज़िर हैं. आते ही उन्होंने हाथ में कुछ कागज निकालकर दिखाया. एक विधानसभा क्षेत्र का पूरा ब्यौरा था. भाई साहब ने अपनी जेब से अपना कार्ड निकाला और अपने पोस्टर भी दिखाए. बिल्कुल नए अंदाज में खिचवाए फोटो में भाई साहब एकदम झकास दिख रहे थे. भाई साहब ने छूटते ही कहा भाई इस बार मैं चुनाव लड़ने जा रहा हूँ. मेरे आर्श्चय का ठिकाना नहीं रहा क्योंकि मैं उनकी माली हालत जानता था और आज के वक्त के चुनावी खर्चे के फैशन से भी अनजान नहीं था. मैंने पूछ डाला- भाई साहब इस अनजान शहर में और बिना जेब की इजाज़त के अचानक इस तरह का विचार कैसे आया. उन्होंने अपनी बात बहुत साफ़ अंदाज में समझाई. उनकी बातों को मैं उन्हीं के शब्दों में रख रहा हूँ--- "भाई सच्चाई ये है कि हमने अबतक की अपनी जिंदगी में केवल राजनीति की है और अब हम कोई और काम नहीं कर सकते. राजनीति के चक्कर में अपना शहर अपना राज्य छूटा और अब यहाँ आकर क्या कर सकते हैं. सच्चाई ये है कि हमारे लिए हार-जीत कोई मायने नहीं रखती और जबतक हम राजनीतिक हैं तभी तक जिन्दा है और जब हम राजनीति से दूर हो जायेंगे- ख़त्म हो जायेंगे."--- साफगोई से अपनी बात कहते हुए उन्होंने बताया कि उन्होंने एक हिंदूवादी दल के चुनाव चिन्ह पर पर्चा भी दाखिल कर दिया है. उन्होंने चुनाव की पूरी रणनीति भी मुझे समझाई. पूरे आत्मविश्वास से लबालब वे मुझे लेकर अपने इलाके में निकल पड़े. रास्ते में उनके रणनीतिकार कई मित्र लोगों के यहाँ रुकने पर मुझे राजनीति के बारे में कई नए अनुभव हुए. मसलन मोर्चे निकालने के लिए और उसमें ज्यादा से ज्यादा लोगों को शामिल करने के लिए क्या तैयारी करनी पड़ती है, कैसे आपके सभाओं में लोग आते हैं, उनके कई मित्रों ने सभा के लिए लोगों को लाने का ठेका लिया और साथ ही उसपर आने वाला खर्च भी उन्हें बता दिया. सभाओं के दौरान भीड़ जुटाई जाये इसके लिए एक गायक महोदय से भी उनकी बाते हुई. सारी तैयारियों को देखकर मुझे थोडा-थोडा भरोसा होने लगा कि शायद पिछले दिनों में इन्होने अपने इलाके में जान-पहचान बढाकर चुनाव लड़ने लायक स्थिति में खुद को ला दिया है. सब नज़ारे देखने के बाद मुझे भी वक्त देने का वचन देना पड़ा. लेकिन गाँव जाने के लिए मैंने एक हफ्ते तक न आने की मजबूरी बताई और वापसी के बाद उनके इलाके में काम करने का वचन दिया.

एक हफ्ते बाद वापस आकर अपने वचन के अनुसार मैंने उन्हें सूचना देने के लिए फोन किया कि मैं वापस आ गया हूँ और अब आपको समय दे सकता हूँ। उनकी भाषा बदली हुई थी और उन्होंने तुंरत खुशखबरी सुनाई- भाई मैंने इलाके के हित के लिए चुनाव से अपना नाम वापस ले लिया है। मैंने कहा फिर क्या करना है. उनका जवाब था कि भाई मैंने फलाना पार्टी के लिए चुनाव प्रचार शुरू कर दिया है. इसके साथ ही उन भाई साहब ने नयी पार्टी जो कि उनके पहले वाले दल की विचार के स्तर पर पूरी तरह विरोधी थी की जमकर तारीफ शुरू कर दी. इतना ही नहीं जल्द ही उनके जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन भी दिखने लगे। जब मैं उनके घर पहुंचा तो उनके घर में रंग-रोगन का काम लगा हुआ था और भाई साहब का जोश दुगुना-चौगुना दिख रहा था। कल तक एक-एक पैसे के लिए रोने वाले भाई साहब ने अपना आगे का आईडिया सुना डाला. भाई साहब जल्द ही व्यापर शुरू करने वाले थे और इस बार उन्होंने किसी संभावित फाइनेंसर का नाम लिए बिना व्यापार की अपनी योजना सुना डाली. हैरानी में मैं उनके चेहरे को ताक रहा था. आखिर चुनाव में खडा होने और फिर बैठ जाने के दौरान इतनी ताकत कहाँ से आ गयी इनमें. हमें छोड़ने के लिए वे मोहल्ले में निकले और लोगों से अपनी नयी पार्टी के बारे में उसी अंदाज से बात करते जा रहे थे जैसे १० दिन पहले पिछली पार्टी के बारे में करते उन्हें देखा था. उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी. मैंने इसका कारण पूछा तो उन्होंने फिर साफगोई के साथ कहा- तुम नहीं समझोगे यही राजनीति है॥
धीरे से कहे हुए उनके ये शब्द मेरे कानों में गूंज रहे थे...मेरे लिए ये भी एक नया राजनीतिक ज्ञान था.

Sunday, 3 May 2009

राजनीति में ईमानदारी और खर्चे का झमेला!

हमारे बड़े-बुजुर्ग बड़े आराम से कहते हैं कि भाई राजनीति में अब ईमानदारी का जमाना ही नहीं रहा। कहाँ वो जमाना था जब नेता लोग पैदल चुनाव प्रचार करते थे और कहाँ ये जमाना आ गया जब नेता लोग साधन-संपन्न एसी गाड़ियों में घूम रहे हैं. तब से अब तक देश ने कितना विकास कर लिया ये चुनाव के वक्त ही दिखता है. चुनावी खर्च का भले जो भी ब्यौरा चुनाव आयोग और प्रशासन को दिया जाता हो लेकिन क्षेत्र की जनता को पता रहता है कि हमारे नेताजी ने पिछले ५ साल में कितना विकास कर लिया. सत्ता सुख भोग रहे नेता जी को बेदखल कर मौका अपने हाथ में लेने के लिए सामने वाले में भी उतना ही दम चाहिए. इसलिए अब चुनाव मैदान में वे लोग उतर पाते हैं जिनमे अपने लोगों पर खर्च करने की कुव्वत हो. इलाके के लोग भी अब वैसे लोगों को सीरियसली नहीं लेते जिनके पास जमकर उडाने लायक पैसा नहीं हो.

मुझे याद है जब २ साल पहले मेरे गाँव में ग्राम प्रधान और ब्लाक प्रमुख के चुनाव हुए थे। तब उम्मीदवारों के घर में जैसे मेला लगा रहता था. आम दिनों में घर के आस-पास तक न फटकने वाले इलाके के लोग उनके आगे-पीछे ऐसे दिखने लगे थे जैसे उनसे कई पुश्तों की रिश्तेदारी हो. पडोसी होने के कारण हर गतिविधि पर नज़र हमेशा बनी रहती थी. तब उनके घर से आने वाली मीट और मशाले की खुशबु मुंह में पानी भर दिया करती थी. तब रोज सुबह उठकर दोनों घरो के बीच स्थित गढ्ढे में झांकना मैं नहीं भूलता था. देशी विदेशी शराब के खाली बोतल ऐसे पड़े रहते थे जैसे दीपावली के बाद पटाखों के कागज के टुकडे. शाम में जैसे ही अँधेरा होता लोग गमछे में कुछ छिपाकर ले जाते हुए दिखने लगते. दादाजी से पूछने पर पता चला लोग इन दिनों मुफ्त के मदिरे का जमकर लुत्फ़ उठा रहे हैं. दादाजी ने एक को रोक कर पूछा था भाई रोज खाने के समय से लेकर शाम तक यहीं दिख रहे हो वोट तो इन्हें दोगे न. ये जानकार कि हम ये बात हम किसी को नहीं बताएँगे उस आदमी ने धीरे से कहा---काहेका जब तक जहाँ से जो मिल रहा है ले लो. फिर कौन देखता है किसे वोट दिया. दुसरे उम्मीदवार के पीछे मिठाई के दुकान के बाहर क्या लाइन लगती थी. मिठाई वाले ने पूछने पर बताया था नेता जी ने कहा है चुनाव के दिन तक खाता चलाओ जिन्हें मैं कहूँ उन्हें ही देना और जिनके लिए कहने के बाद ना का इशारा करूँ उन्हें टरका देना. जनता भी कम चालाक नहीं है चुनाव हुआ और चालक जनता ने फिर इन दोनों नेता जी लोगों को टरका दिया. बाहरी उम्मीदवार जीत गया और दोनों की सारी उम्मीदें धरी की धरी रह गयी. निचले स्तर का चुनाव था दोनों ने जमकर पैसे लुटाये थे. इस उम्मीद में कि जीतने पर सारा वसूल लेंगे.