Sunday, 20 January 2008

कहलगांव में बिजली मांगने पर मिली गोलियाँ!

बिहार के भागलपुर जिले के कहलगांव में लोग और ज्यादा बिजली आपूर्ति की माँग के साथ सड़क पर उतरे। लोगों ने बाज़ार बंद कर दिए और आम-जन जीवन ठप्प कर दिए। लालू राज से नीतिश राज में आकर जी रही बिहार पुलिस के जवान जागे और उन्होने लोगों को काबू करने के लिए कारवाई की। इस दौरान गोलियाँ चली और ३ लोग मारे गए। ये है आज के बिहार में प्रशासन और आम जनता के अधिकारों कि हालत। लोगों का कहना था की कहलगांव में बिजली संयंत्र होने के बावजूद भी यहाँ ४-५ घंटे से ज्यादा बिजली नहीं रहती। अगर लोग ज्यादा बिजली कि माँग कर रहे हैं तो इसमे गलत क्या था। क्या प्रशासन को लोगों से बात करके लोगों कि शिकायतों को दूर नहीं करना था। क्या प्रशासन का काम यही नहीं है।

मैं हाल ही में बिहार के अपने गाँव से लौटा हूँ। मुझे अपने यहाँ बिजली, सड़क, स्वास्थ्य के मोर्चे पर कोई बदलाव अब भी नहीं दिखा। सबकुछ ऐसा ही है जैसा मैं बचपन से देखता आ रहा हूँ। अब चलते हैं बिहार कि बुनियादी हालत पर। तमाम सरकारें आयी और विकास के तमाम दावे करती रहीं। मैं खुद बिहार के छपरा जिले का रहने वाला हूँ जहाँ से कई मुख्यमंत्री बने। यहाँ तक कि जिला मुख्यालय से अन्य भागों को जोड़ने वाले मुख्य रास्ते को मैंने आजतक अच्छी हालत में नहीं देखा। हालांकि हमेशा उस रास्ते पर काम लगा हुआ ही देखता हूँ। इस बार हाल में मैं फिर गाँव गया था और फिर उस सड़क पर काम लगा ही देखा। आने-जाने के लायक तो उस रास्ते के होने का सवाल ही नहीं था। इस बार लोग थोडे उम्मीद में थे। लोगों ने कहाँ कि इस बार जरूर रोड ठीक हो जायेगा। अब देखना है कि बिहार कि यही नीतिश सरकार जनता कि उमिददों पर कितनी खड़ी उतरती है।

Sunday, 6 January 2008

मनचले होने का हुनर सबमें कहाँ।

माना आप मनचले ना हों और आपने कभी किसी से छेड़छाड़ भी नहीं किया हो , लेकिन अगर किसी केस में कोई टीवी पर दिख रहा आरोपी का चेहरा आपसे मिलता-जुलता हो और कोई सजग नागरिक टीवी पर दिखने की चाहत में आपको पुलिस हिरासत में भिजवा दे। अगले दिन की शिनाख्त परेड में आप मनचलों की जमात में सर झुकाए खडे हों। सारे गवाह आपके एक-एक कर लोगों को पहचानने के काम में लग जायेंगे। एक-एक मनचले का चेहरा देखते हुए जब वे आपकी तरफ बढ़ रहे होंगे तब आपके दिल में क्या चल रहा होगा- भगवान् इस बार तो बचा लो एक किलो लड्डू लेकर कल सुबह मंदिर आऊँगा।

आपको ये यकीं तो होगा कि मैंने छेड़छाड़ नहीं किया है लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि आप बच ही जाओगे। अगर बच भी गए तो आपको पसंद नहीं करने वाले पड़ोसी कहाँ आपको माफ़ करने वाले हैं। जब भी आप मोहल्ले से निकलोगे, लोग आपस में भुनभुनायेंगे की देखो यहीं हैं जनाब छेड़-छाड़ के चक्कर में जेल गए थे वो तो किस्मत अच्छी थी की पहचाने नहीं गए वरना आज जेल में सड़ रहे होते। सबसे ज्यादा मजा वही लोग लेते पाए जायेंगे जो चौक-चौराहों पर बैठकर आती-जाती महिलाओं और लड़कियों पर या तो फब्तिया कसते रहते है या शराफत का लबादा ओढे दांत निपोरते रहते हैं। ऐसे लोगों के लिए मेरे एक मित्र महोदय अक्सर हिपोक्रेसी शब्द का इस्तेमाल करते रहे हैं। उनका कहना है कि ये वर्ग उन्ही बातों का विरोध करता है जिसमें उसे खुद ज्यादा मज़ा आता है।

अब मैं मनचलों की जमात के बारे में तो ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा लेकिन उनकी विचारधारा का मैं कायल हूँ। किस मौक़े पर क्या बोलना है और कैसे-कैसे आवाज कब निकालने हैं इसकी कला इनसे जरूर सीखनी चाहिए। एक बात और, मनचले होने के लिए एक कला का आना बहुत जरुरी है। सिटी बजाना। ये नहीं आया तो मनचले होने के प्रोफेशनल में आपकी सफलता वाकई मुश्किल है।

जब सांसद महोदय संसदीय क्षेत्र से दूर रहने लगें।

हम एक संसदीय व्यवस्था में रहते हैं और देश के हर आदमी का अपना कोई ना कोई सांसद होता है। हर नागरिक किसी ना किसी संसदीय क्षेत्र में रहता है। यही हमारी व्यवस्था है। सरकारी कोष से हर सांसद को एक निश्चित राशी मिलती है ताकि वो अपने क्षेत्र में विकास के काम करते रहें। मसलन स्कूल, कॉलेज, सड़क, स्वास्थ्य संबंधी काम करवाते रहें। इस काम के लिए क्षेत्र की जनता अपने सांसद को ५ साल के लिए चुनकर लोकसभा भेजती है। अब आइये एक आपको एक खबर पढाते हैं जो मुम्बई उत्तर लोकसभा क्षेत्र के लोगों से जुडी हुई है।

उत्तरी मुम्बई लोक सभा क्षेत्र के लोगों ने अपने सांसद महोदय को खोज कर लाने वाले के लिए ५१ लाख रूपये के इनाम की घोषणा की है। वहाँ के लोगों का कहना है कि वर्ष 2004 में चुनाव जीतने के बाद से हमारे इलाक़े के सांसद महोदय ने अपना चेहरा नहीं दिखाया है। इसके लिए महाराष्ट्र अल्पसंख्यक मार्चे के अध्यक्ष मोहम्मद फारूक आजम ने उनका पता लगाने के लिए 51 लाख रुपए का इनाम देने की घोषणा की है। सच्चाई कुछ भी हो सकती है लेकिन अगर ये सच है तो वाकई गंभीर मसला है। मोर्चे ने इस संबंध में लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी को भी पत्र लिखा है। चटर्जी से आग्रह किया है कि चुनाव जीतने के बाद अपने निवार्चन क्षेत्र से गायब रहने वाले सांसदों को अयोग्य ठहराया जाए।

लेकिन इस मामले पर इससे इतर भी कुछ होना चाहिए। वोटरों को ये अधिकार दिया जाना चाहिऐ कि ऐसे सांसद
जो चुनाव जीतने के बाद अपने संसदीय क्षेत्र से दूरी बनाने लगें उन्हें सबक सीखा सके। ईस पहले भी कई इलाकों के लोगों ने अपने जनप्रतिनिधियों के खिलाफ इस तरह का कदम उठाया था ताकि लोगों का ध्यान इस ओर जाये। लोगों को इस बात का अधिकार है कि वो अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल कर सके। हां इस तरह के मामलों को अपने राजनितिक फायदे के लिए उठाने वाले लोगों पर भी लगाम लगना चाहिए। लोकतंत्र में सभी धडो की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और साथ ही ये भी तय होना चाहिये कि सभी उसे निभा रहे हैं कि नहीं।

Saturday, 5 January 2008

अगर आप आतंकी नहीं हैं तो आइडेंटिटी कार्ड जेब में रखें।

अगर घर से बाहर निकलते वक्त पर्स और आइडेंटिटी कार्ड छूट जाने की आपकी आदत हो तो अपनी आदत को ज़रा बदल लें। और अगर आप देश कि राजधानी दिल्ली में रह रहे हैं तब तो इस आदत से छुटकारा पाना आपके लिए बेहद जरुरी हो गया है। वरना ये आदत किसी दिन आपको बहुत महंगा पर सकता है। राजधानी में आतंकवाद के बढ़ते ख़तरे से निपटने के लिए पुलिस वालों को ये आदेश दिया गया है कि वे जब भी चाहें किसी भी व्यक्ति को रोककर उससे उसकी पहचान पत्र माँग सकते हैं। और नहीं पाए जाने पर उसके बारे में जांच करना जरूरी है। अगर आपकी आदत देर रात तक इधर-उधर घूमने की है तब तो ये आपके लिए बेहद जरुरी हो जाता है।

हाल के वर्षों में जिस तरह से आतंकियों की सक्रियता दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में बढ़ी है उससे निपटना पुलिस के लिए काफी चुनौतीपूर्ण हो गयी है। वो भी एक ऐसे शहर में जहाँ डेढ़ करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं। तो आप जब भी घर से निकले अपना पर्स भले ही छोड़ दें लेकिन अपना पहचान पत्र जरुर जेब में डाल लें। देशभर में आतंकी हमलों के बढ़ते खतरे के मद्देनजर राष्ट्रीय राजधानी में पुलिस 15 जनवरी से किसी भी नागरिक की कभी भी पहचान से जुड़ी जांच कर सकती है। ऐसे में पुलिस के मांगने पर उन्हें पहचान के रूप में ड्राइविंग लाइसेंस, पैन कार्ड, पासपोर्ट, राशन कार्ड, ऑफिस का आइ कार्ड या दूसरा कोई ऐसा प्रमाण दिखाना पड़ सकता है। ऐसे लोग जिनके पास कोई भी आइडेंटिटी कार्ड नहीं है वे पुलिस अधिकारोयों से मिलकर अपने लिए कार्ड बनवा सकते हैं।

Friday, 4 January 2008

सुरापान में गाँव वाले शहरवालों को दे रहे हैं टक्कर।

वैसे देश में शराब पर खुलकर बात करना अच्छा भले ही ना माना जाता हो लेकिन आज इसका बाजार कई हजार करोड़ रूपये में पहुंच चुका है। साहित्यकार हरिवंश राय बच्चन ने मधुशाला में इसपर खुलकर चर्चा की है। इसपर खुलकर चर्चा होनी भी चाहिऐ। आख़िर एक बड़ी आबादी इसका सेवन करती है। अब आइये देश में शराब से जुडे कुछ आंकडो पर गौर फरमाते हैं। आपने विकास के लिए शहर और गाँव के बीच तुलनात्मक अध्ययन तो बहुत पढे होंगे। मसलन अब गाँव भी तेज विकास की ओर या विकास में शहरों को टक्कर दे रहें है गाँव वगैरह-वगैरह। लेकिन आपको ये जानकार हैरत होगी कि भारत के गाँव सुरापान में भी शहरों को टक्कर देने कि स्थिति में आ रहे हैं।

अगर एसोचैम की रिपोर्ट की माने तो गांवों और छोटे कस्बों में शराब की खपत बहुत तेजी से बढ़ रही है। एसोचैम का अनुमान है कि चालू वित्त-वर्ष के अंत तक ये खपत ५०० करोड़ रूपये तक पहुंच सकता है। एसोचैम का अनुमान है कि चालू वित्त-वर्ष में देश में ८५ लाख लीटर शराब बिक्री कि उम्मीद है, जिसमें से गांवों और छोटे कस्बों का हिस्सा ३५ लाख लीटर का होगा। यानी की करीब ४० फीसदी शराब गांव वाले गटक जा रहे है। एसोचैम के इस रिपोर्ट से इत्तर मैं ये भी साफ कर दूँ कि ये केवल एक रिपोर्ट है। गांवों और छोटे में इससे कितना गुना ज्यादा शराब छोटे स्तर पर बँटा है और बिकता है जिसका कोई आंकड़ा एसोचैम के पास नहीं पहुंच सकता। और हां ये कोई छुपा हुआ रहस्य भी नहीं है बल्कि गांवों में इसका कारोबार खुलेआम होता है।

ये आंकडे गांवों की सेहत सुधारने के लिए उठाये जा रहे तमाम सरकारी प्रयासों के लिए गंभीर चिंता का विषय हो सकती है. शराब के अलावा तम्बाकू और गुटखा वगैरह का एक बड़ा बाज़ार भी इन्हीं ग्रामीण इलाकों में है। एक तरफ गांवों में रोजगार गारंटी और तमाम योज्नावों के माध्यम से सरकार वहाँ के लोगों के पॉकेट को भरने में लगी है दूसरी ओर सुरापान में इन इलाकों का करोड़ों रुपया जा रहा है। वैसे शहरों और गांवों में अब एक बात समान हो गयी है की किसी भी खास दिन को मनाने के लिए लोग सुरापान का मौका जाने देने को तैयार नहीं है। अब पहली जनवरी के दिन दिल्ली के एक अखबार ने शीर्षक दिया था कि नए साल पर करोड़ों की शराब गटक गए दिल्ली वाले। भैया दिल्ली वालो अब सचेत हो जाओ वो दिन दूर नहीं जब गाँव के लोग भी आपके इन रेकोर्ड को चुनौती देने लगेंगे।

Thursday, 3 January 2008

तीसरे मोर्चे की मृगमरीचिका!

भारतीय राजनीति में आजादी के बाद से ही बहुदलीय राजनीतिक व्यवस्था रही है, भले ही ज्यादातर पार्टियों का प्रभाव कम ही देखने को मिला है। क्षेत्रिय राजनीति में तो तमाम पार्टियां लगातार अपना बर्चस्व कायम करती रही हैं लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में अब तक की राजनीति पहले कांग्रेस और अब उसके साथ भाजपा के इर्द-गिर्द सिमटी रही है।

वीपी सिंह की सरकार बनने के बाद भारत में कांग्रेस और भाजपा से इत्तर सरकार बनाने का कई बार प्रयास हुआ है। इसके लिए हमेशा एक जुमला गढ़ा गया- "तीसरे मोर्चे " का। लेकिन हमेशा ये नाम अवसरवाद का एक रुप साबित हुआ। कुछ दिन वीपी सिंह की सरकार देश चलाने में सफल रही तो थोडे-थोडे दिनों तक देवेगौडा और गुजराल की सरकार। लेकिन अब तक की राजनीति में तीसरे मोर्चे को कोई खास पहचान नहीं मिल सकी है।
राज्यों में छोटे दलों के बढ़ते प्रभाव के कारण जब राजग और सप्रंग बना तब भी कमान या तो भाजपा के पास रहा या फिर कांग्रेस के पास। उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव के समय भी कुछ दलों ने तीसरे मोर्चे का राग अलापना शुरू किया था लेकिन फिर पता नहीं वे सारे दल किसी ना किसी खेमे में देखे जाने लगे।

इधर अब जब लोकसभा के चुनाव फिर सामने दिख रहें हैं फिर कुछ दलों ने तीसरे मोर्चे के जुमले का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। इस बार माकपा इसकी अगुआ दिख रही है। लेकिन उसे भी अभी इस जुमले के सच होने में उतना यकीन नहीं है इसलिए अभी इसपर काफी आराम से चर्चा चलाने की कोशिश की जा रही है। वरिष्ठ वाम नेता ज्योति बासु ने कहा है की अभी हाल-फिलहाल इसपर तुरंत किसी परिणाम की उम्मीद नहीं की जा सकती। वैसे इसमें कोई हैरत नहीं होगी अगर कई ऐसे दल जो अलग-अलग राज्यों में अच्छी स्थिति में है एक साथ हो जाएँ। लेकिन वो गठजोड़ कितना मजबूत होगा ये देखने लायक होगा। इसके साथ ही की लोकसभा चुनाव में देश की जनता को उस गठजोड़ पर कितना यकीन होता है। हालांकि अब देश की जनता पहले से ज्यादा जागरूक है और कई राज्यों के चुनाव परिणाम कुछ इसी तरह के संकेत दे रहे हैं।

Wednesday, 2 January 2008

भारत के हर 22वें व्यक्ति के पास फोन!

वर्ष 2007-08 की दूसरी तिमाही [जुलाई-सितंबर] के दौरान देश में टेलीफोन ग्राहकों की संख्या 24 करोड़ 86 लाख 50 हजार पर पहुंच गई है। इस अवधि में ग्राहकों की संख्या में 2 करोड़ 41 लाख 50 हजार का इजाफा हुआ है। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण [ट्राई] द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक देश में अब करीब प्रति 22 व्यक्ति में से एक के पास टेलीफोन है। -- ये खबर पढ़ते हुए एक भारतीय के नाते मुझे भी भारत में दूरसंचार क्षेत्र में आई क्रान्ति पर काफी गर्व हुआ। जाहीर है लोगों के पास फ़ोन बढे हैं तो लोगों की परचेजिंग पॉवर(खरीद क्षमता) बढ़ी है। मैं भी उस वर्ग से आता हूँ जिसकी पहुंच वर्ष २००० के बाद मोबाइल तक हुई। जो १९९० के दशक में भारत में शुरू हुई उदारीकरण की नीति का परिणाम है। इसने देश के फ़ोन बाज़ार में नए खिलाड़ियों को उतरने का मौका दिया और इस कारन फ़ोन और उसको उपयोग करने का शुल्क कम हुआ। अब हालत ऐसी हो गयी है कि कई कंपनियां ५०० रूपये में भी मोबाइल देने लगी है। जाहीर है कीमतों में आई इस गिरावट के कारण आम लोग भी मोबाइल खरीदने में सक्षम हुए हैं। अब फ़ोन स्टैटस सिमबॉल नहीं रह गया, बल्कि के जरुरत बन चुकी है। बाज़ार की बिल्कुल यही हालत टाटा कि लखटकिया कार के आने के बाद भारत के कार बाज़ार का होने वाला है।

लेकिन एक बात ध्यान देने वाली है कि अब तक बाज़ार के आंकडे बता रहे थे कि गांवों में फ़ोन की संख्या बढ़ रही है। लेकिन ताजा रिपोर्ट में ये बात सामने आई है गांवों के टेलीफोन ग्राहकों में इस दौरान 2.28 प्रतिशत की गिरावट दिखी। इनकी संख्या पहले के एक करोड़ 22 लाख 70 हजार से घटकर एक करोड़ 19 लाख 90 हजार रह गई। इस दौरान इंटरनेट ग्राहकों की संख्या बढ़कर 96 लाख 30 हजार पर पहुंच गई। जाहीर है कि इंटरनेट का उपयोग शहरों में ही होता है। अभी भी गांवों में फ़ोन कि सुविधा देने में केवल सरकारी कंपनियां आगे हैं। अब जब निजी कंपनियां आगे आएँगी तो गाँव में सुविधाएं बढेगी। अभी गाँव में मोबाइल तो पहुंच गएँ हैं लेकिन बात करने के लिए लोगों को काफी समय तक मशक्कत करनी पड़ती है। फ़ोन लगते नहीं और लैंड लाइन फ़ोन कि हालत तो और खराब है। आप को अगर गाँव में नया कनेक्शन लेना है तो पता नहीं कब आपका नम्बर आयेगा। अगर लग भी गया तो पता नहीं कब खराब हो जाये या फिर पता नहीं कितने गुने ज्यादा का बिल आपको भेज दिया जाये। इन सब समस्याओं से अगर फ़ोन कोम्पनिया निजात दिलाएं तो भारत के गाँव में के बड़ी आबादी और इंतज़ार कर रही है फ़ोन कि सुविधा लेने के लिए।

Tuesday, 1 January 2008

न्यू ईयर पर मिडनाईट सेलीब्रेशन का तडका!

नए साल को मनाने के लिए लोग आधी रात तक जगे हुए थे। पूरे देश में नए साल कि तैयारियां हुई थी और जैसे घड़ी में रात के १२ बजे (मैं बस एक मिनट कि बात कर रहा हूँ।) लोगों में न जाने कहाँ से गजब का उत्साह आ गया। इधर घड़ी कि सुई १२ पर पहुंची और उधर लोग झूम उठे । सबसे ज्यादा उछल रहे थे टीवी चैनल वाले। १२ बजते ही उनका उत्साह भी अचानक कई गुना हो गया। मुझे ये महीन समझ में आया कि आख़िर इस एक मिनट में ऐसा क्या बदल गया। तारीख तो रोज बदलती है और उसपर तो लोग बस ये मानकर खुश हो लेते हैं कि चलो एक और दिन गुजर गया। इधर पिछले कुछ सालों में न्यू ईयर पर टीवी चैनलों मिडनाईट सेलीब्रेशन का तडका लगाकर लोगों का उत्साह बढ़ा दिया है। दिल्ली के कई होटलों ने तो लोगों को आधी रात का ये जश्न मनाने के लिए लाखों का बजट थमा दिया। अब बड़ा कहलाना है तो भाई इस तरह के खर्च तो करने पड़ेंगे।

आधी रात को लोग इसी तैयारी में रहते हैं कि १२ बजे और अपने लोगों को नयी साल कि बधाई दे दी जाये। लोग इसके लिए सुबह तक इंतज़ार नहीं कर सकते। भाई अब लोगों में इतना धीरज कहाँ। लेकिन मुझे तो कई बार इस आधुनिक शैली के नक़ल के चक्कर में मुझे दांत सुन्नी पड़ी है। १२ बजे मैंने किसी को बधाई देने के लिए फ़ोन लगा दिया। वो परेशान हो कर उठा, फ़ोन उठाते ही बोला क्या हुआ। इतनी रात गए पता नहीं क्या बिपत्ती आ गयी। मैंने कहाँ अरे नए साल कि बहुत-बहुत बधाई। सामने तो नहीं बोला लेकिन लगा मन में गालियाँ दिए जा रहा हो। भंड में गया नया साल और भंड में गयी बधाई। सुबह तक इंतज़ार नहीं कर सकते क्या।

Monday, 31 December 2007

काश मेरा जन्मदिन भी साल में कई-कई बार आता!

प्रेम और जन्मदिन में क्या संबंध है?
आप भी सोचियेगा कि क्या फालतू का सवाल मैं कर रहा हूँ। सीधे तौर पर तो नहीं लेकिन आधुनिक प्रेम में जन्मदिन का काफी महत्त्व है। आज-कल कई बार ऐसा होता है कि किसी दोस्त के बारे में एक साल के अन्दर कई बार उसके जन्मदिन के बारे में सुनने को मिल जाता है। पहले तो थोडी हैरत होती थी लेकिन अब इसमे कोई हैरानी नहीं होती। अब दोस्ती का मामला है भेद तो खोल नहीं सकता।

एक मेरे मित्र ने अप्रैल में एक बार जन्मदिन मनाई थी लेकिन अभी २-३ माह ही बीते थे कि बेचारे को एक दिन प्रेम हो गया। अब जो लड़की पसंद आई थी उसको इम्प्रेस करने के लिए उन्होने पार्टी देने कि सोची और कहा कि मेरा जन्मदिन पहली जनवरी को है। और इसी के साथ साहब ने अपनी नयी प्रेमिका को जन्मदिन मनाने के लिए पार्टी के लिए १ तारीख को दावत दे दी। मुझे पार्टी के लिए आमंत्रित करते हुए बताया गया कि बताना मत। अब मैं क्या कह सकता था। अगर मुझे ६ माह में सालाना जलसे की मिठाई खाने को मिले तो मुझे क्या हर्ज हो सकता था।

लेकिन मुझे सबसे ज्यादा हैरानी अपने मित्र महोदय के आत्मविश्वास से हुआ। उन्हें इस बात का पक्का यकीं था कि अगले साल पहली जनवरी से पहले इस महबूबा से छुटकारा मिल जायेगा। नहीं तो बेचारे ने इतना झूठ बोलने कि हिम्मत नहीं की होती। अब भईया हम तो साल में एक बार जन्मदिन मनाने का मौका मिलता नहीं २ बार-३ बार कहाँ से मनाता, आख़िर किसके लिए मनाता। ये सब बडे जिगर वालों का काम है जो प्यार को इस तरह से मैनेज करने का जिगर रखते हैं। वैसे भी प्यार कोई बच्चों का खेल नहीं।

भाजपा को फिर से याद आये रामजी!

रविवार ३० दिसम्बर को भाजपा के नेताओं के लिए काफी व्यस्त दिन रहा। एक दिन में दो बड़े आयोजन थे। हिमाचल में भाजपा की सरकार सत्ता में आई थी प्रेम कुमार धूमल को मुख्यमंत्री पद कि शपथ लेनी थी वही दिल्ली में विश्व हिन्दू परिषद कि रैली थी जो राम सेतु के मसले पर बुलाई गई थी। पहले जब शिमला में मंच पर पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह नहीं दिखे तो लोगों को हैरत हुई कि अरे ये क्या हुआ. पार्टी का इतना बड़ा आयोजन और राजनाथ जी कैसे गायब हो सकते हैं। शिमला के मंच पर दिल्ली से आडवाणी जी और नकवी जी दिखे।

थोडी देर बाद जवाब खुद मिल गया। दिल्ली में विहिप की रैली के मंच पर बाक़ी के नेता दिख गए। राजनाथ सिंह जी के साथ मुरली मनोहर जोशी जी और सुषमा जी भी विहिप की रैली में मंच पर साधू-संतों की भीड़ में दिख गए। जोशी जी ने बाहर निकल कर मीडिया के बीच राम सेतु मसले पर केन्द्र की कांग्रेस सरकार को घेरने का प्रयास किया। राजनाथ जी की दिल्ली में उपस्थिती ये बता रही थी की हिमाचल में जीत की ख़ुशी मनाने से ज्यादा जरूरी पार्टी अध्यक्ष जी के लिए राम सेतु के मसले पर हो रही रैली थी। लेकिन काफी लोगों को दिल्ली के इस मंच पर मोदी जी को न देखकर निराशा हुई।

गुजरात के कुछ ऐसे लोगों से मेरी बात हुई जो विहिप से जुडे हुए है और काफी सक्रिय हैं। रैली में मोदी के न आने को लेकर उनमें कोई हैरानी नहीं थी। उनका कहना था की मोदी जी ने अपने काम के बदौलत सत्ता बरक़रार रखी है और दिल्ली रैली में मोदी के न आने को लेकर उनका कोई स्पष्ट विचार सामने नहीं आया। लेकिन राम सेतु के मसले ने बीजेपी को एक ऐसा मसला दे दिया है जिसे अगले चुनाव में बीजेपी राम मंदिर के मामले के बदले भुना सकती है और बीजेपी इस बात की गंभीरता को समझ रही है। इसी कारण राम सेतु पर कोई भी मौका बीजेपी गवाना नहीं चाहती। बीजेपी को ऐसा लगने लगा है कि जो पार्टियां अभी इसे हल्के में ले रही है आगे चलकर उन्हें इसका नुकसान हो सकता है। बीजेपी इसे ऐसे मौक़े के रुप में देख रही है जिस पर वह दक्षिण भारत के हिन्दुओं को भी अपने पक्ष में गोलबंद कर सकती है। अपने पक्ष में अचानक आये इस मौक़े को देखकर बीजेपी को फिर वो राम याद आ गए हैं जिन्हें १९९८ में सरकार बनाने के बाद उसने भुला दिया था।

Sunday, 30 December 2007

न्यू ईयर पर बाज़ार में खूब बिक रहा है दिल!

न्यू ईयर पर बाज़ार में ग्रीटिंग कार्ड्स की धूम में दिल की खूब बिक्री हो रही है । कई कार्ड्स पर तो एक की बजाय कई-कई दिल छपे हुए है। किसी को उपहार देना हो बाज़ार में एक रूपये से लेकर मंहगे से महंगा ग्रीटिंग कार्ड है। लेकिन एक बात सब में समान है। सब में नए साल की शुभकामनाएं छपी है साथ में लगभग हर कार्ड में एक , दो या फिर ढेर सारे दिल लगे हुए है। आपको अब अगर किसी को दिल देना है तो अपना दिल जाया करने कि जरूरत ही क्या है, जाइये बाज़ार और खरीद lijiye एक सस्ता सा दिल और उसपर किसी शायरी कि किताब से एक अच्छी सी शायरी चुनकर अच्छी सी लिखावट में लिख डालिए और दे दीजिए अपने अजीज को अपना ये प्यारा सा दिल ।

इस दिल के कई फायदे हैं। अगर बाद में आपके अपने अजीज ने आपका दिल तोड़ दिया तो आपकी जिंदगी बर्बाद होने से भी बच जायेगी. और इस खेल में आपका खर्च भी बमुश्किल एक या दो रूपये का आयेगा। वैसे भी इस सस्ते दिल की आजकल के युवावों को काफी जरुरत है। अब उन्हें कईयों को अपना दिल देना पड़ता है। अब भाई असली दिल इतने कहाँ से आएंगे। वो तो केवल गानों में होता है कि दिल के टुकरे हजार हुए , कोई यहाँ गिरा- कोई वहाँ गिरा। अब असल में दिल के अगर कई हिस्से हुए तो न वो बेचारा किसी काम का रहेगा और न ही बेचारे का बेचारा दिल। वैसे अब अगर आपका अजीज आपसे काफी दूर है तो आपको अपना दिल भेजने के अब कई माध्यम मिल जायेंगे। इंटरनेट पर जाइये और ग्रीटिंग्स में से कोई अच्छा सा दिल वाला ग्रीटिंग चुनकर ई-मेल कर दीजिए। वैसे भी न हो तो मोबाइल पर एक दिल वाला ग्रीटिंग ही चिपका दीजिए। अब अपने अजीज को ख़त भेजने के लिए ना तो किसी कबूतर कि मिन्नत करनी है और ना ही डाकिये की चिरोरी । आधुनिकता ने प्रेमियों को कितनी सुविधाये दे दी है। वैसे नए साल पर दिल भेजने वालों को थोडा सा दिल वैलेंटाइन डे के लिए भी बचाना पड़ता है कारण कि अब प्रेमियों का ये पर्व भी अब ज्यादा दूर नहीं है। इसकी तैयारी तो अभी से ही शुरू करनी पड़ेगी ना।

Sunday, 23 December 2007

विधायक, सांसद टाई-सूट में नज़र आएंगे!

ग्लोबलाइजेशन के बाद इधर अपने नेता जी लोगों के लिए विदेश यात्रा की संभावनाएं काफी बढ़ गयी है। तब से लेकर नेतागिरी के पेशे में आने वाले कुछ पढे-लिखे लोग हमेशा ये कोशिश करते रहे हैं कि जो नेता विदेश जाये उन्हें थोडा स्मार्ट बनाया जाये। अब चुकी ये बात तय नहीं है कि कौन विदेश जाएगा और कौन नहीं। इधर गठबंधन सरकारों के आने से पहली बार विधायक बने या फिर निर्दलीय विधायकों के विदेश जाने कि संभावनाए ज्यादा हो गई है। आख़िर सरकार चलाने की ज्यादा जिम्मेदारी अब उन्ही पर आ गई है। झारखण्ड इसका सबसे अच्छा उदाहर पेश कर रहा है। वहा तो किसी भी विधायक के लिए विदेश यात्रा बहुत ही आसान है, आख़िर निवेश लाने के लिए उनसे बेहतर विदेश यात्रा और कौन कर सकता है।

इसी बात को ध्यान में रखते हुए झारखण्ड के सारे विधायक जल्द ही जींस, रंग-बिरंगी शर्टे और टोपी पहने दिखाई दे सकते हैं । झारखड विधानसभा के अध्यक्ष्र आलमगीर आलम विधानसभा में एक ड्रेस कोड लागू करने का मन बना चुके हैं। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और स्वतंत्र विधायक इंदर सिंह नामधारी द्वारा ड्रेस कोड का मुद्दा उठाए जाने के बाद आलम ने कहा है कि सभी पार्टियों के नेताओं और विधायकों के साथ बैठक कर ड्रेस कोड की जरूरत पर सहमति बनाई जाएगी। ठीक ऐसा प्रयास केन्द्रिया संसदीय कार्य मंत्री प्रिय रंजन दास मुंशी भी कर चुके हैं। उनका विचार था कि सभी सांसद सूट - में आया करे । लेकिन दरजी के नाम पर सहमति नहीं बन सकी और ये प्लान अभी पूरा नहीं हो पाया है। हम उम्मीद करते है कि जल्द ही ये भी होगा।

जाएँ या रहें- मोदी तो मोदी ही रहेंगें!

अब कुछ घंटों में गुजरात विधानसभा चुनाव के परिणाम आने शुरू हो जायेंगे। पूरा देश इंतज़ार कर रहा है की क्या आयेगा परिणाम। इस चुनाव में सबसे ज्यादा नरेन्द्र मोदी का दांव पर लगा हुआ है। परिणाम कुछ भी हो मोदी ने आखिरी समय तक जिस आत्मविश्वास का परिचय दिया है भारत की जनता को अब आगे एक ऐसे ही प्रधानमंत्री कि जरूरत है। कार्यवाहक मुख्यमंत्री होते हुए भी राष्ट्रीय विकास आयोग कि दिल्ली में हुई बैठक में मोदी ने जिस आत्मविश्वास से देश से जुडे हुए मसलों पर प्रधानमंत्री और केन्द्र सरकार से नज़र मिलाकर बात की है देश में उससे बहुत अच्छा संकेत गया है। २१वी सदी के भारत और इसके सम्मान के बारे में सोचने वाले हर भारतीय के लिए अब मोदी एक प्रतीक बनते जा रहे हैं । इस चुनाव में मोदी का रास्ता रोकने के लिए उनकी पार्टी के अन्दर भी कई लोग खड़े हुए लेकिन ईससे मोदी का आत्मविश्वास नहीं डिगा और शायद मोदी कि यही छवि अब उन्हें गुजरात के अलावा पूरे देश में लोकप्रिय बनाती जा रही है। गुजरात में विपक्षी कांग्रेस तो मोदी के कद का कोई नेता भी नहीं दे सकी, मुद्दों कि बात ही छोड़ दीजिए।

रही विचारधारा कि बात तो अब मोदी ही अकेले ऐसे नेता दिख रहे है जो देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बन रहे आतंकवाद के खिलाफ खुलकर बोलने कि हिम्मत कर रहे है। बाक़ी तो सारे लोग जनता को या तो डराने का काम कर रहे है या फिर हमलों के बाद निंदा करने का। मोदी ने गुजरात में आतंकवाद पर लगाम लगा कर दिखाया है कि आतंकवाद को हराया जा सकता है, दबाया जा सकता है। जब पूरा देश आतंकवादियों से आजिज आ चुका होगा तब सभी मोदी की ओर ही देखेंगे।...

Thursday, 20 December 2007

अब 'भारत' भी चलेगा कार पर!

१९९० के दशक के अंत में देश में ये डिजिटल डिवाईड को लेकर बहस बहुत तेज थी । लगभग हर बहस-मुबाहिसे में भारत और इंडिया को अलग कर देखने और दोनों के जीवन स्तर में अंतर पर बाहर एक फैशन जैसा हो गया था। इन दोनों दुनिया में फर्क कार पर चलने वाली आबादी तय करती थी। अर्थात जो कार पर चलते हों वो अगर और जो कार पर नहीं चलते वो देश भारत के लोग।

इधर जल्द ही इस बारे में टाटा कंपनी बड़ा बदलाव लाने वाली है। january २००८ में वह lakhtakiyaa कार के साथ बाज़ार में उतरने वाली है। जाहीर है कि यह एक ऐसी राशी है जिसे देश की बहुसंख्यक जनता या तो खुद के कार खरीदने पर खर्च कर सकती है या फिर सर्वजिंक रुप से चलने वाली कारों की सवारी कर सकती है। कल ही एक खबर आई थी कि टैक्सी एजेंटों कि निगाह टाटा के इस कार पर टिकी है। अगर ये कार उनकी अपेक्षावों पर खरी उतरती है तो जहीर है भारत कि अधिसंख्य आबादी कारों पर चलने लायक होगी। और फिर शहरी आबादी को कारो पर चलन के अलावा आगरा दिखने के लिए कोई और जुमला गढ़ना होगा.....................

सब्सिडी नहीं तो फिर आरक्षण क्यूँ!

सरकार का हाथ आम आदमी के साथ नारे वाली पार्टी कि सरकार है हमारे देश में। उस सरकार के मुखिया ने एक दिन कहा कि अब वक्त आ गया है कि किसानों को मिलने वाली सब्सिडी ख़त्म कर दी जाये। सरकार का कहना है कि इस से सरकार के ऊपर बोझ बहुत ज्यादा हो गया है और सही लोगों को इसका फायदा भी नहीं पहुंच रहा है। इसके कुछ दिन बाद ही उस सरकार ने देश के अल्पसंख्यकों के लिए पंचवर्षीय योजना मी से १५ फीसदी फंड एलौट कर दिया । सरकार को ये कोई बोझ नहीं लगा। अगर इस बात का कोई विरोध करे तो ये सरकार उसे सांप्रदायिक कहने से पीछे नहीं हटने वाली।

अब सरकार को ये भी सुनिश्चित करना चाहिऐ कि बाक़ी के बचे ८५ फीसदी पैसे से बने सड़क पर कोई अल्पसंख्यक नही चले, उस पैसे से हुए किसी काम का फायदा किसी अल्पसंख्यक को नहीं हो। अगर देश का बहुसंख्यक समुदाय इस तरह की माँग उठाने लगे तो इसमे बुराई क्या है। अगर १५ फीसदी पैसे पर अल्पसंख्यकों का अधिकार है तो बाक़ी के ८५ फीसदी पर बहुसंख्यकों का अधिकार भी तय होना चाहिऐ। सरकार का ये कदम देश को सांप्रदायिक अधर पर बांटने वाला है। अब ये भी तय होना चाहिऐ कि इस पैसे का ऐसे लोगों को भी फायदा नहीं होना चाहिऐ जो देश के खिलाफ काम करने वाली शक्तियों से मिले हुए हों। आतंकी हमलों को रोक पाने में असफल रही इस सरकार को ये भी तय करना चाहिऐ।

Wednesday, 12 December 2007

नंदीग्राम में वामपंथ का पंथ गायब!

१९६० के दशक में पश्चिम बंगाल के नक्सल बारी में हुए वामपंथी आन्दोलन ने वाम पंथ के लिए एक आईने का काम किया था। उसने समाज को ये दिखाया था कि भारत का वामपंथ अपने पंथ से हट रहा है। उस दौर में बंगाल में मुख्यधारा की वामपंथी पार्टियों ने मध्य वर्ग को विस्वास में लेकर, विशेषकर ग्रामीण आबादी को भरोसे में लेकर पश्चिम बंगाल में सरकार बनाई थी. लेकिन आज नंदीग्राम में चल रही लड़ाई भारत के वामपंथी विचारधारा से ताल्लुक रखने हर आदमी के लिए अहम् है। आज वहाँ चल रही लड़ाई में किसान और आम आदमी जमीन अधिग्रहण के खिलाफ खड़ा है और जो वामपंथी सरकार और वामपंथी पार्टी (सत्ताधारी) है वो उसके खिलाफ लड़ाई के मैदान में है। इस लड़ाई में माकपा को छोड़कर अन्य जो पार्टियां हैं, चाहे वे सरकार में साझेदार ही क्यों न हो माकपा के खिलाफ हैं। लेकिन उन्हें अपनी आवाज इस दर से दबानी पद रही है कि कह इस लड़ाई(sattasangharsh) कि आड़ लेकर माकपा उनकी वाम विचारधारा और वोट बैंक को हाईजैक ना कर ले।

नंदीग्राम में संघर्ष शुरू हुए एक साल होने जा रहा है। वहाँ लड़ाई किसान की अपनी जमीन बचाने को लेकर है। अब नंदीग्राम की लड़ाई एक प्रतीकात्मक लड़ाई बन गई है। ये लड़ाई अब देश के हर उस किसान की है जो औधोगिक इकाई लगाने के लिए किसी भी कीमत पर अपनी जमीन नहीं देना चाहता। मेरे विचार में इस मामले पर एक कानून बनना चाहिऐ। आखिर एक किसान को अपने पुरखों कि जमीन को जबरदस्ती बेचने को मजबूर कैसे किया जा सकता है। अपनी जड़ों को छोड़कर वो कहाँ जायेगा। उसे इस बात का अधिकार होना चाहिऐ कि वो अपने पुरखों कि जमीन को बेचने से इनकार कर सके। इस लड़ाई में दूसरा पक्ष सरकारी मशीनरी है जिनका ये काम है कि वो किसी भी कीमत पर विकास का काम आगे बढाये। अब ये अलग मसला है की सरकारी मशीनरी किस पार्टी के हाथ में है।

Tuesday, 11 December 2007

'भाजपा का आत्मविश्वास लौट रहा है'

गुजरात में प्रथम चरण के चुनाव से महज १८ घंटे पूर्व भाजपा के सारे दिग्गज मीडिया के सामने आये और एक सुर से प्रधानमंत्री पद के लिए अपने उम्मीदवार के लिए आडवाणी जी का नाम घोषित कर दिया। इसी के साथ अब ये मान लिया जाना चाहिऐ की भाजपा में वाजपेयी युग का अंत हो गया। अब कमान आडवाणी जी के हाथ में होगी. आडवाणी जी अब भाजपा का चेहरा होंगे। केन्द्र की सत्ता से बहा होने के तीन सालों भाजपा ने आडवाणी जी को अपना नेता घोषित कर साहस का परिचय दिया है। अब तक भाजपा उन्हें आगे करने में अपने सहयोगी दलों के कारण डर रही थी। जाहिर है भाजपा ने अब इस डर से खुद को मुक्त कर लिया है।

१८० सीटें लेकर भाजपा जब १९९८ में सत्ता में आई थी तब से लेकर सत्ता से बाहर आने तक भाजपा सहयोगी दलों के हाथों में खेलती रही। वाजपेयी जी को पीएम के रूप में देखने की चाहत रखने वाले लोगों को उनके लचीलेपन से काफी निराशा हुई थी। भाजपा ने सरकार चलाने के लिए मुख्य मसलों को भुला दिया। लेकिन आज आडवाणी की ताजपोशी भाजपा के लौटते आत्मविश्वास का संकेत है। वैसे भी गुजरात के चुनाव में भाजपा पूरे आत्मविश्वास से उतर रही है। उसे उम्मीद है की गुजरात में फिर से उसकी सरकार बनेगी। भाजपा को ही नहीं उसकी विचारधारा से ताल्लुक रखने वाले लोगों को भी उम्मीद है की अगले साल होने वाले लोक सभा चुनाव के पहले भाजपा फिर से उन मुद्दों को उठाने का साहस कर लेगी जिन्हें सत्ता के लिए उसने पिछली बार भुला दिया था। देखते हैं आडवाणी जी की अगुवाई में भाजपा भारत के बहुसंख्यक समुदाय के लिए आवाज बुलंद करने का कितना साहस बटोरे पाती है? ये जरूर होगा की सहयोगी दल फिर से रुकावट डालेंगे। लेकिन ऊससे क्या फर्क पड़ता है। आप आगे तो बढो बाकि लोग साथ होते जायेंगे।

Wednesday, 5 December 2007

"इंटरनेशनल डॉग शो में ४२ लाख का कुत्ता"

एक कुत्ते कि कीमत ४२ लाख ! आपको शायद इसपर यकीन न हो लेकिन यही सच है। उत्तरांचल की राजधानी देहरादून के सर्द मौसम में दुनिया भर के कुत्तो को लेकर उनके मालिक(अभिभावक - कृपया कोई बुरा ना माने) पहुंचे। मौका था इंटरनेशनल डॉग शो का। बंगलोर से आये एक कुत्ते की कीमत ४२ लाख थी। और ना जाने कितने नए-नए नस्ल के कुत्ते भी यहाँ लाये गए थे। भैया हमारे लिए तो नयी बात थी। हम तो गाँव के रहने वाले हैं और हमे याद है बचपन में जो कुत्ते हमे पसंद आ जाते थे उन्हें स्चूल से लौटते वक्त हम अपने बसते में छुपा चुपके से उठा लाते थे। न कोई कीमत देना होता था और ना ही कोई दोग शो में जाना पड़ता था। और कुत्ते भी साहब बडे होने के बाद इतने बहादुर निकलते । थी किसी कि मजाल जो रात को हमारे घर की ओर कदम बढ़ा लें।

देहरादून में पौंचे कुत्ते एक से एक उन्नत नस्ल के। उनके साथ आये थे उनके नखरे उठाते आ रहे उनके अभिभावक भी मुझे इसके पहले जानकारी नहीं थी कि कोई इस तरह का आयोजन भी दुनिया में होता हैं। कहीं और होता है या नहीं लेकिन यहाँ अपने देश में इस तरह का ये मेरा पहला अनुभव था। मुझे बहुत ख़ुशी हुई कि चलो अब तक कुत्तों को मालिकों के प्रति वफादारी के लिए जाना जाता था और अब आने वाली दुनिया में मालिकों को उनके कुत्तो के प्रति संजीदगी के लिए भी जाना जाएगा। दूसरी जिस बात पर मुझे ज्यादा ख़ुशी हुई की चालों इस तरह के आयोजन से कुत्तो का अंतरराष्ट्रीयकरण हो रहा है।

मुझे याद है वो कवी सम्मेलन । बात तब की है जब मैं बनारस में रहता था। बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी के लंका गेट पर हुए एक कवि सम्मेलन में एक युवा कवि ने सुनाया था "काश मैं किसी आमिर का कुत्ता होता" । उस बेचारे कवि कि व्यथा थी अमीरों के कुत्तों कि देखरेख कि व्यापक व्यवस्था को लेकर। बेचारे कि कविता में आमिर कुत्तो कि सम्पन्त्ता से जलन साफ दिख रही थी।

Sunday, 2 December 2007

माउस नहीं हुआ जैसे अल्लादीन का चिराग हो गया!

रोज इस तरह की कोई न कोई नई खबर देखने को मिलती है- माउस दबाइए ट्यूटर पाईये। माउस दबाये अपने ग्रुप का ब्लड पाईये। अब आप का मनपसंद साथी मिलेगा बस माउस को क्लीक करिये । इस तरह कि खबरें रोज अखबारों में, वेबसाइट्स पर और सड़क किनारे लगे इस्तेहारों पर हर जगह मिल जायेंगे । अब आप ही बताईये क्या ये सारी सुविधाएं मुफ्त में मिलेगी। अब इनके दावे देखने से तो ऐसा लगता है कि जैसे ये अल्लादीन का चिराग हों । आपने मसला और जिन हाजिर होकर बोलेगा क्या हुक्म हैं मेरे आका. मैंने जैसे ही उससे कहा कि कोई परी कोई हर मेरे सामने पेश कर और वो बस पलक झपकते ही लाकर किसी नाज़नीं को मेरे सामने हाजिर कर देगा।

ऎसी ही एक वेबसाइट पर देखा मैंने कि नए दोस्त पैयी। मैंने भी सोचा यार चलो कुछ नए लोगों से दोस्ती कर ली जाये । आजकल के जमाने मैं अच्छे दोस्त मिलते भी कहाँ हैं। भैया इसी जोश में मैंने उस वेबसाइट पर रजिस्ट्रेशन के लिए लगी फॉर्म को भर दिया। बस क्या था मेरे सामने एक बधाई पत्र तुरंत आ गया। उसमे मुझे बधाई देते हुए कहा गया था कि २४ घंटे के बाद आप नये दोस्तों से सम्पर्क कर सकेंगे । अगले दिन मेरे उत्साह का पारा नही था। पट से फिर उसी साइट पर आ गया. लोगिन की और नए लोगों कि लंबी लिस्ट हाजीर । कोई बोम्बे से तो कोई कोलकाता से। कोई मोस्को से तो कोई न्यूयॉर्क से। मेरी ख़ुशी और धरकन एक साथ तेज हो रही थी। मैंने सोचा जब मौका मिला है तो पट से एक लड़की को पत्र लिख ही दूँ , लेकिन ये क्या, इससे पहले कि मैं कुछ लिख पाता सामने सुब्स्क्रिप्शन कि लिस्ट आ गयी । उसमे मेंबर शिप के लिए शुल्क कि कई श्रेणियां थी । सआरी किम्तें डॉलर में थी। अपन लोग दोस्ती पर रुपया तो खर्च कर सकते नहीं अब डॉलर कौन करे। सो कर दिए बाय। लोग कहते हैं ना कि खोजने से तो भगवान् भी मिल सकता है । भैया लेकिन दोस्त पाने के लिए खोजने के साथ - साथ डॉलर का होना भी उतना ही जरुरी हो जाता है। अब जाकर समझ में आया अब वक्त बदल गया है और इसी कारन आजकल लोगों को अच्छे दोस्त नहीं मिल पा रहे हैं।

गुजरात की बेजान पिच पर डटे धुरंधर!

गुजरात में चुनावी बिसात बिछ चुकी है, सारे धुरंधर अपने-अपने बल्ले और गेंद का जौहर दिखाने के लिए गुजराती पिच पर उतर चुके हैं। क्या भाजपा और क्या कांग्रेस सभी २०-२० स्टाइल में अपनी जीत कि उम्मीद लगाए हुए हैं। लेकिन कोई कुछ भी कहे भाजपा के मास्टर ब्लास्टर नरेन्द्र मोदी गुजरात के बेजान पिच पर फिर परचम लहराने कि स्थिति में लग रहे हैं। हालांकि कांग्रेस ने पूरा जोर लगा लिया है मोदी से असंतुष्ट लोगों को अपनी तरफ करने में लेकिन कई लोगों के जाने के बाद भी मोदी का दमख़म कम होता नहीं दिख रहा है।

बेजान पीच पर कांग्रेस ने पूरा प्रयास किया कि गेंद को मोदी के शरीर के सिद्ध में रखकर निशाना बनाया जाये और इसके लिए मोदी के गढ़ में दरार डालने कि कोशिस भी की गई । यहाँ तक कि जिस दंगे के लिए कांग्रेस मोदी को kos रही थी उसी मोदी सरकार के ग्रीह मंत्री को मोदी के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए तैयार दिख रही है। यहाँ बात वही हुई ना कि राजनीति में कोई स्थायी दुश्मन या दोस्त नहीं होता, और राजनीति किसी सिद्धांत कि मोहताज नहीं होती, मौका पड़ने पर राजनितिक दल अछे-बुरे कि अपनी परिभाषा बदल सकते हैं। हालांकि आखिरी फैसला गुजरात कि जनता को ही करना है। और अब वक्त भी ज्यादा नहीं बचा है। देखते है कौन गुजरात सीरीज़ मैं चैम्पियन बनके उभरता है।

पिछली बार मोदी ने दो तिहाई सीटें जीती थी इस बार ये आंकड़ा कम जरूर होगा लेकिन लगता नहीं है कि मोदी कि सत्ता को कांग्रेस अभी उखाड़ पाने में सफल होगी। कारन वही है कि कांग्रेस ने अबतक अल्पसंख्यक तुस्तीकरण पर ज्यादा ध्यान दिया है इसके ठीक उलट मोदी ने बहुसंख्यक आबादी को रिझाने पर ध्यान दिया है। मोदी का ये नज़रिया लोकतांत्रिक व्यवस्था के मनमाफिक ही लगता है। आलोचना करने वाले चाहे जो भी कहें लेकिन लोकतंत्र वास्तव में बहुसंख्यक आबादी कि सत्ता ही होती है।