Friday, 15 May 2009

'स्लमडॉग' अजहरुद्दीन और मिलिनेअर फ्रीडा पिंटो!

हाल ही में एक फिल्म आई थी 'स्लमडॉग मिलिनेअर'। एक चाय वाले के करोड़पति बनने की अविश्वश्नीय लेकिन दर्दभरी दास्ताँ। फिल्म में देशी-विदेशी क्रियेटिव महारथियों का जमावाडा था. ब्रिटिश डायरेक्टर, भारतीय संगीत निर्देशक और फ्रेंच डीजे के तडके के बीच गरीबी की ऐसी जबरदस्त मार्केटिंग की गई कि फिल्म ने दुनिया भर में अपना डंका बजा दिया. फिल्म ने ८ ऑस्कर जीते और चमचमाते भारतीय सिनेमा जगत ने इसे अपनी सफलता के रूप में प्रचारित किया. फिल्म ने जबरदस्त कारोबार किया॥एक रिपोर्ट के अनुसार फिल्म अब तक 32 करोड़ डॉलर से ज्यादा की कमाई कर चुकी है।

इस फिल्म से जुडी दो खबरें आज पढने को मिली। दोनों खबरें इस फिल्म से जुड़े कलाकारों से जुडी हैं। पहली खबर फिल्म की हीरोइन फ्रीडा पिंटो से जुड़ी हुई है. इस फिल्म की अपार सफलता ने फ्रीडा को अचानक लाइम लाईट में ला दिया. फ्रीडा आज के वक्त में हॉलीवुड के मंहगे सितारों में शामिल हो चुकी है. फ्रीडा के खाते में आज एक और सफलता जुड़ गई. मशहूर फैशन पत्रिका 'मैक्सिम' की दुनिया के १०० हॉट स्टार्स की लिस्ट आई है और फ्रीडा ने ४९वे स्थान पर जगह बनाई है. इतना ही नहीं मैक्सिम के मार्च के इंडियन संस्करण के कवर पर भी फ्रीडा दिखेंगी. मतलब सफलता आज फ्रीडा के कदम चूम रही है।

इसी फिल्म में एक बाल कलाकार अजहरुद्दीन इस्माइल एम। शेख ने भी काम किया था। झुग्गी का रहने वाला अजहरुद्दीन आज भी वही रहता है उसकी लाइफ स्लम से शुरू हुई थी और आज भी वही पल रही है. स्टारडम ने उसे झुग्गी से नहीं निकाला. फिल्म की अब तक की कमाई अरबो डॉलर भले ही हो लेकिन इससे अजहरुद्दीन की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता. इतना ही नहीं आज हुई एक घटना ने अजहरुद्दीन को झुग्गी से भी निकाल बाहर कर दिया. मुंबई में गुरुवार सुबह वृहन मुंबई नगर निगम (एमसीजीएम)द्वारा करीब 50 झोपड़ियां ढहा दिए गए. इसमें अजहरुद्दीन की झुग्गी भी थी. मीडिया को जैसे ही भनक मिली दौड़ पड़े टूटी हुई झुग्गी की ओर. मीडिया को मसाला मिल गया था. अजहर ने जो मीडिया को बताया वो गौर करने वाली बात है, अजहर ने बताया---"उसके पास रहने को अब कोई ठिकाना नहीं। हम चिलचिलाती धूप में सड़क पर बैठे हैं। हमारा सारा सामान या तो फेंक दिया गया है या फिर नष्ट हो गया है। हम नहीं जानते आज हमारा पेट कैसे भरेगा। नहीं मालूम कि शाम को मैं क्या खाऊँगा और कहाँ सोऊँगा." फिल्म की सफलता के बाद इन बाल कलाकारों को घर देने की घोषणा की गई थी जाहिर है अगर घर मिल गया होता तो ये झुग्गी में क्या करते...

फ़िल्मी स्लमडॉग को मिलिनेअर बनाकर 'स्लमडॉग मिलिनेअर' जरूर बिलिनेयर बन गया लेकिन इससे स्लम की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा. हाँ पुलिस ने जरूर स्लम ख़त्म कर गरीबी मिटाओ, नहीं-नहीं सॉरी "गरीबों को मिटाओ" का अपना वादा पूरा किया है...

Thursday, 14 May 2009

सर्वे, सुराही और लोकतंत्र का फ्रॉड!

१३ मई २००९। शाम के ५ बजते हैं. देश का आखिरी वोटर अपने मताधिकार का प्रयोग कर ईवीएम से दूर होता है और अचानक समाचार चैनलों के परदे पर हलचल मच उठती है. अचानक हर समाचार चैनल पर एक्जिट पोल और सर्वे का संसार जगमगा उठता है. चुनाव के संभावित परिणामों को लेकर हर चैनल का अपना राग, हर चैनल पर अलग-अलग आंकडे और हर चैनल के लिए आंकडे जुटाने वाले अलग-अलग नाम. हर आंकडे का विश्लेषण करने के लिए हर चैनल पर अलग-अलग चेहरा. ये है लोकतंत्र का बाज़ार और दुनिया की सबसे बड़ी लोकतंत्र में बाजारवाद की पहुँच.

हर चैनल अपने एक्जिट पोल के नतीजे को अगर-मगर की चाशनी में लपेट कर पेश किये जा रहा था। इसके साथ ही एसएमएस का खेल भी शुरू हो गया. एक मशहूर चैनल ने एक मोबाइल कम्पनी के विज्ञापन के साथ सही-सही सीट का आकलन करने की प्रतियोगिता शुरू कर दी और विजेता के लिए इनाम की घोषणा भी कर दी. हमारे गाँव में इसे बुज्झ्वल कहा जाता है. मुझे बचपन में अपने पड़ोस के एक बुजुर्ग के इस तरह के बुज्झ्वालों का लगातार सामना करना पड़ता था. वैसे इसमें कोई ज्यादा झमेला नहीं है. अगर आपका तुक्का सही बैठा तो आपकी बल्ले-बल्ले और अगर तुक्का फुस्स हो गया तो बात बदल डालिए. एक्जिट पोल को लेकर अपने देश में अब तक ऐसा ही होता रहा है. हर चुनाव के वक्त तुक्का खूब लगाए जाते हैं और चुनाव परिणाम आने के बाद जब सच्चाई सामने आती है तबतक टीवी चैनल वाले अच्छी-खासी कमाई निकाल चुके होते हैं और तब जनता इन्हें कोसते फिरती है. लेकिन तब किया ही क्या जा सकता है. यहाँ दर्शको की स्थिति बिलकुल देश के वोटर की तरह है जो नेताओं को जीताने के बाद अगला ५ साल असहाय की तरह काटती है. वोट की शक्ति इस्तेमाल कर लेने के बाद फिर ५ साल नेताओं को कोसने में बीता देती है.

एक्जिट पोल और सर्वे के इस फ्रॉड की सबसे अच्छी खिंचाई आज एक टीवी चैनल पर आये एक वरिष्ठ पत्रकार ने की। एक मशहूर टीवी चैनल का लाइव प्रोग्राम चल रहा था. न्यूज़ रूम में माइक लेकर घूम रहे एक जाने-माने एंकर ने जब उनसे एक्जिट पोल के बारे में पूछा तो उन्होंने हाथ में एक सुराही लेकर इसका जमकर मजाक उड़ाया. सुराही में जहाँ-तहां पानी डालकर वे और फिर उसे उडेलने का प्रयास कर वे कुछ देर तक उसमें देश की सबसे बड़ी पार्टी तलाशते रहे. उस समय टीवी देखने वाले जरूर सोच रहे होंगे कि कुछ जरूर हो रहा है लेकिन कुछ देर तक सुराही वाला तमशा करने के बाद उन्होंने कहा कि ये कोई तरकीब नहीं बल्कि एक फ्रॉड है और एक्जिट पोल जैसी चीजे इसी तरह का प्रयास है. कुछ भी हो कुछ पल के लिए टीवी के परदे पर चल रहा ये तमाशा मेरी जिज्ञासा का केंद्र-बिंदु बना रहा.

लेकिन फिल्म अभी बाकी है मेरे दोस्त... लोकतंत्र के तमाशे का ये तो सेमीफाइनल है. फाइनल तो १६ मई को होगा जब ईवीएम के द्वार खुलेंगे और देश के वोटरों की करतूत सबके सामने आयेगी. फिर बनेगी देश की लोकप्रिय सरकार. किसी महान आदमी ने कहा था- "किसी भी समाज का नेतृत्व उसकी जनता और उसकी सोच का आइना होती है"...हम भी इस इन्तेजार में है कि १६ तारीख आये और जनता और उसकी सोच ईवीएम से बहार निकल कर सबको दिखाई दे...जय लोकतंत्र...

Wednesday, 13 May 2009

पैसा खुदा तो नहीं लेकिन खुदा से कम भी नहीं है!

"पैसा खुदा तो नहीं लेकिन खुदा से कम भी नहीं है"-- पता नहीं किस महान आत्मा ने ये बात कही थी, लेकिन कुछ भी हो बात है बड़ी पत्ते की। पैसे की महिमा कौन नहीं जानता. आप सब जानते हैं कि यहाँ बिना पैसे के एक पत्ता भी नहीं हिल सकता. बिना पैसे के आज के जमाने में किया ही क्या जा सकता है. करने की तो छोडिये अगर आपके पास अथाह धन नहीं है तो फिर ये दुनिया आपको जीने भी नहीं देगी. अगर आप सपनों के देश भारत के नागरिक हैं और आपकी आय रोजाना ६० रूपये से कम है तो फिर ये दुनिया आपको गरीबों की सूचि में डाल देगी. उस महान आदमी द्वारा कही गई महान बात को अपने जीवन में नहीं उतार सकने वाले भारत में करीब एक तिहाई लोग हैं. वर्ल्ड बैंक की ग्लोबल इकनॉमिक प्रॉस्पेक्टस फॉर 2009 शीर्षक से जारी रिपोर्ट के अनुसार गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली आबादी के प्रतिशत के लिहाज से भारत की स्थिति केवल अफ्रीका के सब-सहारा देशों से ही बेहतर है। बैंक ने अनुमान जताया है कि 2015 तक भारत की एक तिहाई आबादी बेहद गरीबी (1.25 डॉलर, यानी करीब 60 रुपये प्रति दिन से कम आय) में अपना गुजारा कर रही होगी। हमारे पडोसी देश चीन के लिए यह आंकड़ा 6.1 प्रतिशत और दुनिया के सबसे गरीब सब-सहारा अफ्रीकी क्षेत्र के लिए 37.1 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है।

((कहां तो तय था चिरागां हरेक घर के लिए, यहां तो रोशनी नहीं है शहर के लिए))

तेजी से संपन्न हो रहे हमारे देश के ऐसे बदकिस्मत लोगों के लिए पिछले ६ दशकों में चुनावों के वक्त न जाने कितने नारे दिए गए, कितने आश्वासन दिए गए. इतने सालों में देश में विकास के नाम पर करोडों-अरबो रूपये खर्च हुए. हालत ऐसी है कि देश की राजनीति आजकल करोडों में पहुँच गयी है. मसलन अगर आपको चुनाव के मैदान में उतरना है तो करोडों की औकात बनानी पड़ेगी. लेकिन आज भी देश में करीब ४०-४५ करोड़ लोग ऐसे है जो रोजाना ६० रुपया कमा पाने में भी सक्षम नहीं हैं. अभी भी देश में चुनाव चल रहे हैं और लोगों को गरीबी से मुक्ति दिलाने के नाम पर न जाने कितने सपने दिखाए जा रहे हैं लेकिन देश जानता है कि जब इतने सालों में किस्मत यहीं पर बनी हुई है तो आज कौन सा अलादीन का चिराग हाथ लग गया है कि आज देश के बदकिस्मत लोगों की किस्मत चमक जायेगी.

Tuesday, 12 May 2009

पता नहीं कब छुटकारा मिलेगा इन वोटरों से...

अजी निराश मत होइए अब शुभ मुहूर्त आने ही वाला है। जी मैं १3 मई की बात कर रहा हूँ. जब शाम ५ बजे आखिरी वोटर अपनी ताकत दिखा लेगा और फिर हमारे देश की राजनीतिक बिरादरी जनता-जनार्दन के चंगुल से अगले ५ सालों के लिए(?) आजाद होकर अपने मन की कर सकेगी. अभी तो देश की जनता राजनितिक बिरादरी के लोगों की सारी मनोकामनाओं और इच्छाओं पर कुंडली मारे बैठी है और ऐसे नखरे दिखा रही है कि कुछ भी हमारे मन का गलत किया तो अपने वोट की ताकत दिखाकर ऐसे बटन दबायेंगे की कहीं के नहीं रहोगे. अब ज्यादा दिन की बात नहीं है इसलिए राजनीतिक बिरादरी के लोग इन्हें झेले जा रहे हैं. भाई जितना फुफकारना है १३ मई तक फुफकार लो... फिर हर काम के लिए हमारे घर के चक्कर ही लगाओगे न. फिर दिखायेंगे हम भी अपनी जात. फिर बताएँगे हम अपनी ताकत. एक-एक मुलाकात के लिए नाको चने न चबवा दिए तो फिर नेता नाम नहीं.

मौज-मस्ती से लेकर सब कुछ इस जनता-जनार्दन के बच्चे ने रोक रखा है। लेकिन बेटा कब तक रोकोगे...१३ तक ही न. फिर ५ साल करेंगे हम अपनी मौज-मस्ती. तब देखेंगे कहाँ-कहाँ रोकते हो. तब सिस्टम अपनी होगी, पुलिस-प्रशासन अपना होगा और फिर सरकारी खजाना भी अपना होगा. फिर टांग अड़ा कर देखना- तब बताऊंगा.

अब देखिये नेता जी लोगों ने अपने कितने अरमान चुनाव ख़त्म होने तक के लिए रोक रखे हैं। एक किस्सा चुनाव के दौरान सबसे मशहूर हो गया. देश के एक मशहूर प्रान्त के एक मशहूर सेकुलर नेता और वर्तमान मुख्यमंत्री जी जी जो अबतक सिर्फ और सिर्फ सेकुलर कहलाना पसंद करते थे...उन्होंने अपने राज्य में चुनाव ख़त्म होने के अगले दिन सेकुलरवाद के सबसे बड़े विरोधी के साथ मंच संभाल लिया और सेकुलरवाद की हवा निकाल दी.इसी तरह अपने रामपुर के शोले इतने तेज भड़क रहे हैं कि हालात बेकाबू हो रहे हैं. ठाकुर और जय की दादागिरी से आहत होकर अपने वीरू भैया ने १३ मई के बाद सक्रिय राजनीति से सन्यास लेने की घोषणा कर दी है.इतना ही नहीं लाल बादशाह ने भी अपने पत्ते १६ मई के बाद खोलने की घोषणा कर दी है. ऐसे ही न जाने कितने सपने १३ मई तक के लिए रोक राखी है राजनीतिक लोगों ने जब उन्हें आज़ादी मिलेगी.

सभी दलों के लोग १३ मई को राहत की साँस ले सकेंगे और जनता के चंगुल से बाहर निकल सकेंगे. तब देखना मनाएंगे आज़ादी का जश्न. सड़कों पर ढोल-नगाडे बजेंगे. चहक-कर मजे करेंगे. फिर न तो वोट का डर होगा और न ही चुनाव आयोग जैसे मौसमी समस्याओं का भय. फिर तुम भी आना हमारे जश्न में शामिल होने. भाई भीड़ बढाने के लिए कुछ तो चाहिए ही. हमारी चुनावी सभाओं में भी तुम ही भीड़ बढाने आते थे और अब हमारे जश्न का रंग फीका मत करो और अगर नहीं आये तो याद रखना जब हमसे काम पड़ेगा फिर बताएँगे...

Tuesday, 5 May 2009

चुनावी मैदान से सकुशल पीछे हटने की कला...

टीवी पर एक उम्मीदवार के चुनावी मैदान से पीछे हटने की खबर देखकर आज अचानक मुझे अपने एक मित्र की याद आ गयी। उन्हें राजनीतिक व्यक्ति कहना तो नहीं चाहता लेकिन उनकी और कोई पहचान भी नहीं है।वे पिछले २५ सालों से राजनीतिक गलियारों में वैसे ही टहलते रहे हैं जैसे उनका घर हो, उनका बगीचा हो. अपने हर बात में पूरे जोश के साथ वे कहते हैं कि भाई हमने सर के बाल ऐसे ही नहीं सफ़ेद किये हैं इस गलियारे में ढाई दशक बिताये हैं और सबकी रग-रग से वाकिफ हैं. हालाँकि इस दौरान उन्हें किसी ने सीरियसली नहीं लिया. मेरे बार-बार सीरियसली नहीं लेने के बावजूद भी वो अक्सर मेरे करीबी बन बैठते हैं. हर महीने उनके किसी नए प्रस्ताव के लिए मैं तैयार रहता हूँ. हर बार वे किसी नए आईडिया के साथ उपस्थित होते हैं और उस आईडिया के फ़ेल होने तक मुझे उन्हें झेलना होता है. हर बार उनका कहना होता है कि ये फ्लॉप होने वाला आईडिया नहीं है और दुनिया में उन्होंने केवल मुझे ही इस बारे में बताया है. मुझे उनसे कोई दिक्कत नहीं होती क्यूंकि मैं पहले दिन से ही उनके आईडिया के फ्लॉप होने को लेकर आश्वस्त रहता हूँ. और इस भावना के साथ मैं उन्हें हर बार झेल जाता हूँ. पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव के ६ माह पहले एक दिन अचानक मेरे उन मित्र का फोन आया. चौंका देने वाले अंदाज में उन्होंने मुझे एक बहुत जरूरी बात का वास्ता देकर शाम में मिलने के लिए मना लिया. शाम में मिलने पर उनके चेहरे की चमक बता रही थी कि इस बार भाई साहब फिर किसी धांसू आईडिया के साथ हाज़िर हैं. आते ही उन्होंने हाथ में कुछ कागज निकालकर दिखाया. एक विधानसभा क्षेत्र का पूरा ब्यौरा था. भाई साहब ने अपनी जेब से अपना कार्ड निकाला और अपने पोस्टर भी दिखाए. बिल्कुल नए अंदाज में खिचवाए फोटो में भाई साहब एकदम झकास दिख रहे थे. भाई साहब ने छूटते ही कहा भाई इस बार मैं चुनाव लड़ने जा रहा हूँ. मेरे आर्श्चय का ठिकाना नहीं रहा क्योंकि मैं उनकी माली हालत जानता था और आज के वक्त के चुनावी खर्चे के फैशन से भी अनजान नहीं था. मैंने पूछ डाला- भाई साहब इस अनजान शहर में और बिना जेब की इजाज़त के अचानक इस तरह का विचार कैसे आया. उन्होंने अपनी बात बहुत साफ़ अंदाज में समझाई. उनकी बातों को मैं उन्हीं के शब्दों में रख रहा हूँ--- "भाई सच्चाई ये है कि हमने अबतक की अपनी जिंदगी में केवल राजनीति की है और अब हम कोई और काम नहीं कर सकते. राजनीति के चक्कर में अपना शहर अपना राज्य छूटा और अब यहाँ आकर क्या कर सकते हैं. सच्चाई ये है कि हमारे लिए हार-जीत कोई मायने नहीं रखती और जबतक हम राजनीतिक हैं तभी तक जिन्दा है और जब हम राजनीति से दूर हो जायेंगे- ख़त्म हो जायेंगे."--- साफगोई से अपनी बात कहते हुए उन्होंने बताया कि उन्होंने एक हिंदूवादी दल के चुनाव चिन्ह पर पर्चा भी दाखिल कर दिया है. उन्होंने चुनाव की पूरी रणनीति भी मुझे समझाई. पूरे आत्मविश्वास से लबालब वे मुझे लेकर अपने इलाके में निकल पड़े. रास्ते में उनके रणनीतिकार कई मित्र लोगों के यहाँ रुकने पर मुझे राजनीति के बारे में कई नए अनुभव हुए. मसलन मोर्चे निकालने के लिए और उसमें ज्यादा से ज्यादा लोगों को शामिल करने के लिए क्या तैयारी करनी पड़ती है, कैसे आपके सभाओं में लोग आते हैं, उनके कई मित्रों ने सभा के लिए लोगों को लाने का ठेका लिया और साथ ही उसपर आने वाला खर्च भी उन्हें बता दिया. सभाओं के दौरान भीड़ जुटाई जाये इसके लिए एक गायक महोदय से भी उनकी बाते हुई. सारी तैयारियों को देखकर मुझे थोडा-थोडा भरोसा होने लगा कि शायद पिछले दिनों में इन्होने अपने इलाके में जान-पहचान बढाकर चुनाव लड़ने लायक स्थिति में खुद को ला दिया है. सब नज़ारे देखने के बाद मुझे भी वक्त देने का वचन देना पड़ा. लेकिन गाँव जाने के लिए मैंने एक हफ्ते तक न आने की मजबूरी बताई और वापसी के बाद उनके इलाके में काम करने का वचन दिया.

एक हफ्ते बाद वापस आकर अपने वचन के अनुसार मैंने उन्हें सूचना देने के लिए फोन किया कि मैं वापस आ गया हूँ और अब आपको समय दे सकता हूँ। उनकी भाषा बदली हुई थी और उन्होंने तुंरत खुशखबरी सुनाई- भाई मैंने इलाके के हित के लिए चुनाव से अपना नाम वापस ले लिया है। मैंने कहा फिर क्या करना है. उनका जवाब था कि भाई मैंने फलाना पार्टी के लिए चुनाव प्रचार शुरू कर दिया है. इसके साथ ही उन भाई साहब ने नयी पार्टी जो कि उनके पहले वाले दल की विचार के स्तर पर पूरी तरह विरोधी थी की जमकर तारीफ शुरू कर दी. इतना ही नहीं जल्द ही उनके जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन भी दिखने लगे। जब मैं उनके घर पहुंचा तो उनके घर में रंग-रोगन का काम लगा हुआ था और भाई साहब का जोश दुगुना-चौगुना दिख रहा था। कल तक एक-एक पैसे के लिए रोने वाले भाई साहब ने अपना आगे का आईडिया सुना डाला. भाई साहब जल्द ही व्यापर शुरू करने वाले थे और इस बार उन्होंने किसी संभावित फाइनेंसर का नाम लिए बिना व्यापार की अपनी योजना सुना डाली. हैरानी में मैं उनके चेहरे को ताक रहा था. आखिर चुनाव में खडा होने और फिर बैठ जाने के दौरान इतनी ताकत कहाँ से आ गयी इनमें. हमें छोड़ने के लिए वे मोहल्ले में निकले और लोगों से अपनी नयी पार्टी के बारे में उसी अंदाज से बात करते जा रहे थे जैसे १० दिन पहले पिछली पार्टी के बारे में करते उन्हें देखा था. उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी. मैंने इसका कारण पूछा तो उन्होंने फिर साफगोई के साथ कहा- तुम नहीं समझोगे यही राजनीति है॥
धीरे से कहे हुए उनके ये शब्द मेरे कानों में गूंज रहे थे...मेरे लिए ये भी एक नया राजनीतिक ज्ञान था.

Sunday, 3 May 2009

राजनीति में ईमानदारी और खर्चे का झमेला!

हमारे बड़े-बुजुर्ग बड़े आराम से कहते हैं कि भाई राजनीति में अब ईमानदारी का जमाना ही नहीं रहा। कहाँ वो जमाना था जब नेता लोग पैदल चुनाव प्रचार करते थे और कहाँ ये जमाना आ गया जब नेता लोग साधन-संपन्न एसी गाड़ियों में घूम रहे हैं. तब से अब तक देश ने कितना विकास कर लिया ये चुनाव के वक्त ही दिखता है. चुनावी खर्च का भले जो भी ब्यौरा चुनाव आयोग और प्रशासन को दिया जाता हो लेकिन क्षेत्र की जनता को पता रहता है कि हमारे नेताजी ने पिछले ५ साल में कितना विकास कर लिया. सत्ता सुख भोग रहे नेता जी को बेदखल कर मौका अपने हाथ में लेने के लिए सामने वाले में भी उतना ही दम चाहिए. इसलिए अब चुनाव मैदान में वे लोग उतर पाते हैं जिनमे अपने लोगों पर खर्च करने की कुव्वत हो. इलाके के लोग भी अब वैसे लोगों को सीरियसली नहीं लेते जिनके पास जमकर उडाने लायक पैसा नहीं हो.

मुझे याद है जब २ साल पहले मेरे गाँव में ग्राम प्रधान और ब्लाक प्रमुख के चुनाव हुए थे। तब उम्मीदवारों के घर में जैसे मेला लगा रहता था. आम दिनों में घर के आस-पास तक न फटकने वाले इलाके के लोग उनके आगे-पीछे ऐसे दिखने लगे थे जैसे उनसे कई पुश्तों की रिश्तेदारी हो. पडोसी होने के कारण हर गतिविधि पर नज़र हमेशा बनी रहती थी. तब उनके घर से आने वाली मीट और मशाले की खुशबु मुंह में पानी भर दिया करती थी. तब रोज सुबह उठकर दोनों घरो के बीच स्थित गढ्ढे में झांकना मैं नहीं भूलता था. देशी विदेशी शराब के खाली बोतल ऐसे पड़े रहते थे जैसे दीपावली के बाद पटाखों के कागज के टुकडे. शाम में जैसे ही अँधेरा होता लोग गमछे में कुछ छिपाकर ले जाते हुए दिखने लगते. दादाजी से पूछने पर पता चला लोग इन दिनों मुफ्त के मदिरे का जमकर लुत्फ़ उठा रहे हैं. दादाजी ने एक को रोक कर पूछा था भाई रोज खाने के समय से लेकर शाम तक यहीं दिख रहे हो वोट तो इन्हें दोगे न. ये जानकार कि हम ये बात हम किसी को नहीं बताएँगे उस आदमी ने धीरे से कहा---काहेका जब तक जहाँ से जो मिल रहा है ले लो. फिर कौन देखता है किसे वोट दिया. दुसरे उम्मीदवार के पीछे मिठाई के दुकान के बाहर क्या लाइन लगती थी. मिठाई वाले ने पूछने पर बताया था नेता जी ने कहा है चुनाव के दिन तक खाता चलाओ जिन्हें मैं कहूँ उन्हें ही देना और जिनके लिए कहने के बाद ना का इशारा करूँ उन्हें टरका देना. जनता भी कम चालाक नहीं है चुनाव हुआ और चालक जनता ने फिर इन दोनों नेता जी लोगों को टरका दिया. बाहरी उम्मीदवार जीत गया और दोनों की सारी उम्मीदें धरी की धरी रह गयी. निचले स्तर का चुनाव था दोनों ने जमकर पैसे लुटाये थे. इस उम्मीद में कि जीतने पर सारा वसूल लेंगे.

Wednesday, 29 April 2009

मोबाइल हो गयी अपनी राजनीति!

पूरी दुनिया भले ही आर्थिक मंदी का शिकार होने का विलाप कर रही हो लेकिन देश में हो रहे आम चुनाव ने मेरे मोबाइल से मंदी का असर ख़त्म कर दिया है। एक अनुभवी वोटर ने पूछने पर बताया कि मेरे मोबाइल की ये खुशहाली चुनाव ख़त्म होने तक ऐसे ही चलने वाली है। पिछले कुछ दिनों से मेरे मोबाइल पर लगातार एसएमएस आ रहे हैं और मेरे मोबाइल का मेसेज बॉक्स भरता जा रहा है. राजनीतिक दलों के घोषणाओं से जुड़े सन्देश बार-बार मेरे मोबाइल पर फ्लैश हो रहे हैं. मसलन सत्ता में आने पर क्या करेंगे. क्या-क्या अजेंडा रहेगा जीतने के बाद. रोज ही नए-नए घोषणाओं की बारिश से मेरा मोबाइल इन दिनों सुशोभित होता रहता है. ये पता नहीं चल पाया है कि इन दलों तक मेरा मोबाइल नंबर कैसे पहुंचा. खैर जो भी हो घोषणाओं की इस बारिश से मैं खुश बहुत हूँ. आखिर मोबाइल के रास्ते मेरे घर में सपने जो आ रहे हैं. मैं एक आम मतदाता हूँ और अगर राजनीतिक दलों तक सीधी पहुँच हो गई तो मेरे कई काम आसान हो सकते हैं...ऐसा मैं सोचता हूँ. अगर मेरे नंबर पर मेसेज आ रहे हैं तो उनके पास मेरा नंबर होगा ही. अब आप ही सोचिये आज के जमाने में अगर आपकी पहुँच राजनीतिक दलों तक है तो आप कितने आसानी से अपना काम करवाने में सफल हो सकते हैं. जैसे अगर आपको रेल में सफ़र करना है और आपकी टिकट वेटिंग में मिली है तो उसे कन्फ़र्म कराने के लिए आपको वहीँ जाना होगा. अगर आपको रसोई गैस का नया कनेक्शन लेना है तो आपको सांसद के कोटा का इस्तेमाल करना होगा. केन्द्रीय विद्यालय में बच्चे का नाम लिखवाना है तो सांसद की सिफारिश जरूरी है. अस्पताल, फोन के कनेक्शन आदि कई काम है आज के ज़माने में जिन्हें बिना जुगाड़ के करवा पाने में आपको नानी याद आ जायेगी। राजनीतिक लोगों तक पहुच बना पाना भी इतना आसान नहीं है. अगर आप उनके काम के नहीं हैं तो फिर कौन पूछता है आपको. आप ही सोचिये इतने दुर्लभ राजनीतिक बिरादरी के लोग अगर आपके पास मेसेज करें तो किसे ख़ुशी नहीं होगी. घर बैठे-बैठे मेरे पास एक मौका आया है अपनी पहुँच इन तक बनाने का...है न गोल्डन चांस!

राजनीतिक चीयरलीडर्स...
राजनीतिक प्रचार के तरीके लगातार बदल रहे हैं. जब से चुनाव और आईपीएल साथ-साथ शुरू हुए हैं सब जगह चीयरलीडर्स दिखाई दे रहे हैं. वैसे आईपीएल में इसका कांसेप्ट नया-नया है लेकिन अपने यहाँ राजनीति में इसका क्रेज बहुत पुराना है. पहले भी चुनावों के वक्त भीड़ खिंचने के लिए फ़िल्मी सितारों और खिलाड़ियों को मंच पर लाया जाता रहा है. कई बार चुनावों में टिकट लेकर ये सितारे संसद और विधानसभाओं तक पहुँचते रहे. हालांकि पिछले कुछ सालों में जिन क्षेत्रों के लोगों ने अभिनेताओं और अभिनेत्रियों की चमक-दमक में आकर इन्हें चुनकर संसद भेजा उन्हें पछताना पड़ा. इनमें से केवल कुछ ही राजनीति में खुद को पूरी तरह से शामिल कर सकें हैं.बाकी कईयों को तो दुबारा चुनने की जहमत उठाने को लोग तैयार नहीं हैं...

Sunday, 26 April 2009

बूझो तो जाने: किसने तोड़ा बाबरी मस्जिद!

कई दिनों से मीडिया में लगातार ये सवाल गूंज रहा है कि बाबरी मस्जिद किसने तोड़ा। देश के सारे राजनेता अपनी-अपनी जानकारी के हिसाब से इस पहेली को सुलझाने का प्रयास कर रहे हैं सब के सब गेंद एक-दूसरे के पाले में उछाल रहे हैं. लेकिन आम आदमी इतने सारे जवाब को सुनकर बड़े कन्फ्यूजन में है. भाई किसे इसका श्रेय दिया जाए ये तय नहीं कर पा रहा है आम आदमी. इस उछल-कूद की शुरुआत की मशहूर समाजवादी नेता और गरीबों के मसीहा(?) लालू जी ने. गठबंधन में सहमती नहीं बन सकी और कांग्रेस ने नुकसान पहुचाने लायक उम्मीदवार विरोध में उतार दिए तब लालू जी ने कह डाला कि बाबरी विध्वंश के लिए कांग्रेस जिम्मेदार है. कांग्रेस ने इसका जवाब दिया और भाजपा के पीएम इन वेटिंग आडवाणी जी पर निशाना साध लिया और कहा कि वही इसके लिए जिम्मेदार हैं. बस क्या था भाजपा के बचाव में संघ के पूर्व सरसंघचालक सुदर्शन जी उतर गए और उन्होंने नरसिंह राव की सरकार को इसके लिए जिम्मेदार बता आडवाणी जी के बचाव का प्रयास किया. गेंद फेंका-फेंकी के इस खेल से अपने को अब तक बचाते आये कांग्रेस के युवा कर्णधार राहुलजी भी अपने को रोक नहीं सके और कह डाला कि भाजपा ही इसके लिए दोषी है.

आम आदमी के सामने इतने सारे जवाब और जवाब देनेवाला हर इंसान देश का जाना-माना चेहरा. किसपर भरोसा करें और किसे झूठा माने. इतने सारे कन्फ्यूजन के बीच घिरा भारत का आम आदमी करीब २ दशकों से जवाब तलाश रहा है. इतने में पूरी एक पीढ़ी बदलने को आ गई. पुरानी पीढ़ी इसका जवाब नहीं पा सकी नई पीढ़ी को यही सवाल बार-बार सुनाया जा रहा है ताकि भूल न सके. जिसे भी जिम्मेदार समझो लेकिन याद रखो जरूर. इस पाले में रहोगे या उस पाले में काम तो आओगे न...

Friday, 24 April 2009

वोटर न हुआ जैसे कोई बड़ा अपराध कर डाला!

जब से चुनाव का कार्यक्रम शुरू हुआ है वोटर रुपी मानव के लिए मानो संकट का समय शुरू हो गया है। पिछले सालों में नेताओं द्वारा काम नहीं करने की आदत को देखकर थक-हार चुकी जनता ने इस बार वोट देने न जाने का मन बना लिया था. सोचा था कि इस बार घर बैठ कर टीवी पर ही देख लेंगे लोकतंत्र के इस सबसे बड़े महापर्व को. जैसे किस शहर में कितने कम लोग मतदान के लिए जाते हैं, कहाँ-कहाँ लोग इस महापर्व के दिन नक्सली हमलों के शिकार बन इस महापर्व के दिन शहीद होने का गौरव प्राप्त करते हैं. कहाँ-कहाँ के वोटर बाहुबली भगवान् लोगों के आशीर्वाद से फलीभूत होते हैं. इसके आलावा किन जगहों पर वोटरों की किस्मत में धनबलियों के आशीर्वाद को पाने में सफल होना लिखा है. लेकिन इस दिन को सुकून से मनाने का मेरा ख्वाब टीवी वालों ने पूरा नहीं होने दिया.

सुबह जैसे ही टीवी खोला उस पर एक ऐड चल रहा था "जो वोट देने नहीं जायेगा वो पप्पू कहलायेगा"। मेरे भतीजे ने पूछा चाचा आप वोट देने जा रहे हो कि नहीं. मेरे नहीं कहते ही वो बोल पड़ा आज से हम आपको पप्पू कहेंगे. उसकी खुश होती मुद्रा से डर-कर मैंने फैसला किया कि चाहे जितनी भी मुसीबतों का सामना करना पड़े वोट डालने जरूर जाऊंगा. रोज-रोज पप्पू के नाम पर जलील होने से तो अच्छा है एक दिन मेहनत कर ही ली जाये. लेकिन वोट डालने जाने से पहले सोचा कि टीवी समाचारों में जरा बाहर के माहौल का पता तो कर लिया जाये. चैनल बदलते ही देखा समाचारवाचक चीख रहा था और बता रहा था कि फलाना राज्य में नक्सलियों ने सुरक्षाकर्मियों पर हमले किये और कइयो को मार डाला. मतलब जिन सुरक्षाकर्मियों को वोटरों कि सुरक्षा के लिए बुलाया गया था वही सुरक्षाकर्मी नक्सली हिंसा के शिकार हुए. किसी महान आदमी ने कहा था कि एक वोटर ही वोटर का दर्द समझ सकता है. तुंरत मेरे दिमाग में उस इलाके के वोटर का दर्द उभर आया. क्या इतनी बड़ी खबर के बाद उस इलाके का वोटर मतदान केंद्र तक जाने कि हिम्मत करेगा. पिछले कुछ समय से नक्सलियों द्वारा जारी चेतावनी को तो वो सुरक्षाकर्मियों का चेहरा देखकर टाल गया था लेकिन अब जब उनका विकराल रूप सामने दिख गया है तो कौन मां अपने बेटे को, कौन पत्नी अपने पति को और कौन सी बहन अपने भाई को लोकतंत्र के इस महापर्व में आहुति देने के लिए भेजेगी.

ऐसे ही अचानक जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य के लोगों का चेहरा भी दिमाग में घूम गया। अब समझ में आया कि वहां के लोग किस मानसिकता में जी रहे होंगे. अगर वे वोट देने न जाये तो सुरक्षाकर्मी उन्हें अलगाववादी समझ बैठते होंगे और अगर देने जाए तो आतंकी उन्हें अपना दुश्मन मां बैठते हैं. अब बताइए बेचारा वोटर न घर का रहा न घाट का. इतना ही नहीं देश के अन्य हिस्सों में भी कहानी ऐसी ही है. अगर आपने मतदान में हिस्सा लिया और बाहुबली भाई लोग को खबर लग गयी कि फलाना गाँव के लोग मेरे विरोध में मतदान किये थे. बस क्या चुनचुन कर निशाना बनते हैं बेचारे वोटर.

ये सारे नज़ारे दिमाग में घूमते ही फिर मन में एक डर बैठ गया, वोट करने जाऊँ या नहीं। एक तरफ लोकतंत्र के सबसे बड़े पहरुए लोगों का डर मन में समाया हुआ था तो दूसरी तरफ पप्पू के नाम से विख्यात होने का भय. समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ. अब खुद के १८ साल का होने पर अफ़सोस होने था कि अच्छा था हम वोटर लिस्ट में शामिल ही नहीं थे. कम से कम कह तो सकते थे कि अभी १८ साल के हुए ही नहीं हैं. घर से बाहर निकलते ही पडोसी ने पूछा अरे भाई साहब किसे वोट दे रहे हो इस बार. मन में अचानक एक डर समां गया पता नहीं किस पार्टी से जुडा है. कहीं विरोधी पार्टी का नाम ले लिया और इसने जाकर बता दिया तो पता नहीं क्या होगा. मैंने मामले को संभालते हुए झट से कह दिया अरे नहीं तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही थी दावा लेने जा रहा हूँ...और तेज कदम वापस घर की ओर हो लिए...मन में ख़ुशी थी चलो जान बची...

Monday, 13 April 2009

लेटेस्ट मोर्चा और देश का फ्यूचर!

आज़ादी के बाद पनपा अपना देश ६ दशकों का हो गया है। ऐसा कहा जाता रहा है कि इस दौरान देश में लोकतान्त्रिक व्यवस्था लगातार परिपक्व होती रही है. अभी हाल ही में लोकसभा चुनावों के लिए दो नए राजनीतिक मोर्चे बने हैं. इनमें सबसे लेटेस्ट है चौथा मोर्चा. जाहीर है सबसे लेटेस्ट मोर्चे का घोषणापत्र भी लेटेस्ट ही होगा. इसमें देश के फ्यूचर का आइना होगा. अब आइये डालते हैं इस लेटेस्ट मोर्चे में शामिल दलों की आइडियोलॉजी और भविष्य के लिए उनकी सोच और अजेंडा पर एक नज़र.

दल नंबर एक-
चुनाव चिन्ह लालटेन। नारा समाजवाद का. सबको साथ लेकर चलने का. हालाँकि पहले के नारों में स्वर्ण जाति के लोग निशाना बनते रहे हैं. जाति-वाद और सांप्रदायिक रणनीति के हिसाब-किताब पर इस दल ने एक राज्य में करीब १५ साल तक राज्य किया. जब विकास के सभी आंकडों पर राज्य सबसे नीचे दिखने लगा तो उसके लिए भी इसी दल को जिम्मेदार ठहराया गया. चुनाव चिन्ह लालटेन के साथ १५ साल के शासन में राज्य अँधेरे में ही डूबा रहा और जगमगाती बिजली का सपना संजोये राज्य की जनता ने इसे राज्य की सत्ता से बेदखल कर दिया. बाद में दल के सुप्रीमो ने केन्द्रीय मंत्री के नाते अपनी छवि सुधारी और फिर इसी बदली हुई इमेज के बल पर इस चुनावी समर में उतरे हैं. गठबंधन के ज़माने में एकला चलो का कोई मतलब नहीं देख फ़िलहाल इस लेटेस्ट गठबंधन की नाव पर सवारी शुरू की है.

दल नंबर दो-
चुनाव चिन्ह झोपडी। जातीय समीकरण के बल पर कुछ सीटें लगातार जीतते रहे और केंद्र में बनी हर सरकार में मंत्रीपद का जुगाड़ होता रहा. जीतने वाले अधिकांश सांसद या तो दलप्रमुख के खानदान के रहे या फिर बाहुबली. विधानसभा चुनाव के दौरान मुस्लिम मुख्यमंत्री देने का वादा कर कई सीट जीतने में कामयाब रहे. लेकिन अपना आकलन करने में भ्रमित हो ये कहते घूमते रहे कि सरकार बनाने की चाभी मेरे पास है और मेरे बिना कुछ हो ही नहीं सकता. इसी जिद में राज्य को एक साल के अन्दर दूसरे चुनाव का दर्शन कराया. अगले चुनाव में जनता ने पूछा ही नहीं और भावः कम हो गया. लेकिन आत्मविश्वास डिगने का नाम नहीं ले रहा और इस चुनाव में झोपडी के साए में फिर मैदान में हैं. सफ़र में मन लगे इसलिए लेटेस्ट गठबंधन का दामन थामा है.

दल नंबर तीन-
तकनीकी क्रांति के दौर में बने इस लेटेस्ट गठबंधन में शामिल इस दल का चुनाव चिन्ह साइकिल है। जमीनी राजनीति, जातीय समीकरण और सांप्रदायिक झुकाव के दम पर देश के सबसे बड़े राज्य में हमेशा राजनीतिक दबंगता बनी रही. जमीनी राजनीति के बाद इस दल को उद्योगपतियों के साथ जुगलबंदी के कारण आलोचना का सामना करते रहना पड़ा. हाल ही में इस दल ने अपना मेनिफेस्टो जारी किया. भविष्य के लिए इस दल का अजेंडा जरा सुनिए. चुनाव चिन्ह साइकिल है ही. सत्ता में आने पर ये दल अंग्रेजी भाषा और कम्प्यूटर पर बंदिश लगा देगी. इतना ही नहीं सत्ता में आने पर वायदा कारोबार, शेयर कारोबार और मॉल कल्चर पर भी अंकुश लगाया जाएगा।

लोकतंत्र की परिपक्वता और २१वी सदी में जीने की दुहाई देते अपने देश का भविष्य क्या होगा- लालटेन...झोपड़ी और साइकिल. साथ में देश से अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा भी हटा दीजिये और कंप्यूटर को तो भूल ही जाईये. साथ में शेयर कारोबार और मॉल जैसी चीजों को भी भुला दीजिये. लो अब बन गया न आपके सपनो का भारत...जाइए एन्जॉय कीजिये.

Saturday, 11 April 2009

ऐसी चुनावी नौटंकीबाजी के लायक ही हैं हम...

एक राष्ट्रीय दल की रैली का नज़ारा। पार्टी के सभी बड़े नेता मंच पर मौजूद. एक-दो वरिष्ट नेताओं के बोलने के बाद माईक थमाई जाती है एक जाने माने चेहरे को. मंच के सामने मौजूद भीड़ में अचानक उबाल आ जाता है. अचानक जोश में आई भीड़ नारे लगाने लगती है. जैसे इसी लम्हे के लिए सबने अपनी साँसे थाम रखी थी. कौन है यह शख्स जिसे देख कर हजारों की भीड़ अचानक उत्साह से भर उठती है. इस शख्स को पूरा देश जानता है. इसने हाल ही में फिल्मों की दुनिया से राजनीति में कदम रखा है. उसे पहले इस दल का उम्मीदवार बनाने का फैसला किया गया था लेकिन देश की सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहकर इसे चुनाव लड़ने से रोक दिया कि २ साल से ज्यादा की सजा पाया कोई व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता. यह शख्स एक भूतपूर्व सांसद और फिल्म अभिनेता का बेटा है. फिल्मों में भी इसने खूब नाम कमाया है. लेकिन इस शख्स पर १९९३ में मुंबई में हुए धमाकों में शामिल लोगों से संपर्क रखने का आरोप लगा और सालों तक इसे अदालती कार्यवाही का सामना करना पड़ा. अदालत ने इसे उन्हीं आरोपियों में से किसी एक से एके-४७ राइफल लेकर रखने का दोषी करार दिया और ६ साल की सजा सुनाई. यह शख्स अभी जमानत पर है और चुनाव लड़ना चाहता था. अदालत ने लड़ने नहीं दिया. पार्टी स्टार प्रचारक नहीं खो सकती थी सो उसने पार्टी में बड़ा पद दे दिया. अब यह शख्स पार्टी के हर मंच पर गाँधी टोपी लगाये दीखता है. यहाँ गाँधी टोपी की भी अपनी कहानी है. कुछ साल पहले एक फिल्म आई थी. जिसमें इस शख्स ने ऐसे व्यक्ति का किरदार निभाया था जो पहले अपराधी होता है और फिर गांधीजी के सिधान्तों से प्रभावित होकर अहिंसा का मार्ग अपना लेता है और लोगों को मार-पीट के बदले जादू की झप्पी देता फिरता है. फिल्म हिट रही और दर्शकों की जुबान पर गांधीगिरी शब्द चिपका गयी. इस शख्स ने रियल लाइफ में भी गांधीगिरी को अपने साथ चिपका लिया. व्यवहार में अपनाया कि नहीं कह नहीं सकते लेकिन अब हर मंच पर यह शख्स गाँधी टोपी के साये में गांधीगिरी शब्द का इस्तेमाल जरूर करता है.

हाँ तो हम फिर उस नज़ारे पर आते हैं जब इसे मंच पर माइक पकड़ा दिया जाता है। शख्स माइक लेता है और लोगों की सहानुभूति लेने के अंदाज में शुरू होता है. कहता है- मैंने टाडा कानून का दर्द झेला है. मुझपर जो आरोप लगाये गए हैं गलत हैं. मुझसे जबरन आरोप कबूलवाया गया, मारपीट कर. टाडा और पोटा जैसे कानून हटा देने चाहिए. सामने खड़ी जनता हो-हो करती है. नारे लगाती है. भीड़ चिल्लाती हैं--मुन्ना भाई जादू की झप्पी दे दो. मंच से आवाज आती है पहले हमें चुनाव में जिताओ और दिल्ली पहुचाओ फिर जादू की झप्पी मिलेगी. भीड़ फिर चिल्लाती है मुन्नाभाई जिंदाबाद...पार्टी जिंदाबाद...वगैरह...वगैरह.

राजनीति को फ़िल्मी नौटंकी बनाती इस भीड़ में कौन शामिल है. हम-आप और कौन. ऐसी भीड़ देश में रोज हो रही सैकडों रैलियों में शामिल है. पार्टियों के बैनर-पोस्टर से सजी यह भीड़ लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहरुआ मानी जा रही है. गाड़ियों में भर-भरकर यह भीड़ एक शहर से दूसरे शहर में, एक राज्य से दूसरे राज्य में लाई जा रही है. महीने भर के इस महापर्व में जाने भीड़ में शामिल कितने लोगों का गला बैठ जायेगा. चुनाव ख़त्म होगी, नयी सरकार बनेगी फिर यह भीड़ भी चैन की सांस ले सकेगी. लेकिन अपने नेताओं की शान में कशीदे पढने और नारा लगाने की आदत लगा चुकी यह भीड़ कब तक चुप रहेगी. फिर जीतने के बाद जब यह नेता लोग अपने इलाके में पहुचेंगे तो उनके स्वागत कार्यक्रम में नारा लगाने के लिए यह भीड़ फिर से एक-जूट हो जायेगी. अपने बैठे हुए गले को तर करके फिर से भीड़ जीवंत हो सकेगी और लोकतंत्र की रक्षा के नारे लगा सकेगी...

Thursday, 9 April 2009

जूता क्या... नए ज़माने का हथियार कहिये इसे...

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पढने जाने को हुआ तो उससे जुडी कई कहानियां दादाजी ने सुनाई। उनमें से एक था हैदराबाद के निजाम के जूते की महिमा की दास्तान. कहानी कुछ यूँ थी कि बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय को बनाने के लिए चंदे का जुगाड़ करने के क्रम में मालवीय जी हैदराबाद के निजाम के दरबार तक पहुंचे. लेकिन जब निजाम को पता चला कि ये आदमी हिन्दुओं के लिए विश्वविद्यालय बना रहा है और उसके लिए चंदा मांगने मेरे पास आया है तो निजाम गुस्से से भड़क उठा और अपना जूता मालवीय जी की ओर दे मारा. शांतचित मालवीयजी जूते को उठाकर आये और अगले दिन नीलामी पर रख दिया. बदनामी के डर से फिर निजाम ने मुहमांगा दाम देकर अपना जूता वापस मंगाया. वो पैसा विश्वविद्यालय के निर्माण में लगा. निजाम के जूते की ये कहानी करीब १०० साल पुरानी है. अब तो जूते के इस्तेमाल की ये कहानी पुराने ज़माने की बात हो गयी. तब हथियार भी बड़े परंपरागत हुआ करते थे. अब जमाना बदल गया है. परमाणु बम बन गए हैं और कई देशों के पास हैं. एक-दो परमाणु बम तो फूट भी चुके हैं.

जैसा कि हम अक्सर सुनते हैं कि पुरानी शैली के कपडे कुछ समय बाद फिर फैशन में आते हैं उसी तरह से जूते का फैशन भी फिर से लौट आया है। इसका श्रेय जाता है इराकी पत्रकार मुंतजर अल जैदी को. बम-गोलों-मिसाइलों की मार झेलकर टूट-फूट चुके इराक के नागरिक जैदी(नागरिक के आलावा पत्रकार भी लेकिन वो बाद में) ने जूते को अपना हथियार बनाकर अमेरिका पर प्रहार किया और भरी सभा में अमेरिकी राष्ट्रपति बुश के मुंह पर जूता दे मारा. जैदी के साथ जो हुआ वो हुआ लेकिन पूरी दुनिया ने अमेरिका को जूता खाते देखा. अधिकांश लोगों के लिए ये मौका काफी खास रहा. चीनी राष्ट्रपति बेन जियाबवो के ऊपर (कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में) जूता भी जल्दी चल गया. लेकिन सहनशील भारत में जूता इतनी जल्दी चलेगा इसकी उम्मीद किसी ने नहीं की थी.

१९८४ में हुए दंगों की टीस को यहाँ की सिख बिरादरी अभी तक नहीं भूली है और न्याय की आस अब भी उसके मन में जिन्दा है इसका संकेत दिया एक सिख पत्रकार जरनैल सिंह ने. जरनैल सिंह ने साबित किया कि वो पत्रकार हैं लेकिन उसके पहले एक इन्सान है जो अच्छे-बुरे को महसूस करता है और शरीर पर लगे जख्म उसके दिल में भी दर्द पहुचाते हैं. पत्रकार वार्ता के दौरान जरनैल ने गृह मंत्री के ऊपर जूता उछाल दिया. जरनैल का कहना था कि सत्ताधारी दल ने १९८४ दंगों में शामिल अपने नेताओं को बचाने के लिए सीबीआई का इस्तेमाल किया है और पीडितों को न्याय मिलना चाहिए. जरनैल का जूता ऐसा तगड़ा लगा कि देश भर में सिख बिरादरी न्याय के लिए सड़कों पर आ गयी और वोट बैंक की चिंता में पार्टी को अपने इन दोनों नेताओं को लोकसभा चुनाव से हटानी पड़ी...कहते हैं न कि आम आदमी बोलता नहीं है और जब बोलता है तो जमकर बोलता है...जैदी और जरनैल के रूप में आम आदमी बोला और बोला तो ऐसा बोला कि अब तक बोलते रहने वालों की बोलती बंद हो गयी.

Sunday, 29 March 2009

किसी की जय हो तो किसी की भय हो...

चुनावी घमासान शुरू हो गया है ऐसे में कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता. ऐसे में गानों की तरह राजनीति में भी रीमिक्स का बोलबाला बढ़ता जा रहा है. पार्टियों की रीमिक्स, नारों की रीमिक्स और प्रचार के तरीको की रीमिक्स की धूम मची हुई है. देश के सत्ताधारी दल ने गरीबी पर बने और पूरी दुनिया में सराहे गए फिल्म स्लमडॉग मिलियनायर के मशहूर गाने --जय हो-- को अपनाया और कहा हमारा हाथ आम आदमी के साथ. उसके जवाब में विपक्षी पार्टी ने उसका विकृत रूप --भय हो-- उतारा. कुछ दिन पहले ऐसी ही जंग उत्तर प्रदेश के सत्ताधारी दल और विपक्ष के बीच हुई थी. एक ने धिक्कार रैली निकाली तो दूसरे ने थू-थू दिवस से ही काम चला लिया. एक तरफ तीसरा मोर्चा अस्तित्व में आया तो मशहूर हास्य अभिनेता जसपाल भट्टी ने इसका उपहास उडाने के लिए चौथे मोर्चे का भी कांसेप्ट सामने रख दिया. हालाँकि जल्द ही सच्ची में भी चौथा मोर्चा सामने आ गया. ऐसे न जाने कितने रीमिक्स अभी इस मौसम में लगातार देखने को मिलते रहेंगे...राजनीति के इस पाईरेसी के धंधे में कब कौन किसका शिकार बन जाये कहा नहीं जा सकता...रात में सोये मजे-मजे और सुबह उठने पर अपनी ही पाईरेटेड कॉपी से मुलाकात हो जाये...कुछ निश्चित नहीं है आज के दौर में...

Friday, 27 March 2009

तस्लिमा के आने से कौन भड़क सकता है?

हमेशा मुस्लिम समुदाय के कट्टरपंथी धड़े के निशाने पर रहने वाली बंगलादेशी लेखिका तस्लिमा नसरीन ३१ मई तक भारत नहीं आ सकती। ऐसा सरकार ने उन्हें वीजा जारी करने के लिए दिए शर्तों में लिखा है. जाहिर सी बात है कि ऐसा इसलिए किया गया है ताकि तस्लिमा को चुनाव तक देश से बाहर ही रखा जाये. इसका सीधा सा मतलब है कि इसके पीछे ये डर है कि कहीं तस्लिमा के आने से देश का मुस्लिम समुदाय भड़क न जाये. जाहिर है सभी दल चुनावी मौसम में अपना कोई भी दांव ख़राब नहीं होने देना चाहते.

अब हाल ही में हुए कुछ राजनीतिक गठजोड़ पर गौर फरमाए. देश के सत्ताधारी दल ने कल ही एक ऐसे दल के साथ चुनावी गठजोड़ किया जिसने पिछले साल जॉर्ज बुश के सर पर करोडों का इनाम घोषित किया था. देश के विपक्षी दल के नेता उस नौजवान के पक्ष में गोलबंदी के लिए लालायित दिख रहे है जिसे कल तक कोई राजनीति में गंभीरता से नहीं ले रहा था और आज एक संप्रदाय विशेष के खिलाफ भड़काऊं बयान देकर वो रातो-रात हीरो बन गया है. जबसे चुनाव का माहौल बना है अल्पसंख्यक जमात के नेताओं को(कई तो बस अल्पसंख्यक दिखने भर की योग्यता रखते हैं) सभी दलों के नेता प्रेस कांफेरेंस के दौरान अपने बगल में बैठाते हैं. राजनीति में शामिल ऐसे ही धाकड़ राजनीतिज्ञों और देश का भविष्य सुधारने(शायद!) के काम में जुड़े महान लोगों को चिंता है कि कहीं तस्लिमा जैसे बेबाक लोग आकर उनके रंग में भंग न डाल दे. वे इतनी मेहनत से, इतनी तिकरम से लोगों को अपने से जोड़ रहे हैं लेकिन अब कोई आकर उनका काम ख़राब कर दे तो अखरेगा ही...इसलिए समय रहते ही कदम उठा लिया गया.

कुछ शब्द मां के लिए...

भरी दुपहरी में, जलती रेत पे चलते-चलते
जब भी मेरे पांव जवाब देने को होते है,
उखड़ने को होती है मेरी साँसे
जब सो जाना चाहता हूँ मैं भी
वक्त के निर्मम छाँव में...

तभी मेरे जेहन में आ बसता है
उस मां का चेहरा
जिसकी उम्मीदों और अपेक्षाओं का
आखिरी सिरा जुड़ा है मुझसे...
घर से निकलते वक्त
उम्मीद और आकाँक्षाओं से भरी
मुझे निहारती मां की आँखे...
और बाहर से सकुशल लौट आने की
उसकी हिदायते भी...

शायद ऐसे ही
हर किसी की जिंदगी में होता है
स्थान--- मां का...
और शायद ऐसी ही होती है
उसकी छाया....।

Thursday, 26 March 2009

जो पप्पू नहीं उन्हीं की देन है ये लोकतंत्र...

टीवी पर एक विज्ञापन इन दिनों लगातार देखने को मिल रहा है। जागो रे... इसकी लाईने हैं--अगर वोट नहीं कर रहे तो आप सो रहे हैं। ये अभियान पिछले साल राजधानी दिल्ली में हुए विधानसभा चुनाव के समय शुरू किये गए पप्पू अभियान से मिलता-जुलता है. लेकिन सिक्के का एक और पहलू है. आप किसी को पप्पू कह लें और अपने मन को तसल्ली कर लें आपकी मर्जी... लेकिन ये भी तो सोचिये कि लोग अपने मताधिकार का प्रयोग करने की अपेक्षा पप्पू कहलाना क्यूँ पसंद करते हैं. अच्छी बात है अच्छा उद्देश्य है इन विज्ञापनों का...लेकिन ये कुछ-कुछ वैसा ही है जैसा कि बाल मजदूरी रोकने का विज्ञापन है. जिसमें इसे अपराध तो बताया जाता है लेकिन इसका कोई हल भी कोई बताता तो बेहतर होता.

हम-आप में से कई लोग अपने वोट का इस्तेमाल करते ही हैं... और शायद जम्मू-कश्मीर के लोग इस काम में सबसे हिम्मत का प्रदर्शन करते हैं वहां के जो लोग पप्पू कहलाना पसंद नहीं करते उन्हें बम-गोलों का भी सामना करना पड़ता है। शायद हमारे जैसे लोगों के कारण ही पिछले ५० सालों से भारतीय लोकतंत्र की गाड़ी चल रही है. लेकिन कई अच्छाईयों के साथ-साथ हमारे लोकतंत्र का एक बदरंग चेहरा भी है. जो लोग खुद को पप्पू न कहला पाने के मुगालते में जी रहे है उन्ही के कारण संसद और विधानसभा दागी छवि वाले इंसानों, अपराधियों, हत्यारों और अन्य अवांछित लोगों का सबसे सुरक्षित अड्डा बना हुआ है. अगर इन्हें गैर-पप्पू लोगों ने नहीं चुना है तो किसने चुना है. कोई अपराधी किसी एक के वोट से सांसद-विधायक नहीं चुना जाता. बल्कि कई-एक लाख लोग मिलकर किसी माननीय को चुनते हैं और अगर ऐसे लोग चुने जाते है तो हमारे समाज और उसके सभ्य होने के हमारे मुगालते पर एक करारा तमाचा है.

मैं बिहार प्रान्त से आता हूँ। जब मैं वोट देने का अधिकार नहीं रखता था तब से देख रहा हूँ अपने यहाँ की लोकतांत्रिक व्यवस्था को. मैंने बूथ कैप्चरिंग का दौर भी देखा है. तब वोट मत-पत्रों से डलते थे. उस दौर में मेरे गाँव में चुनाव के दिन शाम को जो भी मिलता अपनी बहादुरी के किस्से सुनाता. मसलन आज दिन में उसने किस तरह से मतदानकर्मियों को उल्लू बनाया और किस चालाकी से वह कई बार वोट डालने में कामयाब हुआ. फिर समय बदला और तकनीक ने हम सभी लोगों को एक मौका दिया है पप्पू बन जाने का. ये भी एक सच्चाई है कि अगर हम व्यवस्था से दूर भागेंगे तो बदलाव कैसे आयेगा लेकिन जो चीज पूरा देश देख रहा है उसे क्या रोका जा सका है. अभी हाल ही में देश की संसद में सरकार बचाने को लेकर पैसे बाँटने(करोड़ो में) का किस्सा सबने देखा, संसद में नोट के बण्डल लहराते भी सबने देखा तो क्या. क्या वे सारे लोग चुनावी परिदृश्य से गायब हो गए. नहीं....

सच्चाई ये है कि हम भले ही पप्पू न कहलाने के मुगालते में रहें लेकिन बदलाव कुछ नहीं आने वाला. अगर ऐसा होता तो चुनाव के दौर में शराब की बिक्री इतनी नहीं बढती और प्रशासन को शराब बाँटने वाले लोगों पर शिकंजा कसने के लिए कसरत नहीं करनी पड़ती. लोगों का मत शराब के पौवे पर तय नहीं होता और अगर हम वाकई सुधरने के लायक होते तो हमारा नेतृत्व और उसकी मांग करने चुनाव में उतरने से पहले लोग कई बार सोचते.हम ये तय भी करते कि हमारा भविष्य तय करने वाला पढ़ा-लिखा भी होना चाहिए और योग्य भी होना चाहिए. हम उसकी जवाबदेही भी तय करते और उससे सवाल करने की हिम्मत भी रखते. और फिर तब हमें पप्पू कहलाने में शर्म भी आती और पप्पू कहलाने से बचने के लिए मतदान केन्द्रों तक पहुचना हमारी मजबूरी भी होती. लेकिन अभी के हालात में अगर हम पप्पू हैं तो कोई बुरे नहीं है...

Saturday, 14 March 2009

वादे पे यकीं करो...तो सभी गरीबों को स्मार्ट फोन मिलेगा!

चुनावी समर में उतरने के बाद अब सबका ध्यान जीत पर है... सभी दल बड़े-बड़े वादे कर रहे हैं। आज भाजपा के पीएम इन वेटिंग आडवाणी जी ने अपना चुनावी घोषणापत्र जारी किया...इसके मुख्य वादे है कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आई तो गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले सभी लोगों को स्मार्ट फोन दिए जायेंगे, सबको रोजगार मुहैया कराया जायेगा, हर स्कूल में इन्टरनेट शिक्षा दी जायेगी और हर भारतीय का बैंक खाता खोला जायेगा। क्या मान लें कि अब भारत से गरीबी के दिन लदने वाले हैं. अगर वाकई में ऐसा हो गया तो फिर विश्व बैंक और तमाम बड़े संगठन और गरीबी को लेकर लगातार अपना आकलन दे रहे विश्लेषक किस काम के रह जायेंगे.


अब आप ही सोचो कि अगर देश के हर गरीब(यूँ कहें कि जिनके पास नहीं है...वैसे इससे भी ज्यादातर वही लोग लाभान्वित होंगे जो वास्तव में गरीब नहीं होंगे) को स्मार्ट फोन पकडा दिया जाये। सोचो कि पूरा देश मोबाइल हो जायेगा। कितनी तेजी से लोग अपना काम कर पाएंगे और देश कितनी तेजी से तरक्की कर पायेगा। वैसे देश के दक्षिणी राज्यों में राजनीतिक पार्टियाँ चुनाव के वक्त जनता से वादा करती रही है कि जीतने के बाद टीवी वगैरह देंगे. जहाँ तक देश के सभी लोगों को रोजगार देने की बात है तो ये काम हमारे देश की वर्तमान सरकार के वादों के खटोले में भी है. सच कहें तो रोजगार गारंटी योजना के तहत भी हर ग्रामीण नागरिक को रोजगार देना है जो मेहनत-मजदूरी करने को तैयार हो. इसमें प्रावधान है कि अगर रोजगार नहीं दिया जा सका तो भत्ता मिलेगा. लेकिन इस नए घोषणापत्र की परिधि में देश का हर नागरिक है. चाहे वो ग्रामीण हो या शहरी ये नयी सरकार सबको रोजगार देगी॥ अब ये कैसे होगा ये बता पाना मुश्किल है. जहाँ तक बैंक खाता खोलने की बात है तो रोजगार गारंटी योजना में भी ऐसा प्रावधान है कि सभी के खाते खुले और उनकी मजदूरी उसी खाते में भेजी जाये. अब ये राशिः सही तरीके से कितनो को मिल पाती है ये कहा नहीं जा सकता.

सरकार में आने की चाह में भाजपा ने वादा किया है कि देश के सभी स्कूलों में इन्टरनेट शिक्षा प्रदान की जायेगी। अगर सच में ऐसा हो जाये तो शहर तो शहर गाँव के लोग भी ग्लोबल विलेज में शामिल हो जायेंगे और बाकि दुनिया से कदम से कदम मिलाकर चल सकेंगे. लेकिन इस सपने के पहले इस बात का भी ध्यान होना चाहिए कि हमारे अधिकांश गांवों में आज भी कभी-कभार ही बिजली आती है और आज भी हमारे गाँव लालटेन युग में ही जी रहे हैं.

चुनाव के वक्त राजनीतिक बिरादरी के वादों को सुनकर ठहाका लगाना और उसका उपहास उडाने का वक्त अब गया। क्या हमें इन वादों को ध्यान से सुनना नहीं चाहिए और फ़िर अपने द्वारा चुनी हुई सरकार से उन वादों को पूरा नहीं करवाना चाहिए। अगर अब भी हम ऐसा नहीं करवा सके तो फ़िर वैसे ही ये वादे भी उसी तरह हवा होते रहेंगे जैसे पिछले ६ दशकों से होते रहे हैं...

चुनावी मौसम में सब अपनी जगह फिट हो रहे हैं...

देश में जब से चुनावी मौसम शुरू हुआ है चारो ओर हरकंप मचा हुआ है। पार्टियाँ बन और बिगड़ रही हैं, गठबंधन पैदा हो रहे हैं और नेता लोग अपनी-अपनी औकाद के अनुसार अपनी जगह पकड़ रहे हैं। सत्ता पर कब्ज़ा ज़माने के लिए सब अपनी-अपनी गोटी फिट करने में मशगुल हैं। कई थके-हारे नेता धूल झाड़कर अचानक खड़े हो गए हैं और कई नए नेता चुनावी मैदान में उग आये हैं. जिन्हें कल तक कोई नहीं जानता था आज अचानक पोस्टर-बैनरों में छपकर वे गली मोहल्लों में चिपक गए हैं...बड़े-बड़े नारों और वादों की बाढ़ में घिरे कई गुमनाम चेहरे अचानक कुर्सी की लड़ाई में शामिल हो गए हैं. ये है देश में लोकतंत्र की सबसे बड़ी लडाई की तैयारी...कौन कहाँ बाजी मार ले कुछ कहा नहीं जा सकता यहाँ..इसलिए सबसे संभलकर से बात करना पड़ता है...पता नहीं इन छुटभैयों में से कौन कल को माननीय हो जाये...और देश के सम्मानित नागरिकों में गिना जाने लगे..इसलिए भैया कुछ भी बोलने से पहले दस बार सोचना पड़ता है...शायद लोकतंत्र का यही तकाजा है...

चुनावी लड़ाई में उतरने से पहले सभी दल तैयारी में लगे हुए हैं॥ जैसा कि सब कह रहे हैं और लोकतंत्र की हमारी किताब में भी लिखा हुआ है-- इन सबका मकसद आम जानता की भलाई और उनका हित करना है...अब आइये देखते हैं क्या तरीका अपना रहे हैं सब राजनीतिक दल जानता के दिल में अपनी जगह बनाने के लिए...दलों ने लोकप्रिय हुए गानों कि धुन खरीद ली है..प्रचार के दौरान उनके दल के नारों के साथ वो धुन बजेगा और उनका अभियान भी इन हिट गानों की तरह हिट हो जायेगा... लोकप्रिय फ़िल्मी कलाकारों और छक्का-चौका जड़ने वाले क्रिकेटरों को अपने से जोड़ने के लिए तमाम प्रयास हो रहे हैं। कई फ़िल्मी सितारों को मैदान में उतारा गया है और फिल्मों में उनके द्वारा निभाई गयी भूमिका को आधार बनाकर वोट मांगे जा रहे हैं. बिहार की सड़कों को ड्रीमगर्ल के गालों की मानिंद चमका देने का आश्वासन देने वाली हमारी राजनीतिक बिरादरी ने भाई को गांधीगिरी के काम पर लगा दिया है. गाँधीजी के द्वारा उपयोग किये गए चप्पल..कटोरे आदि सामान को राष्ट्रिय अस्मिता वाली चीज बताने वाली राजनीतिक बिरादरी अब उसकी कोई कोई सुध लेने को व्याकुल नहीं दिखती...कोई भारतीय अगर उसे नहीं खरीद लता तो ये भी एक चुनावी मुद्दा बना दिया जाता...गाँधी से बड़ा बिकाऊ राजनीतिक मसला अपने देश में और क्या मिल सकता था..वो तो कहो की किसी भारतीय ने नीलामी में इसे खरीदकर इसे राजनीतिक मसला बनने से बचा लिया...

इस चुनाव में एक नया शब्द मिला है--पीएम इन वेटिंग... सबके अपने-अपने प्रधानमंत्री हैं. हर दल के पास प्रधानमंत्री पद के लिए अपना एक उम्मीदवार है, और हर दल किसी गठबंधन से जुड़ा हुआ है..हर दल का पीएम अपने गठबंधन पर दबाव बना रहा है कि उसे गठबंधन की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया जाये. इसमें कुछ गलत भी नहीं है..अनिश्चितता के इस दौर में कब किसकी लौटरी लग जाये कुछ कहा नहीं जा सकता इसलिए पार्टी वालों के आलावा निर्दलियों के भी अपने पीएम इन वेटिंग होंगे..भले ही उन्होंने अभी अपना प्लान मन में ही रखा है...सब अपनी जगह पर हैं और जो गलत जगहों पर फंसे हुए हैं उनका भी जी-तोड़ प्रयास यही है कि जैसे भी हो अपनी मुक्कमल जगह हासिल की जाये...वैसे भी लोकतंत्र में सबको अपनी जगह हासिल होनी चाहिए..तभी जाकर लोकतंत्र अपने मानदंडो पर खरा उतर पायेगा..

Sunday, 8 March 2009

कौन कहता है कि गाँव वहीँ ठहरे हुए हैं?

हाल ही में गाँव से लौटा हूँ। पिछले कई सालों से एक हफ्ते में लौट आना होता था इस बार पूरा महिना बिताने का मौका मिला इसलिए गाँव को करीब से देखने का मौका मिला. इस बार देखा- गाँव पहले की अपेक्षा काफी बदल गए हैं। पक्की सड़क(हमेशा मरम्मत के काम में मशगुल भी) गाँव-गाँव में बन गयी है, जगह-जगह मोबाइल के टावर लगे दिखे, घर-घर में दोपहिया वाहन और काफी संख्या में चौपहिया वाहन भी(ज्यादातर व्यवसायिक उदेश्य के लिए जिनकी मांग शादी-ब्याह में ज्यादा रहती है) आ गए हैं। गाँव के चौक पर दुकानों की कतार लम्बी हो गयी है. सौंदर्य प्रसाधन से लेकर तरह-तरह के इलेक्ट्रोनिक सामान(ज्यादातर को लोग चाईनीज़ माल बोलते हैं) भी बिक रहे हैं. बिजली रहती नहीं और रौशनी के लिए लोगों ने बैटरी पर चलने वाले तमाम उपकरणों को अपना लिया है. बिजली कम रहने के कारण अभी भी ब्लैक एंड व्हाइट टीवी कार्यरत हैं. सबसे ज्यादा भीड़ मोबाइल और सीडी की दुकानों पर दिखी. तरह-तरह के भोजपुरी फिल्मों और गानों की सीडी से दुकाने अटी पड़ी है. बाज़ार में घूमते हुए २-३ छोटे बच्चे एक गाना गुनगुना रहे थे, उस समय समझ में नहीं आया. घर आकर पूछा तो मेरा भतीजा जो कि अभी ४ साल का हुआ है उसने वो गाना सुना दिया--गाना कुछ इस तरह था--- "दिन पर दिन दुबराईल जात बारू, दिन पर दिन सुखाईल जात बारू, हईं, हम हईं दिल के डॉक्टर मिलल कर, लव के टॉनिक पियल करअ"... मेरा भतीजा अक्सर इस गाने को गुनगुनाता रहता था। अब पता नहीं ४ साल का लड़का इसका क्या मतलब समझ रहा है?

गाँव के चौक पर दुकानों की कतारों के आखिर में कुछ दुकानों देखी। पता किया वहां देसी-विदेशी दारु मिलती है. तार के पेड़ से निकलने वाली ताड़ी भी कई जगह सजी थी. इसे बेचने वालों के पास दुकाने नहीं हैं वे खुले में बेचते हैं. ये दारु का खर्च न उठा सकने वालों का पसंदीदा पेय है, कई बार लोग टेस्ट बदलने के लिए इसे चखते हैं. लेकिन ऐसा नहीं हैं कि केवल यही पसंदीदा है. दुकानों में कोल्ड ड्रिंक्स भी खूब बिक रहे थे और बच्चों को हर ब्रांड की खबर भी है. हाँ दूध मिलना जरूर कम हो गया है. बचपन में हर घर में गाय-भैंश होते थे, अब इक्का-दुक्का घरो में ही दीखते हैं. लोगों को ग्वाले द्वारा लाये गए दूध पर भरोसा नहीं है और बच्चे उसमें होर्लिक्स मिला कर पी रहे हैं और तंदुरुस्त होने के सपने के साथ जवानी की ओर बढ़ रहे हैं.

मेरे साथ मेरे गाँव का समाज भी जवान हो गया है. बचपन में देखे हुए अधिकांश परिवार टूट चुके हैं. लगभग हर परिवार में नई पीढी ने कमान संभाल ली है. लोग जागरूक हो गए हैं. पीठ पर झोला लादकर स्कूल जाते बच्चे अब भी दीखते हैं लेकिन बहुत सारे बच्चों के पीठ पर झोले की जगह स्कूल बैग ने ले लिया है. स्कूली बच्चे बोरे से उठकर बेंच पर आ गए हैं. बच्चे धुले हुए स्कूल ड्रेस पर टाई लगाकर जाने लगे हैं. मिटटी के घडों की जगह पक्के माकन दिखने लगे हैं हालाँकि अभी भी गाँव के बाहरी इलाकों में बसे काफिघर मिटटी के ही हैं और हर साल बरसात के बाद लिपे जाते हैं. खेती में भी बड़ा बदलाव आ गया है. बैल नहीं दीखते और उनकी जगह ट्रैक्टर और अन्य मशीनों ने ले लिया है. शहर की तरह गाँव में भी क्रिकेट ने गहरी पैठ बनायीं है. बच्चे बर्थडे पर बैट गिफ्ट मांगने लगे हैं और अपने प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री-राष्ट्रपति के नाम उन्हें याद हो न हो देशी-विदेशी क्रिकेट खिलाडियों के नाम उन्हें जरूर याद हैं...ये पिछले एक दशक में आया हुआ परिवर्तन है और अब शायद मैं ये कहने के पहले कई बार सोचूंगा कि गाँव बदलाव की बयार से अछूते हैं और वहीँ के वहीँ रह गए हैं.

Sunday, 1 February 2009

हमारे तालिबान.उनके तालिबान...

तालिबान क्या है... शायद एक नकाबपोश चेहरा। तालिबान कहे जाने वाले इस कौम का चेहरा बहुत ही कम दिखता है. लेकिन नकाब पहना ये कौम पिछले कुछ सालों में कई देशों में दिखा। ये अफगानिस्तान में दिखा...पाकिस्तान में दिखा और हाल के दिनों में भारत में भी दिखने लगा है. ऐसा मैं नहीं कहता ऐसा हमारी मीडिया कहती है. बेंगलूर में पब में डांस करती लड़कियों की पिटाई की गई. हमला करने वालों ने कहा ये लड़कियां हमारी संस्कृति को तबाह कर रही हैं और हम संस्कृति को बचाने के लिए आगे आए हैं. लड़कियों का कहना है कि ये हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है. इसके विरोध में देश और दुनिया में आवाज उठाई गई. इसपर देश भर में राजनीति भी शुरू हो गई है. इसका विरोध करने वाले हमला करने वाले लोगों को तालिबान के नाम से संबोधित कर रहे हैं. हममे से कई लोग तालिबान शब्द के मतलब को लेकर बँटे हुए हैं. कई लोग अपने इस तालिबान को समाज के हित में मानते हैं तो दूसरे देशों के तालिबान को ग़लत मानते हैं.

जहाँ तक मुझे याद है तो ये शब्द मुझे सबसे पहले अफगानिस्तान के सन्दर्भ में सुनने को मिला था। वहां दशकों तक चले सत्ता संघर्ष में विजेता के रूप में कुछ नकाबपोश लोग दिखने लगें। जैसा कि मैंने सुना और ख़बरों में पढ़ा उन्होंने पूरी सभ्यता को बंधक बना लिया. इसके बाद पाकिस्तान में भी लगातार ये बढ़ता रहा. अफगानिस्तान आने से पहले भी इसकी उपज पाकिस्तान में ही होती हुई दिखी थी. इन दोनों देशों में 'तथाकथित तालिबान' ने कई स्वघोषित कानून लागू किए---लाठी के बल पर. लड़कियों का स्कूल जाना बंद कर दिया गया. उन्हें परदे में रहने का फरमान सुनाया गया. उनपर वो सारी पाबंदियां लागू की गई जो शायद मध्यकालीन समाज के लिए भी स्वीकार्य नहीं कहा जा सकता. पाकिस्तान में पिछले महीनों में स्वात घाटी में कट्टरपंथियों और सरकारी व्यवस्था में घमासान जारी है. कौन हावी होगा कहा नहीं जा सकता लेकिन फ़िर भी अभी कट्टरपंथी हावी हैं. १०० से ज्यादा स्कूल तबाह कर दिए गए हैं. स्कूलों को साफ़ कहा गया है की लड़कियों को मत पढाये. लोगों को कहा गया है कि अपनी कुंवारी बेटियों की शादी आतंकियों से कर दें वरना गंभीर परिणाम भुगतने को तैयार रहें. इन इलाकों में पुरूष वैसे ही आतंकी गतिविधियों के लिए सुलभ हैं और अब महिलाओं को भी जबरन इसका परिणाम भुगतने को मजबूर किया जा रहा है. वैसे भी किसी समाज में पुरूष और महिला की किस्मत एक दूसरे से जुड़ी होती है.

बेंगलूर की घटना की निंदा करने वाले ऐसा करने वालों को फासीवादी और तालिबान और न जाने क्या-क्या कह रहे हैं. इसका तरीका भले ही ग़लत कहा जा सकता है और इसे रोकना भी चाहिए लेकिन इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि क्या पब संस्कृति को रोका नहीं जाना चाहिए. अगर ये जरूरी नहीं है तो क्यूँ गोवा के बीच पर नए साल के दौरान पार्टी वगैरह पर रोक लगाई गई थी. मुंबई के डांस बार पर रोक क्यूँ लगाई गई. गोवा का स्कारलेट केस क्यूँ हुआ. देश की राजधानी दिल्ली में रोज-रोज पकड़ा जाने वाला नशीला और मादक द्रव्य किसके लिए आता है. जाहीर है कि जितना पकड़ा जाता है उससे कई गुना ज्यादा माल शहर में खप जाता होगा. इन सब कामों में शामिल लोग कौन हैं, हमारे बीच के लोग ही न. इन्हें रोकने का तरीका जरूर बदला जाना चाहिए लेकिन इन्हें रोकने वालों को तालिबान कहना कहीं से भी उचित नहीं लगता. इन्होने न तो लड़कियों के घर से बाहर निकलने पर रोक लगाई है और न ही परदे के भीतर जिंदगी जीने को मजबूर किया है. हा इन्हे रोकने के तरीकों को जरूर बदला जाना चाहिए.